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क्या पीसीओएस (PCOS) का आयुर्वेदिक इलाज बिना हार्मोन दवाओं के संभव है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 06 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 17 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
  • blog-view-icon5105

गर्भनिरोधक गोलियों (Birth control pills) और भारी हार्मोनल दवाओं का इस्तेमाल पीसीओएस (PCOS) जैसी ज़िद्दी और जटिल जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ शरीर में कृत्रिम हार्मोन डालकर मासिक धर्म (Periods) को कुछ समय के लिए नियमित कर देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गई है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि दवा का असर खत्म होने या गोलियाँ छोड़ने के तुरंत बाद फिर से अनियमित पीरियड्स, चेहरे पर अनचाहे बाल और तेज़ी से वज़न बढ़ने की समस्या होने लगती है और पीसीओएस पहले से भी बड़े और भयंकर रूप में वापस आ जाता है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार कृत्रिम हार्मोन लेने से शरीर का अपना हार्मोन बनाना भूल जाना, इंसुलिन रेजिस्टेंस, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण अंडाशयों (Ovaries) में मौजूद सिस्ट और शरीर के अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और प्रजनन तंत्र की सेहत बनी रहे।

पीसीओएस (PCOS) क्या है?

पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) महिलाओं के शरीर में होने वाली एक हार्मोनल समस्या है, जहाँ प्रजनन हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। एक सामान्य महिला के शरीर में हर महीने अंडाशय से एक परिपक्व अंडा निकलता है, लेकिन पीसीओएस की स्थिति में हार्मोनल गड़बड़ी (मुख्य रूप से पुरुष हार्मोन 'एंड्रोजन' के बढ़ने) के कारण अंडे पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते और अंडाशय के किनारे छोटी-छोटी थैलियों (सिस्ट) के रूप में जमा हो जाते हैं। इसके कारण पीरियड्स समय पर नहीं आते या बिल्कुल ही रुक जाते हैं। आमतौर पर महिलाएँ इसका शिकार खराब जीवनशैली, तनाव, अनियंत्रित खान-पान या इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण होती हैं। हार्मोनल दवाइयाँ लेने पर कुछ समय के लिए ब्लीडिंग हो जाती है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ चक्र को मशीन की तरह चलाती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस जड़ को ठीक नहीं करतीं जिसके कारण सिस्ट बार-बार बनते हैं। दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना प्रजनन क्षमता और चयापचय (Metabolism) पर बुरा असर डालता है।

पीसीओएस की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

हार्मोनल तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में पीसीओएस मुख्य रूप से इन प्रकारों में देखा जाता है:

  • इंसुलिन-रेसिस्टेंट पीसीओएस (Insulin-resistant PCOS): यह सबसे आम है (लगभग 70% मामलों में)। इसमें शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन को ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जिससे ब्लड शुगर बढ़ता है और वज़न तेज़ी से बढ़ने लगता है।
  • इन्फ्लेमेटरी पीसीओएस (Inflammatory PCOS): इसमें शरीर में पुरानी सूजन (Inflammation) होती है, जो अंडाशयों को एंड्रोजन (पुरुष हार्मोन) बनाने के लिए उत्तेजित करती है। इसमें थकान और त्वचा की समस्याएँ ज़्यादा होती हैं।
  • पोस्ट-पिल पीसीओएस (Post-pill PCOS): यह तब होता है जब कोई महिला लंबे समय तक गर्भनिरोधक गोलियाँ खाने के बाद उन्हें छोड़ती है, और शरीर तुरंत प्राकृतिक हार्मोन बनाने में असमर्थ हो जाता है।
  • एड्रिनल पीसीओएस (Adrenal PCOS): यह मुख्य रूप से अत्यधिक तनाव के कारण होता है। इसमें तनाव के कारण एड्रिनल ग्रंथि ज़्यादा एंड्रोजन बनाने लगती है।

पीसीओएस के लक्षण और संकेत

हार्मोनल गोलियों से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • अनियमित पीरियड्स: मासिक धर्म का कई महीनों तक न आना, बहुत कम आना या बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग होना।
  • वज़न बढ़ना (Obesity): लाख कोशिशों के बावजूद वज़न कम न होना, खासकर पेट के आसपास चर्बी जमा होना।
  • चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल (Hirsutism): ठुड्डी, गाल, पेट और छाती पर कड़े और काले बालों का उगना।
  • मुंहासे और तैलीय त्वचा: चेहरे, छाती और पीठ पर ज़िद्दी मुंहासे निकलना जो आसानी से ठीक नहीं होते।
  • बालों का झड़ना: सिर के बाल पतले होना और पुरुषों की तरह बाल झड़ने (Male-pattern baldness) की समस्या होना।
  • गर्भधारण में कठिनाई: ओव्यूलेशन न होने के कारण प्राकृतिक रूप से माँ बनने (Infertility) में परेशानी आना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार पीसीओएस लौटने के मुख्य कारण क्या हैं?

