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Thyroid + PCOD दोनों हैं — एक ठीक करो तो दूसरा बिगड़ता है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 09 Jun, 2026
  • category-iconUpdated on 09 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
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जब शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग आपस में तालमेल बिठाना बंद कर दें, तो स्वास्थ्य एक उलझी हुई पहेली बन जाता है। महिलाओं में आज यह स्थिति बहुत आम हो गई है जहाँ एक तरफ थायरॉयड का वजन कम करने की कोशिश होती है, तो दूसरी तरफ ओवरी (अंडाशय) में सिस्ट की समस्या हावी हो जाती है। यह एक ऐसा झूला है जिसमें एक पलड़ा भारी होता है तो दूसरा हल्का पड़ जाता है। आप एक समस्या के लिए दवाइयाँ लेती हैं, लेकिन दूसरी समस्या शरीर पर अपना नियंत्रण जमा लेती है।

इस दोहरी चुनौती का सीधा असर आपके शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आपके आत्मविश्वास और मानसिक शांति पर भी पड़ता है। केवल बाहरी लक्षणों को दबाने या अलग-अलग गोलियाँ खाने से यह चक्र नहीं टूटता। जब तक शरीर के भीतर गहराई में छिपे इस आपसी जुड़ाव को समझकर उसे मूल रूप से ठीक नहीं किया जाता, तब तक यह समस्या बनी रहती है। इस चक्र से बाहर निकलने के लिए शरीर की आंतरिक कार्यप्रणाली को समझना पहला कदम है।

Thyroid और PCOD का यह दोहरा चक्र असल में क्या है?

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर का संपूर्ण एंडोक्राइन (हार्मोनल) सिस्टम आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। जब थायरॉयड ग्रंथि का कार्य धीमा पड़ जाता है (हाइपोथायरायडिज्म), तो शरीर का समग्र मेटाबॉलिज्म (चयापचय) सुस्त हो जाता है। मेटाबॉलिज्म धीमा होने के कारण शरीर इंसुलिन का सही से उपयोग नहीं कर पाता, जिसे 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' कहते हैं। यह बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी को अधिक मात्रा में पुरुष हार्मोन (एण्ड्रोजन) बनाने के लिए प्रेरित करता है, जो सीधे तौर पर PCOD (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज) का कारण बनता है। यही वजह है कि दोनों बीमारियाँ एक-दूसरे को लगातार बढ़ावा देती रहती हैं।

आयुर्वेद के दृष्टिकोण से, यह स्थिति शरीर की 'अग्नि' (पाचन तंत्र) के अत्यधिक कमजोर होने का परिणाम है। जब जठराग्नि मंद हो जाती है, तो भोजन सही से नहीं पचता और शरीर में 'आम' (विषाक्त पदार्थ) का निर्माण होने लगता है। यह आम शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों (स्रोतों) में जाकर वात और कफ दोष को बढ़ा देता है। बढ़ा हुआ कफ दोष ओवरी में रुकावट (सिस्ट या ग्रंथि) पैदा करता है और वजन बढ़ाता है। वहीं, वात दोष का असंतुलन मासिक धर्म चक्र को बिगाड़ देता है। इसलिए, दोनों को अलग-अलग देखने के बजाय इस मूल अग्नि दोष को सुधारना ही एकमात्र उपाय है।

यह दोहरी समस्या किन रूपों में प्रकट होती है?

शरीर में जब ये दोनों हार्मोनल विकार एक साथ पनपते हैं, तो उनका प्रभाव किसी एक अंग तक सीमित नहीं रहता। यह स्थिति हर महिला के शरीर में अपनी प्रकृति और दोषों के अनुसार अलग-अलग रूपों में सामने आती है।

  • प्रजनन संबंधी रूप (Reproductive Form): मासिक धर्म का कई महीनों तक न आना, बहुत कम या अत्यधिक रक्तस्राव होना और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया का पूरी तरह से रुक जाना।
  • चयापचय संबंधी रूप (Metabolic Form): कुछ भी न खाने पर भी शरीर का फूलना, पेट के आस-पास बहुत अधिक चर्बी जमा होना और शरीर में हमेशा भारीपन महसूस होना।
  • सौंदर्य संबंधी रूप (Cosmetic Form): चेहरे और ठुड्डी पर अनचाहे बालों का आना, सिर के बालों का तेजी से झड़ना और त्वचा पर जिद्दी मुँहासों का निकलना।
  • मानसिक रूप (Psychological Form): बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक बहुत उदास हो जाना, छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और लगातार मानसिक तनाव में रहना।

Thyroid और PCOD साथ होने पर शरीर कौन से मुख्य संकेत देता है?

