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रात में सांस की तकलीफ बढ़ना – आयुर्वेद में इसका कारण

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

क्या आपके साथ भी अक्सर ऐसा होता है कि दिन भर आप बिल्कुल सामान्य रहते हैं, आपके काम-काज में कोई रुकावट नहीं आती, लेकिन जैसे ही सूरज ढलता है और आप रात को सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, आपकी सांसें भारी होने लगती हैं? आधी रात को अचानक आपकी आंख खुलती है और आपको ऐसा महसूस होता है जैसे किसी ने आपकी छाती पर एक भारी पत्थर रख दिया हो या आपका गला घोंट रहा हो। आप हवा के लिए मछली की तरह तड़पने लगते हैं, उठकर बैठ जाते हैं और तुरंत अपना इनहेलर (पंप) ढूंढ़ने लगते हैं। आज के समय में, जब हमारी जीवनशैली पूरी तरह से कृत्रिम हो चुकी है, रात के समय सांस उखड़ने की यह खौफनाक समस्या लाखों लोगों के लिए एक बुरे सपने जैसी बन चुकी है।

रात में सांस की तकलीफ बढ़ना क्या है?

जब कोई व्यक्ति यह शिकायत करता है कि उसे केवल रात में या लेटते समय ही सांस फूलने की भयंकर समस्या होती है और बैठकर ही राहत मिलती है, तो इसका सीधा चिकित्सीय अर्थ यह है कि उसकी श्वासनलिकाएं अंदर से अत्यधिक सूज चुकी हैं और गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर का सारा कफ छाती में जमा हो रहा है।

हमारे श्वसन तंत्र और फेफड़ों की कार्यक्षमता दिन और रात के अनुसार बदलती है। जब हम सीधे खड़े होते हैं या बैठे होते हैं, तो छाती का तरल पदार्थ और कफ नीचे की तरफ रहता है और सांस लेने का रास्ता खुला रहता है। लेकिन जब हम लेटते हैं, तो वह सारा गाढ़ा और चिपचिपा कफ श्वासनलिकाओं के ऊपरी हिस्से में आ जाता है। 

इसके प्रकार

रात में सांस फूलने की इस भयंकर स्थिति को लक्षणों और शारीरिक कारणों के आधार पर मुख्य रूप से चार प्रकारों में बांटा जा सकता है:

  • नॉक्टर्नल अस्थमा: यह सबसे आम प्रकार है। इसमें अस्थमा के मरीज की सांस दिन में ठीक रहती है, लेकिन रात के 12 से 2 बजे के बीच नलियों में अचानक भयंकर ऐंठन आ जाती है और व्यक्ति सीटी की आवाज के साथ हांफने लगता है।
  • ऑर्थोपनिया: यह स्थिति तब होती है जब व्यक्ति के लेटते ही सांस फूलती है और उसे सांस लेने के लिए दो-तीन तकिए लगाकर या कुर्सी पर बैठना पड़ता है। यह अक्सर फेफड़ों में पानी भरने या हृदय की कमजोरी के कारण होता है।
  • एसिड रिफ्लक्स से श्वास: इसमें रात को लेटते ही पेट का तेज तेजाब गले और सांस की नली में आ जाता है, जिससे नसों में भयंकर जलन होती है और अचानक खांसी व सांस फूलने का दौरा पड़ जाता है।

लक्षण और संकेत

लंबे समय तक फेफड़ों में कफ की अशुद्धि रहने और रात में नलिकाओं के सिकुड़ने से मरीजों को निम्नलिखित कष्टकारी लक्षणों का सामना करना पड़ता है:

  • रात को सोने के 2-3 घंटे बाद अचानक दम घुटने और छाती में भारी जकड़न के कारण नींद खुल जाना
  • सांस अंदर खींचते और बाहर छोड़ते समय छाती से सीटी बजने या घरघराहट की तेज आवाज आना।
  • रात के समय लगातार उठने वाली सूखी या बलगम वाली खांसी के दौरे पड़ना जिससे पसलियां दर्द करने लगें।
  • लेटने पर सांस रुकना और उठकर बिस्तर पर आगे की तरफ झुककर बैठने पर ही थोड़ी राहत महसूस होना।
  • सांस लेने की कोशिश में घबराहट होना, धड़कन तेज हो जाना और माथे पर ठंडा पसीना आ जाना।
  • रातों की नींद उजड़ जाने के कारण दिन भर भयंकर थकान, सिरदर्द और चिड़चिड़ापन महसूस होना।

