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School शुरू होते ही बच्चों को infection जल्दी क्यों होता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 06 Jul, 2026
  • category-iconUpdated on 06 Jul, 2026
  • category-iconChild Health
  • blog-view-icon5006

अक्सर देखा जाता है कि गर्मियों की छुट्टियों में बिल्कुल ठीक रहने वाला बच्चा स्कूल शुरू होते ही बीमार पड़ जाता है। कभी सर्दी-खांसी, तो कभी बुखार या गले में इन्फेक्शन उसे घेर लेता है। ज़्यादातर माता-पिता इस बात से परेशान रहते हैं कि अचानक ऐसा क्या हो गया।

स्कूल जाते ही बच्चा एक साथ कई बच्चों के संपर्क में आता है, जिससे नए-नए वायरस और बैक्टीरिया बहुत तेज़ी से फैलते हैं। इसके अलावा, अचानक से बदला हुआ रूटीन, सुबह जल्दी उठने के चक्कर में नींद पूरी न होना और खाने-पीने की आदतों में बदलाव भी बच्चे की इम्युनिटी को थोड़ा कमज़ोर कर देते हैं। यही कारण है कि शुरुआती हफ्तों में उनके बीमार होने का रिस्क सबसे ज़्यादा होता है। 

स्कूल जाते ही इंफेक्शन का खतरा क्यों बढ़ जाता है?

घर का माहौल सुरक्षित और सीमित होता है। लेकिन स्कूल का माहौल बिल्कुल अलग होता है। वहां बीमारियों के तेज़ी से फैलने के तीन मुख्य कारण होते हैं:

एक साथ कई बच्चों के संपर्क में आना: घर पर बच्चा गिने-चुने लोगों के बीच रहता है, लेकिन स्कूल में वह 30-40 बच्चों के साथ घंटों एक ही क्लास में बैठता है। ऐसे में अगर किसी एक बच्चे को भी सर्दी-जुकाम हो, तो बंद कमरे में हवा के ज़रिए वायरस बाकी बच्चों तक बहुत आसानी से पहुँच जाता है।

चीज़ें और जगहें शेयर करना: बच्चे आपस में पेंसिलें, लंच बॉक्स या पानी की बोतलें खूब शेयर करते हैं। इसके अलावा स्कूल के डेस्क, दरवाज़े के हैंडल और झूलों को दिनभर में सैकड़ों बच्चे छूते हैं। इन जगहों पर लगे कीटाणु बच्चे के हाथों में आ जाते हैं और जब वह उन्हीं हाथों से अपनी आँख, नाक या मुँह छूता है, तो बीमार पड़ जाता है।

रूटीन का अचानक बदलना: छुट्टियों के बाद अचानक सुबह जल्दी उठने के चक्कर में अक्सर बच्चों की नींद पूरी नहीं हो पाती। ऊपर से पढ़ाई, होमवर्क और खेलकूद की वजह से शरीर थकने लगता है। कम नींद और थकान के कारण उनकी बीमारियों से लड़ने की अंदरूनी ताकत (इम्युनिटी) कमज़ोर पड़ जाती है।

स्कूल खुलने पर बच्चों को कौन-सी बीमारियाँ सबसे ज़्यादा होती हैं?

स्कूल के शुरुआती महीनों में डॉक्टरों के पास आने वाले ज़्यादातर बच्चों में ये पांच समस्याएं सबसे आम होती हैं:

  • सर्दी और जुकाम: नाक बहना, लगातार छींकें आना, सिर भारी होना और हल्का बुखार। यह स्कूल जाने वाले बच्चों में साल में कई बार होना बहुत आम बात है।
  • वायरल बुखार: मौसम बदलने और बच्चों के एक-दूसरे के करीब आने से वायरल फीवर बहुत तेज़ी से फैलता है। इसमें अचानक तेज़ बुखार आता है और शरीर में दर्द होता है।
  • गले का इंफेक्शन: ठंडी चीजें खाने-पीने से या वायरस के कारण बच्चों के गले में खराश हो जाती है। उन्हें कुछ भी निगलने में दर्द महसूस होता है।
  • पेट खराब होना: अगर बच्चे बिना हाथ धोए खाना खा लेते हैं, या स्कूल में कहीं बाहर का गंदा पानी पी लेते हैं, तो पेट में दर्द, उल्टी और दस्त की शिकायत शुरू हो जाती है।
  • आंखों का इंफेक्शन (Pink Eye): आंखें लाल होना, उनसे पानी आना या खुजली होना। बच्चे अक्सर गंदे हाथों से आंखों को रगड़ देते हैं, जिससे यह संक्रमण पूरी कक्षा में आग की तरह फैल जाता है।

आयुर्वेद बच्चों की बीमारियों को कैसे देखता है?

