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Ayurveda में chronic disease को सिर्फ symptoms से क्यों नहीं देखा जाता?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

जब हम लंबे समय से किसी बीमारी से परेशान होते हैं, तो हमारा पूरा ध्यान सिर्फ अपनी तकलीफ पर होता है। हम यही सोचते हैं कि बस किसी तरह यह दर्द, जलन या खुजली शांत हो जाए। अक्सर हम एक गोली खाते हैं और कुछ देर के लिए दर्द भूल जाते हैं। असल में, कोई भी पुरानी बीमारी शरीर में रातों-रात नहीं पनपती, बल्कि यह महीनों या सालों के गलत खानपान और बिगड़े हुए लाइफस्टाइल का नतीजा होती है। ऐसे में सिर्फ बाहरी तकलीफ को दबा देना शरीर की अंदरूनी पुकार को अनसुना करने जैसा है।

यही वजह है कि आयुर्वेद का सोचने का तरीका बिल्कुल अलग है। वह सिर्फ आपके दर्द को सुन्न करने पर काम नहीं करता, बल्कि शरीर के बुनियादी सिद्धांतों को गहराई से समझकर यह जानने की कोशिश करता है कि बीमारी की असली जड़ कहाँ है।

 

बीमारी शरीर में क्यों टिक जाती है?

पुरानी बीमारी उस बिन बुलाए मेहमान की तरह है, जो एक बार घर आ जाए तो जाने का नाम ही नहीं लेता। आप दवाइयों के रूप में उसे थोड़ा बहुत डराते हैं, तो वह कुछ दिन के लिए छुप जाता है, लेकिन दवा बंद होते ही वह फिर से लौट आता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम उस मेहमान के रुकने का इंतजाम खुद कर रहे होते हैं। हमारी खराब लाइफस्टाइल, गलत खान-पान, लगातार रहने वाला तनाव, नींद की कमी और दिन भर बैठे रहने की आदत, ये सब मिलकर शरीर के अंदर एक ऐसा माहौल बना देते हैं, जो बीमारी को पनपने में मदद करता है। जब तक शरीर के अंदर का यह खराब माहौल नहीं बदलेगा, तब तक सिर्फ ऊपरी तौर पर बीमारी को दबाने से वह खत्म नहीं होगी।

आयुर्वेद का नज़रिया एकदम अलग क्यों है?

आयुर्वेद हमारे शरीर को किसी मशीन या अलग-अलग पुर्जों का हिस्सा नहीं मानता। वह शरीर, दिमाग, नींद, और हमारे पाचन को एक ही धागे में पिरोकर देखता है।

अगर आपके सिर में दर्द है, तो आयुर्वेद सिर्फ सिर की नसों को शांत करने की दवा नहीं देगा। वह यह देखेगा कि कहीं आपका पेट तो खराब नहीं है।? कहीं आप बहुत ज़्यादा टेंशन तो नहीं ले रहे? कहीं आपकी नींद तो अधूरी नहीं है? आयुर्वेद मानता है कि अगर शरीर के किसी एक हिस्से में गड़बड़ी है, तो उसकी जड़ शरीर के किसी दूसरे हिस्से में छिपी हो सकती है।

सिर्फ लक्षणों का इलाज करने में क्या दिक्कत है?

मान लीजिए आपके घर की छत में एक बड़ी दरार है और बारिश के मौसम में वहां से पानी टपककर फर्श पर गिर रहा है। अब आप एक पोछा लेकर उस पानी को बार-बार साफ करते रहें। जब तक आप पोछा लगाएंगे, फर्श साफ दिखेगा, लेकिन जैसे ही आप थककर बैठेंगे, फर्श फिर पानी से भर जाएगा।

