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क्या सफेद दाग (विटिलिगो) का आयुर्वेदिक उपचार असरदार होता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

स्टेरॉयड वाले मलहमों, इम्यूनोसप्रेसेंट (इम्युनिटी को दबाने वाली दवाओं) और फोटोथेरेपी का इस्तेमाल सफेद दाग (विटिलिगो) जैसी ज़िद्दी और मानसिक रूप से परेशान करने वाली त्वचा की बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ और क्रीम त्वचा की ऊपरी सतह पर कुछ समय के लिए रंग (पिगमेंट) वापस लाने में मदद करती हैं या इम्युनिटी को सुन्न कर देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि उसकी परेशानी  खत्म हो रही है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि दवा या क्रीम छोड़ने के तुरंत बाद सफेद दाग शरीर के दूसरे हिस्सों में तेज़ी से फैलने लगते हैं और बीमारी पहले से भी बड़े रूप में वापस आ जाती है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार स्टेरॉयड क्रीम लगाने से त्वचा का पतला होना, रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) का कमज़ोर होना, या सबसे महत्वपूर्ण रक्त में मौजूद गहरी अशुद्धियाँ और शरीर के अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और बीमारी को जड़ से फैलने से रोका जा सके।

सफेद दाग (विटिलिगो) क्या है?

सफेद दाग एक ऑटोइम्यून स्थिति है, जहाँ हमारी त्वचा को रंग देने वाली कोशिकाएँ (जिन्हें मेलानोसाइट्स कहते हैं) नष्ट होने लगती हैं या काम करना बंद कर देती हैं। एक सामान्य इंसान में ये कोशिकाएँ 'मेलेनिन' नाम का रंग बनाती हैं जिससे त्वचा, बालों और आँखों को उनका रंग मिलता है, लेकिन सफेद दाग के मरीज़ में इम्युनिटी गलती से अपनी ही इन रंग बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला कर देती है। इसके कारण त्वचा पर दूध जैसे सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार तनाव, आनुवांशिकी, थायरॉइड जैसी समस्याओं या विरुद्ध आहार (गलत खान-पान के संयोजन) के कारण होते हैं। स्टेरॉयड क्रीम लगाने पर कुछ समय के लिए रंग आ सकता है, लेकिन ये दवाएँ शरीर के अंदर मौजूद उस रक्त दोष और भटके हुए इम्यून सिस्टम को ठीक नहीं करतीं जिसके कारण कोशिकाएँ बार-बार मरती हैं। दवा का बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना त्वचा की प्राकृतिक सेहत पर बुरा असर डालता है।

सफेद दाग की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

त्वचा की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से सफेद दाग के ये प्रकार देखे जाते हैं:

  • जनरलाइज़्ड विटिलिगो (Generalized Vitiligo): यह सबसे आम है। इसमें शरीर के दोनों तरफ (जैसे दोनों घुटनों या दोनों हाथों पर) एक साथ सफेद दाग उभरने लगते हैं।
  • सेगमेंटल विटिलिगो (Segmental Vitiligo): यह शरीर के किसी एक ही हिस्से या एक ही तरफ (जैसे सिर्फ एक हाथ या चेहरे के एक तरफ) होता है और आमतौर पर एक या दो साल फैलकर रुक जाता है।
  • फोकल विटिलिगो (Focal Vitiligo): इसमें शरीर पर सिर्फ एक या दो छोटे सफेद धब्बे होते हैं जो ज़्यादा नहीं फैलते।
  • एक्रोफेशियल विटिलिगो (Acrofacial Vitiligo): यह होठों के आस-पास, चेहरे और हाथों-पैरों की उँगलियों के पोरों पर होता है। (आयुर्वेद में इसे सबसे ज़िद्दी माना जाता है)।
  • यूनिवर्सल विटिलिगो (Universal Vitiligo): यह बहुत दुर्लभ है, जिसमें शरीर की लगभग 80% से ज़्यादा त्वचा अपना रंग खो देती है और सफेद हो जाती है।

