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थायरॉइड की दवा कब और कैसे लें? सबसे आम 5 गलतियाँ जो हम सब करते हैं

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

 सुबह के 7 बजे हैं। अलार्म बजते ही आपने आँखें खोलीं, बिस्तर से उठे, और सबसे पहले क्या किया? शायद चाय बनाई। चाय की पहली चुस्की के साथ ही याद आया, “अरे, थायरॉइड की दवा तो लेनी थी!” बस, गोली निकाली और चाय के घूँट के साथ अंदर। अगर यह कहानी आपकी रोज़ की है, तो रुकिए। आप अकेले नहीं हैं और शायद यही वजह है कि महीनों दवा खाने के बाद भी थकान, वज़न, बाल झड़ना जैसी शिकायतें वैसी की वैसी हैं। थायरॉइड की दवा बहुत “नाज़ुक” होती है। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे कब लेते हैं, किसके साथ लेते हैं, और दिनभर क्या खाते हैं। एक छोटी सी गलती और दवा का आधा असर बेकार चला जाता है।

थायरॉइड क्या है और इसकी दवा क्यों ज़रूरी होती है?

थायरॉइड गर्दन के सामने स्थित एक छोटी तितली के आकार की ग्रंथि होती है। आकार छोटा होने के बावजूद यह शरीर की कई महत्वपूर्ण क्रियाओं को नियंत्रित करती है। शरीर की ऊर्जा, तापमान, वज़न, दिल की धड़कन और मानसिक सक्रियता को संतुलित रखने में इसकी अहम भूमिका होती है। जब यह ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती, तब शरीर की कार्यप्रणाली धीमी होने लगती है। इस स्थिति को हाइपोथायरॉइड कहा जाता है। ऐसे में शरीर में हार्मोन की कमी को पूरा करने के लिए दवा दी जाती है। यह दवा उस हार्मोन की पूर्ति करने में मदद करती है, जिसे शरीर सामान्य रूप से खुद बनाता है। इसलिए इसे सही समय और सही तरीके से लेना बहुत ज़रूरी माना जाता है।

थायरॉइड कितने प्रकार का होता है? 

थायरॉइड की समस्या मुख्य रूप से हार्मोन के कम या ज्यादा बनने से जुड़ी होती है। इसके अलग अलग प्रकार शरीर पर अलग असर डालते हैं।

  • हाइपोथायरॉइड (Hypothyroidism): इसमें थायरॉइड ग्रंथि कम हार्मोन बनाती है। इससे शरीर की गति धीमी होने लगती है। थकान, वज़न बढ़ना, ठंड ज्यादा लगना और सुस्ती इसके आम लक्षण हो सकते हैं।
  • हाइपरथायरॉइड (Hyperthyroidism): इस स्थिति में थायरॉइड ज़रूरत से ज्यादा हार्मोन बनाता है। इससे शरीर की कार्यप्रणाली तेज़ हो जाती है। वज़न कम होना, घबराहट, तेज़ धड़कन और ज्यादा पसीना इसके संकेत हो सकते हैं।
  • ऑटोइम्यून थायरॉइड समस्या: इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से थायरॉइड ग्रंथि को प्रभावित करने लगती है। Hashimoto और Graves disease इसके सामान्य उदाहरण माने जाते हैं।
  • थायरॉइड नोड्यूल या सूजन: कुछ लोगों में थायरॉइड ग्रंथि में गांठ या सूजन बन सकती है। कई बार यह बिना लक्षण के होती है, लेकिन कुछ मामलों में निगलने या सांस लेने में परेशानी पैदा कर सकती है।

थायरॉइड की दवा खाली पेट क्यों ली जाती है?

थायरॉइड की दवा शरीर में पेट और छोटी आंत के माध्यम से अवशोषित होती है। यदि पेट में पहले से भोजन मौजूद हो, तो दवा सही तरीके से शरीर में नहीं पहुंच पाती। इससे दवा का असर कम हो सकता है। खासकर चाय, कॉफी, दूध, ज्यादा रेशेदार भोजन और कुछ ज़रूरी तत्व दवा के अवशोषण में रुकावट पैदा कर सकते हैं। यही कारण है कि दवा लेने के तुरंत बाद कुछ खाने या पीने से बचने की सलाह दी जाती है। आमतौर पर सुबह खाली पेट दवा लेने और उसके बाद लगभग 30 से 60 मिनट तक कुछ न खाने की सलाह दी जाती है। यह छोटी सी सावधानी दवा को सही तरीके से काम करने में मदद करती है।

