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IBS जैसे symptoms को ignore क्यों नहीं करना चाहिए?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आजकल पेट में गैस बनना, कब्ज़ रहना, पेट फूलना या बार-बार टॉयलेट भागना बहुत आम बात हो गई है। कई बार हम इसे बाहर का खाना या मामूली बदहज़मी समझकर कोई चूर्ण या गोली खा लेते हैं और बात खत्म कर देते हैं। लेकिन अगर ये दिक्कतें महीनों से आपके साथ-साथ चल रही हैं, तो यह IBS (इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम) का इशारा हो सकता है।

इसे सिर्फ "पेट की गैस" समझकर इग्नोर करते रहना आपके शरीर के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है। आइए समझते हैं कि ये दिक्कत क्यों होती है, इसके खतरे क्या हैं और आयुर्वेद इसे ठीक करने का क्या रास्ता दिखाता है।

इन दिक्कतों को बार-बार नज़रअंदाज़ करना क्यों खतरनाक है?

अक्सर हम पेट की छोटी-मोटी तकलीफों को मामूली समझकर टाल देते हैं, लेकिन शरीर के इन इशारों को लगातार अनदेखा करना बहुत बड़ा जोखिम बन सकता है: 

  • पोषण की कमी: जब किसी का पेट हमेशा खराब रहता है, तो इंसान डर के कारण बहुत सी अच्छी और ज़रूरी चीज़ें खाना छोड़ देता है। लगता है कि कुछ भी खाएंगे तो पेट में मरोड़ उठ जाएगी। इस डर की वजह से शरीर में ज़रूरी विटामिन्स और पोषण की भारी कमी हो जाती है और शरीर कमज़ोर पड़ने लगता है।
  • ज़िंदगी पर बुरा असर: आपको किसी ज़रूरी मीटिंग में जाना है, क्लास अटेंड करनी है या दोस्तों के साथ बाहर जाना है और तभी पेट में दर्द या मरोड़ उठ जाए। यह आपकी पढ़ाई, काम और आत्मविश्वास (कॉन्फिडेंस) सब कुछ खराब कर देता है।
  • बड़ी बीमारी का खतरा: कई बार हम जिसे सिर्फ गैस या मामूली दर्द समझते हैं, वह असल में आंतों की सूजन या किसी बड़ी बीमारी की शुरुआत हो सकती है। बिना डॉक्टर को दिखाए खुद से अंदाज़ा लगाना आगे चलकर भारी पड़ सकता है।

आयुर्वेद इस पेट की गड़बड़ी को कैसे समझता है?

आयुर्वेद में IBS नाम की कोई सीधी बीमारी नहीं है, लेकिन इसके लक्षण आयुर्वेद की कुछ बहुत पुरानी और जानी-मानी पेट की दिक्कतों से मिलते हैं:

  • पाचन अग्नि को शांत करना: आयुर्वेद कहता है कि हमारे पेट में खाना पचाने वाली एक अग्नि होती है। अगर यह आग सुस्त पड़ जाए, तो आप कुछ भी खा लें, वो पचेगा नहीं।
  • गंदगी (आम) का बनना: जब खाना ठीक से नहीं पचता, तो वह पेट में सड़ने लगता है और एक चिपचिपी गंदगी बन जाता है। आयुर्वेद में इसे 'आम' कहते हैं। यह गंदगी ही गैस, भारीपन और आलस पैदा करती है।
  • गैस (वात) का बिगड़ना: गलत टाइम पर खाना, रूखा-सूखा खाना या बहुत ज़्यादा टेंशन लेने से पेट का 'वात' (हवा) बिगड़ जाता है। इसी बिगड़े हुए वात की वजह से पेट में अचानक दर्द, मरोड़ और कब्ज़ की शिकायत होती है।
  • दिमाग और पेट का कनेक्शन: क्या आपने ध्यान दिया है कि जब आप बहुत टेंशन या डर में होते हैं, तो पेट तुरंत खराब हो जाता है? आयुर्वेद मानता है कि हमारा दिमाग और हमारा हाज़मा एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। ज़्यादा सोचना और तनाव लेना पेट को सीधा नुकसान पहुंचाता है।

आखिर आपका पेट बार-बार खराब क्यों होता है? 