आयुर्वेद बीमारियों को शरीर के अंदरूनी संतुलन से जोड़कर देखता है। बच्चों के मामले में आयुर्वेद तीन मुख्य बातों पर ज़ोर देता है:

बचपन और 'कफ' का प्रभाव: आयुर्वेद के मुताबिक, बचपन का दौर शरीर में 'कफ' का समय होता है। यह विकास के लिए तो ज़रूरी है, लेकिन थोड़ा सा भी मौसम बदलने या गलत खानपान से कफ तुरंत बढ़ जाता है। यही वजह है कि बच्चों को बड़ों के मुकाबले सर्दी, खांसी और बलगम की शिकायत बहुत जल्दी होती है।

सुरक्षा दीवार यानी 'ओज': हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) को आयुर्वेद में 'ओज' कहा जाता है। जब बच्चा अच्छी नींद लेता है और पौष्टिक खाना खाता है, तो यह सुरक्षा दीवार मज़बूत रहती है। लेकिन ज़्यादा थकान और जंक फूड से यह दीवार कमज़ोर पड़ जाती है, जिससे वायरस आसानी से हमला कर देते हैं।

पेट की आग यानी 'पाचन शक्ति': आयुर्वेद मानता है कि हर बीमारी की जड़ पेट में होती है। अगर बच्चे की 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) मज़बूत है, तो खाना सही से पचकर ताकत बनेगा। वहीं, बिना समय खाए या चिप्स-चॉकलेट जैसी चीजों से पेट में गंदगी (टॉक्सिन्स) जमा होने लगती है, जो बच्चे को बार-बार बीमार करती है।

बच्चों की कौन-सी आदतें उन्हें जल्दी बीमार बनाती हैं?

कई बार हम अनजाने में बच्चों की कुछ ऐसी आदतों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जो उनकी सेहत को अंदर से कमज़ोर कर रही होती हैं:

  • देर रात तक जागना: अगर बच्चा रात को 11-12 बजे तक टीवी या मोबाइल देखता है और सुबह स्कूल के लिए 6 बजे उठ जाता है, तो उसकी नींद पूरी नहीं होती। कम नींद सीधे बच्चे की इम्युनिटी को घटा देती है।
  • पैकेट वाले और तले-भूने खाने का शौक: चिप्स, बिस्कुट, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक्स और ज़्यादा मीठी चीजें बच्चों का पेट तो भर देती हैं, लेकिन शरीर को ताकत नहीं देतीं। उलटा ये पेट में जाकर कफ और गंदगी बढ़ाती हैं।
  • हाथ न धोने की आदत: ज़्यादातर बच्चे खेलकूद कर सीधे डाइनिंग टेबल पर आ जाते हैं और बिना साबुन से हाथ धोए खाना शुरू कर देते हैं। हाथों में छिपे कीटाणु सीधे पेट में चले जाते हैं।
  • पानी कम पीना: स्कूल में बच्चे खेलने और बात करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वे पानी की बोतल वैसी की वैसी भरी हुई घर ले आते हैं। पानी कम पीने से शरीर की गंदगी बाहर नहीं निकल पाती।

बच्चों को मज़बूत बनाने के लिए घर का आसान खानपान

बच्चों को डॉक्टर और कड़वी दवाइयों से बचाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उनकी रसोई से ही शुरुआत की जाए। उन्हें ऐसा भोजन दें जो शरीर में ऊर्जा भरे और पचने में आसान हो:

ताज़ा और घर का बना भोजन दें: बच्चों को हमेशा ताज़ा, गर्म और घर पर बना खाना ही दें। बासी या बहुत देर तक फ्रिज में रखा खाना बच्चों के पेट के लिए भारी होता है।

