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Laxative रोज़ ले रहे हैं - आंत आलसी हो रही है, कैसे रोकें?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

सुबह उठकर पेट का स्वाभाविक रूप से साफ होना हमारे शरीर के 'मेटाबॉलिज्म' और एक स्वस्थ दिन का सबसे अहम हिस्सा है, लेकिन आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली और खराब खान-पान ने कब्ज़ को एक आम बीमारी बना दिया है। इस परेशानी से तुरंत राहत पाने के लिए अक्सर लोग रात को सोने से पहले कोई तेज चूर्ण या मल साफ करने वाली दवा लेने लगते हैं। शुरुआत में यह तरीका किसी चमत्कार जैसा लगता है, जहाँ सुबह बिना किसी खास प्रयास के पेट साफ हो जाता है।

लेकिन समय के साथ शरीर की यह सहूलियत एक खतरनाक निर्भरता में बदल जाती है। हमारे शरीर का वह प्राकृतिक तंत्र, जिसका काम मल को आंतों में आगे धकेलना है, वह पूरी तरह से इन बाहरी दवाओं का गुलाम बन जाता है। आपकी आंतें इतनी आलसी हो जाती हैं कि बिना बाहरी केमिकल या उत्तेजना के मल त्याग की कोई प्राकृतिक इच्छा ही पैदा नहीं होती। यह स्थिति सिर्फ आपके पाचन तंत्र को ही खोखला नहीं करती, बल्कि मानसिक रूप से भी आपको इन दवाओं के मोहताज बना देती है। आंतों की इस कृत्रिम आदत को तोड़ना और उन्हें वापस उनकी प्राकृतिक अवस्था में लाना संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है।

रोज़ाना रेचक (Laxative) पर निर्भरता असल में क्या है?

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, जब आप नियमित रूप से कृत्रिम रेचक (Laxatives) लेते हैं, तो ये दवाएँ आंतों की नसों को कृत्रिम रूप से उत्तेजित करती हैं या उनमें जबरन पानी खींचती हैं। लंबे समय तक इस बाहरी झटके के कारण आंतों का 'एंटेरिक नर्वस सिस्टम' (Enteric nervous system) असंवेदनशील हो जाता है। बड़ी आंत (Colon) की मांसपेशियाँ अपनी प्राकृतिक सिकुड़ने और फैलने की क्षमता (Peristalsis) को भूल जाती हैं। इसी स्थिति को 'लेजी बाउल सिंड्रोम' (Lazy Bowel Syndrome) कहा जाता है, जहाँ आंतें बाहरी उत्तेजना के बिना कोई भी गति नहीं करती हैं।

अगर हम आयुर्वेद के नज़रिए से देखें, तो बात थोड़ी अलग है। हमारे शरीर में मल बाहर निकालने की जो पूरी प्रक्रिया है, उसे 'अपान वायु' ही कंट्रोल करती है। यदि आप रोज़ाना कोई तेज़ या कठोर चूर्ण खा रहे हैं तो ये दवाइयाँ आपकी आंतों से सिर्फ मल को ही बाहर नहीं निकालतीं। बल्कि वहां जो शरीर की अपनी एक प्राकृतिक चिकनाहट होती है, ये उसे भी खुरचकर बाहर फेंक देती हैं। इसकी वजह से हमारी बड़ी आंत में बहुत ही ज़्यादा रूखापन आ जाता है। और यही वो जगह है जहां 'वात दोष' बहुत भयानक तरीके से बढ़ जाता है। अब ज़ाहिर सी बात है, जब आंतें इतनी रूखी और कमज़ोर हो जाएंगी, तो वे मल को आगे कैसे धकेल पाएंगी? आयुर्वेद में इस पूरी स्थिति को बहुत ही गंभीरता से लिया जाता है। इसे हमारी 'जठराग्नि' यानी पाचन की आग का कमज़ोर होना माना जाता है। और साथ ही, इसे अपान वायु का बहुत बुरी तरह से बिगड़ जाना भी कहा जाता है।

मल त्याग की समस्या किन रूपों में प्रकट होती है?