सफेद दाग के लक्षण और संकेत

क्रीम से आराम मिलने के बाद दाग का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • त्वचा का रंग उड़ना: शरीर के किसी भी हिस्से पर ( खासकर धूप के संपर्क में आने वाली जगहों पर) अचानक सफेद धब्बे उभर आना।
  • बालों का समय से पहले सफेद होना: सिर के बाल, भौहें (Eyebrows), पलकें या दाढ़ी के बालों का कम उम्र में ही सफेद हो जाना।
  • मुँह के अंदर रंग उड़ना: मुँह या नाक के अंदर की श्लेष्मा झिल्ली (Mucous membrane) का रंग हल्का या सफेद हो जाना।
  • धूप के प्रति संवेदनशीलता: सफेद दाग वाली जगह पर धूप पड़ने पर तेज़ जलन होना या उस हिस्से का लाल हो जाना।
  • दवा का असर  खत्म होते ही वापसी: स्टेरॉयड या लेज़र ट्रीटमेंट बंद करते ही दाग का तेज़ी से फिर से फैलने लगना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार सफेद दाग बढ़ने के मुख्य कारण क्या हैं?

त्वचा पर बार-बार सफेद दाग फैलने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • विरुद्ध आहार (Incompatible Food): आयुर्वेद के अनुसार मछली के साथ दूध पीना, दूध के साथ खट्टी चीज़ें या नमक खाना शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनाता है, जो रक्त को दूषित कर सफेद दाग का सबसे बड़ा कारण बनता है।
  • ऑटोइम्यून विकार: जब शरीर की इम्युनिटी अनियंत्रित हो जाती है, तो वह अपनी ही स्वस्थ मेलानोसाइट कोशिकाओं को दुश्मन समझकर मारने लगती है।
  • मानसिक तनाव: बहुत ज़्यादा तनाव लेना, डर या गहरा आघात (Trauma) इम्युनिटी को कमज़ोर करता है और सफेद दाग को तेज़ी से भड़काने का बड़ा ट्रिगर माना जाता है।
  • लिवर की कमज़ोरी: पाचन  खराब होने और लिवर के सही से काम न करने पर शरीर खून को साफ नहीं कर पाता, जिससे त्वचा का पिगमेंटेशन बिगड़ने लगता है।
  • क्रीम और स्टेरॉयड पर निर्भरता: तुरंत राहत के लिए लंबे समय तक भारी दवाएँ खाने से बीमारी दब जाती है और शरीर अंदर से प्राकृतिक रूप से पिगमेंट बनाना भूल जाता है।

सफेद दाग के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

सफेद दाग को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इसका अंदरूनी इलाज न मिले, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन: समाज के नज़रिए और त्वचा के रंग में बदलाव के कारण इंसान गहरे डिप्रेशन, चिंता और हीन भावना का शिकार हो जाता है।
  • सनबर्न (Sunburn) का  खतरा: मेलेनिन न होने के कारण सफेद दाग वाली त्वचा सूरज की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से अपना बचाव नहीं कर पाती और उसमें गंभीर जलन हो सकती है।
  • आँखों की समस्याएँ: मेलेनिन आँखों में भी होता है, इसलिए सफेद दाग के कुछ मरीज़ों को आँखों में सूजन (Iritis) या रोशनी कम होने की शिकायत हो सकती है।
  • सुनने की क्षमता पर असर: कान के अंदरूनी हिस्से में भी रंग बनाने वाली कोशिकाएँ होती हैं, जिनके नष्ट होने से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
  • अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों का  खतरा: सफेद दाग वाले लोगों में थायरॉइड, एलोपेसिया (बालों का गुच्छों में झड़ना) और टाइप-1 डायबिटीज़ होने का  खतरा ज़्यादा रहता है।
  • समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित आयुर्वेदिक इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से सफेद दाग सिर्फ बाहरी त्वचा की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'श्वित्र' (Shvitra) या 'किलास' कहा जाता है। इसे कुष्ठ रोग की तरह छूत की बीमारी नहीं माना जाता, लेकिन इसके कारण शरीर के अंदर ही होते हैं। यहाँ यह माना जाता है कि जब विरुद्ध आहार और गलत जीवनशैली के कारण वात, पित्त और कफ तीनों दोष बिगड़ जाते हैं, तो वे रक्त (Blood), मांस (Muscle) और मेद (Fat) धातु को दूषित कर देते हैं। विशेष रूप से त्वचा में मौजूद 'भ्राजक पित्त' (जो त्वचा को रंग देता है) कमज़ोर पड़ जाता है। डॉक्टर नाड़ी, जीभ और दाग की जगह देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। आयुर्वेद में बस रंग पोतना या स्टेरॉयड देना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, रक्त की गहरी शुद्धि हो, भ्राजक पित्त संतुलित हो और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राकृतिक रूप से सही काम करे।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और ट्रिगर अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: सफेद दाग कब शुरू हुए, उनके बाल सफेद हैं या नहीं, और दाग होठों या उँगलियों (हथेलियों) पर तो नहीं हैं, इसकी बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: मरीज़ की पिछली बीमारियाँ, थायरॉइड की स्थिति और पहले लगाई गई क्रीम या लाइट थेरेपी का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: मरीज़ के रोज़ाना के खान-पान, विरुद्ध आहार खाने की आदत, और तनाव के स्तर को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और दूषित रक्त को पकड़ने के बाद ही मरीज़ के लिए खून साफ करने और त्वचा में मेलेनिन बढ़ाने का सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