शरीर के भीतर चल रही इस हार्मोनल उथल-पुथल को बाहर से आसानी से महसूस किया जा सकता है। आपका शरीर कई ऐसे स्पष्ट संकेत देता है जो बताते हैं कि आपके हार्मोन अपना प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह खो चुके हैं।

  • अचानक वजन बढ़ना: लाख कोशिशों, डाइटिंग और व्यायाम के बावजूद वजन का लगातार बढ़ते जाना और उसे कम करने में भारी संघर्ष करना।
  • गंभीर बालों का झड़ना: कंघी करते समय या नहाते समय बालों का गुच्छों में टूटना और स्कैल्प (सिर की त्वचा) का साफ दिखाई देने लगना।
  • मासिक धर्म की अनियमितता: पीरियड्स का अपने निर्धारित समय पर न आना और दवाओं के बिना प्राकृतिक रूप से मासिक धर्म का शुरू न होना।
  • चेहरे पर पिगमेंटेशन: गर्दन के पिछले हिस्से, कोहनियों और चेहरे पर काले धब्बों (Acanthosis Nigricans) का उभर आना जो इंसुलिन रेजिस्टेंस का सीधा संकेत है।
  • अत्यधिक थकान: भरपूर नींद लेने के बाद भी सुबह उठने में परेशानी होना और दिन भर शरीर में ऊर्जा की भारी कमी महसूस करना।

आगे चलकर यह हार्मोनल असंतुलन क्या परेशानियाँ दे सकता है?

यदि समय रहते इन दोनों समस्याओं के बीच के इस हानिकारक तालमेल को नहीं सुधारा गया, तो भविष्य में स्थिति और भी जटिल हो सकती है। लंबे समय तक इस हार्मोनल चक्र में फँसे रहने से शरीर कई बड़ी बीमारियों की ओर धकेल दिया जाता है।

  • गर्भधारण में कठिनाई: ओव्यूलेशन न होने और अंडाशय में सिस्ट बनने के कारण प्राकृतिक रूप से माँ बनने में गंभीर बाधाएँ आ सकती हैं।
  • टाइप-2 डायबिटीज का खतरा: इंसुलिन रेजिस्टेंस लगातार बने रहने से रक्त में शुगर का स्तर अनियंत्रित हो सकता है, जो मधुमेह का रूप ले लेता है।
  • हृदय संबंधी समस्याएँ: खराब मेटाबॉलिज्म के कारण शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ने लगता है, जिससे भविष्य में हृदय रोगों की संभावना बढ़ जाती है।
  • गंभीर अवसाद (Depression): शारीरिक बदलावों और हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण लंबे समय तक चलने वाला मानसिक अवसाद और एंग्जायटी हावी हो सकती है।

आयुर्वेद इस स्थिति को कैसे देखता है और सहायक उपाय

आयुर्वेद इस दोहरी चुनौती को दो अलग-अलग बीमारियों के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे 'अग्नि' की विफलता और तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) के गहरे असंतुलन के रूप में पहचानता है। जब थायरॉयड और PCOD एक साथ होते हैं, तो इसका अर्थ है कि शरीर का 'रस' और 'रक्त' धातु दूषित हो चुका है। अनुचित आहार-विहार से पैदा हुआ विषैला 'आम' जब थायरॉयड ग्रंथि तक पहुँचता है, तो उसके कार्य को धीमा करता है, और जब वह प्रजनन अंगों (आर्तव वहा स्रोतस) तक पहुँचता है, तो वहाँ कफ के साथ मिलकर सिस्ट बनाता है। आयुर्वेद का संपूर्ण ध्यान इस 'आम' को शरीर से बाहर निकालने, जठराग्नि को पुनः प्रज्वलित करने और कफ-वात के मार्ग को खोलने पर होता है। जब मूल अग्नि सुधर जाती है, तो थायरॉयड और अंडाशय दोनों अपना प्राकृतिक कार्य सुचारू रूप से करने लगते हैं।

Thyroid और PCOD के मरीजों के लिए विशेष आहार तालिका

आपका भोजन ही आपकी सबसे पहली और महत्वपूर्ण औषधि है, विशेषकर जब बात चयापचय और हार्मोन को संतुलित करने की हो। यहाँ एक ऐसा सुपाच्य और संतुलित आहार चार्ट दिया गया है जो इन दोनों स्थितियों को एक साथ प्रबंधित करने में बहुत सहायक हो सकता है।

