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ज़ोर लगाने पर भी अधूरा मल त्याग: क्या यह लंबे समय से चली आ रही कब्ज़ की पहचान है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

टॉयलेट में घंटों बैठकर ज़ोर लगाना, तेज़ चूर्ण या सिरप पीना और फिर भी ऐसा महसूस होना कि पेट पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ है, आज घर-घर की परेशानी बन गया है। आधुनिक दवाएँ या लैक्सेटिव्स मल को पतला करके एक बार तो बाहर निकाल देते हैं, लेकिन वे आँतों की कमज़ोर हो चुकी प्राकृतिक सिकुड़न और गुदा मार्ग की नसों को ठीक नहीं कर सकते। दवाओं पर यह निर्भरता और आयुर्वेद के अनुसार शरीर में बढ़ा हुआ 'वात दोष' व जठराग्नि का कमज़ोर होना 'अधूरे मल त्याग' का सबसे बड़ा कारण है। बिना जड़ पर काम किए यह समस्या स्थायी रूप से ख़त्म नहीं हो सकती।

अधूरा मल त्याग क्या है?

एक स्वस्थ शरीर में, जब मल मलाशय में पहुँचता है, तो दिमाग़ को संकेत मिलता है और गुदा मार्ग की नसें मल को आसानी से बाहर धकेल देती हैं।  लेकिन जब आँतों की मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं या मल बहुत ज़्यादा सूख जाता है, तो मल मलाशय में ही फँस जाता है।

मरीज़ को लगातार टॉयलेट जाने की इच्छा महसूस होती है इसे मेडिकल भाषा में Tenesmus कहते हैं। वह बहुत ज़ोर लगाता है, लेकिन मल या तो टुकड़ों में आता है या मल त्याग के तुरंत बाद फिर से ऐसा लगता है कि कुछ अंदर रह गया है। यह 'क्रोनिक कब्ज़' का एक बहुत ही जटिल रूप है। बाहरी तेज़ चूर्ण आँतों की बची-खुची नमी को भी निचोड़ लेते हैं, जिससे यह समस्या और भयंकर हो जाती है।

कब्ज़ और मल त्याग की समस्याएँ मुख्य रूप से कितने प्रकार की होती हैं?

आधुनिक चिकित्सा में अधूरे मल त्याग और कब्ज़ को मुख्य रूप से इन स्थितियों में बाँटा गया है

ऑब्सट्रक्टिव डेफ़िकेशन सिंड्रोम (ODS) इसमें मल मलाशय तक तो आ जाता है, लेकिन गुदा मार्ग से बाहर नहीं निकल पाता। मरीज़ को मल निकालने के लिए बहुत ज़ोर लगाना पड़ता है।

पेल्विक फ़्लोर डिस्फ़ंक्शन (Pelvic Floor Dyssynergia) इसमें मल त्याग करते समय गुदा की नसें ढीली होने के बजाय उल्टी सिकुड़ जाती हैं, जिससे मल का रास्ता ब्लॉक हो जाता है।

इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS-C) आँतों की अति-संवेदनशीलता के कारण आँतों में ऐंठन होती है। मल बकरी की मेंगनी की तरह छोटे-छोटे टुकड़ों में आता है और पेट कभी पूरी तरह साफ़ नहीं लगता।

 एटोनिक कब्ज़ (Lazy Bowel) सालों तक चूर्ण खाने से आँतें अपना काम करना भूल जाती हैं और मल को आगे धकेलने की ताक़त खो देती हैं।

अधूरे मल त्याग के मुख्य लक्षण और संकेत

जब मल आँतों या मलाशय में फँसा रहता है, तो शरीर ये ख़ास चेतावनी संकेत देता है

बार-बार टॉयलेट भागना दिन में 3-4 बार टॉयलेट जाने पर भी पेट हल्का महसूस न होना।

मल त्याग के लिए अत्यधिक ज़ोर मल को बाहर निकालने के लिए शरीर का पूरा ज़ोर लगाना, जिससे चेहरा लाल हो जाना और पसीना आ जाना।