बीमारी के लक्षण उसी फर्श पर गिरे पानी की तरह हैं।

  • अगर आप जोड़ों के दर्द में सिर्फ पेनकिलर खा रहे हैं, लेकिन वज़न कम नहीं कर रहे हैं।
  • अगर आप एसिडिटी की गोली तो खा रहे हैं, लेकिन रोज रात को तला-भुना खाकर सो रहे हैं।
  • शुगर की दवा तो ले रहे हैं, लेकिन मीठा खाना और तनाव लेना नहीं छोड़ रहे हैं।

तो आपकी बीमारी कभी जड़ से खत्म नहीं होगी। आयुर्वेद फर्श साफ करने के बजाय छत की उस दरार को भरने (बीमारी की जड़ को खत्म करने) पर काम करता है।

बीमारी की जड़ को समझना इतना जरूरी क्यों है?

कोई भी बड़ी बीमारी शरीर में रातों-रात नहीं आती। हमारा शरीर बहुत समझदार है, वह किसी भी बड़ी मुसीबत से पहले हमें छोटे-छोटे अलार्म देता है।

जैसे, शुरुआत में आपको भूख कम लगेगी, पेट में भारीपन महसूस होगा, पूरा दिन थकान रहेगी, हल्की गैस बनेगी या रात को नींद टूट-टूट कर आएगी। हम अक्सर इन छोटे इशारों को यह कहकर टाल देते हैं कि "शायद मौसम बदल रहा है" या "थकान की वजह से हो रहा है"। जब हम इन इशारों को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करते हैं, तो शरीर के अंदर की यह छोटी सी गड़बड़ी एक बड़ी और पुरानी बीमारी का रूप ले लेती है। आयुर्वेद इन्हीं छोटे इशारों को पकड़कर बीमारी को शुरुआत में ही खत्म करना चाहता है।

पाचन अग्नि, आम और दोष (आसान शब्दों में)

आयुर्वेद के कुछ बहुत ही आसान नियम हैं, जिन्हें समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है:

  • पाचन अग्नि: आयुर्वेद कहता है कि हमारे पेट में खाना पचाने वाली एक 'अग्नि' होती है। अगर यह अग्नि तेज़ है, तो आप जो भी खाएंगे वह पच जाएगा और शरीर को ताकत मिलेगी।
  • आम जमा होना: अगर आपके पेट की आग सुस्त पड़ गई है (गलत खाने या टेंशन से), तो खाना पचेगा नहीं, बल्कि पेट में सड़ने लगेगा। यह सड़ा हुआ खाना एक चिपचिपे तत्त्व में बदल जाता है, जिसे 'आम' कहते हैं।
  • शरीर का बैलेंस (Dosha): यही आम जब शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जाता है, तो वहां दर्द, सूजन या बीमारी पैदा करता है और हमारे शरीर के तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ यानी हवा, गर्मी और भारीपन) का बैलेंस बिगाड़ देता है।

आयुर्वेद सबसे पहले आपके पेट की इस अग्नि को ठीक करता है और शरीर से उस जमे हुए आमरे को बाहर निकालता है।

एक्सपर्ट डॉक्टर की विशेष सलाह 

यद्यपि आयुर्वेद पुरानी बीमारियों को जड़ से खत्म करने और जीवनशैली में गहराई से सुधार लाने के लिए एक बेहद प्रभावी दृष्टिकोण है, लेकिन गंभीर बीमारियों में केवल इसी पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। यदि आप डायबिटीज़, थायरॉइड, हाई ब्लड प्रेशर या हृदय रोग जैसी गंभीर क्रॉनिक बीमारियों के लिए पहले से कोई एलोपैथिक दवा ले रहे हैं, तो केवल जीवनशैली में बदलाव या आयुर्वेदिक नुस्खों के भरोसे अपनी नियमित दवाइयां अचानक बंद न करें। किसी भी पुरानी बीमारी के सटीक निदान के लिए क्लिनिकल जांच और ब्लड टेस्ट बेहद ज़रूरी हैं। अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए सबसे सही रास्ता यही है कि आप किसी भी नए इलाज या डाइट को शुरू करने से पहले डॉक्टर से उचित परामर्श ज़रूर लें। 

बीमारी एक है, लेकिन हर मरीज का इलाज अलग क्यों?