सफेद दाग के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में सफेद दाग को दूर करने, मेलेनिन के निर्माण को बढ़ाने और रक्त शोधन के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • बाकुची : आयुर्वेद में इसे सफेद दाग की सबसे अचूक औषधि माना गया है। इसे खाने और दाग पर लगाने से त्वचा में भ्राजक पित्त उत्तेजित होता है और रंग वापस आने लगता है।
  • खदिर : यह त्वचा के रोगों और रक्त की अशुद्धियों को दूर करने के लिए प्रकृति का सबसे शक्तिशाली पेड़ है।
  • मंजिष्ठा: यह सबसे शक्तिशाली रक्त शोधक है। यह खून से गहरे टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है और इम्युनिटी को शांत करती है।
  • नीम: इसका कड़वा स्वाद लिवर को साफ करता है और रक्त को शुद्ध कर त्वचा को स्वस्थ बनाता है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित खून और दोषों को बाहर निकालकर रंग वापस पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और रक्त शोधन: जब सफेद दाग तेज़ी से फैल रहा हो, तो जीवा आयुर्वेद में विरेचन और रक्तमोक्षण जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों और रक्त की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना: 'विरेचन' प्रक्रिया में मरीज़ को औषधीय घी पिलाकर विशेष जड़ी-बूटियों के माध्यम से दस्त कराए जाते हैं। इससे लिवर में जमा पुरानी गंदगी बाहर निकल जाती है।
  • लेप और सूर्य किरण चिकित्सा (Sun Therapy): शरीर को अंदर से साफ करने के बाद, दागों पर बाकुची आदि का लेप लगाकर मरीज़ को सुबह की हल्की धूप में बैठने को कहा जाता है, जो पिगमेंटेशन को तेज़ी से वापस लाता है।

सफेद दाग के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, सफेद दाग को दूर करने के लिए हल्का, पचने में आसान और शरीर के भ्राजक पित्त को स्वस्थ करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • तांबे के बर्तन का पानी: रात भर तांबे के बर्तन में रखा पानी सुबह खाली पेट पिएँ, यह मेलेनिन के निर्माण के लिए बहुत ज़रूरी होता है।
  • कड़वी सब्ज़ियाँ और पुराना अनाज: करेला, परवल, लौकी, मूंग की दाल और पुराने चावल खाएँ, ये रक्त को साफ रखते हैं।
  • अंजीर और खजूर: ये मेलेनिन को बढ़ाने में प्राकृतिक रूप से मदद करते हैं।

क्या न खाएँ?