मल मार्ग में रुकावट ऐसा महसूस होना जैसे गुदा मार्ग में कोई चीज़ फँसी हुई है या कोई गांठ बन गई है।

पेट में भारीपन और गैस पेट का ढोल की तरह फूल जाना, नाभि के निचले हिस्से में भारीपन और लगातार गैस पास होना।

 हाथ या उँगली का इस्तेमाल कुछ गंभीर मामलों में मल को बाहर निकालने के लिए उँगली या पानी के जेट का सहारा लेना पड़ना।

दवा बंद करते ही समस्या क्यों लौट आती है? – मुख्य कारण

आँतों का सुन्न होना तेज़ चूर्ण आँतों की नसों को कृत्रिम रूप से चाबुक मारते हैं। सालों तक इन्हें खाने से आँतों की नसें सुन्न हो जाती हैं।

प्राकृतिक नमी का सूखना घी-तेल न खाने और पानी कम पीने से आँतों के अंदर की प्राकृतिक चिकनाई सूख जाती है, जिससे मल आँतों की दीवारों पर चिपक कर रह जाता है।

पेल्विक फ़्लोर की कमज़ोरी घंटों टॉयलेट सीट पर बैठकर मोबाइल चलाने या ज़ोर लगाने से वहाँ की मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।

तनाव और वात दोष भारी तनाव 'अपान वायु' की दिशा को बिगाड़ देता है, जिससे मल नीचे जाने के बजाय आँतों में ही फँसा रहता है।

जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

अगर अधूरे मल त्याग को अनदेखा किया जाए या सिर्फ़ चूर्ण के सहारे छोड़ा जाए, तो यह कई भयंकर जटिलताओं का कारण बन सकता है

बवासीर (Piles/Hemorrhoids) लगातार ज़ोर लगाने से गुदा मार्ग की नसें फूलकर बाहर आ जाती हैं, जिनसे भयंकर ख़ून रिसता है।

फिशर (Anal Fissure) पत्थर जैसा सख़्त मल गुदा मार्ग को छील देता है, जिससे कट लग जाते हैं और असहनीय दर्द होता है।

रेक्टल प्रोलैप्स (Rectal Prolapse) अत्यधिक ज़ोर लगाने से आँत का निचला हिस्सा (मलाशय) अपनी जगह छोड़कर गुदा मार्ग से बाहर लटकने लगता है।

मानसिक अवसाद (Depression) रोज़ाना सुबह पेट साफ़ न होने की चिंता इंसान को मानसिक रूप से बीमार और चिड़चिड़ा बना देती है।

आयुर्वेद में अधूरे मल त्याग और क्रोनिक कब्ज़?

आयुर्वेद में अधूरे मल त्याग और क्रोनिक कब्ज़ को 'पक्वाशय' (बड़ी आँत) में 'अपान वायु' के बिगड़ने के रूप में देखा जाता है। अपान वायु का मुख्य काम मल, मूत्र और गैस को शरीर से नीचे की ओर बाहर निकालना है। जब हम रूखा, बासी खाना खाते हैं, मल-मूत्र के वेग को रोकते हैं या बहुत ज़्यादा तनाव लेते हैं, तो शरीर में वात दोष भड़क जाता है। बढ़ा हुआ वात आँतों की प्राकृतिक चिकनाई को पूरी तरह सुखा (रूक्षता) देता है।

इसके साथ ही जठराग्नि की कमज़ोरी से बना 'आम' मल को चिपचिपा बना देता है। एक तरफ़ आँतें सूख गई हैं और दूसरी तरफ़ मल चिपक रहा है यही कारण है कि बहुत ज़ोर लगाने पर भी मल पूरी तरह बाहर नहीं आ पाता। आयुर्वेद का मकसद सिर्फ़ मल को पिघलाना नहीं है, बल्कि 'स्नेहन' (चिकनाई) देकर आँतों की रूक्षता दूर करना, 'आम' को पचाना और अपान वायु का रास्ता सही करना है।

आयुर्वेद में अधूरा मल त्याग ?

