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सुबह उठते ही छींकें, नाक बहना, गले में खराश और भारी-सा सिर, जुकाम छोटा लगता है, लेकिन जब यह बार-बार होने लगे तो बहुत परेशान कर देता है। कई लोग इसे “सामान्य” मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, पर आयुर्वेद कहता है कि शरीर कभी बिना वजह संकेत नहीं देता। अक्सर हम मौसम, ठंडा पानी या आइसक्रीम को दोष देते हैं, लेकिन जुकाम सिर्फ बाहर की ठंड से नहीं होता, यह अंदर की असंतुलित स्थिति का भी परिणाम हो सकता है।
पाचन, नींद, दिनचर्या, तनाव और खान-पान, ये सब मिलकर प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बनाते हैं। जब पाचन कमजोर हो, नींद अधूरी हो या दिनचर्या अनियमित हो, तो शरीर संक्रमण को जल्दी पकड़ लेता है। कुछ लोगों को मौसम बदलते ही जुकाम हो जाता है जबकि कुछ लोग ठंड में भी ठीक रहते हैं, फर्क अक्सर अंदरूनी संतुलन का होता है। आयुर्वेद इसी संतुलन को समझकर जड़ से सुधारने की बात करता है, न कि सिर्फ लक्षण दबाने की।
जुकाम क्या होता है?
जुकाम एक सामान्य श्वसन संक्रमण है जो नाक और गले को प्रभावित करता है। इसमें नाक बहना, छींक आना, गले में खराश, सिर भारी लगना, हल्का बुखार, आंखों से पानी आना या शरीर टूटना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। शुरुआत अक्सर हल्की असहजता से होती है, लेकिन एक-दो दिन में लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं और रोज़मर्रा का काम भी प्रभावित करने लगते हैं। आधुनिक दृष्टि से यह अक्सर वायरस के कारण होता है। यह जल्दी फैलता है, खासकर मौसम बदलते समय, भीड़भाड़ वाली जगहों पर, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से, या जब शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो। ठंडी हवा, धूल या एलर्जी भी कुछ लोगों में जुकाम जैसे लक्षण ट्रिगर कर सकती है।
जुकाम अमातौर पर 5-7 दिनों में ठीक हो जाता है, लेकिन अगर ध्यान न दिया जाए तो यह साइनस, गले या छाती तक भी असर कर सकता है। बार-बार जुकाम होना इस बात का संकेत भी हो सकता है कि शरीर की इम्युनिटी या पाचन शक्ति को सहारे की जरूरत है, इसलिए इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं माना जाता।
जुकाम होने के सामान्य कारण क्या हो सकते हैं?
जुकाम को हम अक्सर छोटी और सामान्य समस्या मान लेते हैं, लेकिन जब यह बार-बार होने लगे तो रोजमर्रा की जिंदगी को काफी प्रभावित कर देता है। बार-बार छींकना, नाक बहना और सिर भारी रहना काम करने की ऊर्जा भी कम कर देता है। कई लोग तुरंत दवा लेकर लक्षण दबा देते हैं, पर यह समझने की कोशिश नहीं करते कि समस्या बार-बार क्यों लौट रही है।
आयुर्वेद इस स्थिति को सिर्फ संक्रमण नहीं मानता, बल्कि शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन का संकेत मानता है। हमारी दिनचर्या, भोजन की आदतें, नींद और पाचन, ये सब मिलकर तय करते हैं कि शरीर कितनी मजबूती से मौसम और संक्रमण का सामना करेगा। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो जुकाम जल्दी पकड़ लेता है। इसलिए कारण को समझना और सही तरीके से संभालना ज्यादा जरूरी हो जाता है।
- जुकाम सिर्फ ठंड से नहीं, आदतों से भी जुड़ा है - इसे केवल मौसम की बीमारी मानना अधूरा नजरिया है। रोजमर्रा की लाइफस्टाइल भी बड़ा रोल निभाती है और बार-बार होने का कारण बन सकती है।
- ठंडी और भारी चीजों का ज्यादा सेवन - फ्रिज का पानी, आइसक्रीम, रात में दही, कोल्ड ड्रिंक्स और ज्यादा मीठा कफ बढ़ाते हैं, जिससे नाक-गले में बलगम जमा होने लगता है।
- कमजोर पाचन शक्ति - अगर खाना ठीक से नहीं पचता, गैस, भारीपन या आलस रहता है, तो “अमा” बनता है जो इम्युनिटी घटाकर जुकाम की संभावना बढ़ाता है।
- कम नींद और ज्यादा तनाव - अधूरी नींद और मानसिक दबाव शरीर की प्राकृतिक रक्षा क्षमता को कमजोर करते हैं, जिससे संक्रमण जल्दी असर दिखाता है।
- अनियमित दिनचर्या - देर रात सोना, बिना समय के खाना और ज्यादा स्क्रीन टाइम शरीर की लय बिगाड़ते हैं और बार-बार जुकाम को ट्रिगर कर सकते हैं।
- पर्यावरणीय कारण - धूल, धुआं, प्रदूषण, ठंडी हवा और अचानक तापमान बदलना संवेदनशील लोगों में तुरंत लक्षण शुरू कर सकता है।
छोटी आदतों में सुधार और संतुलित दिनचर्या अपनाने से जुकाम की आवृत्ति काफी हद तक कम की जा सकती है। शरीर के संकेतों को समय पर समझना ही सबसे अच्छा बचाव है।
क्या हर जुकाम एक जैसा होता है?