जब आप लंबे समय तक सिर्फ इन्हीं कृत्रिम रेचकों के भरोसे रहते हैं, तो आंतों की कार्यप्रणाली (Bowel function) में कई गंभीर बदलाव आते हैं। आपका शरीर और पाचन तंत्र इस खतरनाक निर्भरता को कुछ स्पष्ट लक्षणों के रूप में प्रकट करने लगता है:

  • उत्तेजक निर्भरता: यह वह अवस्था है जहाँ बिना किसी तेज दवा या चूर्ण के आंतों में कोई हलचल ही नहीं होती। सुबह सोकर उठने पर मल त्यागने की जो स्वाभाविक इच्छा (Natural urge) होनी चाहिए, शरीर वह प्राकृतिक दबाव बनाना पूरी तरह से भूल जाता है।
  • मात्रा में वृद्धि: शुरुआत में जिस एक हल्की सी गोली या चम्मच भर चूर्ण से पेट एकदम साफ हो जाता था, कुछ समय बाद शरीर उसका आदी हो जाता है। फिर उसी परिणाम के लिए आपको उस दवा की दुगनी या तिगुनी मात्रा लेनी पड़ती है।
  • अपूर्ण सफाई का अहसास: वॉशरूम से आने के बाद भी ऐसा ही लगता रहता है कि पेट तो अभी पूरी तरह से साफ़ हुआ ही नहीं है। कुछ कसर बाकी है। और फिर इसी की वजह से पूरे दिन पेट में एक अजीब सा भारीपन बना ही रहता है।
  • कठोर और शुष्क मल: आंतों का सारा प्राकृतिक तरल पदार्थ सूख जाने के कारण मल का अत्यंत कठोर और पत्थर जैसा हो जाना।

आंतों के आलसी होने के मुख्य संकेत

आपका पाचन तंत्र अपनी कमज़ोर और बाहरी दवाओं पर इस खतरनाक निर्भरता को कुछ स्पष्ट लक्षणों के माध्यम से प्रकट करता है। इन संकेतों को समय रहते पहचानना बहुत आवश्यक है।

  • प्राकृतिक दबाव का अभाव: सुबह सोकर उठने पर मल त्यागने की जो स्वाभाविक इच्छा (Natural urge) होनी चाहिए, उसका पूरी तरह से समाप्त हो जाना।
  • पेट में लगातार सूजन: मल और गैस के स्वाभाविक रूप से न निकलने के कारण पेट दिन भर गुब्बारे की तरह फूला रहता है। अंदर रुकी हुई गैस के कारण आंतों पर भारी दबाव पड़ता है, जिससे पूरा दिन एक असहज भारीपन और बेचैनी बनी रहती है।
  • दवा छोड़ने पर गंभीर कब्ज़: अगर आपने गलती से किसी एक दिन भी वो चूर्ण या दवा नहीं ली। तो मल बिल्कुल भी बाहर नहीं आएगा। और फिर इस वजह से पेट में बहुत ही भयानक दर्द उठने लगता है।
  • बार-बार पेट में ऐंठन: मल त्याग से पहले या दिन के समय आंतों में अजीब सी ऐंठन, खिंचाव और मरोड़ का अनुभव होना।
  • थकान: मल के साथ शरीर से आवश्यक पोषक तत्वों के तेजी से बाहर निकल जाने के कारण हर समय ऊर्जा की कमी और सुस्ती महसूस करना।

आगे चलकर आंतों का आलसी होना क्या परेशानियाँ दे सकता है?

यदि समय रहते दवाओं पर इस कृत्रिम निर्भरता को नहीं तोड़ा गया, तो आंतें अपना काम करना पूरी तरह से बंद कर सकती हैं। भविष्य में यह आदत शरीर में कई गंभीर और स्थायी जटिलताएँ (Chronic complications) पैदा कर सकती है:

  • इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन: तेज़ दवाओं से बार-बार जबरन मल त्यागने के कारण शरीर से पोटेशियम और सोडियम जैसे बहुत ही महत्वपूर्ण खनिज बाहर निकल जाते हैं। इसका सीधा और खतरनाक असर हमारे हृदय की कार्यप्रणाली और मांसपेशियों पर पड़ता है।
  • आंतों की मांसपेशियों का लकवा: जब आंतों को लंबे समय तक बाहरी दवाओं का झटका दिया जाता है, तो उनकी प्राकृतिक रूप से सिकुड़ने और फैलने की मोटर क्षमता (Peristalsis) हमेशा के लिए खत्म हो सकती है। ऐसी स्थिति में भविष्य में बिना दवा के प्राकृतिक रूप से पेट साफ होना लगभग असंभव हो जाता है।
  • बवासीर और फिशर: जब मल अंदर ही अंदर सूखकर एकदम कड़क हो जाता है। तो हम उसे जबरदस्ती ज़ोर लगाकर बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। इस ज़ोर की वजह से पीछे मलाशय की नसों पर बहुत ही ज़्यादा और भारी दबाव पड़ता है। कई बार तो नसें छिल भी जाती हैं। और फिर वहां से खून आने लगता है, जो बहुत ही दर्दनाक होता है।
  • पोषक तत्वों की कमी: खाना पचने के लिए उसे आंतों में कुछ समय तक रुकना होता है। लेकिन इन तेज़ दवाओं की वजह से खाने को वहां रुकने का वो सही समय ही नहीं मिल पाता। नतीजा यह होता है कि हमारा शरीर उस खाने से ज़रूरी विटामिन्स और मिनरल्स को सोख ही नहीं पाता। और शरीर अंदर से बिल्कुल कमज़ोर पड़ने लगता है।

आयुर्वेद इस स्थिति को कैसे देखता है?

आयुर्वेद में कहा गया है कि मल त्याग करना हमारे शरीर का एक प्राकृतिक 'वेग' है। यह शरीर की एक अपनी पुकार है। इसे ना तो कभी रोकना चाहिए, और ना ही बाहरी दवाओं का ज़ोर लगाकर जबरदस्ती पैदा करना चाहिए। जब हमारी आंतें बिल्कुल आलसी हो जाती हैं, तो इसका सीधा सा मतलब यही होता है कि हमारे शरीर का वात दोष पूरी तरह से बेकाबू हो चुका है। वात का स्वभाव सूखापन (Rukshata) है, और जब यह आंतों में घर कर लेता है, तो मल सूख कर पत्थर जैसा बन जाता है। इस रूखे मल को बाहर निकालने के लिए लोग और अधिक तीखी दवाएँ खाते हैं, जो आंतों को और ज़्यादा छीलकर सुखा देती हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जो कभी खत्म नहीं होता।

इस चक्र को तोड़ने के लिए आयुर्वेद आंतों को 'धक्का' देने के बजाय उन्हें 'पोषण' देने की बात कहता है। इसके लिए जठराग्नि को सम किया जाता है और आंतों में स्वस्थ वसा (घी, तेल) के माध्यम से प्राकृतिक चिकनाहट वापस लाई जाती है। जब पक्वाशय (Colon) में स्निग्धता (नमी) लौट आती है, तो अपान वात शांत हो जाता है और मल बिना किसी बाहरी दबाव के आसानी से खिसकने लगता है। सही आहार, औषधियों का समझदारी से उपयोग और दिनचर्या में सुधार आंतों की भूली हुई प्राकृतिक लय को वापस लाने में मदद करते हैं।

आलसी आंत को पुनः सक्रिय करने के लिए विशेष आहार तालिका

आंतों को प्राकृतिक रूप से काम करने के लिए पर्याप्त नमी (Hydration) और फाइबर की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यह आहार योजना आपकी पाचन प्रणाली को फिर से मजबूत और सक्रिय बनाने में बहुत सहायक हो सकती है।

भोजन का समय अनुशंसित आहार वर्जित आहार
सुबह (नाश्ता) पका हुआ पपीता, भीगे हुए मुनक्का और अंजीर, दलिया, एक चम्मच गाय के घी के साथ हल्का गर्म पानी सूखी ब्रेड, मैदे से बने बिस्कुट, बहुत अधिक कड़क चाय या खाली पेट कॉफी
दोपहर (लंच) ज्वार या चोकर युक्त आटे की रोटी, मूंग दाल, लौकी या तोरई की सब्जी, ताजी छाछ बहुत अधिक सूखे और तले हुए खाद्य पदार्थ, मैदा से बनी चीजें, और बासी सफेद चावल
रात (डिनर) सब्जियों का ताजा सूप, आसानी से पचने वाली हल्की खिचड़ी, उबली हुई हरी पत्तेदार सब्जियाँ भारी लाल मांस, फास्ट फूड, छोले और राजमा जैसे भारी वात बढ़ाने वाले पदार्थ

