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ट्राइग्लिसराइड बढ़ने की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार: कारण, लक्षण और इलाज

जीवा आयुर्वेद के साथ पाएँ ट्राइग्लिसराइड बढ़ने की समस्या का प्राकृतिक और सम्पूर्ण आयुर्वेदिक इलाज। यहाँ आपको मिलती है व्यक्तिगत समस्या के अनुसार बनी उपचार योजना, जिसमें शामिल हैं आयुर्वेदिक दवाएँ, जड़ी-बूटियाँ, खानपान में बदलाव और जीवनशैली में सुधार। आज ही करें जीवा के प्रमाणित विशेषज्ञों से निःशुल्क परामर्श बुक।

आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली, अनियमित भोजन और बढ़ते तनाव के कारण मेटाबॉलिक समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण समस्या है रक्त में ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा हुआ स्तर, जो अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करता रहता है। नियमित हेल्थ चेकअप के दौरान जब लिपिड प्रोफाइल में इसका स्तर अधिक पाया जाता है, तब अधिकांश लोगों को पहली बार इसकी गंभीरता का एहसास होता है।

ट्राइग्लिसराइड का संतुलन केवल हृदय स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि लिवर, वजन नियंत्रण और संपूर्ण मेटाबॉलिक संतुलन से भी जुड़ा होता है। समय रहते सही आहार, नियमित व्यायाम और संतुलित दिनचर्या अपनाकर इसे नियंत्रित किया जा सकता है और भविष्य में होने वाली जटिलताओं से बचाव संभव है।

ट्राइग्लिसराइड क्या है?

ट्राइग्लिसराइड शरीर में ऊर्जा जमा करने का एक तरीका है। जब हम जरूरत से ज्यादा खाना खाते हैं, तो बची हुई कैलोरी ट्राइग्लिसराइड में बदलकर शरीर की चर्बी में जमा हो जाती है। बाद में जब शरीर को ऊर्जा की जरूरत होती है, तो वही जमा वसा काम आती है। सामान्य मात्रा में ट्राइग्लिसराइड जरूरी होते हैं। लेकिन अगर इनका स्तर लंबे समय तक ज्यादा रहे, तो नसों में चर्बी जमने लगती है। इससे दिल की बीमारी, स्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। 

ट्राइग्लिसराइड के स्तर की श्रेणियाँ इस प्रकार हैं:

  • सामान्य: 150 mg/dL से कम
  • सीमा रेखा (Borderline): 150–199 mg/dL
  • उच्च: 200–499 mg/dL
  • बहुत अधिक: 500 mg/dL या अधिक

ट्राइग्लिसराइड बढ़ने के मुख्य कारण

आजकल की आधुनिक जीवनशैली में खान-पान की आदतों और शारीरिक गतिविधि की कमी का सीधा प्रभाव हमारी लिपिड प्रोफाइल पर पड़ता है। ट्राइग्लिसराइड का बढ़ना अचानक नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे विकसित होने वाली मेटाबॉलिक असंतुलन की प्रक्रिया का हिस्सा होता है। नीचे ट्राइग्लिसराइड बढ़ने के मुख्य कारण दिए गए हैं:

  • अधिक चीनी और मैदा वाली चीजें - मिठाई, सफेद ब्रेड, मैदा और पैकेट वाला खाना ज्यादा कैलोरी देते हैं, जो शरीर में ट्राइग्लिसराइड बनकर जमा हो जाती है।
  • ज्यादा तला-भुना खाना - तेल और घी से भरा खाना खून में फैट की मात्रा बढ़ा सकता है।
  • कम शारीरिक गतिविधि - अगर हम व्यायाम नहीं करते, तो शरीर जमा चर्बी को सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाता।
  • मोटापा - खासकर पेट के आसपास की चर्बी ट्राइग्लिसराइड बढ़ने से जुड़ा होता है।
  • मधुमेह (डायबिटीज) - जब ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं रहती, तो ट्राइग्लिसराइड भी बढ़ सकते हैं।
  • ज्यादा शराब पीना - अधिक शराब लेने से लिवर में चर्बी बनने लगती है, जिससे ट्राइग्लिसराइड बढ़ते हैं।

इन कारणों को समझकर और समय रहते जीवनशैली में सुधार करके ट्राइग्लिसराइड के स्तर को नियंत्रित रखना संभव है।

ट्राइग्लिसराइड क्यों खतरनाक है?

