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Thyroid, constipation और weight gain: क्या connection हो सकता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 05 Aug, 2026
  • category-iconUpdated on 05 Aug, 2026
  • category-iconMental Health
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कई बार हमारे शरीर की समस्या गहराई में छिपा एक गंभीर असंतुलन होता है पर हम उसे अलग अलग आम समस्याओं का संग्रह मान लेते है और उनके इलाज के लिए विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ लेने के बाद भी प्रभाव लम्बे समय तक नहीं टिक पाता है।  ऐसी परिस्थिति में यह आवश्यक हो जाता है की हम अपने शरीर के वास्तविक असंतुलन को पहचाने और उसका पूर्ण निदान करें। 

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धत्ति में थॉयरॉइड को एक क्रोनिक बिमारी के रूप में देखा जाता है, यह बीमारी कई दूसरी दीर्घकालीय रोगों की जड़ बन जाती है, जिसके परिणामस्वरूप यह पता कर पाना कठिन होता है कि कौन सी परेशानी थायरॉइड की देन है एवं कौन सी दिक्कत किसी अन्य जड़ से उपजी है, जिसके लिए अलग चिकिस्ता की आवश्यकता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा शरीर के दोषों को संतुलित करके तन-मन की परिस्थिति में सुधार लाता है. जिससे थायरॉइड जैसी ज़िद्दी बीमारी भी सही खान-पान तथा आयुर्वेदिक जीवनशैली के बल पर नर्म होने लगती है।

थायरॉइड: सभी समस्याओं की जड़

यह हमारे गले के निचले हिस्से में स्थित एक तितली के आकार की ग्रंथि होती है। यह ग्रंथि ऐसे महत्वपूर्ण हार्मोन बनाती है जो हमारे शरीर की ऊर्जा और काम करने की गति को पूरी तरह से नियंत्रित करते हैं। जब किसी कारण से यह ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में रस नहीं बना पाती, तो शरीर के लगभग सभी अंग बहुत धीमी गति से काम करने लगते हैं। शरीर के इसी धीमेपन के कारण कई तरह की गंभीर बीमारियाँ जन्म लेने लगती हैं।

थायराइड का यह असंतुलन किन प्रकारों का हो सकता है?

थायराइड ग्रंथि का काम बिगड़ना केवल एक तरह की बीमारी नहीं है। हॉर्मोन्स के घटने या बढ़ने के आधार पर यह आपको इन अलग-अलग रूपों में अपना शिकार बना सकता है:

  • हाइपोथायरायडिज़्म: यह सबसे आम प्रकार है। इसमें ग्रंथि पर्याप्त हॉर्मोन नहीं बना पाती, जिससे मेटाबॉलिज़्म सुस्त हो जाता है, थकावट होती है और वज़न का बढ़ना बेकाबू हो जाता है।
  • हाइपरथायरायडिज़्म: इसमें ग्रंथि बहुत ज़्यादा हॉर्मोन बनाने लगती है। मेटाबॉलिज़्म इतना तेज़ हो जाता है कि इंसान कमज़ोरी महसूस करता है, बाल पतले हो जाते हैं और वज़न तेज़ी से गिरने लगता है।
  • हाशिमोटो डिसीज़: यह एक ऑटोइम्यून स्थिति है जहाँ आपका अपना ही इम्यून सिस्टम भ्रमित होकर थायरॉइड ग्रंथि पर हमला कर देता है, जिससे ग्रंथि अंदर ही अंदर खत्म होने लगती है।

कब्ज: एक समग्र दृष्टिकोण

कब्ज केवल पेट की या मल त्यागने की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर के असंतुलन का एक बहुत बड़ा संकेत है। जब मल त्याग नियमित रूप से नहीं होता, तो शरीर के अंदर विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं। समग्र दृष्टिकोण से देखा जाए, तो मल का शरीर में लंबे समय तक रुकना वात दोष के बढ़ने और पाचन तंत्र के बहुत कमजोर होने का स्पष्ट संकेत है। यह केवल एक साधारण सी बीमारी नहीं है, बल्कि यह भविष्य में होने वाली कई अन्य शारीरिक और मानसिक परेशानियों की शुरुआत है।

एक्सपर्ट डॉक्टर की विशेष सलाह

थाइरॉइड से संबंधित कठिनाइयों के बीच यदि आपको कोई गंभीर परेशानी महसूस हो, तो यह किसी ऐसे रोग का संकेत भी हो सकता है जो केवल दीर्घकालिक ही नहीं, बल्कि जानलेवा भी हो। असहनीय पेट दर्द या हद से अधिक मोटापे को कभी हल्के में न लें और जल्द से जल्द किसी विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाएँ।

वजन बढ़ना: पाचन का धीमा होना

जब हम कुछ भी खाते हैं, तो हमारा शरीर उस भोजन को पचाकर ऊर्जा में बदल देता है। इस पूरी प्रक्रिया को चयापचय कहते हैं। जब यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है, तो शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलने के बजाय उसे वसा (चर्बी) के रूप में जमा करने लगता है। यही कारण है कि बहुत कम भोजन करने या व्यायाम करने के बावजूद भी कुछ लोगों का वजन बहुत तेजी से बढ़ने लगता है।

