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Ayurvedic medicine लेते समय allopathic medicine बंद करनी चाहिए? यह गलती खतरनाक हो सकती है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

रोज़ाना खाने वाली दवाइयाँ बंद कर देनी चाहिए। यह एक बहुत बड़ी और खतरनाक गलती साबित हो सकती है। आयुर्वेद बीमारी की जड़ पर काम करता है और शरीर को भीतर से ठीक करने में थोड़ा वक्त लेता है। दूसरी ओर आधुनिक चिकित्सा बीमारी के लक्षणों और उसके असर को तुरंत काबू में रखती है। अगर आप अचानक से अपनी रोज़ाना की दवाइयाँ छोड़ देते हैं तो शरीर का पूरा संतुलन बिगड़ सकता है। बीमारी बहुत तेज़ी से वापस आ सकती है और आपकी स्थिति पहले से भी ज़्यादा खराब हो सकती है। इसलिए कभी भी खुद से इलाज न रोकें और सही सलाह लें।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्या कहते हैं

बड़े और बहुत अनुभवी डॉक्टरों का बिल्कुल साफ तौर पर यही कहना है कि मरीजों को खुद अपना डॉक्टर कभी नहीं बनना चाहिए। मिली जुली चिकित्सा पद्धति यानी दोनों तरीकों को मिलाकर इलाज करना आज के समय में बहुत ज़्यादा कारगर माना जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक आयुर्वेद शरीर में अपना पूरा काम शुरू नहीं कर देता तब तक पुरानी दवा का सहारा लेना बहुत ज़रूरी है। कोई भी बीमारी एक दिन में नहीं आती इसलिए उसे शरीर से बाहर जाने में भी काफी समय लगता है। इसलिए हमेशा धैर्य रखें अपने डॉक्टर पर पूरा भरोसा करें और कोई भी दवा अचानक से बंद करके अपनी जान को जोखिम में बिल्कुल न डालें।

दवाइयों को अचानक बंद करने के मुख्य कारण और नुकसान

लोग अक्सर कुछ गलतफहमियों की वजह से अपनी पुरानी दवाइयाँ अचानक छोड़ देते हैं। इसके नुकसान बहुत गहरे और गंभीर हो सकते हैं।

  • बहुत से लोग सोचते हैं कि दोनों तरह की दवाइयाँ एक साथ लेने से शरीर में बहुत ज़्यादा गर्मी बढ़ जाएगी या कोई बड़ा नुकसान होगा।
  • उन्हें लगता है कि आयुर्वेद प्राकृतिक और पूरी तरह सुरक्षित है इसलिए अब पुरानी चिकित्सा की कोई ज़रूरत नहीं रह गई है।
  • रक्तचाप और मधुमेह के मरीज़ अगर अचानक दवा छोड़ दें तो उन्हें दिल का दौरा पड़ने या लकवा मारने का बड़ा खतरा रहता है।
  • कई मामलों में पुरानी बीमारी दोबारा बहुत तेज़ी से और भयंकर रूप में उभर सकती है।
  • शरीर को नए इलाज के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाने में समय लगता है इसलिए पुरानी दवा एकदम से नहीं रोकनी चाहिए।

दोनों दवाइयाँ साथ लेने पर रिएक्शन को कैसे पहचानें

कई बार जानकारी न होने पर दोनों तरह की दवाइयाँ आपस में टकरा सकती हैं। हमारा शरीर ऐसे समय में कुछ खास इशारे देता है जिन्हें समझना बहुत ज़रूरी है। अगर आपको दवा खाने के बाद अचानक से चक्कर आने लगें या बहुत ज़्यादा घबराहट महसूस होने लगे तो यह एक सही संकेत नहीं है। त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ना या खुजली होना भी एक अहम इशारा है। इसके अलावा पेट में तेज़ जलन होना उल्टी जैसा महसूस होना या दिल की धड़कन का एकदम से तेज़ हो जाना भी इसी बात का संकेत है कि दवाइयाँ आपस में सही से काम नहीं कर रही हैं। ऐसा कुछ भी होने पर तुरंत अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए।

दोनों medicine एक साथ लेते समय किन बातों का ध्यान रखें

अगर आप दोनों तरह का इलाज एक साथ ले रहे हैं तो कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है ताकि शरीर को कोई नुकसान न हो।

  • दोनों तरह की दवाओं के बीच कम से कम एक से दो घंटे का अंतर ज़रूर रखें ताकि वे आपस में न टकराएँ।
  • खाली पेट और खाना खाने के बाद वाली दवाओं के नियम का सख्ती से और रोज़ाना पालन करें।
  • अपने दोनों डॉक्टरों को एक-दूसरे की दी गई दवाओं के बारे में पूरी और सही जानकारी ज़रूर दें।
  • अगर कोई नई तकलीफ या परेशानी महसूस हो तो तुरंत दवा रोककर सही सलाह लें।
  • दिन भर में पानी ज़्यादा पिएँ ताकि शरीर से विषैले तत्व आसानी से बाहर निकल सकें।