मान लीजिए दो लोगों को घुटनों में बहुत तेज दर्द है। पहले व्यक्ति का वज़न बहुत ज़्यादा है, वह दिन भर एक कुर्सी पर बैठकर काम करता है और बहुत ज़्यादा मीठा और भारी खाना खाता है। दूसरे व्यक्ति का वज़न एकदम कम है, वह बहुत रूखा-सूखा खाता है, लेकिन दिमाग में बहुत ज़्यादा टेंशन पाले रहता है और रात भर सो नहीं पाता।

दोनों की बीमारी का नाम "जोड़ों का दर्द" है, लेकिन दोनों के शरीर में दर्द होने की वजह एकदम अलग है। पहले व्यक्ति के शरीर में भारीपन (कफ) बढ़ गया है, जबकि दूसरे व्यक्ति के शरीर में वात और रूखापन बढ़ गया है। इसलिए, अगर दोनों को एक ही दर्द की गोली दी जाए, तो वह काम नहीं करेगी। दोनों की डाइट, दोनों की दवा और दोनों का रूटीन बिल्कुल अलग होंगे।

सिर्फ रिपोर्ट देखकर इलाज क्यों नहीं किया जाता?

आजकल हम ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट को ही सब कुछ मान लेते हैं। रिपोर्ट बहुत जरूरी है, यह बीमारी को समझने में बहुत मदद करती है। लेकिन रिपोर्ट यह नहीं बता सकती कि आप रात को कितने बजे सोते हैं, आपको गुस्सा कितना आता है, आपकी भूख कैसी है या मौसम बदलने पर आपका शरीर कैसा महसूस करता है।

आयुर्वेद डॉक्टर आपकी रिपोर्ट भी देखता है, लेकिन साथ ही वह आपके पूरे रूटीन, आपकी आदतों और आपके स्वभाव को भी समझता है। इससे बीमारी की असली जड़ पकड़ने में बहुत आसानी होती है।

खान-पान और लाइफस्टाइल का कितना बड़ा रोल है?

अगर आप यह सोचते हैं कि आप दुनिया की सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा खा लें और फिर रात को 2 बजे तक जागकर पिज्जा खाएं, तो बीमारी ठीक हो जाएगी, तो यह आपकी सबसे बड़ी भूल है।

आयुर्वेद में कहा गया है कि अगर आपका खान-पान खराब है, तो कोई दवा काम नहीं करेगी। और अगर आपका खान-पान सही है, तो आपको किसी दवा की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। आपकी रसोई ही आपका सबसे बड़ा अस्पताल है और आपका खाना ही आपकी सबसे बड़ी दवा है।

क्या केवल दवा से पुरानी बीमारी भाग सकती है?

बिल्कुल नहीं। दवा सिर्फ एक सहारा है। अगर आप पुरानी बीमारी को हराना चाहते हैं, तो आपको एक अच्छी नींद, घर का बना सादा खाना, रोज थोड़ी कसरत और मन की शांति को अपनी ज़िन्दगी में शामिल करना ही होगा। जब दवा के साथ ये सारी चीजें मिलती हैं, तब शरीर अपने आप को अंदर से रिपेयर करने लगता है।

किन बीमारियों में यह तरीका सबसे ज़्यादा काम आता है?