जब खून में ट्राइग्लिसराइड की मात्रा लंबे समय तक ज्यादा रहती है, तो यह हमारी नसों (धमनियों) की दीवारों पर चर्बी जमा करने लगती है। धीरे-धीरे ये नसें कठोर हो सकती हैं, जिससे खून का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता। खून के प्रवाह में रुकावट आने से हृदय को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे सीने में दर्द, सांस फूलना या आगे चलकर हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। यही समस्या अगर दिमाग की नसों में हो जाए, तो स्ट्रोक का जोखिम भी बढ़ जाता है।

इसके अलावा, बहुत अधिक ट्राइग्लिसराइड होने पर पाचन ग्रंथि में सूजन (पैंक्रियाटाइटिस) जैसी गंभीर समस्या भी हो सकती है, जो अचानक तेज पेट दर्द के रूप में सामने आती है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है। इसलिए ट्राइग्लिसराइड को सामान्य सीमा में रखना हृदय, लिवर और पूरे शरीर के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। नियमित जांच, संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल में क्या अंतर है?

ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल दोनों ही रक्त में पाए जाने वाले वसा (फैट) के प्रकार हैं, लेकिन इनका काम अलग-अलग होता है।

ट्राइग्लिसराइड मुख्य रूप से शरीर की ऊर्जा भंडारण वसा है। जब हम जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेते हैं, तो शरीर उसे ट्राइग्लिसराइड के रूप में जमा कर लेता है और बाद में ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करता है।

कोलेस्ट्रॉल शरीर की कोशिकाओं के निर्माण, विटामिन D बनाने और कुछ जरूरी हार्मोन बनाने में काम आता है। यह शरीर के लिए जरूरी है, लेकिन इसकी मात्रा संतुलित रहनी चाहिए।

हालांकि दोनों अलग हैं, लेकिन यदि ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ जाए, तो हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए दोनों को संतुलित रखना जरूरी है।

ट्राइग्लिसराइड की जांच कैसे की जाती है?

ट्राइग्लिसराइड का स्तर जानने के लिए लिपिड प्रोफाइल ब्लड टेस्ट किया जाता है। यह एक साधारण खून की जांच है, जिसमें थोड़ा सा रक्त लेकर उसमें मौजूद फैट की मात्रा मापी जाती है। इस टेस्ट में ट्राइग्लिसराइड के साथ-साथ कुल कोलेस्ट्रॉल, HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) और LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) का स्तर भी देखा जाता है।

यह टेस्ट आम तौर पर 8-12 घंटे खाली पेट रहने के बाद किया जाता है, ताकि रिपोर्ट सही और सटीक आए। इस दौरान आप केवल पानी पी सकते हैं। चाय, कॉफी या कोई भी मीठा पेय नहीं लेना चाहिए।

रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर आपके अन्य स्वास्थ्य कारकों, जैसे वजन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और जीवनशैली को ध्यान में रखकर सही सलाह देते हैं। समय-समय पर यह जांच करवाना दिल, लिवर और पूरे शरीर के मेटाबॉलिज़्म की सेहत को समझने और भविष्य की बीमारियों से बचाव में मदद करता है।

ट्राइग्लिसराइड Symptoms

थकान

जब शरीर में ऊर्जा संतुलन बिगड़ जाता है, तो आप दिन भर थोड़ा सुस्त या लगातार थका हुआ महसूस कर सकते हैं। छोटे-छोटे काम भी भारी लगने लगते हैं।

पेट के आसपास चर्बी बढ़ना

अगर पेट के आसपास फैट जमा होने लगे, तो यह मेटाबॉलिक असंतुलन का संकेत हो सकता है। यह सिर्फ दिखने में नहीं, बल्कि आपके शरीर के अंदर स्वास्थ्य की चेतावनी भी देता है।

फैटी लिवर

लीवर में अतिरिक्त वसा जमा होने से फैटी लिवर बन सकता है। इससे लिवर सही तरह से काम नहीं कर पाता और पाचन और मेटाबॉलिज़्म प्रभावित हो सकते हैं।

उच्च रक्तचाप

जब खून में फैट का स्तर बढ़ जाता है, तो यह रक्त वाहिकाओं में दबाव बढ़ा सकता है। इसका असर सीधा आपके ब्लड प्रेशर पर पड़ता है और हृदय को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है।

हृदय रोग का खतरा

नसों में चर्बी जमने लगती है तो खून का प्रवाह सुचारू नहीं रहता। इससे दिल की धड़कन पर असर पड़ता है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

क्या आप इनमें से किसी लक्षण से जूझ रहे हैं?

थकान
पेट के आसपास चर्बी बढ़ना
फैटी लिवर
उच्च रक्तचाप
हृदय रोग का खतरा
 

आयुर्वेद ट्राइग्लिसराइड को कैसे समझता है?