आंतों की कार्यक्षमता सुधारने में लाभकारी प्रमुख जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने कुछ ऐसी सौम्य और सुरक्षित औषधियाँ प्रदान की हैं जो आंतों को बिना नुकसान पहुँचाए उनकी प्राकृतिक गति को वापस लाती हैं। यहाँ कुछ प्रमुख आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का विवरण है जो इस स्थिति में अत्यंत लाभकारी हैं।

  • त्रिफला: यह तीन फलों का एक अद्भुत मिश्रण है जो आंतों को जबरन उत्तेजित नहीं करता, बल्कि उनकी दीवारों को मजबूत कर प्राकृतिक रूप से मल को बाहर धकेलता है।
  • ईसबगोल (Psyllium Husk): यह मल में एक प्राकृतिक थोक (bulk) जोड़ता है और आंतों की सूखी हुई परतों में आवश्यक नमी प्रदान कर मल को नरम बनाता है।
  • मुलेठी: यह हमारी आंतों के अंदर की उस नाज़ुक सी झिल्ली को बहुत ही प्यार से शांत करती है। आंतों के अंदर जो इतना सारा सूखापन आ गया था, यह उसे धीरे-धीरे दूर करती है। और वहां वापस से एक प्राकृतिक और असली चिकनाहट पैदा करने का काम करती है।
  • हरड़ (Haritaki): आयुर्वेद की दुनिया में हरड़ को एक बहुत ही शानदार और बड़ी औषधि माना जाता है। खासकर वात दोष को कंट्रोल करने में इसका कोई जवाब नहीं है। यह हमारी आंतों की कमज़ोर नसों को अंदर से नई ताकत देती है। और धीरे-धीरे मल त्यागने की इस पूरी प्रक्रिया को वापस से रोज़ाना की सही पटरी पर ले आती है।
  • सौंफ: यह आंतों की कठोर ऐंठन को कम करती है, पाचन अग्नि को बढ़ाकर खाए हुए भोजन को पचाती है और रुकी हुई गैस को शरीर से बाहर निकालती है।

मल त्याग को प्राकृतिक बनाने वाली लाभकारी आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेद में कुछ खास तरह के तरीके और थेरेपीज़ बताई गई हैं। ये थेरेपीज़ आंतों के अंदर खोई हुई नमी और काम करने की रफ्तार वापस ला सकती हैं।

  • मात्रा बस्ती: यह आयुर्वेद का एक बड़ा ही असरदार तरीका है। इसमें होता यह है कि गुदा मार्ग (पीछे के रास्ते) से कुछ बहुत ही हल्के और जड़ी-बूटियों वाले तेलों को शरीर के अंदर पहुंचाया जाता है।
  • अभ्यंग: पेट पर हल्के गर्म तिल या अरंडी के तेल से (नाभि के चारों ओर गोलाकार दिशा में) मालिश करने से आंतों की प्राकृतिक सिकुड़ने-फैलने की गति को बढ़ावा मिलता है।
  • स्वेदन: पेट की हल्की और गुनगुनी सिकाई करने से आंतों की कठोर पड़ चुकी मांसपेशियाँ ढीली पड़ती हैं और रुका हुआ मल आसानी से आगे बढ़ने लगता है।
  • नाभि बस्ती: नाभि के ऊपर औषधीय तेल को एक विशेष घेरे में कुछ देर तक रोक कर रखने से पूरे पाचन तंत्र की सूक्ष्म नसों को गहरा पोषण प्राप्त होता है।

आंतों को प्राकृतिक रूप से काम करने में सुधार की समय सीमा

दवाओं की पुरानी आदत छोड़कर आंतों को उनके प्राकृतिक स्वरूप में वापस लाना एक क्रमिक और धीमी प्रक्रिया है। इसमें शरीर को ढलने में थोड़ा समय लगता है, जिसके सुधार के चरण इस प्रकार हैं।