पीसीओएस होने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • कफ और वात का असंतुलन: गलत खान-पान जैसे मीठा, मैदा और भारी चीज़ें खाने से कफ दोष बढ़ता है, जो वात के साथ मिलकर 'आर्तववह स्रोतस' (प्रजनन नलिकाओं) को ब्लॉक कर देता है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस: शरीर में इंसुलिन का सही से उपयोग न होना सबसे बड़ा कारण है। यह अंडाशयों को टेस्टोस्टेरोन बनाने के लिए भड़काता है।
  • हार्मोनल पिल्स पर निर्भरता: तुरंत पीरियड्स लाने के लिए लगातार गोलियाँ खाने से अंडाशय सुस्त पड़ जाते हैं और शरीर प्राकृतिक रूप से ओव्यूलेशन करना भूल जाता है।
  • मानसिक तनाव: बहुत ज़्यादा तनाव लेना कार्टिसोल हार्मोन को बढ़ाता है जो सीधे प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुँचाता है।
  • खराब पाचन और 'आम' (टॉक्सिन्स): पाचन कमज़ोर होने से शरीर की गंदगी बाहर नहीं निकल पाती और सिस्ट (ग्रंथि) का रूप ले लेती है।

पीसीओएस के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

पीसीओएस को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इसका अंदरूनी इलाज न मिले, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • बांझपन (Infertility): नियमित ओव्यूलेशन न होने से भविष्य में गर्भधारण करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  • टाइप 2 डायबिटीज़: इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण कम उम्र में ही शुगर की बीमारी होने का खतरा रहता है।
  • हृदय रोग और ब्लड प्रेशर: वज़न बढ़ने और कोलेस्ट्रॉल बिगड़ने से दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
  • एंडोमेट्रियल कैंसर: पीरियड्स न आने से गर्भाशय की परत (Endometrium) मोटी होती जाती है, जिससे गर्भाशय के कैंसर का खतरा बढ़ता है।
  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन: चेहरे पर बाल, वज़न बढ़ने और माँ न बन पाने के डर से महिलाएँ गहरे डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित आयुर्वेदिक इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से पीसीओएस सिर्फ गर्भाशय या हार्मोन की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'नष्टार्तव', 'आर्तव क्षय' या 'पुष्पघ्नी जातहारिणी' के लक्षणों से जोड़ा जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि जब शरीर में कफ और वात दोष बुरी तरह बिगड़ जाते हैं और मेद धातु (Fat tissue) दूषित हो जाती है, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी और जीवनशैली देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में 'आम' (Toxins) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने प्रजनन नलियों में रुकावट पैदा कर दी है। जब तक यह रुकावट रहेगी, सिस्ट बार-बार बनते रहेंगे। आयुर्वेद में बस किसी भी तरह ब्लीडिंग कराना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, ओव्यूलेशन प्राकृतिक रूप से हो, इंसुलिन रेजिस्टेंस कम हो और गर्भाशय की सेहत मज़बूत बने।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर महिला का शरीर और लक्षण अलग होते हैं, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनकी प्रकृति के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: पीरियड्स के चक्र, वज़न, बालों के झड़ने और मुंहासों की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पिछली बीमारियाँ, पहले खायी गई गर्भनिरोधक गोलियों (OCPs) और हार्मोनल दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, मीठा खाने की लत, व्यायाम और तनाव के स्तर को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और बिगड़े हुए वात-कफ को पकड़ने के बाद ही प्राकृतिक ओव्यूलेशन के लिए सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

पीसीओएस के लिए असरदार  जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में महिलाओं के हार्मोन को ठीक करने, पानी की गांठों (सिस्ट) को गलाने और अंदरूनी कमज़ोरी को दूर करने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बहुत ही असरदार मानी जाती हैं:

  • कचनार गुग्गुल (गांठों को पिघलाए): आयुर्वेद में इसे शरीर की किसी भी तरह की गांठ या सिस्ट को सुखाने की सबसे पक्की चीज़ माना गया है। यह ओवरी की सूजन को कम करने में बहुत मदद करती है।
  • शतावरी (हार्मोन को रखे फिट): यह महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह बिगड़े हुए हार्मोन को वापस पटरी पर लाती है, अंडों को समय पर बनने में मदद करती है और अंदरूनी अंगों को पूरी ताकत देती है।
  • अशोक (पीरियड्स को करे नियमित): यह बच्चेदानी को मज़बूत बनाता है और रुके हुए या आगे-पीछे होने वाले पीरियड्स को कुदरती तरीके से समय पर लाने में मदद करता है।
  • गिलोय और गुड़मार (वज़न और शुगर को संभाले): पीसीओएस में शरीर के अंदर जो शुगर का तालमेल बिगड़ जाता है, ये दोनों बूटियाँ उसे ठीक करती हैं। ये बॉडी के सुस्त पड़े सिस्टम को तेज़ करती हैं और पीसीओएस की वजह से अचानक बढ़ने वाले वज़न को काबू में रखती हैं।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, ब्लॉक हुई नलियों को खोलकर संपूर्ण स्त्री स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और वात-कफ शमन: जब पीसीओएस सालों पुराना हो, बार-बार सिस्ट बन रहे हों और गर्भधारण में दिक्कत आ रही हो, तो जीवा आयुर्वेद में वमन, विरेचन और उत्तर बस्ती जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • उत्तर बस्ती (Uttar Basti): यह पीसीओएस और इनफर्टिलिटी के लिए सबसे चमत्कारी थेरेपी है। इसमें गर्भाशय के अंदर औषधीय तेल या घी डाला जाता है, जो सीधे अंडाशयों पर काम करके सिस्ट को खत्म करता है।
  • वमन और विरेचन: औषधीय काढ़े और घी के ज़रिए उल्टी और दस्त कराकर शरीर का पुराना कफ और टॉक्सिन्स बाहर निकाले जाते हैं, जिससे मेटाबॉलिज़्म तुरंत सुधरता है।

पीसीओएस की रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, पीसीओएस को दूर करने के लिए हल्का, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) वाला और कफ दोष को शांत करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • साबुत अनाज और बीज: डाइट में बाजरा, रागी, जौ और अलसी (Flaxseeds), कद्दू के बीज (Pumpkin seeds) शामिल करें, ये हार्मोन को बैलेंस करते हैं।
  • हल्की सब्ज़ियाँ: करेला, परवल, पालक और मेथी का सेवन बढ़ाएँ, यह ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखते हैं।
  • गुनगुना पानी और दालचीनी: दिन भर हल्का गुनगुना पानी पिएँ। दालचीनी की चाय पीने से इंसुलिन रेजिस्टेंस में ज़बरदस्त फायदा मिलता है।

क्या न खाएँ?

  • मीठा और रिफाइंड कार्ब्स: चीनी, गुड़, मिठाई, मैदा, वाइट ब्रेड और पैकेटबंद जूस का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, ये पीसीओएस का सबसे बड़ा दुश्मन हैं।
  • डेयरी उत्पाद: अगर मुंहासे और कफ ज़्यादा है, तो दूध, चीज़ और पनीर का सेवन कम या बंद कर दें (छाछ ले सकते हैं)।
  • जंक फूड और सोया: पिज़्ज़ा, बर्गर और सोया प्रोडक्ट्स हार्मोनल असंतुलन को और भड़काते हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में पीसीओएस का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे सिस्ट का आकार कितना बड़ा है, वज़न कितना ज़्यादा है, और हार्मोनल इम्बैलेंस कितना पुराना है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर पीसीओएस की शुरुआत है, तो आमतौर पर 2 से 3 महीनों में ही पीरियड्स नियमित होने लगते हैं और वज़न कम होना शुरू हो जाता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है, चेहरे पर बहुत बाल हैं और महिला गोलियों पर निर्भर है, तो अंडाशयों को प्राकृतिक रूप से काम करने और सिस्ट घुलने में 6 महीने से 1 साल भी लग सकता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से सिस्ट घोलने वाली जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म, सही डाइट (PCOS Diet) और योग (जैसे सूर्य नमस्कार और बटरफ्लाई पोज़) शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करती है और रोज़ व्यायाम करती है, तो भविष्य में हार्मोनल गोलियों के बिना भी प्राकृतिक पीरियड्स आने लगते हैं।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पीसीओएस की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है:

  • आधुनिक चिकित्सा: यह लक्षणों को बाहर से दबाने पर काम करती है। पीरियड्स लाने के लिए गर्भनिरोधक गोलियाँ (OCPs) दी जाती हैं और शुगर कंट्रोल करने के लिए मेटफॉर्मिन। ये दवाएँ तुरंत आराम देती हैं, जो कुछ समय के लिए अच्छा लगता है। लेकिन यह बीमारी की जड़ यानी सिस्ट और वात-कफ दोष को खत्म नहीं करता। दवा छोड़ते ही पीसीओएस फिर से वापस आता है और शरीर दवाओं का आदी हो जाता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सा: आयुर्वेद बीमारी की असली वजह यानी कफ दोष, कमज़ोर पाचन और टॉक्सिन्स को खत्म करता है। इसमें जड़ी-बूटियों और सही डाइट के ज़रिए इंसुलिन रेजिस्टेंस को सुधारा जाता है और सिस्ट को प्राकृतिक रूप से घुलाया जाता है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन शरीर का वातावरण ऐसा बन जाता है कि अंडाशय खुद स्वस्थ अंडे बनाने लगते हैं और स्थायी आराम मिलता है।

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

पीसीओएस के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • पीरियड्स आए हुए कई महीने बीत चुके हों और घरेलू नुस्खे काम न कर रहे हों।
  • पीरियड्स आने पर बहुत ही ज़्यादा और कई दिनों तक ब्लीडिंग हो रही हो।
  • पेट के निचले हिस्से (पेल्विक एरिया) में भयंकर दर्द महसूस हो।
  • वज़न बहुत तेज़ी से बढ़ रहा हो और डिप्रेशन हावी हो रहा हो।
  • शादी के बाद प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने (Pregnancy) में लगातार विफलता मिल रही हो।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और गर्भाशय को बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से पीसीओएस मुख्य रूप से कफ और वात दोष के बिगड़ने तथा मेद धातु के दूषित होने से जुड़ा होता है। गलत खान-पान, जंक फूड, ज़्यादा मीठा खाने और गतिहीन जीवनशैली से शरीर में टॉक्सिन्स बनते हैं जो इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करते हैं और अंडाशय में सिस्ट बनाते हैं। सिर्फ कृत्रिम हार्मोन खाने से ब्लीडिंग तो हो जाती है, लेकिन बीमारी अंदर ही बढ़ती रहती है। इलाज में शरीर की शुद्धि और ओव्यूलेशन को प्राकृतिक बनाना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, लो-ग्लाइसेमिक डाइट लेना, शतावरी व कचनार जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, और रोज़ाना योग (व्यायाम) करना शामिल है जिससे बीमारी को बिना हार्मोनल दवाओं के जड़ से ठीक किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, जीवनशैली में सुधार, रोज़ाना 45 मिनट का व्यायाम और सही आयुर्वेदिक डाइट अपनाकर प्राकृतिक रूप से पीरियड्स को नियमित किया जा सकता है।

बिल्कुल संभव है। आयुर्वेद में पंचकर्म और गर्भाशय को ताक़त देने वाली औषधियों से सिस्ट ठीक हो जाते हैं और प्राकृतिक गर्भधारण पूरी तरह संभव है।

हाँ, पीसीओएस में इंसुलिन रेजिस्टेंस मुख्य कारण होता है। चीनी और मीठा पूरी तरह छोड़ने से इंसुलिन का स्तर सुधरता है और वज़न तेज़ी से घटता है।

ये दोनों एक ही स्पेक्ट्रम का हिस्सा हैं, लेकिन पीसीओएस ज़्यादा गंभीर मेटाबॉलिक और हार्मोनल स्थिति है, जबकि पीसीओडी मुख्य रूप से अंडाशय में अपरिपक्व अंडों का जमाव है।

सफेद चावल और मैदे की रोटी से बचना चाहिए। इसकी जगह ब्राउन राइस, रागी, ज्वार या मल्टीग्रेन आटे की रोटी खानी चाहिए।

जब अंदर से हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) का स्तर संतुलित हो जाता है, तो नए बालों का उगना रुक जाता है और पुराने बालों की ग्रोथ बहुत कम हो जाती है।

आधुनिक चिकित्सा इसे लाइलाज मान सकती है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार सही आहार, विहार (लाइफस्टाइल) और औषधियों से इसे पूरी तरह रिवर्स और मैनेज किया जा सकता है।

कुछ महिलाओं में डेयरी उत्पाद (A1 दूध) हार्मोनल इम्बैलेंस और मुंहासों को भड़काते हैं। ऐसे में डॉक्टर की सलाह से ही दूध का सेवन करना चाहिए।

हाँ, ज़्यादा तनाव से कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो इंसुलिन को और असंतुलित करता है और पीसीओएस के लक्षणों को भयंकर रूप से बढ़ा देता है।

हाँ, यदि माँ या बहन को पीसीओएस या डायबिटीज़ की हिस्ट्री रही है, तो इसका खतरा काफी बढ़ जाता है, लेकिन सही जीवनशैली से इससे बचा जा सकता है।

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