थायरॉइड बिगड़ने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

थायरॉइड की समस्या अचानक नहीं होती। यह अक्सर लंबे समय तक बनी रहने वाली आदतों, तनाव और शरीर के अंदर होने वाले बदलावों का परिणाम होती है। धीरे धीरे शरीर का संतुलन प्रभावित होने लगता है और थायरॉइड ग्रंथि की कार्यप्रणाली बदल सकती है।

  • आयोडीन का असंतुलन: शरीर में आयोडीन बहुत कम या बहुत ज्यादा होना, दोनों ही थायरॉइड पर असर डाल सकते हैं।
  • पारिवारिक इतिहास: यदि परिवार में किसी को थायरॉइड की समस्या रही हो, तो अन्य सदस्यों में इसका जोखिम बढ़ सकता है।
  • लगातार तनाव: लंबे समय तक मानसिक तनाव शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकता है, जिससे थायरॉइड की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है।
  • खराब नींद और अनियमित दिनचर्या: देर रात तक जागना, समय पर भोजन न करना और असंतुलित जीवनशैली शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी स्थितियां: कुछ स्थितियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से थायरॉइड ग्रंथि को प्रभावित करने लगती है।
  • हार्मोनल बदलाव: खासकर महिलाओं में गर्भावस्था के बाद या बढ़ती उम्र के दौरान होने वाले हार्मोन बदलाव थायरॉइड को प्रभावित कर सकते हैं।

वो 5 गलतियाँ — जो आप शायद आज सुबह भी कर बैठे

ये कोई बड़ी, “हाई-फाई” गलतियाँ नहीं हैं। ये वो छोटी-छोटी आदतें हैं जो हम सबकी हैं। और शायद इसीलिए इन्हें पकड़ पाना सबसे मुश्किल है।

  • चाय या नाश्ते के साथ दवा निगलना: सुबह उठते ही चाय या नाश्ते के साथ थायरॉइड की गोली खाने से उसका असर आधा रह जाता है, इसलिए हमेशा खाली पेट सिर्फ सादे पानी के साथ दवा लें और अगले 45 मिनट तक कुछ न खाएं-पिएं।
  • सप्लीमेंट्स को एक साथ खाना: कैल्शियम, आयरन या मल्टीविटामिन की गोलियाँ थायरॉइड दवा को शरीर में सोखने से रोकती हैं, इसलिए इन सप्लीमेंट्स को हमेशा थायरॉइड की गोली खाने के कम से कम 4 घंटे बाद ही लें।
  • अच्छा महसूस होते ही दवा बंद करना: रिपोर्ट नॉर्मल आने या थकान कम होने पर खुद ही दवा रोकना भारी भूल है क्योंकि दवा छोड़ते ही हार्मोन्स का संतुलन फिर बिगड़ जाता है, इसलिए डोज़ बदलने का फैसला सिर्फ डॉक्टर पर छोड़ें।
  • कच्ची 'गोइट्रोजेनिक' सब्जियां खाना: पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकली और सोया प्रोडक्ट्स थायरॉइड ग्लैंड का काम बिगाड़ते हैं, इसलिए इन्हें कच्चा खाने या इनकी स्मूदी पीने के बजाय हमेशा पकाकर और सीमित मात्रा में ही खाएं।
  • सालों-साल बिना जांच के एक ही डोज़ चलाना: उम्र, वजन और मौसम के साथ शरीर की जरूरतें बदलती रहती हैं, इसलिए बिना टेस्ट कराए पुरानी डोज़ चलाते रहने के बजाय हर 6 महीने में TSH की जांच कराएं और डॉक्टर से डोज़ सेट करवाएं।

आयुर्वेद इसे कैसे देखता है?

आधुनिक चिकित्सा थायरॉइड को मुख्य रूप से एक “हार्मोन की कमी/अधिकता” के रूप में देखती है  और उसे दवा से नियंत्रित करती है। यह ज़रूरी और कारगर तरीक़ा है। लेकिन आयुर्वेद एक क़दम और आगे जाता है। यह पूछता है : हार्मोन का यह असंतुलन क्यों हुआ? जवाब अक्सर शरीर की अंदरूनी प्रकृति, पाचन और जीवनशैली में छिपा होता है। आयुर्वेद में थायरॉइड का इलाज इन तीन-चार बातों पर एक साथ काम करके किया जाता है:

  • कफ संतुलन: Hypothyroidism को आयुर्वेद में अक्सर कफ बढ़ने और metabolism धीमा होने से जोड़कर देखा जाता है।
  • पाचन अग्नि: अगर पाचन कमज़ोर है, तो दवा का असर भी कम होगा। इसलिए पाचन सुधारने पर ज़ोर।
  •  मानसिक संतुलन: तनाव थायरॉइड का बड़ा कारण है। इसलिए ध्यान, प्राणायाम और काउंसलिंग इलाज का हिस्सा हैं।
  • दिनचर्या: सोने, उठने, खाने का सही समय। आयुर्वेद इसे दिनचर्या कहता है, और इसे दवा जितना ही ज़रूरी मानता है।

इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद में थायरॉइड के लिए कोई एक “जादुई गोली” नहीं है। शरीर की ज़रूरत के हिसाब से डॉक्टर अलग-अलग जड़ी-बूटियाँ तय करते हैं। कुछ प्रमुख हैं:

  • अश्वगंधा: यह थायरॉइड में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटी है, जो शरीर की पुरानी थकान, कमज़ोरी और मानसिक तनाव को दूर करने में मदद करती है।
  • कांचनार गुग्गुल: गले की ग्रंथियों (थायरॉइड ग्लैंड) की सूजन, समस्या और किसी भी तरह की गाँठ को ठीक करने के लिए यह एक पारंपरिक और असरदार औषधि है।
  • गुग्गुल: यह शरीर के सुस्त पड़े मेटाबॉलिज्म (चयापचय) की रफ्तार को बढ़ाता है और बढ़े हुए कफ दोष को शांत करने में सहायक होता है।
  • त्रिफला: पेट को साफ़ रखने, हाजमा सुधारने और शरीर के भीतर जमा हानिकारक टॉक्सिन्स (गंदगी) को बाहर निकालने का काम करता है।
  • ब्राह्मी: यह दिमाग को शांत रखती है, जिससे थायरॉइड के कारण होने वाला चिड़चिड़ापन दूर होता है और नींद व एकाग्रता में सुधार आता है।

इलाज में सहायक आयुर्वेदिक थेरेपी

कुछ शारीरिक थेरेपी भी इलाज का हिस्सा हो सकती हैं ये शरीर को रिलैक्स करने और संतुलन बेहतर करने में सहायक हैं।

  • अभ्यंग (तेल मालिश): गुनगुने औषधीय तेल की मालिश से शरीर का ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और मांसपेशियों की जकड़न व थकान कम होती है।
  • स्वेदन (भाप थेरेपी): जड़ी-बूटियों की हल्की भाप देने से शरीर के रोमछिद्र खुलते हैं, जिससे भारीपन दूर होता है और शरीर हल्का महसूस करता है।
  • विरेचन: एक्सपर्ट की देखरेख में की जाने वाली यह शरीर की अंदरूनी सफ़ाई (डिटॉक्स) की एक खास प्रक्रिया है, जो बढ़े हुए दोषों को बाहर निकालती है।
  • शिरोधारा: माथे पर औषधीय तेल की गिरती धीमी धारा सीधे नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती है, जो मानसिक शांति देने और भयंकर स्ट्रेस को काटने में बेहद कारगर है।

थायरॉइड में डाइट — सरल नियम, बड़े फ़ायदे

दवा अपनी जगह, खाना अपनी जगह। अगर थाली सही है, तो दवा का असर दोगुना होता है।

क्या खाएँ?

  •  ताज़ा, गर्म और हल्का खाना, जो आसानी से पच जाए
  • पकी हुई हरी सब्ज़ियाँ, मूँग दाल, खिचड़ी जैसे सुपाच्य भोजन
  • पर्याप्त प्रोटीन: दाल, पनीर, अंडे (अगर शाकाहारी न हों)
  • सूखे मेवे सीमित मात्रा में, खासकर बादाम और अखरोट
  • गुनगुना पानी दिनभर, खासकर सुबह खाली पेट
  • आयोडीनयुक्त नमक सीमित मात्रा में

क्या कम करें?

  • बहुत ठंडी, तली हुई और बहुत मीठी चीज़ें
  •  पैकेट बंद, processed और बार-बार जंक फ़ूड
  • ज़रूरत से ज़्यादा चाय, कॉफ़ी और सोया उत्पाद
  • देर रात भारी खाना
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम सुनील सिंह है और मैं फरीदाबाद का रहने वाला हूँ। कुछ समय पहले मेरा वज़न अचानक बढ़ने लगा, जिसके बाद जांच कराने पर पता चला कि मुझे थायरॉइड की समस्या है। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन मेरे वजन में कोई खास सुधार नहीं हुआ। बाद में दोबारा जांच कराने पर पता चला कि मुझे फैटी लिवर (ग्रेड 3) और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याएँ भी हैं। इस दौरान मैं बहुत परेशान रहने लगा और कई रातें नींद नहीं आती थी। फिर मैंने आयुर्वेद का सहारा लेने का फैसला किया और जीवा क्लिनिक से संपर्क किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा और उसी के अनुसार उपचार शुरू किया। मुझे थायरॉइड के लिए पर्सनलाइज्ड डाइट के साथ आयुर्वेदिक दवाइयाँ दी गईं। धीरे-धीरे मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरा फैटी लिवर ग्रेड 3 से घटकर ग्रेड 1 हो गया। आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ और आयुर्वेदिक जीवनशैली की सभी को सलाह देता हूँ।

 डॉक्टर से कब मिलें?