हम दिन भर में अनजाने में कई ऐसी गलतियां करते हैं, जो इस परेशानी को बढ़ा देती हैं, जैसे:

  • खाने का कोई फिक्स टाइम ना होना। कभी दोपहर में खा लिया, कभी सीधे रात को।
  • बहुत ज़्यादा पैकेट वाला, तला-भुना या मिर्च-मसाले वाला बाहर का खाना।
  • रात को बहुत देर तक जागते रहना और सुबह देर से उठना।
  • लगातार दिमाग में टेंशन या डिप्रेशन रखना
  • पूरा दिन कुर्सी या सोफे पर बैठे रहना और कोई कसरत (फिजिकल एक्टिविटी) ना करना।
  • बिना डॉक्टर से पूछे बार-बार दर्द की दवाइयां या एंटीबायोटिक खा लेना।

कैसे पता करें कि यह मामूली गैस है या कुछ और?

पेट खराब होना एक बात है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में नीचे बताए गए इशारे दिख रहे हैं, तो तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाना चाहिए:

  • पॉटी (मल) के रास्ते खून का आना।
  • बिना कोई डाइटिंग किए अचानक से वज़न का बहुत तेज़ी से कम होने लगना।
  • लगातार तेज़ बुखार रहना।
  • रात को सोते हुए अचानक पेट में इतना तेज़ दर्द होना कि आपकी नींद खुल जाए।
  • खून की कमी (एनीमिया) हो जाना या बहुत ज़्यादा कमज़ोरी लगना।

आयुर्वेद इसे कैसे ठीक करता है?

आयुर्वेद सिर्फ दर्द को दबाने के लिए ऊपर से गोली नहीं देता, बल्कि बीमारी की जड़ तक जाता है।

  • जड़ को पकड़ना: सबसे पहले यह देखा जाता है कि दिक्कत असल में कहाँ है, आपके खाने में, आपके रूटीन में, या आपके दिमाग (तनाव) में?
  • सही खाना: आपको ऐसा खाना खाने की सलाह दी जाती है जो पेट को आराम दे और पचने में एकदम हल्का हो। ताज़ा और गर्म खाना इस बीमारी की सबसे अच्छी दवा है।
  • लाइफस्टाइल में बदलाव: योग, गहरी सांसें लेना (प्राणायाम), अच्छी नींद और समय पर खाना, ये सब मिलकर आपके पेट को वापस पटरी पर ले आते हैं।
  • देसी दवाइयां और इलाज: अगर दिक्कत ज़्यादा है, तो डॉक्टर आपकी तासीर देखकर कुछ जड़ी-बूटियां या पंचकर्म (शरीर की अंदरूनी सफाई) की सलाह देते हैं। (लेकिन कभी भी इंटरनेट देखकर खुद से कोई दवा न लें।)

पेट को शांत रखने के लिए क्या खाएं और क्या न खाएं?

ये चीज़ें खाएं:

  • मूंग की दाल और सादी खिचड़ी।
  • ताज़ी और अच्छी तरह पकी हुई मौसमी सब्ज़ियाँ।
  • दिन भर में खूब सारा पानी पिएं।
  • अगर आपके डॉक्टर ने मना नहीं किया है, तो ताज़ा छाछ (मट्ठा) पीना बहुत फायदेमंद होता है।

इन चीज़ों से दूर रहें:

  • बाज़ार का भारी, तला हुआ और भटूरे-पूड़ी जैसा खाना।
  • बहुत ज़्यादा मिर्च-मसाले और पैकेट वाले चिप्स या स्नैक्स।
  • दिन भर में कई-कई कप चाय और कॉफी पीना।
  • सिगरेट और शराब।
  • पेट को बहुत लंबे समय तक खाली भूखा रखना।