  • विरुद्ध आहार बिल्कुल बंद: दूध के साथ नमक, मछली, प्याज़, लहसुन या कोई भी खट्टा फल कभी न खाएँ, यह सफेद दाग का सबसे बड़ा कारण है।
  • खट्टी चीज़ें: नीबू, संतरा, टमाटर, इमली और कच्चा आम बिल्कुल न खाएँ, खट्टा रस सफेद दाग को तुरंत भड़काता है।
  • जंक फूड और फर्मेंटेड चीज़ें: इडली, डोसा, अचार, बेकरी के उत्पाद और मैदे से बनी चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ सफेद दाग देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, दाग के फैलने की रफ्तार को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी बीमारी, थायरॉइड और पहले लगाए गए स्टेरॉयड मलहमों के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और विरुद्ध आहार लेने की आदतों को गहराई से समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पेट साफ होने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति (विशेषकर पित्त की स्थिति) को जाना जाता है।
  • दाग वाली जगह पर बालों का रंग सफेद हुआ है या नहीं, यह परखा जाता है।
  • इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपके खून को पूरी तरह शुद्ध करे और इम्युनिटी को सुधारे।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

सफेद दाग एक ज़िद्दी बीमारी है। जीवा आयुर्वेद में इसका इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी की स्थिति: ठीक होने का वक्त इस बात पर निर्भर करता है कि दाग कितने पुराने हैं, शरीर के किस हिस्से पर हैं (होठों और उँगलियों के पोरों के दाग सबसे देर से ठीक होते हैं), और दाग के ऊपर के बाल काले हैं या सफेद।
  • रंग वापस आने की शुरुआत: आयुर्वेदिक इलाज और परहेज़ शुरू करने के आमतौर पर 3 से 6 महीने में दाग का फैलना रुक जाता है और छोटे-छोटे काले या गुलाबी बिंदु (Pigmentation) उभरने लगते हैं।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है, तो खून को पूरी तरह शुद्ध होने और त्वचा का पूरा रंग वापस आने में 1 से 2 साल या उससे ज़्यादा भी लग सकता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट (विरुद्ध आहार से परहेज़) का कड़ाई से पालन करता है और तनाव मुक्त रहता है, तो भविष्य में रंग उड़ने की संभावना  खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मैंने अपनी त्वचा की समस्या से राहत पाने के लिए बहुत सारा पैसे खर्च किया। मुझे लगा कि यह कभी ठीक नहीं होगी और फिर एक दिन मैंने यूट्यूब पर स्किन डिसऑर्डर पर जिवा का शो देखा और मैंने एक आयुर्वेद डॉक्टर से सलाह लेने का निर्णय लिया। मुझे जिवा डॉक्टरों से या तो वीडियो कॉल पर या क्लिनिक में आमने-सामने सलाह लेने की सुविधा पसंद आई। आयुर्वेदिक दवाओं ने मेरी त्वचा की समस्या को पूरी तरह से ठीक कर दिया।

गुणाध्य ठाकुर (मथुरा)

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

सफेद दाग की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है:

  • आधुनिक चिकित्सा: यह इम्युनिटी को दबाने (Immunosuppressants) और कृत्रिम रूप से त्वचा को उत्तेजित करने पर काम करती है। स्टेरॉयड और लाइट थेरेपी तुरंत काम शुरू कर देते हैं, जो कुछ समय के लिए अच्छा लगता है। लेकिन यह बीमारी की जड़ यानी रक्त दोष को  खत्म नहीं करता। दवा छोड़ते ही दाग फिर से फैलते हैं और दवाओं से त्वचा पतली हो जाती है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सा: आयुर्वेद बीमारी की असली वजह यानी दूषित रक्त, विरुद्ध आहार और कमज़ोर भ्राजक पित्त को  खत्म करता है। इसमें जड़ी-बूटियों और सख्त डाइट के ज़रिए खून को भीतर से साफ किया जाता है। इसमें ज़्यादा समय लगता है, लेकिन शरीर का वातावरण प्राकृतिक रूप से ऐसा बन जाता है कि मेलानोसाइट्स वापस से रंग बनाने लगते हैं और बीमारी स्थायी रूप से रुक जाती है।