  • पहले 1 से 2 सप्ताह: जब आप ये इलाज शुरू करेंगे, तो शुरू के एक-दो हफ्तों में थोड़ी सी दिक्कत हो सकती है। पेट में हल्की सी गैस बन सकती है। थोड़ा भारीपन लग सकता है। या फिर वॉशरूम जाने में थोड़ी परेशानी भी महसूस हो सकती है। पर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इतने समय बाद आपकी आंतें बिना किसी बाहरी दवा के, खुद से अपना काम करना दोबारा सीख रही होती हैं।
  • तीसरे से चौथे सप्ताह: मल में प्राकृतिक नमी लौटने लगती है और सुबह उठने पर मल त्यागने की प्राकृतिक इच्छा (दबाव) धीरे-धीरे उत्पन्न होने लगती है।
  • दूसरे से तीसरे महीने: पाचन तंत्र अपनी पुरानी लय को वापस पा लेता है, गैस और पेट की ऐंठन में कमी आती है और कब्ज़ की समस्या काफी हद तक प्राकृतिक रूप से सुधर जाती है।
  • चौथे महीने के बाद: जब आप सब्र रखते हुए चार महीने पार कर लेते हैं, तब आपकी आंतें अब पूरी तरह से अपने पैरों पर खड़ी हो जाती हैं। अब उन्हें किसी भी बाहरी दवा या ज़बरदस्ती के धक्के की ज़रूरत नहीं पड़ती। शरीर की यह पूरी प्रक्रिया बिल्कुल पहले की तरह एकदम नॉर्मल और सही तरीके से चलने लगती है।

इस निर्भरता को तोड़ने के लिए आयुर्वेद का दृष्टिकोण कैसे बेहतर है?

आधुनिक रेचक (Laxatives) एक प्रकार से थके हुए घोड़े को चाबुक मारने का काम करते हैं। वे आपकी कमजोर आंतों पर कृत्रिम दबाव डालकर उनसे जबरन काम लेते हैं, जिससे अंग और अधिक थककर शिथिल पड़ जाता है। यही कारण है कि आम दवाओं से कब्ज़ स्थायी रूप से ठीक नहीं होती, बल्कि शरीर उनका आदी बन जाता है। इस 'पुश एंड फोर्स' (धक्का देने) वाली तकनीक से आंतों का प्राकृतिक तंत्र पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

अगर हम बाज़ार की दवाओं और आयुर्वेद की तुलना करें, तो बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है। आयुर्वेद का नज़रिया पूरी तरह से अलग है। यह सिर्फ पोषण देने और अंदरूनी मरम्मत करने पर टिका है। आयुर्वेद आपकी आंतों को किसी चाबुक से मारकर काम करने के लिए मजबूर नहीं करता। इसके बजाय, यह उन्हें प्यार से सही आहार देता है। फाइबर वाली चीज़ें और जड़ी-बूटियाँ देकर उनमें एक प्राकृतिक नमी भरता है। पेट की आग यानी जठराग्नि को ठीक किया जाता है। जिससे बढ़ा हुआ वात दोष खुद ही शांत हो जाता है। और फिर जब आपकी आंतें अंदर से मजबूत और चिकनी हो जाती हैं, तो क्या होता है? उनमें वो काम करने की खोई हुई रफ्तार अपने आप वापस लौट आती है। देखा जाए तो यह तरीका सिर्फ कब्ज़़ का कोई एक-दो दिन वाला इलाज नहीं है। बल्कि यह आपके पूरे पाचन तंत्र को ही इतना सक्षम बना देता है कि आपको पूरी ज़िंदगी भर के लिए एक पक्का और असली स्वास्थ्य मिल जाता है।

डॉक्टर से परामर्श कब लें?