आयुर्वेद में इस स्थिति को केवल पेट की गड़बड़ी नहीं, बल्कि शरीर की *'अपान वायु'* और *'पाचक अग्नि'* के बीच के तालमेल का बिगड़ना माना जाता है।

अपान वायु की विकृति आयुर्वेद के अनुसार, शरीर से गंदगी (मल, मूत्र) बाहर निकालने का काम 'अपान वायु' का है। जब वात दोष बढ़ जाता है, तो यह वायु अपनी सही दिशा (नीचे की ओर) छोड़कर 'विमार्गमन' (ग़लत दिशा) करने लगती है। इसी वजह से ज़ोर लगाने पर भी मल पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाता और पेट में भारीपन बना रहता है।

 'आम' का संचय (Accumulation of Toxins) जब हमारी पाचन शक्ति कमज़ोर होती है, तो आंतों में एक चिपचिपा पदार्थ जमा होने लगता है जिसे 'आम' कहते हैं। यह 'आम' मल को आंतों की दीवारों से चिपका देता है, जिससे मल का कुछ हिस्सा अंदर ही रह जाता है और आपको हमेशा "पेट साफ़ न होने" का अहसास होता है।

 आंतों की सुस्ती (Intestinal Sluggishness) लंबे समय तक कब्ज़ रहने से आंतों की स्वाभाविक गति धीमी पड़ जाती है। आयुर्वेद इसे 'कोष्ट क्रूरता' कहता है, जहाँ आंतें इतनी सख़्त हो जाती हैं कि वे मल को पूरी तरह बाहर धकेलने में असमर्थ होती हैं।

कब्ज़ के रोगी के लिए शुद्ध आहार

आँतों को प्राकृतिक रूप से चलाने और वात को शांत करने के लिए हमेशा सुपाच्य, फ़ाइबर और 'स्निग्ध' (चिकनाई युक्त) आहार चुनना महत्वपूर्ण है

क्या खाएँ?

पपीता और अमरूद रोज़ाना पके हुए पपीते और अमरूद (बीज सहित) का सेवन करें। इनमें भरपूर फ़ाइबर और पानी होता है जो मल को मुलायम बनाता है।

गाय का घी और दूध रात को सोते समय एक गिलास गर्म दूध में 1 चम्मच शुद्ध गाय का घी मिलाकर पिएँ। यह आँतों की 'रूक्षता' को रातों-रात ख़त्म कर देता है और मल फिसलकर बाहर आता है।

गर्म पानी और दलिया दिन भर हल्का गुनगुना पानी पिएँ। नाश्ते में दलिया खाएँ, जो आँतों को साफ़ करने वाले झाड़ू का काम करता है।

क्या न खाएँ?

मैदा और बेकरी उत्पाद पिज़्ज़ा, बर्गर, सफ़ेद ब्रेड और बिस्किट पेट में जाकर 'गोंद' की तरह आँतों से चिपक जाते हैं और मल को मलाशय में फँसा देते हैं। इन्हें बिल्कुल बंद कर दें।

रूखा और सूखा भोजन बहुत ज़्यादा भुने हुए चने, नमकीन, चिप्स और रूखा खाना शरीर के वात दोष को भड़काते हैं।

चाय और कॉफ़ी की अधिकता कैफीन शरीर का सारा पानी सोख लेती है , जिससे मल सूखकर पत्थर हो जाता है।