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

सफेद दाग होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • शरीर पर अचानक छोटे सफेद धब्बे दिखने लगें और वे तेज़ी से बड़े हो रहे हों।
  • सफेद दाग के साथ-साथ वहाँ के बाल भी सफेद होने लगें।
  • दाग वाली जगह पर खुजली, जलन या रूखापन महसूस हो।
  • मानसिक तनाव इतना बढ़ जाए कि आप लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दें।
  • स्टेरॉयड क्रीम लगाने के बाद भी दाग शरीर के नए हिस्सों में फैलने लगें।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और बीमारी को पूरे शरीर पर फैलने से रोका जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से सफेद दाग (श्वित्र) मुख्य रूप से पित्त दोष के बिगड़ने तथा रक्त, मांस और मेद धातु के दूषित होने से जुड़ा होता है। विरुद्ध आहार (जैसे दूध और मछली एक साथ खाना), भारी तनाव और  खराब पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स बनते हैं जो खून को अशुद्ध कर देते हैं और इम्युनिटी को भटका देते हैं। सिर्फ बाहरी स्टेरॉयड लगाने से इम्युनिटी दब जाती है लेकिन बीमारी अंदर ही फैलती रहती है। इलाज में रक्त शुद्धि सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, खट्टी चीज़ें पूरी तरह छोड़ना, तांबे के बर्तन का पानी पीना, बाकुची और नीम जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, और तनाव मुक्त दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे इस ज़िद्दी बीमारी को जड़ से रोककर त्वचा का प्राकृतिक रंग वापस लाया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

बिल्कुल नहीं। सफेद दाग छूने, साथ खाने, हाथ मिलाने या साथ रहने से किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं फैलता है। यह शरीर की अंदरूनी समस्या है।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार यह 'विरुद्ध आहार' है। इनकी तासीर विपरीत होती है जो पेट में जाकर टॉक्सिन्स (आम) बनाती है और रक्त को दूषित कर श्वित्र (सफेद दाग) का कारण बनती है।

यह बीमारी कितनी पुरानी है और कहाँ पर है, इस पर निर्भर करता है। शुरुआत में इलाज करने से रंग वापस आ जाता है, लेकिन होठों और उँगलियों के पोरों के दाग पूरी तरह ठीक होने में बहुत मुश्किल होती है।

हाँ, खट्टा रस पित्त को भड़काता है और खून को अशुद्ध करता है। इसलिए आयुर्वेदिक इलाज के दौरान नीबू, संतरा, अचार और इमली खाने की स ख्त मनाही होती है।

हाँ, सुबह की हल्की धूप (विशेषकर बाकुची का लेप लगाने के बाद) त्वचा की रंग बनाने वाली कोशिकाओं (Melanocytes) को उत्तेजित करती है, लेकिन तेज़ धूप से बचना चाहिए।

आमतौर पर सफेद दाग में कोई दर्द या खुजली नहीं होती, लेकिन जब ये तेज़ धूप के संपर्क में आते हैं, तो वहाँ तेज़ जलन या लालिमा हो सकती है।

हाँ, अत्यधिक मानसिक तनाव इम्युनिटी को कमज़ोर करता है, जिससे ऑटोइम्यून रिएक्शन तेज़ हो जाता है और दाग तेज़ी से नए हिस्सों में फैलने लगते हैं।

लगभग 20-30% मामलों में यह अनुवांशिक हो सकता है। यदि परिवार में किसी को है, तो अगली पीढ़ी को इसका  खतरा थोड़ा ज़्यादा रहता है।

दागों को छिपाने के लिए कैमोफ्लाज (Camouflage) क्रीम या सुरक्षित मेकअप का इस्तेमाल किया जा सकता है, इससे मानसिक आत्मविश्वास बढ़ता है।

हाँ, तांबे में ऐसे गुण होते हैं जो मेलेनिन के निर्माण की प्रक्रिया को तेज़ करते हैं। रात भर तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना इसमें बहुत फायदेमंद है।

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