हालांकि सही आहार, फाइबर और आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ आंतों को सुधारने में बहुत कारगर हैं, लेकिन कुछ शारीरिक स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ बिना देर किए विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।

  • मल में रक्त आना: यदि शौच के दौरान मल के साथ ताजा लाल रक्त या बहुत गाढ़ा काले रंग का मल दिखाई दे, जो किसी आंतरिक घाव का संकेत हो सकता है।
  • अचानक वज़न कम होना: आप कोई डाइटिंग भी नहीं कर रहे हैं। वज़न कम करने की कोई कोशिश भी नहीं कर रहे हैं, लेकिन फिर भी आपका वज़न बहुत ही तेज़ी से नीचे गिर रहा है। और आपको हर समय अपने अंदर एक बहुत ही गहरी कमज़ोरी सी महसूस होती रहती है।
  • तीव्र और असहनीय पेट दर्द: पेट के किसी हिस्से में अचानक बहुत तेज दर्द उठे जो सामान्य घरेलू उपायों या सिकाई से बिल्कुल कम न हो।
  • कई दिनों तक मल न आना: यदि दवा छोड़ने के बाद एक सप्ताह से अधिक समय तक बिल्कुल भी मल त्याग न हुआ हो और पेट पत्थर जैसा सख्त महसूस होने लगे।
  • लगातार उल्टी आना: गंभीर कब्ज़ के साथ-साथ बार-बार जी मिचलाना और जो कुछ भी खाया-पीया हो, उसका उल्टी के रूप में तुरंत बाहर आ जाना।

निष्कर्ष

रोज़-रोज़ पेट साफ़ करने वाली इन दवाओं के भरोसे बैठना बिल्कुल भी सही नहीं है। ये दवाइयाँ आपकी उन अच्छी खासी काम करने वाली और जीवंत आंतों को एक बिल्कुल ही आलसी अंग में बदलकर रख देती हैं। कृपया अपनी आंतों को कोई मशीन न समझें। यह एक प्राकृतिक अंग है जिसे सही पोषण, नमी और उचित देखभाल की आवश्यकता होती है। फाइबर युक्त प्राकृतिक आहार, पर्याप्त पानी, सक्रिय दिनचर्या और आयुर्वेद के शाश्वत सिद्धांतों को अपनाकर आप दवाओं के इस खतरनाक दुष्चक्र को पूरी तरह तोड़ सकते हैं। इसमें थोड़ा समय और धैर्य लग सकता है, लेकिन अंततः आपका पाचन तंत्र फिर से आत्मनिर्भर और स्वस्थ हो जाएगा।

यदि आप भी लंबे समय से मल साफ करने वाली दवाओं पर निर्भर हैं और अपनी आंतों को प्राकृतिक रूप से पुनः सक्रिय और मजबूत बनाना चाहते हैं, तो आज ही विशेषज्ञ से सलाह लें। व्यक्तिगत मार्गदर्शन, प्रकृति परीक्षण और सही आयुर्वेदिक उपचार के लिए जीवा आयुर्वेद के विशेषज्ञों से +919266714040 पर संपर्क करें।

References:

https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/20687617/

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC5411570/

https://www.healthline.com/health/laxative-withdrawal-symptoms

https://www.sciencedirect.com/topics/chemistry/laxative

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

रात को सोते समय एक गिलास हल्के गर्म पानी या गाय के गुनगुने दूध में एक चम्मच शुद्ध देसी घी मिलाकर पीना बहुत लाभकारी होता है। घी आंतों के भीतर जमे अत्यधिक सूखेपन को दूर करता है और वात दोष को शांत करके प्राकृतिक रूप से मल को आगे धकेलने में मदद करता है। इस उपाय को नियमित रूप से अपनाने से आंतों की कार्यक्षमता में धीरे-धीरे सुधार होता है।

जब आपकी आंतें लंबे समय तक बाहरी उत्तेजना और रसायनों की आदी हो जाती हैं, तो वे खुद से सिकुड़ना और फैलना भूल जाती हैं। इसलिए जब आप अचानक दवा लेना बंद करते हैं, तो मल आगे नहीं बढ़ पाता और पेट में गैस तथा भारीपन महसूस होता है। इस प्राकृतिक बदलाव के दौरान घबराने के बजाय आंतों को सही आहार और सौम्य औषधियों के साथ ढलने का समय देना चाहिए।

फाइबर पेट में जाकर एक स्पंज की तरह पानी को सोख लेता है और मल के आकार को बढ़ाकर उसे अत्यंत नरम बनाता है, जिससे आंतों को उसे बाहर धकेलने में आसानी होती है। ताजे फल, हरी सब्जियाँ, और साबुत अनाज फाइबर के बेहतरीन स्रोत हैं। हालांकि, फाइबर के साथ-साथ दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी उतना ही जरूरी है, अन्यथा सूखा फाइबर ही कब्ज़ का कारण बन सकता है।