अगर आप दवा ले रहे हैं और फिर भी ये लक्षण लगातार बने हुए हैं, तो देर मत कीजिए:

  • बहुत ज़्यादा थकान, जो आराम से भी कम नहीं होती
  • तेज़ बाल झड़ना या भौंहों का पतला होना
  •  बिना कारण वज़न में बड़ा बदलाव
  •  दिल की धड़कन असामान्य लगना
  •  गले में सूजन या गाँठ महसूस होना
  •  मूड में बहुत उतार-चढ़ाव, depression जैसे लक्षण

निष्कर्ष

थायरॉइड की दवा लेना मुश्किल नहीं है। मुश्किल है उसे सही तरीक़े से लेते रहना रोज़, सालों तक, बिना आलस के। ऊपर बताई गई पाँच गलतियाँ इतनी छोटी लगती हैं कि लोग इन्हें गंभीरता से लेते ही नहीं हैं। लेकिन यही वो छोटी बातें हैं जो तय करती हैं कि आप पाँच साल बाद वहीं खड़े होंगे जहाँ आज हैं  या काफ़ी बेहतर जगह पर। आज से शुरू कीजिए। एक गिलास सादा पानी, बेडसाइड टेबल पर रखी दवा, और 30 मिनट का धैर्य बस यही है शुरुआत। 

और अगर लगता है कि सिर्फ़ दवा से बात नहीं बन रही, शरीर को अंदर से मज़बूत करना है  तो आयुर्वेद का रास्ता खुला है।  

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

ज़रूरी नहीं। यह स्थिति के प्रकार पर निर्भर करता है। Hashimoto’s जैसी ऑटोइम्यून स्थिति में लंबे समय तक दवा की ज़रूरत हो सकती है। कुछ मामलों में सही जीवनशैली और आयुर्वेदिक उपचार से दवा की मात्रा घटाई भी जा सकती है लेकिन यह फ़ैसला हमेशा डॉक्टर का होना चाहिए।

बिल्कुल। बल्कि प्रेगनेंसी में थायरॉइड को नियंत्रित रखना माँ और बच्चे दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉक्टर की सलाह से नियमित दवा लेना सुरक्षित माना जाता है। प्रेगनेंसी में डोज़ बढ़ानी भी पड़ सकती है।

हाँ, बिल्कुल। लगातार मानसिक तनाव से Cortisol हार्मोन बढ़ता है, जो थायरॉइड की कार्यप्रणाली को सीधे प्रभावित करता है। इसीलिए तनाव कम करना इलाज का एक बड़ा हिस्सा है।

हाँ। हल्का और नियमित व्यायाम सुबह की सैर, योग, प्राणायाम  बहुत फ़ायदेमंद हैं। शुरुआत में बहुत थकाने वाला व्यायाम न करें। धीरे-धीरे बढ़ाएँ।

यह स्थिति और कारण पर निर्भर करता है। सही इलाज और जीवनशैली बदलाव से कई मामलों में TSH सामान्य हो जाता है और दवा की ज़रूरत कम हो जाती है। आयुर्वेद का लक्ष्य शरीर को लंबे समय तक संतुलित रखना है।

कुछ अध्ययनों के मुताबिक सोने से पहले खाली पेट लेना भी असरदार है  बशर्ते रात का आख़िरी खाना दो-तीन घंटे पहले खाया हो। लेकिन यह बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही करें।

हाँ, ले सकते हैं लेकिन दोनों के बीच समय का अंतर रखें (कम से कम 2 घंटे) और अपने आयुर्वेदिक डॉक्टर को बताएँ कि आप कौन सी एलोपैथिक दवा ले रहे हैं। खुद से किसी भी दवा को बंद न करें।

आयोडीन युक्त नमक सीमित मात्रा में लेना सही है। बहुत ज़्यादा या बिल्कुल नहीं  दोनों नुक़सानदेह हो सकते हैं। संतुलन ज़रूरी है।

 हाँ, खासकर hypothyroidism में metabolism धीमा होने की वजह से वजन बढ़ सकता है और उसे कम करना कठिन महसूस हो सकता है। सही दवा, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि इसमें मदद कर सकती है।

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