मरीज़ो का अनुभव 

नमस्कार, मैं अन्नू शर्मा, पंजाब होशियारपुर से हूँ। मेरे बेटे का नाम पौरुष पंडित है, जिसकी उम्र अभी 4 साल है। मेरे बेटे को पिछले तीन साल से कॉन्स्टिपेशन (कब्ज़) की समस्या थी। मैंने कई जगह उसका इलाज कराया पर कोई कामयाबी नहीं मिली। 

फिर मैंने जीवा के बारे में सुना और उनकी हेल्पलाइन पर संपर्क किया। डॉक्टर गरिमा और उनकी टीम ने मेरे बच्चे की समस्या को अच्छी तरह समझा। मैंने उनके बताए डाइट प्लान और दवाइयों को फॉलो किया।

अभी 3 महीने की दवा के बाद बच्चा बिल्कुल स्वस्थ है। वह अब सब कुछ अच्छे से खा रहा है और उसकी फिजिकल ग्रोथ भी बढ़ गई है। पहले वह हर समय परेशान और चिड़चिड़ा रहता था, लेकिन अब वह खुश रहता है। मैं अपने देशवासियों को यही संदेश देना चाहूँगी कि वे जीवा से जुड़ें और अपना जीवन खुशहाल बनाएं। मैं डॉक्टर गरिमा और उनकी टीम का तहे दिल से धन्यवाद करती हूँ।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक इलाज (Allopathy) आयुर्वेदिक इलाज (Ayurveda)
मुख्य उद्देश्य लैक्सेटिव्स (Laxatives) के ज़रिए मल को तुरंत बाहर निकालना। पाचन अग्नि (Agni) को बढ़ाकर कब्ज की जड़ को खत्म करना।
कार्यप्रणाली यह आंतों में पानी खींचकर या उन्हें उत्तेजित कर अस्थायी राहत देता है। यह 'वात दोष' को संतुलित करता है और आंतों के रूखेपन को गहराई से ठीक करता है।
दवाइयों का असर लंबे समय तक इस्तेमाल से आंतें 'सुस्त' हो सकती हैं और दवा की आदत पड़ सकती है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ आंतों की मांसपेशियों को मज़बूत बनाती हैं, न कि उन्हें कमज़ोर।
नतीजा तुरंत राहत मिलती है, लेकिन समस्या अक्सर दोबारा लौट आती है। सुधार में थोड़ा वक़्त लगता है, लेकिन नतीजे स्थायी और सुरक्षित होते हैं।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

कब्ज़ को 'मामूली पेट की गड़बड़ी' समझकर नज़रअंदाज़ करना आपके पाचन तंत्र को स्थायी रूप से सुस्त बना सकता है। यदि आपको नीचे दिए गए ख़तरनाक संकेत महसूस हों, तो तुरंत विशेषज्ञ से मिलना ज़रूरी है

मल में खून आना यदि मल त्याग के समय या उसके बाद लाल खून दिखाई दे, तो यह बवासीर या फिशर का गंभीर संकेत हो सकता है।

असहनीय दर्द पेट में तेज़ मरोड़ या मल त्याग के समय मलाशय (Rectum) में भयंकर चुभन और जलन होना।

हफ़्ते में 2 बार से कम मल त्याग यदि हफ़्तों तक यह स्थिति बनी रहे और घरेलू नुस्ख़ों से भी कोई फ़र्क़ न पड़े।

अचानक वज़न कम होना कब्ज़ के साथ-साथ यदि बिना किसी कारण के आपका वज़न तेज़ी से गिर रहा हो।

पेट का फूलना और उल्टी यदि पेट पत्थर जैसा सख़्त महसूस हो, बहुत ज़्यादा गैस बने और साथ में मतली या उल्टी (Vomiting) जैसा महसूस हो।