आयुर्वेद में ट्राइग्लिसराइड शब्द सीधे रूप से नहीं मिलता, लेकिन इसके बढ़े हुए स्तर को मेद धातु की वृद्धि और मेदोवृद्धि से जोड़ा जाता है। जब पाचन अग्नि कमजोर हो जाती है, तो भोजन सही तरह से पच नहीं पाता और शरीर में अमा (अधपचा विषाक्त पदार्थ) बनने लगता है। यही अमा धीरे-धीरे मेद धातु में जमा होकर वसा बढ़ाने लगता है।

आयुर्वेद के अनुसार यह स्थिति मुख्य रूप से कफ दोष की वृद्धि और मेटाबॉलिक असंतुलन का परिणाम होती है। विशेष रूप से पेट के आसपास चर्बी बढ़ना, भारीपन, आलस्य और सुस्ती जैसे लक्षण इसी असंतुलन की ओर संकेत करते हैं। इसलिए आयुर्वेद में उपचार केवल फैट कम करने पर नहीं, बल्कि पाचन अग्नि को सुधारने, अमा को हटाने और शरीर की धातुओं का संतुलन बनाए रखने पर केंद्रित होता है।

ट्राइग्लिसराइड बढ़ने पर आयुर्वेद कैसे मदद कर सकता है?

आयुर्वेद के अनुसार ट्राइग्लिसराइड का बढ़ना शरीर में पाचन शक्ति की कमी, कफ दोष की वृद्धि और मेद धातु के असंतुलन का परिणाम हो सकता है। इसलिए आयुर्वेदिक उपचार केवल फैट घटाने पर नहीं, बल्कि शरीर की जड़ से सुधार करने पर ध्यान देता है। नीचे दिए गए बिंदुओं को थोड़ा विस्तार से समझते हैं:

  • पाचन शक्ति मजबूत करना: जब पाचन शक्ति कमजोर होती है, तो खाना ठीक से नहीं पचता और शरीर में चर्बी जमा होने लगती है। आयुर्वेद में हल्का, गरम और आसानी से पचने वाला भोजन खाने की सलाह दी जाती है। समय पर भोजन करना और कुछ पाचन बढ़ाने वाली जड़ी-बूटियों का उपयोग भी मददगार माना जाता है।
  • अमा की सफाई (डिटॉक्स समर्थन): अधपचा खाना शरीर में “अमा” बनाता है, जो अंदर रुकावट पैदा कर सकता है। आयुर्वेद में पाचन सुधारने, हल्का उपवास रखने और विशेषज्ञ की सलाह से शरीर की सफाई की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया जाता है।
  • औषधियाँ: गुग्गुलु, त्रिफला और अर्जुन जैसी जड़ी-बूटियां परंपरागत रूप से अतिरिक्त चर्बी को संतुलित करने में सहायक मानी जाती हैं। ये लिपिड प्रोफाइल सुधारने में मदद कर सकती हैं, लेकिन इन्हें हमेशा विशेषज्ञ की सलाह से ही लेना चाहिए।
  • लिवर समर्थन: लिवर शरीर में फैट को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है। गुडूची और कुछ कड़वे तत्व पाचन और लिवर की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक माने जाते हैं।
  • जीवनशैली सुधार (दिनचर्या और व्यायाम): नियमित दिनचर्या, रोजाना टहलना, योग और प्राणायाम करने से शरीर सक्रिय रहता है और मेटाबॉलिज़्म बेहतर होता है।
  • वजन संतुलन पर ध्यान: खासकर पेट के आसपास की चर्बी ट्राइग्लिसराइड बढ़ने से जुड़ी होती है। संतुलित आहार, सही मात्रा में भोजन और नियमित व्यायाम से वजन नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि के माध्यम से वजन को संतुलित रखना जरूरी माना जाता है।

आयुर्वेदिक औषधियां स्वयं से न लें। हर व्यक्ति की प्रकृति (वात-पित्त-कफ) अलग होती है, इसलिए सही उपचार के लिए योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ से परामर्श आवश्यक है।

ट्राइग्लिसराइड बढ़ने पर क्या खाएं और क्या न खाएं?

ट्राइग्लिसराइड को नियंत्रित रखने में आहार की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सही भोजन का चयन करने से वसा का स्तर संतुलित रखने में मदद मिल सकती है, जबकि गलत खान-पान इसे और बढ़ा सकता है। नीचे सरल रूप में समझें कि क्या लेना फायदेमंद है और किन चीज़ों से बचना चाहिए।

क्या खाएं?

  • ओट्स - फाइबर से भरपूर होते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं।
  • हरी सब्जियां - पालक, लौकी, तोरी जैसी सब्जियां हल्की और सुपाच्य होती हैं, जो वजन नियंत्रण में सहायक हैं।
  • दालें - प्रोटीन और फाइबर का अच्छा स्रोत हैं, जो लंबे समय तक पेट भरा रखते हैं।
  • अलसी (फ्लैक्ससीड) - ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
  • अखरोट - हेल्दी फैट का स्रोत, जो संतुलित मात्रा में लेने पर लाभदायक हो सकता है।
  • नींबू पानी - पाचन सुधारने और शरीर को हाइड्रेट रखने में सहायक।

क्या न खाएं?