भोजन का समय अनुशंसित आहार वर्जित आहार
सुबह (नाश्ता) दलिया, उबले हुए सेब, मूंग दाल चीला, गर्म पानी के साथ चिया सीड्स ठंडा दूध, रिफाइंड चीनी वाली चाय, पैकेज्ड जूस, और ब्रेड
दोपहर (लंच) ज्वार या रागी की रोटी, उबली हुई हरी सब्जियाँ, मूंग दाल, हल्का छाछ मैदा से बनी चीजें, सोया उत्पाद, फूलगोभी, और बहुत अधिक सफेद चावल
रात (डिनर) आसानी से पचने वाली खिचड़ी, सब्जियों का सूप, उबली हुई लौकी या तोरई जंक फूड, भारी डेयरी उत्पाद (चीज, पनीर), लाल मांस, और मीठे डेजर्ट

इस दोहरी स्थिति में लाभकारी प्रमुख जड़ी-बूटियाँ

ये जड़ी-बूटियाँ हमारे शरीर के हॉर्मोनल सिस्टम को बिल्कुल अंदर से जाकर पोषण देती हैं। और ये हमारे मेटाबॉलिज्म (चयापचय) को इतना सुधार देती हैं कि थायरॉयड और ओवरी दोनों पर ही इसका बहुत ही अच्छा और पक्का असर देखने को मिलता है।

  • कांचनार: आयुर्वेद में इसे ग्रंथि (सिस्ट) और सूजन को खत्म करने की सबसे अचूक औषधि माना जाता है, जो ओवरी के सिस्ट को घुलाने और थायरॉयड ग्रंथि को उत्तेजित करने में मदद करती है।
  • अश्वगंधा: यह तनाव को कम करने वाला एक बेहतरीन रसायन है जो शरीर की एंडोक्राइन प्रणाली को शांत करता है और ऊर्जा के स्तर को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है।
  • वरुण: यह हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म को जगा देती है। कई बार हमारे शरीर में कफ जमा हो जाता है या फिर शरीर में पानी रुकने लगता है, जिसे हम वॉटर रिटेंशन कहते हैं। वरुण इन सबको शरीर से बाहर निकाल फेंकता है। और इस तरह से यह हमारे बढ़ते हुए वजन को सही तरीके से कंट्रोल करने में बहुत बड़ी मदद करता है।
  • शिलाजीत: यह सिर्फ एक आम सी जड़ी-बूटी नहीं है। यह हमारे शरीर की एक-एक कोशिका (Cell) के बिल्कुल अंदर तक जाकर उसे पूरी तरह से ऊर्जा और ताकत से भर देता है।
  • शतावरी: यह वात और पित्त को शांत कर ओव्यूलेशन की प्रक्रिया को समर्थन देती है और महिला प्रजनन प्रणाली को भीतर से ताकत और पोषण प्रदान करती है।

इन दोनों समस्याओं को प्रबंधित करने वाली लाभकारी आयुर्वेदिक थेरेपी

हमारे शरीर के बहुत अंदर तक जो ज़हरीले तत्व या टॉक्सिन्स जमा हो चुके होते हैं, उन्हें बाहर निकालना भी तो बहुत ज़रूरी है। इसके लिए आयुर्वेद में कुछ खास तरह की थेरेपीज़ बताई गई हैं, जो सच में बहुत कमाल का काम करती हैं।

  • उद्वर्तन: यह एक तरह की सूखी मालिश होती है। इसमें तेल की जगह पर कुछ खास तरह की जड़ी-बूटियों वाले चूर्ण या पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है।
  • विरेचन: आयुर्वेद के पंचकर्म में विरेचन का एक बहुत ही बड़ा और अहम रोल होता है। इस तरीके में कुछ चुनिंदा और असरदार आयुर्वेदिक दवाइयों का इस्तेमाल करके हमारी आंतों की अंदर से बहुत ही गहरी सफाई की जाती है।
  • बस्ती कर्म: इसे आयुर्वेद में 'अर्ध चिकित्सा' (आधी बीमारी का इलाज) कहा गया है। यह औषधीय तेलों और काढ़े के माध्यम से शरीर के वात दोष को जड़ से शांत कर मासिक चक्र को नियमित करती है।
  • शिरोधारा: माथे पर औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने की यह प्रक्रिया मानसिक तनाव को तुरंत कम करती है और हार्मोन को नियंत्रित करने वाली 'पिट्यूटरी ग्रंथि' को शांत करती है।