मुख्य कारण

इस भयंकर ज्वलनशील समस्या और रात के समय फेफड़ों के जाम होने के पीछे हमारी रोजमर्रा की कुछ बड़ी गलतियां जिम्मेदार होती हैं:

  • रात का भारी और कफ वर्धक आहार: आयुर्वेद के अनुसार रात को देर से खाना और गरिष्ठ चीजें (जैसे पनीर, दही, ठंडी चीजें, भारी दालें) खाना सबसे बड़ा कारण है। यह पेट में कच्चा रस बनाता है जो रात को छाती में जाकर गाढ़े कफ के रूप में जम जाता है।
  • तुरंत सो जाना: भोजन करने के तुरंत बाद बिस्तर पर लेट जाने से पेट का एसिड और खाया हुआ भोजन ऊपर की तरफ आता है, जो सांस की नली को सिकोड़ कर तुरंत दमा पैदा कर देता है।
  • बिस्तर के कीटाणु: हमारे गद्दों और तकियों में लाखों सूक्ष्म कीटाणु होते हैं। जब रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, तो रात भर इन कीटाणुओं की सांस लेने से फेफड़ों में भयंकर एलर्जी और सूजन आ जाती है।
  • मानसिक तनाव और चिंता: अत्यधिक तनाव और चिंता के साथ सोने से शरीर की वायु (वात दोष) कुपित हो जाती है। कुपित वायु फेफड़ों की नसों में ऐंठन पैदा कर देती है, जिससे सांस लेने का मार्ग अचानक सिकुड़ जाता है।

जोखिम और जटिलताएं

अगर इस समस्या को केवल तुरंत राहत देने वाले इनहेलर या नींद की गोलियों के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो शरीर में कई खतरनाक और हमेशा के लिए रहने वाले बदलाव आ सकते हैं:

  • हाइपोक्सिया: रात के समय बार-बार सांस रुकने से दिमाग और शरीर के अंगों को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है, जिससे पैरालिसिस (लकवा) या ब्रेन डैमेज का खतरा बढ़ जाता है।
  • हृदय गति रुकना: रात में फेफड़ों तक हवा न पहुंचने के कारण हृदय को खून पंप करने के लिए अत्यधिक जोर लगाना पड़ता है, जिससे हार्ट अटैक का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
  • क्रोनिक अनिद्रा और डिप्रेशन: रात-रात भर सांस उखड़ने और मौत के डर के कारण मरीज भयंकर मानसिक अवसाद और कमजोरी का शिकार हो जाता है।
  • दवाओं का बेअसर होना: शरीर इतना अधिक रसायनों का आदी हो जाता है कि एक समय के बाद कोई भी पंप सांस की नली को खोलने में नाकाम साबित होता है।

प्राकृतिक रूप से बीमारी और लक्षणों की पहचान कैसे करें?

प्राकृतिक स्वास्थ्य विज्ञान में भारी मशीनों या कृत्रिम परीक्षणों के बजाय शरीर के अपने संकेतों और चेतावनियों को गहराई से समझा जाता है। इसमें व्यक्ति के शरीर की प्रतिक्रियाओं के आधार पर समस्या की गंभीरता को जांचा जाता है:

  • सांस उखड़ने का समय: इस बात पर बारीकी से ध्यान देना कि क्या सांस रात के 12 से 2 बजे के बीच ज्यादा उखड़ती है। यह कफ दोष का काल है और प्रमाणित करता है कि बीमारी छाती में जमे हुए भारी कफ से पैदा हो रही है।
  • भोजन और सांस का संबंध: क्या जिस रात आप भारी या मसालेदार खाना खाते हैं, उस रात दम ज्यादा घुटता है? यह सीधे तौर पर पेट की खराबी, टॉक्सिन और एसिड रिफ्लक्स से जुड़े अस्थमा का प्राकृतिक संकेत है।
  • शरीर की मुद्रा: यदि लेटने पर सांस फूलती है और उठकर बैठने पर छाती में हल्कापन आ जाता है, तो यह सीधा संकेत है कि कफ छाती में फैल रहा है और वात दोष की गति रुक रही है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण

आयुर्वेद में रात के समय सांस फूलने की इस भयंकर स्थिति को मुख्य रूप से 'तमक श्वास' के नाम से बहुत ही सूक्ष्मता और वैज्ञानिकता के साथ समझाया गया है। यह समस्या सीधे तौर पर 'प्राणवह स्रोतस' (श्वसन नलियों) में कफ और वात दोष के भयंकर टकराव का परिणाम है। आयुर्वेद के अनुसार रात का प्रथम प्रहर (शाम से रात 10 बजे तक) कफ का काल होता है और आधी रात के बाद वात का काल शुरू होता है। जब हम गलत आहार लेते हैं, तो पाचन अग्नि कमजोर हो जाती है और शरीर में विषैला 'आम' बनने लगता है। यह आम और कफ छाती की नलियों में जाकर चिपक जाता है। जब व्यक्ति लेटता है, तो गुरुत्वाकर्षण के कारण यह कफ छाती के ऊपरी हिस्से को ब्लॉक कर देता है। 

इस रोग के लिए महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां

  • पुष्करमूल: यह आयुर्वेद में सांस के रोगों को नष्ट करने वाली सबसे महान औषधि मानी गई है। यह फेफड़ों की सिकुड़ी हुई नलियों (Bronchospasm) को प्राकृतिक रूप से खोलती है और रात के समय सांस लेना आसान बनाती है।
  • कंटकारी (छोटी कटेरी): यह जड़ी-बूटी छाती में सालों से जमे हुए पत्थर जैसे कफ को पिघलाकर उसे बलगम के रूप में आसानी से बाहर निकाल देती है ताकि लेटने पर छाती ब्लॉक न हो।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी

जब सांस की बीमारी कई सालों पुरानी हो, रात को पंप के बिना सोना असंभव हो गया हो और कफ अशुद्धि बहुत गहराई तक फैल चुकी हो, तो जीवा आयुर्वेद में स्वेदन और वमन नामक पंचकर्म चिकित्सा की जाती है। 'स्वेदन' में छाती पर औषधीय तेलों की मालिश कर भाप दी जाती है, जिससे फेफड़ों के कोने-कोने में जमा हुआ चिपचिपा कफ पिघल जाता है। इसके बाद 'वमन' प्रक्रिया के माध्यम से उल्टी कराकर छाती और पेट में जमा हुए उस सारे विषैले कफ को हमेशा के लिए शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

रोग के लिए सही आहार

आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां तभी लाभ पहुंचाएंगी जब आप सही आहार का पालन करेंगे।

  • क्या खाएं: रात का भोजन हमेशा हल्का और सुपाच्य होना चाहिए। शाम 7 बजे तक भोजन कर लें। पुरानी मूंग की दाल, जौ और लौकी-तोरई खाएं। रात के भोजन में सोंठ, लहसुन, काली मिर्च और हल्दी का प्रयोग जरूर करें। सोने से पहले गुनगुने पानी का ही इस्तेमाल करें।
  • क्या न खाएं: रात के समय कफ बनाने वाले विरुद्ध आहार (जैसे ठंडी दही, दूध, केला, आइसक्रीम) का पूरी तरह और जीवन भर के लिए त्याग करें। फ्रिज का ठंडा पानी, खमीर उठा हुआ भोजन, पैकेटबंद जंक फूड, भारी पनीर और उड़द की दाल का सेवन रात में सख्त वर्जित है क्योंकि ये शरीर में सीधा कफ बढ़ाते हैं और लेटते ही नलियों को तुरंत जाम कर देते हैं।

ठीक होने में लगने वाला समय

प्राकृतिक चिकित्सा में शरीर को भीतर से ठीक होने और फेफड़ों को पूरी तरह शुद्ध होने के लिए थोड़ा समय चाहिए होता है। आमतौर पर, सही आहार (कफ-नाशक डाइट) और श्वास शोधक औषधियों के सेवन से 2 से 3 हफ्तों के भीतर ही रात की जकड़न, खांसी और दम घुटने की घटनाओं में बहुत कमी दिखने लगती है। हालांकि, शरीर की अत्यधिक संवेदनशीलता को खत्म करने, फेफड़ों की नलियों को अंदर से मजबूत बनाने और बीमारी को जड़ से समाप्त करने में स्थिति की गंभीरता के अनुसार 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

आप किन परिणामों की उम्मीद कर सकते हैं?