इलाज के दौरान किन चीज़ों से परहेज़ करना बहुत ज़रूरी है

दवाओं का पूरा और सही असर शरीर पर तभी होता है जब आपका खानपान बिल्कुल सही हो। कुछ चीज़ें दवाओं के असर को एकदम कम कर देती हैं या नुकसान पहुँचाती हैं।

  • बहुत ज़्यादा मसालेदार और तेल में तला हुआ खाना खाने से बिल्कुल बचें क्योंकि यह पेट को खराब करता है।
  • शराब और सिगरेट से पूरी तरह दूरी बना लें क्योंकि ये दवाओं का असर पूरी तरह खत्म कर देते हैं।
  • खट्टी चीज़ें जैसे अचार नींबू या इमली का सेवन कम करें क्योंकि आयुर्वेद में अक्सर इलाज के दौरान इन्हें मना किया जाता है।
  • बासी खाना या फ्रिज का बहुत ज़्यादा ठंडा पानी पीने से बचें।
  • बिना डॉक्टर से पूछे कोई भी नया चूर्ण या अपना घरेलू नुस्खा आज़माने से बचें।

क्या हर आयुर्वेदिक दवा अंग्रेजी दवा के साथ सुरक्षित होती है

यह सोचना बिल्कुल गलत है कि आयुर्वेद पूरी तरह प्राकृतिक है इसलिए यह किसी भी दवा के साथ पूरी तरह सुरक्षित होगा। ऐसा बिल्कुल नहीं होता है।

  • कई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ खून को पतला करती हैं और अगर आप पहले से ही खून पतला करने की दवा ले रहे हैं तो खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
  • अश्वगंधा और गिलोय जैसी चीज़ें मधुमेह का स्तर कम करती हैं इन्हें बिना पूछे लेने से स्तर बहुत कम हो सकता है।
  • भस्म वाली तेज़ दवाओं को दूसरी दवाओं के साथ बहुत ही ज़्यादा सावधानी से लेना चाहिए।
  • हर इंसान के शरीर की तासीर अलग होती है इसलिए जो दवा किसी एक के लिए सुरक्षित है वह दूसरे के लिए नुकसानदेह हो सकती है।

किस स्थिति में दवा बंद करना सबसे ज़्यादा खतरनाक हो सकता है

कुछ खास और गंभीर बीमारियों में खुद से दवा बंद करना सीधा जानलेवा हो सकता है। अगर आपको दिल की बीमारी है और आप खून पतला करने की दवा ले रहे हैं तो उसे एक दिन के लिए भी छोड़ना बहुत बड़ा खतरा है। इसी तरह थायराइड मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों में भी अचानक दवा छोड़ना समझदारी नहीं है। मानसिक तनाव या दिमाग से जुड़ी बीमारियों की दवाइयाँ भी बिना डॉक्टर से पूछे कम या बंद नहीं करनी चाहिए। साँस की बीमारी वाले पंप को आयुर्वेदिक काढ़ा पीते ही बंद कर देना भारी भूल हो सकती है। इन सभी स्थितियों में खास सावधानी बरतना बहुत ज़रूरी होता है।

कब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए

हमारा शरीर हमेशा कोई न कोई चेतावनी देता है बस हमें उसे समझना होता है। कुछ खास लक्षण दिखने पर थोड़ी-सी भी लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।

  • अगर आपको अचानक से साँस लेने में तकलीफ होने लगे या सीने में बहुत ज़्यादा भारीपन लगने लगे।
  • जब आपका रक्तचाप या मधुमेह का स्तर एकदम से बहुत ज़्यादा बढ़ जाए या बिल्कुल कम हो जाए।
  • आपकी आँखों के सामने अचानक अंधेरा छाने लगे या लगातार चक्कर आते रहें।
  • शरीर में कहीं भी तेज़ सूजन आ जाए या आपको पेशाब करने में बहुत ज़्यादा रुकावट महसूस हो।
  • लगातार उल्टियाँ होने लगें और शरीर में पानी की बहुत ज़्यादा कमी होने लगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक उपचार का सही तरीका 

आधुनिक चिकित्सा  आयुर्वेद संतुलित दृष्टिकोण
कई बीमारियों में तेज़ी से निदान और उपचार में मदद करती है। जीवनशैली, आहार और समग्र स्वास्थ्य पर ज़ोर देता है। दोनों पद्धतियों का उपयोग योग्य डॉक्टर की सलाह से करें।
जाँच और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर उपचार किया जाता है। व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर देखभाल की जाती है। दोनों का उद्देश्य रोगी के स्वास्थ्य में सुधार करना है।
दवाओं और नियमित फॉलो-अप से बीमारी को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। योग, दिनचर्या और संतुलित आहार पर विशेष बल देता है। किसी भी दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के बंद या कम न करें।
आपातकालीन और गंभीर स्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लंबे समय तक स्वस्थ आदतें विकसित करने पर ज़ोर देता है। ज़रूरत के अनुसार दोनों पद्धतियाँ एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं।
नियमित निगरानी से जटिलताओं के जोखिम को कम करने का प्रयास किया जाता है। समग्र स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली बनाए रखने पर ध्यान देता है। संतुलित खानपान, व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह के साथ बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