पेट को हमेशा खुश रखने वाली आसान आदतें

  • खाना हमेशा चबा-चबा कर खाएं। जल्दबाज़ी में निगलने से पेट की मशीन को दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।
  • खाना खाने का एक टाइम फिक्स कर लें। शरीर की अपनी एक घड़ी होती है, उसे बार-बार कन्फ्यूज़ न करें।
  • रोज़ सुबह या शाम कम से कम 30 मिनट पैदल चलें, योग करें या हल्की कसरत करें।
  • दिमाग को शांत रखें। आप अपना मनपसंद म्यूज़िक सुन सकते हैं, दोस्तों से बात कर सकते हैं या ध्यान लगा सकते हैं।
  • नींद से कोई समझौता न करें, रात को 7-8 घंटे की गहरी नींद ज़रूर लें।
  • एक डायरी बनाएं। उसमें लिखें कि कौन सी चीज़ खाने से आपका पेट खराब होता है। जिस चीज़ से दिक्कत हो, उसे खाना बंद कर दें।

निष्कर्ष

बार-बार होने वाले पेट दर्द, कब्ज़, दस्त या पेट फूलने को सिर्फ "थोड़ी सी गैस है" कहकर टालें नहीं। यह आपके शरीर का अलार्म है जो आपको बता रहा है कि अंदर के सिस्टम में कुछ गड़बड़ चल रही है।

आयुर्वेद के आसान नियमों को अपनी ज़िंदगी में उतारें, हल्का खाएं, टेंशन कम लें और अपनी रूटीन को सुधारें। अगर फिर भी आपकी परेशानी बनी हुई है, तो अंदाज़ा लगाने के बजाय किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाएँ। आपका हाज़मा ठीक रहेगा, तो आपका पूरा शरीर और आपकी ज़िंदगी अपने आप खुशहाल हो जाएगी।

References

Irritable Bowel Syndrome: The Most Common Presentation, Severity Ranking and Therapeutic Regimens among Patients Attending Outpatient

Irritable Bowel Syndrome (IBS) | World Gastroenterology Organisation

Definition & Facts for Irritable Bowel Syndrome - NIDDK

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

IBS एक लंबे समय तक रहने वाली (Chronic) समस्या हो सकती है, लेकिन सही इलाज, संतुलित खानपान, तनाव कम करने और नियमित जीवनशैली अपनाने से इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है।

नहीं। IBS किसी वायरस, बैक्टीरिया या संक्रमण से फैलने वाली बीमारी नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती।

हर मरीज को Colonoscopy की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर आपकी उम्र, लक्षण और रेड फ्लैग संकेतों को देखकर तय करते हैं कि इसकी आवश्यकता है या नहीं।

हाँ। IBS केवल बड़ों की समस्या नहीं है। बच्चों और किशोरों में भी पेट दर्द, कब्ज़ या बार-बार दस्त जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे मामलों में बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित रहता है।

कुछ लोगों में यात्रा के दौरान खानपान, पानी और दिनचर्या बदलने के कारण IBS के लक्षण बढ़ सकते हैं। इसलिए यात्रा के समय हल्का भोजन, पर्याप्त पानी और नियमित समय पर खाना मददगार हो सकता है।

हाँ। लगातार पेट की परेशानी के कारण चिंता, तनाव और सामाजिक असहजता बढ़ सकती है। इसी वजह से IBS के इलाज में मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

IBS स्वयं कैंसर नहीं बनता और न ही सीधे तौर पर कैंसर का कारण माना जाता है। लेकिन यदि मल में खून, तेजी से वजन घटना या लगातार बुखार जैसे लक्षण हों, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए क्योंकि ये किसी दूसरी गंभीर बीमारी के संकेत हो सकते हैं।

कुछ लोगों में प्रोबायोटिक्स से पेट के अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बेहतर हो सकता है और गैस या पेट फूलने जैसे लक्षणों में राहत मिल सकती है। हालांकि, हर व्यक्ति पर इनका असर अलग हो सकता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

कुछ दर्द निवारक दवाएं लंबे समय तक लेने से पाचन तंत्र पर असर पड़ सकता है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार दवाएं लेना उचित नहीं है।

यदि लक्षण नियंत्रित हैं, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर फॉलो-अप कराना पर्याप्त होता है। लेकिन यदि नए लक्षण दिखाई दें या परेशानी अचानक बढ़ जाए, तो बिना देरी किए दोबारा चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

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