जीवा आयुर्वेद के अनुशासित उपचार के बाद आप एक नया और उन्मुक्त जीवन महसूस करेंगे। रात को बिस्तर पर जाते ही दम घुटने का डर और तकिए के नीचे रखा रहने वाला स्टेरॉयड इनहेलर (पंप) हमेशा के लिए छूट जाएगा। रातों की नींद बिना किसी घबराहट या सीटी की आवाज के पूरी होगी, छाती का भारीपन गायब हो जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, आपका पाचन तंत्र और फेफड़े अंदर से इतने मजबूत हो जाएंगे कि गुरुत्वाकर्षण या मौसम का बदलाव आपकी सांसों को रात के समय बेवजह नहीं रोक पाएगा।

मरीजों के अनुभव

ब्रोंकाइटिस से राहत पाने के लिए मैं एक प्रतिष्ठित अस्पताल के विभागाध्यक्ष से मिला था, क्योंकि मुझे पूरी रात खांसी आती थी और मैं सो नहीं पाता था, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ। मेरे पास ही जिवा आयुर्वेद का एक क्लिनिक था। वहाँ से रोज़ गुजरते समय मैं डॉक्टरों को देखा करता था। इसलिए एक दिन मैंने सोचा—क्यों न आयुर्वेद आज़माया जाए! और मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा किया। अब मुझे खांसी नहीं होती और मैं रात में अच्छी नींद सो पाता हूँ।

भारत भूषण

दिल्ली

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक चिकित्सा में रात के समय सांस फूलने पर मुख्य रूप से लंबे समय तक असर करने वाले ब्रोंकोडायलेटर्स, स्टेरॉयड इनहेलर या फिर स्लीप एपनिया के लिए सीपीएपी (CPAP) मशीन दी जाती है। ये मशीनें या दवाएं नलियों की मांसपेशियों को जबरदस्ती फैला देती हैं और हवा को प्रेशर से अंदर डालती हैं। 

इसके विपरीत, आयुर्वेदिक उपचार सांस को कृत्रिम रूप से नहीं खोलता। यह गर्म जड़ी-बूटियों (जैसे वासा और पुष्करमूल) से फेफड़ों में जमे कफ को पिघलाकर बाहर निकालता है, पेट की पाचन अग्नि को बढ़ाता है ताकि नया 'आम' न बने, और शरीर को अंदर से इतना मजबूत बनाता है कि गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव कफ को श्वासनली में न रोक पाए। यह रोग का प्रबंधन नहीं, बल्कि जड़ से उपचार है।

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?

रात में हल्की खांसी आना आम हो सकता है, लेकिन अगर आपको निम्नलिखित चेतावनी संकेत दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना आवश्यक है:

  • सांस फूलने के साथ-साथ होंठ और नाखूनों का रंग नीला या सफेद पड़ने लगे (ऑक्सीजन की भारी कमी)।
  • रात को अचानक दम घुटने पर उठकर बैठने के 15-20 मिनट बाद भी सांस की नली बिल्कुल न खुले।
  • सांस लेने की कोशिश में छाती और बाईं बांह में भयंकर दर्द हो या चक्कर आने लगें (यह हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है)।
  • खांसते-खांसते बेहोशी छाने लगे या पसीने से पूरा शरीर भीग जाए।
  • सांस छोड़ते समय बहुत तेज और डरावनी सीटी की आवाज आने लगे।