आजकल की कई बीमारियां जैसे शुगर (डायबिटीज़), पीसीओएस, थायरॉइड, गठिया, माइग्रेन, पुरानी एसिडिटी और स्किन की परेशानियां सिर्फ एक अंग की बीमारी नहीं हैं। ये हमारी पूरी लाइफस्टाइल की गड़बड़ी का नतीजा हैं। ऐसी बीमारियों में सिर्फ ऊपर से लक्षण दबाने वाली दवाइयां कोई खास कमाल नहीं दिखा पातीं। इन बीमारियों में अपनी दिनचर्या सुधारना और बीमारी की जड़ पर वार करना ही सबसे सही रास्ता होता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद का मकसद सिर्फ आपको कुछ दिन के लिए बीमारी से राहत देना नहीं है, बल्कि आपको हमेशा के लिए सेहतमंद बनाना है। यह एक शॉर्टकट नहीं है, बल्कि एक सही और पक्का रास्ता है। यह आपके शरीर को लड़ना सिखाता है ताकि आपको जीवन भर दवाइयों के सहारे न जीना पड़े। इसलिए, अगर आप किसी पुरानी बीमारी से जूझ रहे हैं, तो खुद डॉक्टर न बनें। किसी अच्छे आयुर्वेदिक डॉक्टर से मिलें, अपने शरीर को समझें और सही रूटीन के साथ एक नई शुरुआत करें।

References

WHO international standard terminologies on ayurveda

Contribution of world health organization in the global acceptance of Ayurveda - PMC

WHO benchmarks for the practice of ayurveda

A glimpse of Ayurveda – The forgotten history and principles of Indian traditional medicine - PMC

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। आयुर्वेद किसी भी बीमारी के लिए निश्चित इलाज का दावा नहीं करता। इसका उद्देश्य बीमारी के कारणों को समझकर, उचित आहार, जीवनशैली और उपचार के माध्यम से स्वास्थ्य में सुधार करना और लक्षणों को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने में मदद करना है। परिणाम व्यक्ति की स्थिति और बीमारी पर निर्भर करते हैं।

बिल्कुल नहीं। यदि आप पहले से किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं, तो बिना डॉक्टर की सलाह के उसे बंद करना नुकसानदायक हो सकता है। आयुर्वेदिक और आधुनिक चिकित्सा का समन्वय केवल योग्य चिकित्सकों की निगरानी में ही होना चाहिए।

नहीं। आयुर्वेद पाचन को महत्वपूर्ण मानता है, लेकिन बीमारी के पीछे आनुवंशिक कारण, उम्र, मानसिक तनाव, पर्यावरण, संक्रमण, हार्मोनल बदलाव और अन्य कई कारक भी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए हर मरीज़ का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाता है।

हाँ। यदि आपको डायबिटीज़, थायरॉइड, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य पुरानी बीमारी है, तो डॉक्टर द्वारा बताई गई ब्लड टेस्ट और अन्य जांच समय-समय पर करवानी चाहिए। इससे उपचार की प्रगति पर नज़र रखी जा सकती है।

हाँ। पुरानी बीमारियां आमतौर पर लंबे समय में विकसित होती हैं, इसलिए उनमें सुधार भी धीरे-धीरे हो सकता है। उपचार की अवधि बीमारी की गंभीरता, व्यक्ति की जीवनशैली और शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।

हाँ। लगातार तनाव, चिंता और मानसिक दबाव नींद, पाचन, हार्मोन और प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए कई मामलों में तनाव का बेहतर प्रबंधन भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

ज्यादातर मामलों में हल्की शारीरिक गतिविधि लाभदायक मानी जाती है। हालांकि किस प्रकार का व्यायाम करना है, यह व्यक्ति की उम्र, बीमारी और शारीरिक क्षमता के अनुसार तय होना चाहिए। ज़रूरत पड़ने पर चिकित्सक से सलाह लें।

नहीं। आयुर्वेद में आहार व्यक्ति की प्रकृति, मौसम, उम्र, पाचन क्षमता और बीमारी को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की डाइट को बिना सलाह अपनाना उचित नहीं है।

नहीं। केवल हर्बल उत्पादों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता। संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि और चिकित्सकीय सलाह के साथ ही बेहतर परिणाम मिलने की संभावना होती है।

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