नहीं, हर जुकाम एक जैसा नहीं होता। यही वजह है कि एक ही दवा हर व्यक्ति पर एक जैसा असर नहीं दिखाती। आयुर्वेद के अनुसार जुकाम व्यक्ति की प्रकृति, मौसम, पाचन और दोषों की स्थिति के अनुसार अलग रूप ले सकता है। इसलिए सिर्फ “जुकाम” नाम देखकर इलाज तय नहीं किया जाता, बल्कि लक्षणों की प्रकृति समझी जाती है।
आयुर्वेद तीन मुख्य दोष - वात, पित्त और कफ के आधार पर जुकाम के प्रकार को समझाता है। किस दोष की वृद्धि ज्यादा है, उसी के अनुसार लक्षण भी बदलते हैं और देखभाल का तरीका भी।
कफ प्रधान जुकाम में नाक से गाढ़ा, चिपचिपा बहाव आता है, सिर और चेहरा भारी लगता है और सुस्ती ज्यादा रहती है। ऐसे लोगों को नींद अधिक आती है और भूख कम लगती है। यह प्रकार अक्सर ठंडी, मीठी और भारी चीजें ज्यादा लेने या ठंडे मौसम में ज्यादा दिखता है।
वात प्रधान जुकाम में सूखापन ज्यादा होता है। नाक बंद रहती है, पर बहाव कम होता है। सिरदर्द, शरीर दर्द, गले में सूखापन और आवाज़ बैठना अमा है। ठंडी हवा, अनियमित दिनचर्या, कम नींद और ज्यादा यात्रा करने से यह प्रकार बढ़ सकता है।
पित्त प्रधान जुकाम में जलन, हल्का बुखार, गले में गर्मी, प्यास ज्यादा लगना और पीला या हल्का हरा बहाव दिख सकता है। आंखों में जलन और चिड़चिड़ापन भी साथ हो सकते हैं। यह प्रकार तब ज्यादा दिखता है जब शरीर में गर्मी बढ़ी हो या तीखा-खट्टा भोजन ज्यादा लिया गया हो।
इसीलिए आयुर्वेद में इलाज व्यक्ति और लक्षण देखकर तय किया जाता है, सिर्फ बीमारी का नाम देखकर नहीं। सही प्रकार पहचानने से उपचार अधिक सटीक और असरदार माना जाता है।
क्या बार-बार होने वाला जुकाम नजरअंदाज़ करने पर साइनस की समस्या में बदल सकता है?