निष्कर्ष

रात को बिस्तर पर जाते ही सांस का बुरी तरह उखड़ जाना महज कोई साधारण एलर्जी या मौसम की समस्या नहीं है। यह शरीर की एक अत्यंत गंभीर पुकार है जो यह बता रही है कि आपके फेफड़ों में विषैले कफ का अत्यधिक जमाव हो चुका है और आपके पाचन तंत्र ने अपनी क्षमता खो दी है। रोजाना बाजार के रसायनों और स्टेरॉयड इनहेलर्स को इस्तेमाल कर इस समस्या को दबाना शरीर के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। आयुर्वेद की शरण में जाकर ही आप इस भयंकर कफ के जमाव और दम घुटने की समस्या को जड़ से शांत कर सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार, रात 2 बजे से सुबह 6 बजे का समय शरीर में 'वात दोष' का होता है। अगर आपके फेफड़ों में कफ जमा है, तो यह बढ़ा हुआ वात उस कफ को धक्के मारता है, जिससे सांस की नली सिकुड़ जाती है और अचानक भयंकर खांसी और घुटन के साथ आपकी नींद खुल जाती है।

बिल्कुल! जब आप रात को सीधे लेटते हैं, तो पेट का खट्टा पानी और गैस गुरुत्वाकर्षण (Gravity) न होने के कारण गले और सांस की नली (Windpipe) में आ जाते हैं। इससे नली बुरी तरह छिल जाती है और सिकुड़ कर (Spasm) तुरंत दम घोंट देती है, जिसे GERD कहते हैं।

हां। अगर आपको अस्थमा या एसिड रिफ्लक्स है, तो सिर को थोड़ा ऊंचा (Elevated) रखने से पेट का एसिड और छाती का बलगम गले तक नहीं पहुंच पाता। इससे रात को सांस की नली खुली रहती है और अटैक का खतरा कम हो जाता है।

बिल्कुल नहीं। आयुर्वेद के अनुसार रात को दूध पीना शरीर में 'कफ' (बलगम) को बहुत तेजी से बढ़ाता है। अस्थमा के मरीज़ों के लिए रात का दूध सीधा छाती को ब्लॉक करने का काम करता है, इसलिए इसे पूरी तरह बंद कर देना चाहिए।

हां। सोने से ठीक पहले सादे पानी में या थोड़ा सा पुदीना/नीलगिरी का तेल डालकर भाप लेने से सांस की नलियों में चिपका हुआ कफ ढीला होकर बाहर निकल जाता है, जिससे नलियों को प्राकृतिक नमी मिलती है और रात को सांस नहीं रुकती।

पुष्करमूल आयुर्वेद का सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक 'ब्रोंकोडायलेटर' (नली फैलाने वाली जड़ी-बूटी) है। यह रात के समय सिकुड़ी हुई सांस की नलियों को तुरंत खोलता है, सीटी बजने की आवाज को रोकता है और छाती के भारीपन को खत्म करता है।

सौ प्रतिशत! देर से और भारी खाना खाने से वह पचता नहीं है और रात भर पेट में सड़कर एसिड और गैस बनाता है। यही गैस लेटने पर छाती पर भारी दबाव डालती है। इसलिए रात का खाना सोने से 3 घंटे पहले खा लेना चाहिए।

हां। जब आप स्ट्रेस लेते हैं, तो नर्वस सिस्टम हाइपरएक्टिव हो जाता है। इससे शरीर की नलियां सिकुड़ जाती हैं। रात को जब नींद आनी चाहिए, आपका दिमाग शांत नहीं होता, जिससे घुटन (Panic attack) या अस्थमा अटैक ट्रिगर हो जाता है।

रात को बार-बार आंख खुलने और खांसी में तो कुछ ही हफ्तों में भारी आराम मिल जाता है। लेकिन फेफड़ों की सूजन को पूरी तरह खत्म करने और पेट के हाजमे को अंदर से मजबूत करने में कम से कम 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

नहीं। आपके शरीर को इन दवाओं की आदत हो चुकी होती है। आपको एकदम से अपने पफ या गोलियाँ नहीं छोड़ने चाहिए। आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से धीरे-धीरे जड़ी-बूटियों से इम्युनिटी को मजबूत किया जाता है, जिसके बाद एलोपैथिक दवाइयां अपने आप ही छूट जाती हैं।

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