अपनी मर्ज़ी से किसी भी बीमारी की दवाइयाँ छोड़ देना किसी भी तरह की समझदारी का हिस्सा नहीं है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों का अपना एक अलग और बहुत ज़रूरी काम है। आयुर्वेद आपके शरीर को हमेशा के लिए जड़ से ठीक करने की कोशिश करता है और आधुनिक चिकित्सा आपको किसी भी गंभीर नुकसान से तुरंत बचाती है। इसलिए कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले अपने दोनों डॉक्टरों से खुलकर बात करें। अपनी सेहत के साथ कभी भी ऐसा कोई खिलवाड़ न करें जिसके लिए आपको बाद में पछताना पड़े। सही जानकारी और डॉक्टर की सलाह ही आपको पूरी तरह स्वस्थ बना सकती हैं।

References

https://bpspubs.onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1111/bcp.16222

https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/39257096/

https://www.healthline.com/health/drugs/medication-safety/

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

बिल्कुल नहीं। ऐसा करना बहुत खतरनाक और जानलेवा हो सकता है। एलोपैथिक दवाएं बीमारी के लक्षणों को तुरंत काबू में रखती हैं, जबकि आयुर्वेद जड़ पर काम करने में समय लेता है। अचानक दवा छोड़ने से बीमारी बहुत तेजी से और गंभीर रूप में वापस आ सकती है।

दोनों तरह की दवाओं के बीच कम से कम 1 से 2 घंटे का अंतर जरूर रखना चाहिए। इससे दवाएं आपस में टकराती नहीं हैं और शरीर दोनों को सही तरीके से सोख पाता है।

यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। आयुर्वेद प्राकृतिक जरूर है, लेकिन हर दवा के साथ सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं। उदाहरण के लिए, कुछ जड़ी-बूटियाँ खून पतला करती हैं, जिन्हें अगर पहले से चल रही एलोपैथिक खून पतला करने की दवा के साथ लिया जाए, तो अंदरूनी ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है।

यदि दवा लेने के बाद आपको अचानक चक्कर आना, बहुत ज्यादा घबराहट होना, त्वचा पर लाल चकत्ते या खुजली, पेट में तेज जलन, उल्टी जैसा लगना या दिल की धड़कन का अचानक तेज होना जैसे लक्षण दिखें, तो यह दवाओं के आपस में टकराने का संकेत हो सकता है।

बीपी और शुगर की दवाएं अचानक बंद करने से इनका स्तर एकदम से बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में मरीज को दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ने या लकवा (Brain Stroke) मारने का गंभीर खतरा रहता है।

हाँ, यदि इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लिया जाए। अश्वगंधा और गिलोय शरीर में शुगर के स्तर को कम करते हैं। अगर कोई मधुमेह का मरीज अपनी अंग्रेजी दवाओं के साथ इन्हें भी भारी मात्रा में लेने लगे, तो उसका शुगर लेवल खतरनाक स्तर तक कम (Hypoglycemia) हो सकता है।

दवाओं के बेहतर असर के लिए ज्यादा मसालेदार और तला हुआ खाना, शराब, सिगरेट, बासी भोजन और फ्रिज के बहुत ठंडे पानी से दूर रहना चाहिए। इसके अलावा आयुर्वेद में अक्सर खट्टी चीजें जैसे अचार, नींबू या इमली खाने की मनाही होती है।

यह फैसला केवल और केवल आपके डॉक्टर का होना चाहिए। जब आयुर्वेद से शरीर में अंदरूनी सुधार होने लगता है, तो डॉक्टर आपकी जांच रिपोर्ट (जैसे ब्लड टेस्ट या बीपी रीडिंग) देखकर धीरे-धीरे अंग्रेजी दवा की खुराक कम करते हैं। खुद से खुराक कभी कम न करें।

दोनों तरह की दवाएं लेने पर दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बहुत जरूरी है। पानी शरीर से विषैले तत्वों (Toxins) को आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है और दवाओं के अवशोषण को बेहतर बनाता है।

अगर आपको सांस लेने में तकलीफ हो, सीने में भारीपन लगे, बीपी या शुगर का स्तर अचानक बहुत ऊपर-नीचे हो जाए, आंखों के आगे अंधेरा छाए, शरीर में तेज सूजन आए या लगातार उल्टियां हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

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