साइनस की समस्या अक्सर साधारण जुकाम से ही शुरू होती है, खासकर जब जुकाम बार-बार हो या ठीक होने के बाद भी नाक का जमाव बना रहे। जुकाम के दौरान नाक और साइनस के अंदर की परतों में सूजन आ जाती है और कफ ज्यादा बनने लगता है। सामान्य स्थिति में यह कफ बाहर निकल जाता है, लेकिन जब रास्ते सूजकर संकरे हो जाते हैं, तो कफ अंदर ही फंसने लगता है। यही जमा हुआ कफ आगे चलकर साइनस की परेशानी पैदा कर सकता है।
जब जुकाम ठीक से संभाला नहीं जाता, जैसे लगातार ठंडी चीजें लेना, आराम न करना, या बार-बार दवाओं से लक्षण दबाना, तो सूजन लंबी चल सकती है। इसके कारण साइनस गुहाओं में दबाव बढ़ता है और चेहरे, माथे और आंखों के आसपास दर्द महसूस होने लगता है। कई लोगों को लगता है कि “सिर्फ जुकाम है”, जबकि अंदर साइनस प्रभावित हो रहे होते हैं। जुकाम से जुड़े साइनस लक्षणों में नाक लंबे समय तक बंद रहना, गाढ़ा बलगम, सिर झुकाने पर दर्द बढ़ना, गालों में भारीपन, और गले में कफ गिरने का एहसास शामिल हो सकता है। कभी-कभी हल्का बुखार और थकान भी बनी रहती है। यह संकेत है कि साधारण जुकाम साइनस सूजन में बदल रहा है।
आयुर्वेदिक नजरिए से बार-बार जुकाम कफ दोष के लगातार बढ़े रहने का संकेत है। जब कफ बार-बार बनता और जमा होता है, तो साइनस क्षेत्र रुकावट का केंद्र बन जाता है। इसलिए जुकाम को शुरुआत में ही संभालना, कफ कम करना, पाचन सुधारना और नाक मार्ग साफ रखना, साइनस से बचाव के महत्वपूर्ण कदम माने जाते हैं।
Symptoms
लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं
पहले हल्की जलन, छींक या भारीपन महसूस होता है, फिर 1–3 दिन में पूरा जुकाम जैसा महसूस होने लगता है।
नाक बहना या बंद होना
यह सबसे सामान्य संकेत है; कभी पानी जैसा बहाव होता है, तो कभी नाक जाम होकर सांस लेना मुश्किल करता है।
लगातार छींकें आना
खासकर सुबह, धूल या ठंडी हवा में जाने पर छींकें ज्यादा आने लगती हैं।
गले में खुजली या खराश
गला सूखा, चुभता या खुरदुरा लग सकता है, बोलने या निगलने में हल्की परेशानी भी हो सकती है।
आवाज़ बैठना
गले में सूजन या कफ के कारण आवाज भारी या धीमी पड़ सकती है।
सिर भारी और आंखों में पानी
माथे पर दबाव, आंखों से पानी आना और हल्का दर्द साथ में हो सकता है।
हल्का बुखार और थकान
शरीर गर्म लगना, कमजोरी और काम में मन न लगना भी सामान्य संकेत हैं।
कफ या सूखेपन के अनुसार फर्क
कफ ज्यादा हो तो गाढ़ा बलगम बनता है; सूखापन ज्यादा हो तो नाक बंद रहती है लेकिन बहती नहीं।
आयुर्वेद के अनुसार जुकाम कैसे समझा जाता है?
आयुर्वेद में जुकाम को मुख्य रूप से कफ दोष की वृद्धि और अग्नि (पाचन शक्ति) की कमजोरी से जोड़ा जाता है। जब शरीर में कफ बढ़ता है, जैसे ठंडी, भारी, तैलीय या मीठी चीजों के अधिक सेवन से तो श्वसन मार्ग में श्लेष्मा (म्यूकस) अधिक बनने लगता है। यही कफ नाक, गले और सिर में जमा होकर जुकाम के लक्षण पैदा करता है।
अगर पाचन ठीक नहीं है, तो “अमा” (अधपचा भोजन) बनता है। आयुर्वेद मानता है कि यह अमा शरीर में रुकावट, भारीपन और सूक्ष्म स्तर पर सूजन पैदा करता है, जिससे संक्रमण जल्दी पकड़ लेता है और ठीक होने में भी समय लगता है। ऐसे लोगों में जुकाम बार-बार लौट सकता है या लंबा खिंच सकता है। आयुर्वेद यह भी मानता है कि गलत दिनचर्या, जैसे देर रात जागना, दिन में सोना, बिना भूख के खाना, और मौसम के विपरीत आहार, कफ और अमा दोनों को बढ़ाते हैं। इसलिए उपचार में सिर्फ लक्षण कम करना ही लक्ष्य नहीं होता, बल्कि पाचन सुधारना, कफ संतुलित करना और शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना भी जरूरी माना जाता है। इसी कारण आयुर्वेदिक दृष्टि में जुकाम सिर्फ संक्रमण नहीं बल्कि दोष
असंतुलन + कमजोर पाचन + कम प्रतिरोधक क्षमता का संयुक्त परिणाम है।
जुकाम में आयुर्वेदिक घरेलू उपचार क्या मदद कर सकते हैं?