आयुर्वेदिक उपचार से सुधार की समय सीमा

आयुर्वेद शरीर को अंदर से ठीक करने का एक बहुत ही प्राकृतिक और स्थायी रूप से काम करने वाली पद्धति है। यह कभी भी सिर्फ ऊपर-ऊपर से बीमारियों के लक्षणों को दबाने का काम नहीं करता। बल्कि यह तो सीधा बीमारी की जड़ पर प्रहार करता है और उसे खत्म करने की कोशिश करता है। हाँ, इसके लिए आपको थोड़ा सा सब्र और धैर्य तो ज़रूर रखना पड़ता है। और अगर आप ये धैर्य रखते हैं, तो आपको अपने शरीर में ये बदलाव कुछ इस तरह से देखने को मिलेंगे:

  • पहले कुछ सप्ताह: सबसे पहले पाचन तंत्र में सुधार महसूस होता है, शरीर का भारीपन कम होने लगता है और बेवजह की थकान दूर होकर ऊर्जा का स्तर बढ़ता है।
  • 1 से 3 महीने: इंसुलिन का स्तर धीरे-धीरे सुधरने लगता है, बालों का झड़ना कम हो जाता है और वजन बढ़ने की प्रक्रिया पर रोक लग जाती है।
  • 3 से 6 महीने: जब इलाज करते हुए आपको तीन से छह महीने हो जाते हैं, तो आपका बिगड़ा हुआ वात दोष अपने आप संतुलन में आने लगता है। इससे महिलाओं में जो मासिक धर्म यानी पीरियड्स का चक्र बिगड़ गया था, वो वापस अपनी सही और प्राकृतिक लय में लौटने लगता है। और सिर्फ इतना ही नहीं, चेहरे पर जो मुहाँसे या काले दाग-धब्बे हो गए थे, वो भी अब धीरे-धीरे हल्के पड़ने शुरू हो जाते हैं।
  • 6 महीने और उससे अधिक: इतने समय बाद तो शरीर का पूरा का पूरा मेटाबॉलिज्म ही वापस सही तरीके से काम करने लग जाता है। ओवरी के अंदर जो गांठें या सिस्ट बन गई थीं, उनका आकार भी अंदर ही अंदर सिकुड़कर छोटा होने लगता है। और सबसे बड़ी बात, हमारी थायरॉयड ग्रंथि (ग्लैंड) भी अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए वापस अपना काम बिल्कुल ठीक से करने लग जाती है।

इस दोहरी समस्या के लिए आयुर्वेद का दृष्टिकोण कैसे बेहतर है?

आधुनिक चिकित्सा प्रणाली अक्सर शरीर को अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर देखती है। आप थायरॉयड के लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट की गोली खाते हैं और PCOD के लिए गर्भनिरोधक गोलियाँ (Birth control pills) या इंसुलिन की दवाएँ लेते हैं। एक दवा आपके मासिक चक्र को कृत्रिम रूप से चलाती है, लेकिन वह शरीर के मेटाबॉलिज्म पर गहरा नकारात्मक असर डालती है, जिससे थायरॉयड और बिगड़ जाता है। यह दृष्टिकोण केवल बाहरी लक्षणों का प्रबंधन करता है, शरीर के अंदरूनी तंत्र को ठीक नहीं करता।

आयुर्वेद हमारी इस पूरी उलझन को एक बहुत ही अलग और संपूर्ण (होलिस्टिक) नज़रिए से देखता है। आयुर्वेद का सीधा सा मानना है कि जब बीमारी की जड़ एक ही है, यानी आपकी 'अग्नि' का कमज़ोर होना और कफ-वात का बिगड़ जाना। तो फिर ज़ाहिर सी बात है कि इलाज भी उसी जड़ पर होना चाहिए। जब हम आयुर्वेद की मदद से अपनी पेट की आग यानी 'जठराग्नि' को बिल्कुल ठीक कर लेते हैं, तो हमारा शरीर अपना इंसुलिन खुद ही कंट्रोल करना सीख लेता है।

डॉक्टर से परामर्श कब लें?