वजन बढ़ने और अवटु ग्रंथि का संबंध

हमारे गले में स्थित यही अवटु ग्रंथि ही शरीर के चयापचय को पूरी तरह नियंत्रित करती है। जब यह ग्रंथि कम रस पैदा करती है, तो शरीर की ऊर्जा खर्च करने की क्षमता भी कम हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप:

  • शरीर में व्यर्थ तरल पदार्थ जमा होने लगता है, जिससे अंगों में सूजन आती है।
  • नई वसा कोशिकाओं का निर्माण बहुत तेजी से होता है।
  • शरीर में पहले से जमा पुरानी चर्बी को ऊर्जा में बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है।

यही मुख्य कारण है कि इस ग्रंथि की समस्या वाले लोगों का वजन बिना अधिक खाए भी लगातार बढ़ता ही रहता है।

एक दुष्प्रभाव के रूप में कब्ज

अवटु ग्रंथि से निकलने वाले रस केवल ऊर्जा ही नहीं, बल्कि पेट और आंतों की मांसपेशियों की गति को भी नियंत्रित करते हैं। इन रसों की कमी से:

  • आंतों की सिकुड़ने और फैलने की गति बहुत धीमी हो जाती है।
  • खाए गए भोजन को पचने और आगे बढ़ने में सामान्य से कहीं अधिक समय लगता है।
  • मल आंतों में लंबे समय तक रुका रहता है और उसका सारा पानी सूख कर वह सख्त हो जाता है, जिससे पुरानी और भयंकर कब्ज की समस्या पैदा हो जाती है।

इस पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद के अनुसार, ये तीनों समस्याएँ, गले की ग्रंथि का विकार, कब्ज और मोटापा, शरीर में 'अग्नि' (पाचन अग्नि) के बहुत अधिक कमजोर होने के कारण उत्पन्न होती हैं। जब जठराग्नि मंद पड़ जाती है, तो शरीर में 'आम' बनने लगता है।

यह पूरी समस्या मुख्य रूप से वात और कफ दोष के असंतुलन से गहराई से जुड़ी है। शरीर में कफ दोष बढ़ने से वजन बढ़ता है और ग्रंथि का काम धीमा होता है, जबकि वात दोष के बढ़ने से आंतों में अत्यधिक खुश्की आती है और मल सूखने से कब्ज की समस्या उत्पन्न होती है।

आयुर्वेदिक उपचार के विकल्प

इस जटिल समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए आयुर्वेद वात-कफ दोष के संतुलन और पाचन अग्नि को फिर से मजबूत करने पर विशेष ध्यान देता है।

जड़ी-बूटियाँ

  • कांचनार गुग्गुल: यह शरीर की किसी भी ग्रंथि की सूजन और गांठों को ठीक करने में सबसे असरदार और पुरानी औषधि मानी जाती है।
  • त्रिफला: यह कब्ज को दूर करने और आंतों की पूरी तरह से सफाई करने के लिए बेहतरीन है। यह पाचन तंत्र को नई शक्ति भी देता है।
  • अश्वगंधा: यह मानसिक तनाव को कम करता है और गले की ग्रंथि को सही मात्रा में रस बनाने के लिए अंदर से प्रेरित करता है।
  • त्रिकटु: यह धीमी पड़ी चयापचय प्रक्रिया को बहुत तेजी से बढ़ाता है और अवांछित वजन घटाने में बहुत मदद करता है।

चिकित्सा और पंचकर्म

  • उद्वर्तन: यह शरीर में बढ़े हुए कफ दोष को कम करने और जमा हुई अतिरिक्त चर्बी को पिघलाने में बहुत लाभकारी है।
  • बस्ती: औषधीय तेलों या काढ़े के माध्यम से दी जाने वाली बस्ती बढ़े हुए वात दोष को शांत करती है और सालों पुरानी कब्ज को जड़ से खत्म करती है।
  • नस्य: नाक के नथुनों में विशेष औषधीय तेल डालना गले और सिर के हिस्सों के लिए बेहद फायदेमंद होता है, जो सीधे ग्रंथि पर असर करता है।

जीवनशैली में बदलाव

  • सूर्योदय से पहले उठने और नियमित रूप से योग करने की पक्की आदत डालें। सर्वांगासन और हलासन जैसे योगासन गले की ग्रंथि को सक्रिय करने के लिए विशेष रूप से लाभदायक माने गए हैं।
  • हमेशा ताजा, गर्म और आसानी से पचने वाला भोजन ही ग्रहण करें। अत्यधिक ठंडे पेय पदार्थों और फ्रिज में रखे बासी भोजन से पूरी तरह बचें।
  • दिन के समय सोने से बचें क्योंकि इससे शरीर में कफ दोष तेजी से बढ़ता है, जिससे चयापचय की प्रक्रिया और भी ज्यादा धीमी हो जाती है।

ध्यान रखने योग्य अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ

यदि आपको यह तीनों समस्याएँ एक साथ सता रही हैं, तो शरीर में पनप रही कुछ अन्य परेशानियों के प्रति भी आपको पहले से सचेत रहना चाहिए:

  • जोड़ों और मांसपेशियों में लगातार भारीपन या दर्द का रहना।
  • बालों का बहुत तेजी से झड़ना और त्वचा का अत्यधिक रूखा या बेजान होना।
  • महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित या कष्टदायक होना।
  • बिना बात के लगातार मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन या गहरा अवसाद महसूस होना।

निष्कर्ष

अवटु ग्रंथि की कार्यप्रणाली का धीमा होना, शरीर के वजन का लगातार बढ़ना और पुरानी कब्ज का बना रहना, ये तीनों समस्याएँ एक ही बड़े दुष्चक्र का हिस्सा हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति अक्सर इन तीनों बीमारियों का अलग-अलग दवाइयों से इलाज करती है, लेकिन हमारा प्राचीन आयुर्वेद इसे शरीर की भीतरी अग्नि और मूल दोषों के असंतुलन के रूप में देखता है। सही आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, पंचकर्म चिकित्सा और जीवनशैली में उचित बदलाव अपनाकर हम न केवल इन शारीरिक लक्षणों को हमेशा के लिए दबा सकते हैं, बल्कि बीमारी के इस चक्र को जड़ से तोड़कर एक पूरी तरह से स्वस्थ, हल्का और ऊर्जावान जीवन वापस पा सकते हैं।

References:

Management of Hypothyroidism with Ayurveda - A Case Study

Hashimoto's thyroiditis and hypothyroidism, treated with ShamanaChikitsa principles of Panduroga – A case report - PMC

Ayurvedic Medicine for Thyroid: Benefits and Efficacy

Understanding of Primary Hypothyroidism Induced Obesity through Ayurveda

Thyroid Function and Obesity - PMC

Hypothyroidism and obesity: An intriguing link - PMC

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

केवल आहार बदलकर इसे पूरी तरह से ठीक करना कठिन है, लेकिन यह सम्पूर्ण उपचार का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा है। सही आहार ग्रंथि पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करता है, जिससे आयुर्वेदिक औषधियां तेजी से अपना काम कर पाती हैं और शरीर स्वाभाविक रूप से ठीक होने लगता है।

बिल्कुल नहीं। लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में वात दोष बहुत तेजी से बढ़ता है, जिससे आंतें और अधिक सूख जाती हैं और कब्ज की समस्या भयंकर रूप ले सकती है। इसके अलावा, भूख से चयापचय की प्रक्रिया और भी अधिक धीमी हो जाती है, जिससे वजन घटने के बजाय भविष्य में और तेजी से बढ़ता है।

कच्ची पत्तागोभी, फूलगोभी, और मूंगफली में कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व होते हैं जो गले की ग्रंथि को आवश्यक लवण सोखने से रोकते हैं। इससे ग्रंथि का कामकाज और ज्यादा धीमा हो जाता है। यदि इन्हें खाना ही हो, तो अच्छी तरह उबालकर और पकाकर ही खाना चाहिए, कच्चा सलाद के रूप में बिल्कुल नहीं।

जी हाँ, इनका बहुत गहरा संबंध है। अत्यधिक मानसिक तनाव से शरीर में एक विशेष रस अधिक मात्रा में बनने लगता है, जो सीधा गले की ग्रंथि के कामकाज को रोकता है। साथ ही, डर और चिंता वात दोष को बढ़ाकर आंतों की नमी को सुखा देते हैं, जिससे कब्ज जन्म लेती है।

नहीं, अत्यधिक भारी व्यायाम शरीर में थकावट और वात दोष दोनों को बढ़ाता है। चूंकि इस स्थिति में शरीर के पास पहले से ही ऊर्जा की भारी कमी होती है, इसलिए बहुत अधिक थकाने वाले व्यायाम के बजाय प्राणायाम, टहलना और हल्के योगासन अधिक लाभदायक और सुरक्षित होते हैं।

ग्रंथि की कार्यप्रणाली धीमी होने से पसीने की ग्रंथियां भी काम करना कम कर देती हैं। साथ ही, शरीर में वात दोष बढ़ने के कारण शरीर की प्राकृतिक नमी खत्म होने लगती है। यही कारण है कि बाहरी तेल या लेप लगाने के बाद भी त्वचा अंदर से रूखी, बेजान और फटी-फटी रहती है।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार शुद्ध गाय का घी वात और पित्त दोनों दोषों को शांत करता है। यह आंतों में आवश्यक चिकनाई लाता है जिससे मल आसानी से बाहर निकलता है। इसके अलावा, यह शरीर की पाचन अग्नि को भी बढ़ाता है, जो वजन को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में सहायक है।

आधुनिक चिकित्सा की दवाएं अचानक बंद करना शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। आप किसी अनुभवी वैद्य के निर्देशन में दोनों पद्धतियों का साथ में उपयोग कर सकते हैं। जैसे-जैसे शरीर का प्राकृतिक संतुलन वापस आता है और जठराग्नि तेज होती है, वैद्य आधुनिक दवाओं की मात्रा धीरे-धीरे कम कर सकते हैं।

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