शुरुआती जुकाम में हमेशा भारी दवाओं की जरूरत नहीं होती। अगर समय पर ध्यान दिया जाए, तो घर के सरल आयुर्वेदिक उपाय काफी राहत दे सकते हैं। इन उपायों का मकसद कफ को ढीला करना, गले को आराम देना और शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को सहारा देना होता है। खास बात यह है कि ये उपाय आसान, सुरक्षित और रोजमर्रा की रसोई में उपलब्ध चीजों से किए जा सकते हैं।
- गुनगुना पानी बार-बार पीना - दिनभर हल्का गरम पानी पीने से कफ पतला होता है और गले की खराश कम महसूस होती है। ठंडे पानी से बचकर यह छोटा कदम भी रिकवरी तेज कर सकता है।
- अदरक-तुलसी-काली मिर्च का काढ़ा - इनका हल्का काढ़ा गले को गर्माहट देता है और जमाव कम करने में सहायक माना जाता है। इसे दिन में 1–2 बार ताज़ा बनाकर लेना बेहतर रहता है।
- भाप लेना (स्टीम इनहेलेशन) - सादी भाप या अजवाइन डालकर भाप लेने से नाक के रास्ते खुलते हैं और सिर का भारीपन घटता है। यह जमाव और बंद नाक में तुरंत आराम दे सकता है।
- हल्दी वाला दूध - रात में हल्दी मिलाकर गुनगुना दूध लिया जा सकता है, अगर कफ बहुत गाढ़ा न हो। यह शरीर को गर्म रखता है और गले को आराम देता है।
ध्यान रखें, ये उपाय शुरुआती और हल्के जुकाम में ज्यादा मदद करते हैं। अगर लक्षण तेज हों या कई दिन बने रहें, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहता है।
क्या आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां भी उपयोगी होती हैं?
आयुर्वेद में कई जड़ी-बूटियों का उपयोग पारंपरिक रूप से श्वसन तंत्र को सहारा देने के लिए किया जाता रहा है। इनका उद्देश्य सिर्फ लक्षण कम करना नहीं, बल्कि कफ संतुलित करना, गले को आराम देना और पाचन को सहारा देना भी होता है। सही जड़ी-बूटी का चयन व्यक्ति की प्रकृति और लक्षणों के अनुसार किया जाता है, इसलिए समझदारी से उपयोग करना जरूरी है।
- तुलसी - तुलसी को श्वसन स्वास्थ्य के लिए हितकारी माना जाता है। इसका सेवन काढ़े या चाय के रूप में किया जाता है, जो गले को आराम और हल्की गर्माहट देने में सहायक माना जाता है।
- मुलेठी - गले की खराश, सूखापन और खांसी जैसी स्थितियों में मुलेठी पारंपरिक रूप से उपयोग होती है। इसे चूसकर या काढ़े में मिलाकर लिया जाता है।
- अदरक - अदरक पाचन को सहारा देने और कफ संतुलित करने दोनों में उपयोगी माना जाता है। जुकाम के दौरान अदरक वाली चाय या काढ़ा अमा तौर पर लिया जाता है।
- गिलोय - गिलोय को प्रतिरोधक क्षमता सहारा देने वाली जड़ी-बूटी माना जाता है। इसे काढ़े या तैयार फॉर्म में लिया जाता है, खासकर बार-बार जुकाम होने वालों में।
- पिप्पली - पिप्पली (लॉन्ग पेपर) श्वसन मार्ग में जमा कफ कम करने और अग्नि सुधारने के लिए जानी जाती है। इसे अक्सर मिश्रणों में उपयोग किया जाता है, अकेले कम मात्रा में ही दी जाती है।
- त्रिकटु संयोजन - सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली का मिश्रण अग्नि सुधारने और कफ कम करने के लिए जाना जाता है। यह प्रभावी माना जाता है, लेकिन इसकी मात्रा और उपयोग विशेषज्ञ की सलाह से ही होना चाहिए।
बाजार में तैयार आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन भी उपलब्ध हैं, लेकिन स्वयं दवा शुरू करने के बजाय वैद्य से सलाह लेना अधिक सुरक्षित और उचित रहता है। सही मार्गदर्शन से ही जड़ी-बूटियों का पूरा लाभ मिल पाता है।
कब डॉक्टर या वैद्य से मिलना जरूरी है?