यह बात तो अपनी जगह बिल्कुल सच है कि प्राकृतिक तरीके, हमारी आयुर्वेदिक दवाइयाँ और खान-पान में किए गए बदलाव ऐसी स्थिति में बहुत ही कमाल का असर दिखाते हैं। लेकिन फिर भी, कई बार हमारे शरीर की कुछ स्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं, जहाँ हमें बिना एक पल की भी देरी किए किसी अच्छे डॉक्टर या विशेषज्ञ की मदद लेनी ही पड़ती है। शरीर के ऐसे कुछ गंभीर और साफ़ इशारों को हमें बिल्कुल भी हल्के में या नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए।

  • असामान्य रक्तस्राव: अगर आपको पीरियड्स के दौरान बहुत ही ज़्यादा खून आ रहा है। और यह दिक्कत एक-दो दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक ऐसे ही लगातार चल रही है। जिसकी वजह से आपके शरीर में एकदम से बहुत ज़्यादा कमज़ोरी आ गई है या आप हमेशा थका-थका महसूस करने लगी हैं। तो समझ जाइए कि यह कोई आम बात नहीं है, और आपको डॉक्टर को दिखाना ही चाहिए।
  • पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द: पेल्विक क्षेत्र (नाभि के नीचे) में अचानक और असहनीय दर्द उठना, जो किसी भी घरेलू उपाय से शांत न हो रहा हो।
  • वजन का बेतहाशा बढ़ना: यदि आप बहुत कम भोजन कर रहे हैं और सक्रिय हैं, फिर भी कुछ ही दिनों में आपका वजन असामान्य रूप से बढ़ता जा रहा हो।
  • गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट: यदि डिप्रेशन, निराशा या एंग्जायटी इस स्तर तक पहुँच जाए कि आपके दैनिक जीवन और विचारों को पूरी तरह नकारात्मक रूप से प्रभावित करने लगे।

निष्कर्ष

थायरॉयड और PCOD का एक साथ होना जीवन भर का संघर्ष नहीं है। जब तक आप केवल अलग-अलग अंगों के लक्षणों को दबाने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, यह झूला इसी तरह ऊपर-नीचे होता रहेगा। शरीर एक संपूर्ण इकाई है और इसे समग्र रूप से ही ठीक किया जा सकता है। सही आयुर्वेदिक आहार, अनुशासित जीवनशैली और जड़ी-बूटियों की मदद से आप अपने चयापचय की आग (अग्नि) को पुनः सक्रिय कर सकते हैं। जब शरीर की आंतरिक सफाई हो जाती है और दोष अपने संतुलन में आ जाते हैं, तो ये दोनों हार्मोनल समस्याएँ अपने आप विदा होने लगती हैं। आपको अपने शरीर से लड़ने की नहीं, बल्कि उसकी भाषा समझने की आवश्यकता है।

यदि आप भी थायरॉयड और PCOD के इस दोहरे और निराशाजनक चक्र में फँसी हुई हैं और दवाओं के जाल से बाहर निकलकर एक प्राकृतिक, स्थायी समाधान खोज रही हैं, तो आज ही विशेषज्ञ से सलाह लें। अपनी प्रकृति के अनुसार व्यक्तिगत मार्गदर्शन और सही आयुर्वेदिक उपचार के लिए जीवा आयुर्वेद के विशेषज्ञों से +919266714040 पर संपर्क करें।

References:

https://iris.who.int/bitstream/handle/10665/66342/WHO_DIL_00.4_eng.pdf

https://medlineplus.gov/thyroiddiseases.html

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC10453810/

https://www.njppp.com/fulltext/28-1473314294.pdf

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

थायरॉयड के कारण आपका मेटाबॉलिज्म बेहद सुस्त हो जाता है, जिससे शरीर कैलोरी जलाने के बजाय उसे चर्बी के रूप में जमा करने लगता है। इसके साथ ही, PCOD के कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस हो जाता है, जो इस चर्बी को विशेष रूप से पेट के आस-पास तेजी से बढ़ाता है। इन दोनों के संयुक्त प्रभाव के कारण केवल व्यायाम या डाइटिंग से वजन कम करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है।

आजकल बाजार में मिलने वाले दूध और डेयरी उत्पादों में अक्सर कृत्रिम हार्मोन और एंटीबायोटिक्स के अंश होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, भारी डेयरी उत्पाद पचने में मुश्किल होते हैं और शरीर में कफ तथा आम (विषाक्त पदार्थ) को बढ़ाते हैं। यह बढ़ा हुआ कफ ओवरी में सिस्ट को और अधिक ट्रिगर कर सकता है, इसलिए इन्हें कम खाने की सलाह दी जाती है।