पेंसि‍ल जैसा पतला मल यदि मल का आकार बहुत ज़्यादा पतला हो गया हो, तो यह आंतों में किसी रुकावट का इशारा हो सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से ज़ोर लगाने पर भी अधूरे मल त्याग की समस्या (Tenesmus) इस बात का स्पष्ट संकेत है कि शरीर का 'वात दोष' (अपान वायु) भड़क चुका है और मलाशय की प्राकृतिक नमी पूरी तरह सूख चुकी है। मैदा खाने, पानी कम पीने, घंटों टॉयलेट में बैठने और भारी तनाव लेने से आँतों की गति धीमी हो जाती है। सालों तक सिर्फ़ तेज़ चूर्ण खाने से आँतें अपना प्राकृतिक काम करना भूल जाती हैं। इलाज में जठराग्नि को बढ़ाना, आँतों में चिकनाई (स्नेहन) पैदा करना और वात का अनुलोमन करना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें पपीता-मुनक्का खाना, गर्म दूध के साथ घी लेना, एरण्ड तेल का इस्तेमाल करना और 'बस्ति' जैसी दिनचर्या अपनाना शामिल है, जिससे आँतों को ताक़त देकर इस क्रोनिक कब्ज़ को हमेशा के लिए जड़ से ख़त्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। टॉयलेट में 10 मिनट से ज़्यादा बैठने और ज़ोर लगाने से गुदा की नसों पर भारी दबाव पड़ता है, जिससे मल बाहर आने के बजाय बवासीर (Piles) और फिशर का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है।

 नहीं। बाज़ार के तेज़ चूर्ण (जिनमें सेना पत्ती होती है) आँतों की प्राकृतिक गति (Peristalsis) को सुन्न कर देते हैं। शरीर इनका आदी हो जाता है और बिना चूर्ण के मल बाहर नहीं आता।

आयुर्वेद में बढ़ा हुआ 'वात' ही कब्ज़ का कारण है, जो सूखापन लाता है। गर्म दूध और गाय का घी आँतों को अंदर से 'चिकनाई' (Lubrication) देते हैं जिससे मल मलाशय में चिपकता नहीं और आसानी से फिसलकर बाहर आ जाता है।

इंडियन स्टाइल में उकड़ू (Squatting) बैठने से मलाशय (Rectum) की नली बिल्कुल सीधी हो जाती है, जिससे मल बिना ज़्यादा ज़ोर लगाए आसानी से बाहर आ जाता है। वेस्टर्न टॉयलेट में नली मुड़ी रहती है।

 हाँ, हमारा दिमाग़ और आँतें एक दूसरे से जुड़े हैं (Gut-Brain Axis)। भयंकर तनाव लेने से आँतों की नसें सिकुड़ जाती हैं और मल आगे नहीं बढ़ पाता।

 इसबगोल मल का आकार (Bulk) बढ़ाता है। इसे हमेशा एक गिलास गुनगुने पानी या दूध में घोलकर तुरंत पी लेना चाहिए। इसे कभी सूखा नहीं खाना चाहिए, वरना यह आँतों में जाकर फँस सकता है।

   हाँ, चाय और कॉफ़ी शरीर से पानी को बाहर निकाल देते हैं (Dehydration)। पानी की कमी से मल बड़ी आँत में सूखकर पत्थर जैसा सख़्त हो जाता है।

नहीं। त्रिफला कोई तेज़ लैक्सेटिव नहीं है, बल्कि यह एक आयुर्वेदिक 'रसायन' (Rejuvenator) है जो आँतों की मांसपेशियों को अंदर से ताक़त देता है। इसकी आदत नहीं पड़ती।

 बस्ति एक औषधीय एनीमा है जो गुदा मार्ग से दिया जाता है। चूँकि बड़ी आँत 'वात' का मुख्य घर है, बस्ति सीधा वात को ख़त्म कर मलाशय में फँसे पुराने सूखे मल को बाहर निकालती है।

हाँ, जब आप शौच की प्राकृतिक इच्छा (Urge) को बार-बार रोकते हैं, तो शरीर मल से पानी सोखना जारी रखता है, जिससे मल सख़्त हो जाता है और 'अपान वायु' की गति उल्टी हो जाती है।

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