साधारण जुकाम अक्सर 5–7 दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें या सामान्य से ज्यादा तेज महसूस हों, तो विशेषज्ञ से मिलना जरूरी हो जाता है। जैसे, तेज बुखार कई दिन तक बना रहे, सांस लेने में दिक्कत हो, सीने में जकड़न महसूस हो, कफ का रंग गहरा पीला या हरा हो जाए, या चेहरे, माथे और कान के आसपास दर्द बढ़ने लगे। ये संकेत बताते हैं कि संक्रमण गहरा हो सकता है या साइनस/छाती भी प्रभावित हो रही है।
बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से अस्थमा, एलर्जी या कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। अगर जुकाम बार-बार लौट रहा है, 10 दिन से ज्यादा खिंच रहा है, या हर बार ज्यादा तेज हो रहा है, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहना ठीक नहीं। ऐसे में डॉक्टर या आयुर्वेदिक वैद्य से मिलकर कारण समझना और व्यक्तिगत सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी रहता है।
निष्कर्ष
जुकाम सामान्य जरूर है, लेकिन बार-बार होना यह संकेत देता है कि शरीर को अंदर से सहारे की जरूरत है। सिर्फ लक्षण दबाने के बजाय कारण समझना, जैसे कफ बढ़ना, कमजोर पाचन और अनियमित दिनचर्या, ज्यादा जरूरी है। आयुर्वेद सरल उपायों, संतुलित आहार और सही जीवनशैली के जरिए जुकाम को संभालने और दोबारा होने से रोकने पर जोर देता है। समय पर देखभाल, घरेलू उपाय और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह, इन तीनों का संतुलन ही जुकाम से सुरक्षित और समझदारी भरा बचाव देता है।
अगर आप बार-बार होने वाले जुकाम, नाक बंद रहने या साइनस जैसी परेशानी से परेशान हैं, तो प्रमाणित जीवा डॉक्टरों से व्यक्तिगत परामर्श लें। सही मार्गदर्शन और संतुलित आयुर्वेदिक उपचार के साथ राहत पाना आसान और सुरक्षित हो सकता है। आज ही कॉल करें: 0129-4264323
FAQs
नहीं, जुकाम अमातौर पर हल्का होता है जबकि फ्लू के लक्षण तेज होते हैं, जैसे तेज बुखार, ज्यादा बदन दर्द और कमजोरी।
सामान्य जुकाम अक्सर 5–7 दिनों में ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ लोगों में 10 दिन तक भी रह सकता है।
हाँ, बार-बार जुकाम होना कम प्रतिरोधक क्षमता, कमजोर पाचन या असंतुलित दिनचर्या का संकेत हो सकता है।
ठंडी और भारी चीजें कफ बढ़ाती हैं, जिससे नाक और गले में जमाव बढ़ सकता है और लक्षण लंबे चल सकते हैं।
अगर कफ बहुत ज्यादा और गाढ़ा है तो दूध कम लेना बेहतर है। हल्दी वाला गुनगुना दूध कुछ लोगों को सूट करता है।
हाँ, भाप लेने से नाक के रास्ते खुलते हैं, कफ ढीला होता है और सिर का भारीपन कम महसूस होता है।
सामान्य जुकाम अक्सर वायरस से होता है, इसलिए एंटीबायोटिक अमातौर पर जरूरी नहीं होती जब तक बैक्टीरियल संक्रमण न हो।
हल्का काढ़ा सीमित मात्रा में लिया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक नियमित सेवन से पहले वैद्य की सलाह बेहतर है।
जब तेज बुखार, सांस में दिक्कत, चेहरे में दर्द, गाढ़ा रंगीन कफ या 10 दिन से ज्यादा लक्षण बने रहें।
हाँ, बार-बार या लंबे समय तक रहने वाला जुकाम साइनस में सूजन और कफ जमाव बढ़ाकर साइनसाइटिस का कारण बन सकता है।
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