  • मिठाइयाँ - अधिक चीनी ट्राइग्लिसराइड को तेजी से बढ़ा सकती है।
  • मैदा से बनी चीजें - जैसे सफेद ब्रेड, पेस्ट्री, नमकीन आदि, जो जल्दी फैट में बदल सकती हैं।
  • फ्राइड फूड - तला-भुना और ज्यादा तेल वाला खाना वसा स्तर बढ़ा सकता है।
  • सॉफ्ट ड्रिंक - इनमें छिपी हुई अधिक मात्रा में शक्कर होती है।
  • अत्यधिक चावल - खासकर सफेद चावल अधिक मात्रा में लेने से कार्बोहाइड्रेट की अधिकता हो सकती है।

संतुलित, फाइबर युक्त और कम तेल-चीनी वाला भोजन ट्राइग्लिसराइड को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है। छोटे-छोटे लेकिन नियमित सुधार लंबे समय में बड़े लाभ दे सकते हैं।

किन स्थितियों में तुरंत चिकित्सा सलाह आवश्यक है?

ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा हुआ स्तर हमेशा तुरंत खतरे का संकेत नहीं होता, लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। खासकर यदि इसके साथ अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ भी मौजूद हों, तो समय पर डॉक्टर से मिलना बेहद जरूरी हो जाता है। सही जांच और मार्गदर्शन से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।

इन स्थितियों में डॉक्टर से जरूर मिलें:

  • रिपोर्ट में ट्राइग्लिसराइड 200 mg/dL से अधिक हो - यह संकेत हो सकता है कि जीवनशैली सुधार के साथ चिकित्सा सलाह की भी आवश्यकता है।
  • यदि पहले से मधुमेह या उच्च रक्तचाप हो - इन बीमारियों के साथ बढ़ा हुआ ट्राइग्लिसराइड हृदय जोखिम को बढ़ा सकता है।
  • फैटी लिवर रिपोर्ट में दिखाई दे - यह शरीर में वसा असंतुलन का संकेत है, जिसे अनदेखा नहीं करना चाहिए।
  • छाती में दर्द या सांस फूलना - ये गंभीर लक्षण हो सकते हैं और तुरंत चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है।

समय पर सही कदम उठाना ही भविष्य में होने वाली गंभीर समस्याओं से बचाव का सबसे सुरक्षित तरीका है।

निष्कर्ष

ट्राइग्लिसराइड बढ़ना एक “साइलेंट मेटाबॉलिक चेतावनी” है। सही आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और चिकित्सकीय मार्गदर्शन से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद संतुलन और मेटाबॉलिज्म सुधार के माध्यम से सहायक भूमिका निभा सकता है, लेकिन मुख्य उपचार का विकल्प नहीं है।

हर कदम सही मार्गदर्शन और विशेषज्ञ देखरेख में ही उठाना चाहिए। योग्य चिकित्सक के साथ उपचार करने से योजना व्यक्ति के अनुसार बनाई जाती है, सुरक्षित रहती है और ठीक तरह से समन्वित होती है। अगर आप ट्राइग्लिसराइड संबंधी परेशानी से परेशान हैं, तो प्रमाणित जीवा डॉक्टरों से व्यक्तिगत परामर्श लें। सही मार्गदर्शन और संतुलित उपचार के साथ राहत पाना आसान और सुरक्षित हो सकता है। आज ही कॉल करें: 0129-4264323

FAQs

150 mg/dL से कम स्तर सामान्य माना जाता है। 200 mg/dL से ऊपर होने पर सावधानी और सुधार की ज़रूरत होती है।

लंबे समय तक बढ़ा हुआ स्तर हृदय रोग और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए इसे नियंत्रित रखना जरूरी है।

हाँ, अक्सर कोई लक्षण नहीं होता। यह केवल ब्लड टेस्ट से ही पता चलता है।

हाँ, कम चीनी और कम तला-भुना भोजन लेने से सुधार हो सकता है। फाइबर युक्त आहार लाभदायक है।

नियमित 30 मिनट की वॉक या हल्का व्यायाम स्तर कम करने में मदद कर सकता है।

हाँ, ज्यादा शराब पीने से ट्राइग्लिसराइड तेजी से बढ़ सकते हैं।

नहीं, दोनों अलग प्रकार की वसा हैं, लेकिन दोनों का बढ़ना हृदय के लिए जोखिमपूर्ण है।

हाँ, खासकर पेट की चर्बी कम होने से स्तर में सुधार आता है।

आयुर्वेद पाचन और जीवनशैली सुधार के माध्यम से सहायक हो सकता है, लेकिन विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।

यह व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है, लेकिन सही आहार और व्यायाम से कुछ हफ्तों में सुधार दिख सकता है।

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