शारीरिक रूप से सक्रिय न रहने पर आंतों का रक्त संचार धीमा पड़ जाता है और मल को आगे बढ़ाने वाली मांसपेशियाँ सुस्त हो जाती हैं। नियमित रूप से हल्का व्यायाम या सुबह-शाम टहलने से गुरुत्वाकर्षण और शारीरिक गति दोनों मिलकर मल को नीचे की ओर ले जाने में सहायता करते हैं। अपनी दिनचर्या में योग को शामिल करना आंतों को प्राकृतिक रूप से सक्रिय रखने का एक उत्तम तरीका है।

बाजार में मिलने वाले कृत्रिम रेचक आंतों को जबरन उत्तेजित करके उनमें से पानी खींचते हैं और शरीर को अपना आदी बना देते हैं। इसके विपरीत, त्रिफला तीन प्राकृतिक जड़ी-बूटियों (आँवला, हरड़, बहेड़ा) का एक संतुलित रसायन है जो आंतों को भीतर से पोषण देता है। यह मल को बाहर निकालने के साथ-साथ पाचन प्रणाली की कोशिकाओं की मरम्मत भी करता है।

सुबह खाली पेट कड़क चाय या कॉफी में मौजूद कैफीन आपके तंत्रिका तंत्र को एक कृत्रिम झटका देता है, जिससे मल त्याग की इच्छा तुरंत महसूस होती है। लेकिन लंबे समय में यह कैफीन आंतों की नमी को पूरी तरह सुखा देता है और शरीर की प्राकृतिक लय को बिगाड़ देता है। इसके बजाय सुबह उठकर खाली पेट दो गिलास हल्का गुनगुना पानी पीना एक सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प है।

पश्चिमी शैली के कमोड (Western toilet) पर बैठने से आंतों का वह हिस्सा पूरी तरह से सीधा नहीं हो पाता, जहाँ से मल बाहर निकलता है। भारतीय शैली (Indian toilet) में उकड़ूँ बैठने (Squatting) से मलाशय पूरी तरह से सीधा हो जाता है और मल बिना किसी अतिरिक्त दबाव के आसानी से बाहर आ जाता है। यदि आप वेस्टर्न कमोड का उपयोग करते हैं, तो पैरों के नीचे एक छोटा स्टूल रखना बहुत मददगार साबित हो सकता है।

रात के समय हमारी जठराग्नि (पाचन अग्नि) सूरज ढलने के साथ स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाती है, और भारी या तला हुआ भोजन पचने में बहुत अधिक समय लेता है। यह अधपचा भोजन आंतों में जाकर चिपक जाता है और आम (विषाक्त पदार्थ) का निर्माण करता है, जिससे सुबह पेट साफ होने में भारी दिक्कत आती है। रात का खाना हमेशा हल्का और सोने से कम से कम दो घंटे पहले खा लेना चाहिए।

जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो शरीर अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बड़ी आंत में मौजूद मल से सारा पानी वापस सोख लेता है। इसके परिणामस्वरूप मल अत्यधिक कठोर, सूखा और कंकड़ जैसा हो जाता है, जिसे बाहर निकालना बहुत पीड़ादायक होता है। दिन भर में 8 से 10 गिलास हल्का गुनगुना पानी पीने से आंतों में मल को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक नमी हमेशा बनी रहती है।

आयुर्वेद में पेट की हल्की मालिश करने को बहुत महत्व दिया गया है, क्योंकि यह सीधे तौर पर आंतों की पेरिस्टाल्टिक (सिकुड़ने-फैलने) गति को बाहर से प्रेरित करती है। नाभि के चारों ओर दाईं से बाईं दिशा (घड़ी की सुई की दिशा) में हल्के गर्म तिल के तेल से मालिश करने से रुकी हुई गैस बाहर निकलती है। यह साधारण सी प्रक्रिया आंतों की सुस्ती को दूर कर मल को प्राकृतिक मार्ग की ओर धकेलने में बहुत सहायता करती है।

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