जब आप तनाव में होते हैं, तो शरीर कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन अधिक बनाता है। यह हार्मोन सीधे तौर पर थायरॉयड ग्रंथि के कामकाज को रोकता है और दूसरी ओर इंसुलिन का संतुलन भी बिगाड़ देता है। कोर्टिसोल बढ़ने से ओवरी अधिक पुरुष हार्मोन बनाने लगती है, जिससे PCOD के लक्षण जैसे चेहरे पर बाल और मुँहासे तुरंत बढ़ जाते हैं।

रात की गहरी नींद के दौरान शरीर अपनी क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करता है और हार्मोन के स्तर को रीसेट करता है। जब नींद पूरी नहीं होती, तो मेटाबॉलिज्म खराब हो जाता है और तनाव का स्तर बढ़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप इंसुलिन रेजिस्टेंस और अधिक बढ़ जाता है, जो थायरॉयड और PCOD दोनों की रिकवरी को पूरी तरह रोक देता है।

इस स्थिति में बहुत अधिक कठोर या थका देने वाला व्यायाम करने से बचना चाहिए क्योंकि यह शरीर में तनाव (कोर्टिसोल) बढ़ा सकता है। इसके बजाय, मध्यम स्तर का व्यायाम जैसे तेज चलना, तैराकी, साइकिल चलाना और योग (विशेषकर सूर्य नमस्कार और कपालभाति प्राणायाम) एंडोक्राइन सिस्टम को सक्रिय करने और वात दोष को शांत करने में बहुत लाभकारी होते हैं।

इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण शरीर की कोशिकाओं को तुरंत ऊर्जा नहीं मिल पाती, जिससे बार-बार मीठा खाने की तीव्र इच्छा होती है। इसे नियंत्रित करने के लिए अपने आहार में प्रोटीन और स्वस्थ वसा (जैसे घी, बादाम) की मात्रा बढ़ाएँ। इसके अलावा, मीठे की तलब होने पर भुने हुए बीज, मुनक्का या प्राकृतिक फलों का संतुलित मात्रा में सेवन करें।

आयुर्वेद में सही तरीके से किया गया उपवास (लंघन) बहुत फायदेमंद माना गया है। इंटरमिटेंट फास्टिंग (जैसे 12-14 घंटे भोजन न करना) पाचन अग्नि को बहुत मजबूत करता है और शरीर को इंसुलिन के प्रति संवेदनशील बनाता है। हालाँकि, बिना पानी के या बहुत लंबे समय तक कठोर उपवास करने से वात दोष बढ़ सकता है, जिससे समस्या और बिगड़ सकती है।

हार्मोनल असंतुलन के कारण बाल बहुत कमजोर हो जाते हैं। इसे रोकने के लिए बाहरी तेल के साथ-साथ अंदरूनी पोषण आवश्यक है। अपने आहार में करी पत्ता, आँवला और भीगे हुए बादाम शामिल करें। साथ ही, भृंगराज और ब्राह्मी युक्त आयुर्वेदिक तेल से सप्ताह में दो बार हल्के हाथों से सिर की मालिश करने से बालों की जड़ों को मजबूती मिलती है।

प्राकृतिक रूप से गर्भधारण के लिए ओव्यूलेशन (अंडे का सही समय पर फूटना) का होना आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले आयुर्वेद पंचकर्म (विशेष रूप से बस्ती चिकित्सा) के माध्यम से वात और कफ दोष को संतुलित करना चाहिए। साथ ही, शतावरी और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों का सेवन करने से प्रजनन अंगों को बल मिलता है और गर्भधारण की संभावना काफी बढ़ जाती है।

हाँ, आधुनिक दवाओं (जैसे थायरॉयड की गोली) के साथ आयुर्वेदिक उपचार लेना पूरी तरह सुरक्षित है, बशर्ते यह किसी विशेषज्ञ की देखरेख में किया जाए। इन दोनों दवाओं के सेवन के बीच कम से कम एक से दो घंटे का अंतर रखना जरूरी है। जैसे-जैसे आयुर्वेदिक औषधियों से शरीर का मेटाबॉलिज्म प्राकृतिक रूप से सुधरने लगता है, आपके डॉक्टर आपकी एलोपैथिक दवाओं की खुराक को धीरे-धीरे कम कर सकते हैं।

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