दाल, घी और हरी सब्जियां: बच्चे के खाने में मूंग की दाल, थोड़ा सा शुद्ध देसी घी और मौसम की हरी सब्जियां जरूर शामिल करें। घी बच्चों के शरीर और दिमाग को ताकत देता है। पनीर और घर में जमाया हुआ ताज़ा दही (दोपहर के समय) भी बच्चों के विकास के लिए बहुत अच्छे होते हैं।

रंग-बिरंगे मौसमी फल: सेब, पपीता, अमरूद, केला, संतरा या अनार, जो भी फल मौसम के हिसाब से बाजार में आ रहा हो, बच्चे को रोज़ एक फल जरूर खिलाएं। फलों में प्राकृतिक विटामिन होते हैं जो बीमारियों से लड़ते हैं।

रसोई के आसान मसाले: खाना बनाते समय उसमें चुटकी भर हल्दी, थोड़ा सा जीरा, धनिया और कभी-कभार थोड़ी सी अदरक जरूर डालें। ये घरेलू मसाले शरीर के अंदर से सूजन को कम करते हैं और पेट को साफ रखते हैं। हल्दी वाला दूध (रात को सोते समय थोड़ा सा) बच्चों को सर्दी-जुकाम से बचाने का सबसे पुराना और बेहतरीन उपाय है।

बच्चों का रूटीन कैसा होना चाहिए? 

अगर आप चाहते हैं कि बच्चा बार-बार बीमार न पड़े, तो उसके रूटीन में ये बदलाव करके देखिए:

सोने का टाइम एकदम फिक्स रखें: स्कूल जाने वाले बच्चों को 8 से 9 घंटे की नींद हर हाल में चाहिए। कोशिश करें कि रात 9 या 9:30 बजे तक बच्चा बिस्तर पर चला जाए। नींद पूरी होगी तो सुबह उठने में कोई चिड़चिड़ाहट नहीं होगी और शरीर पूरे दिन थका हुआ महसूस नहीं करेगा।

फोन छोड़ें, बाहर पसीना बहाएं: आजकल बच्चे स्कूल से आते ही फोन या टीवी से चिपक जाते हैं। शाम को उन्हें कम से कम एक घंटे के लिए पार्क ज़रूर भेजें। साइकिल चलाने या दौड़ने-भागने से जब पसीना निकलेगा, तो शरीर अंदर से मजबूत होगा और भूख भी खुलकर लगेगी।

हाथ धोने की आदत डालें: बच्चे को साफ-सफाई की अहमियत समझाएं। स्कूल से लौटकर, वॉशरूम जाने के बाद या कुछ भी खाने से पहले हाथ साबुन से धोना उनकी आदत में शामिल कराएं। साथ ही उन्हें बताएं कि जब भी खांसी या छींक आए, तो मुंह के आगे रुमाल या अपनी कोहनी ज़रूर रखें।

पैरेंट्स के लिए कुछ काम की बातें

बच्चों को स्कूल के इन्फेक्शन से बचाने के लिए आप रोज़ इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख सकते हैं:

  • टिफिन में रोज़-रोज़ ब्रेड, मैगी या नूडल्स पैक करने से बचें। घर का बना ताज़ा चीला, पोहा, इडली या पराठा-सब्जी बहुत बेहतर और हेल्दी ऑप्शन है।
  • बंद बोतलों में कीटाणु बहुत जल्दी पनपते हैं, इसलिए बच्चे की पानी की बोतल को रोज़ हल्के गर्म पानी और साबुन से रगड़कर धोएं।
  • बच्चे को प्यार से ये बात समझाएं कि स्कूल में दोस्तों के साथ पानी की बोतल या लंच बॉक्स सीधे मुंह लगाकर झूठा न करें।
  • रात को सोते वक्त बच्चे के कमरे में हल्का अंधेरा और पूरी शांति रखें, ताकि उसकी नींद बीच में न टूटे।

रोज़ थोड़ा वक्त निकालकर बच्चे की बातें सुनें। कई बार स्कूल, पढ़ाई या दोस्तों की कोई बात उन्हें परेशान कर रही होती है और अंदर से कमज़ोर कर देती है।

डॉक्टर के पास तुरंत कब जाना चाहिए?

अगर बच्चे में नीचे दिए गए कोई भी लक्षण दिखें, तो बिल्कुल देरी न करें और तुरंत डॉक्टर के पास जाएं:

  • बुखार 101 या 102 डिग्री से ऊपर जा रहा हो और दवा देने पर भी कम न हो रहा हो।
  • बच्चे को सांस लेने में दिक्कत हो रही हो या उसकी सांस बहुत तेज़ चल रही हो।
  • बच्चा लगातार उल्टी कर रहा हो या उसे पानी जैसे दस्त हो रहे हों।
  • बच्चा बहुत ज़्यादा सुस्त हो जाए, आंखें न खोले और बात करने का भी मन न करे।
  • उसने खाना-पीना पूरी तरह से छोड़ दिया हो और शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) दिखने लगे।

निष्कर्ष 

स्कूल खुलते ही बच्चों का बीमार पड़ना ज़्यादातर घरों की कहानी है। एक साथ बहुत सारे बच्चों के बीच आना, चीजें शेयर करना और सुबह जल्दी उठने की थकान, ये सब मिलकर बच्चों पर थोड़ा असर डालते हैं। आयुर्वेद इसे कफ के बढ़ने और पाचन के सुस्त होने से जोड़ता है।

आपको इस स्थिति से घबराने की जरूरत नहीं है। बस बच्चे के खानपान को सादा और घर का बना रखें, उसे समय पर सुलाएं, हाथ धोने की अच्छी आदतें सिखाएं और उसे बाहर खेलने के लिए भेजें। थोड़ी सी समझदारी और सही देखभाल से आपका बच्चा स्कूल की नई दुनिया का भरपूर आनंद भी लेगा और बीमारियों से भी बचा रहेगा।

References

Kids Boost Immunity

Immune system: development and acquisition of immunological competence - PMC

Children’s immature immune systems threatened by increasing ‘superbugs’

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ। खासकर छोटे बच्चों में स्कूल शुरू होने के शुरुआती महीनों में साल में कई बार सर्दी-जुकाम होना सामान्य माना जाता है, क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम नए वायरस के संपर्क में आता रहता है।

हाँ। यदि स्कूल में वायरल संक्रमण फैल रहा हो या बच्चे की इम्युनिटी कमजोर हो, तो सही तरीके से मास्क पहनने से कुछ हद तक संक्रमण का जोखिम कम किया जा सकता है।

हर बच्चे को मल्टीविटामिन की आवश्यकता नहीं होती। संतुलित आहार लेने वाले अधिकांश बच्चों को अतिरिक्त सप्लीमेंट की जरूरत नहीं पड़ती। सप्लीमेंट केवल डॉक्टर की सलाह पर ही दें।

अगर केवल हल्की नाक बह रही है और बच्चा सामान्य रूप से सक्रिय है, तो कई मामलों में वह स्कूल जा सकता है। लेकिन तेज बुखार, लगातार खांसी, उल्टी, दस्त या अत्यधिक कमजोरी होने पर उसे घर पर आराम देना और डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

AC सीधे बीमारी का कारण नहीं बनता। लेकिन बंद कमरों में वायरस आसानी से फैल सकते हैं और बहुत ठंडी हवा कुछ बच्चों में गले की परेशानी बढ़ा सकती है। सही तापमान और पर्याप्त वेंटिलेशन रखना जरूरी है।

हाँ। मौसमी फल बच्चों को विटामिन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करते हैं। हालांकि कटे हुए फलों को लंबे समय तक गर्म वातावरण में रखने से बचें और ताज़े फल ही दें।

नहीं। अधिकांश सर्दी-जुकाम और वायरल बुखार वायरस के कारण होते हैं, जिनमें एंटीबायोटिक काम नहीं करती। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक देना नुकसानदायक हो सकता है।

हाँ। टिफिन बॉक्स और पानी की बोतल को रोज़ अच्छी तरह धोना चाहिए। स्कूल बैग, लंच बैग और अक्सर छुई जाने वाली चीज़ों की भी समय-समय पर सफाई करने से संक्रमण का खतरा कम हो सकता है।

बिल्कुल। राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए सभी वैक्सीन समय पर लगवाने से कई गंभीर संक्रमणों से बचाव होता है।

ज़रूरी नहीं। छोटे बच्चों में नए संक्रमणों के संपर्क में आने के कारण साल में कई बार सर्दी-जुकाम होना सामान्य हो सकता है। लेकिन यदि बच्चा बार-बार गंभीर संक्रमण का शिकार हो, लंबे समय तक ठीक न हो या उसका विकास प्रभावित हो रहा हो, तो बाल रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।

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