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क्या आर्थराइटिस सिर्फ बुज़ुर्गों का रोग है? युवाओं में बढ़ते जोखिम को आयुर्वेद कैसे समझाता है

Information By Dr. Keshav Chauhan

भारत में गठिया या आर्थराइटिस केवल बुज़ुर्गों की बीमारी नहीं रहा। एक बड़े WHO सर्वे के अनुसार, लगभग 1.95 करोड़ भारतीय यानी लगभग हर छठा व्यक्ति जोड़ों के दर्द या आर्थराइटिस से प्रभावित है। इसमें से अनुमानतः 54.44 मिलियन यानी 5.4 करोड़ लोग ऑस्टियोआर्थराइटिस से जूझ रहे हैं और 4.22 मिलियन लोग रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसे इम्यून सिस्टम से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

आज की बदलती जीवनशैली, गलत खान-पान, और शारीरिक गतिविधि में कमी की वजह से यह समस्या अब सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। पहले लोग सोचते थे कि आर्थराइटिस उम्र बढ़ने के साथ आता है, लेकिन अब युवा वर्ग भी तेज़ी से जोड़ों की तकलीफ का सामना कर रहा है। यह बदलाव न सिर्फ आपके चलने-फिरने को प्रभावित कर सकता है, बल्कि रोज़मर्रा के कामों पर भी प्रभाव डालता है।

इस लेख में हम समझेंगे कि क्या वाकई आर्थराइटिस सिर्फ बुज़ुर्गों का रोग है, क्यों युवाओं में इसका जोखिम बढ़ रहा है, और आयुर्वेद इसे कैसे देखता है, ताकि आप अपनी सेहत को बेहतर ढंग से समझकर समय रहते सही कदम उठा सकें।

क्या आर्थराइटिस वाकई सिर्फ बुज़ुर्गों की बीमारी है?

कई सालों तक यह माना जाता रहा कि आर्थराइटिस यानी जोड़ों का दर्द उम्र बढ़ने के बाद होने वाली समस्या है। घर-परिवार में भी आपने अक्सर यही सुना होगा कि “अब उम्र हो गई है, इसलिए घुटने दर्द करने लगे हैं।” इसी सोच की वजह से जब किसी युवा को जोड़ों में दर्द, अकड़न या सूजन होती है, तो वह इसे गंभीरता से नहीं लेता।

लेकिन आज की हकीकत इस आम सोच से काफ़ी अलग है। अब आर्थराइटिस सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रहा। डॉक्टरों के पास ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ बीस, पच्चीस या तीस साल की उम्र में ही लोग जोड़ों की समस्या लेकर पहुँच रहे हैं। घुटनों में दर्द, सुबह उठते समय अकड़न, लंबे समय तक बैठने के बाद चलने में परेशानी—ये सब लक्षण अब युवाओं में भी आम होते जा रहे हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर युवा को आर्थराइटिस हो रहा है, लेकिन यह ज़रूर साफ़ है कि यह बीमारी अब उम्र देखकर नहीं आती। अगर आप युवा हैं और आपको लगता है कि “अभी तो मेरी उम्र ही क्या है”, तो यही सोच कई बार समस्या को बढ़ा देती है। आयुर्वेद भी यही मानता है कि रोग सिर्फ उम्र से नहीं, बल्कि आपकी दिनचर्या, खान-पान और शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन से जुड़ा होता है।

युवाओं में आर्थराइटिस के शुरुआती संकेत क्या हो सकते हैं?

युवाओं में आर्थराइटिस की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसके शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं। आप उन्हें सामान्य थकान या रोज़मर्रा की परेशानी समझकर टाल देते हैं। लेकिन यही छोटे-छोटे संकेत आगे चलकर बड़ी समस्या बन सकते हैं।

कुछ आम शुरुआती संकेत इस तरह हो सकते हैं:

  • हल्का लेकिन बार-बार होने वाला जोड़ों का दर्द: कभी घुटनों में, कभी कंधों में या कभी उँगलियों में ऐसा दर्द जो आता-जाता रहता है। आप सोचते हैं कि थोड़ा आराम करेंगे तो ठीक हो जाएगा।

  • सुबह उठते समय अकड़न: नींद से उठने के बाद शरीर पूरी तरह खुलने में समय लगना। थोड़ी देर चलने-फिरने के बाद आराम मिल जाना, इसलिए आप इसे गंभीर नहीं मानते।

  • थोड़ा काम करने पर जल्दी थक जाना: सीढ़ियाँ चढ़ते समय या हल्का सा शारीरिक काम करते ही जोड़ों में भारीपन या थकान महसूस होना।

  • जोड़ों के आसपास हल्की सूजन या गर्माहट: कई बार सूजन बहुत ज़्यादा नहीं होती, लेकिन छूने पर आपको महसूस होता है कि वह हिस्सा थोड़ा गर्म है।

समस्या तब बढ़ती है जब आप इन संकेतों को लगातार नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। आप सोचते हैं कि यह सब मोबाइल ज़्यादा देखने, देर तक बैठने या एक-दो दिन की थकान की वजह से है। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर पहले हल्के संकेत देता है ताकि आप समय रहते संभल सकें। जब इन संकेतों को अनदेखा किया जाता है, तब रोग गहराने लगता है।

आज की जीवनशैली युवाओं में आर्थराइटिस का जोखिम क्यों बढ़ा रही है?

अगर आप अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर ध्यान दें, तो आपको जवाब खुद ही मिल जाएगा। आज की जीवनशैली में कई ऐसी आदतें शामिल हो गई हैं, जो धीरे-धीरे जोड़ों को कमज़ोर करती हैं।

देर तक बैठना 

आज ज़्यादातर काम बैठकर होते हैं। घंटों कुर्सी पर बैठे रहना, शरीर को एक ही स्थिति में रखना और बीच-बीच में हिलना-डुलना भी नहीं—इससे जोड़ों पर दबाव बढ़ता है। आपको तुरंत दर्द नहीं होता, लेकिन अंदर ही अंदर अकड़न बढ़ती रहती है।

गलत खान-पान 

तेल-मसाले वाला भोजन, बार-बार बाहर का खाना, समय पर भोजन न करना—ये सब पाचन को कमज़ोर करते हैं। आयुर्वेद मानता है कि जब पाचन ठीक नहीं रहता, तो शरीर में ऐसे तत्व बनने लगते हैं जो जोड़ों में जाकर परेशानी पैदा करते हैं।

कम शारीरिक गतिविधि 

पहले लोग पैदल चलते थे, शारीरिक मेहनत ज़्यादा थी। आज अगर आप दिनभर बैठे रहते हैं और शरीर को चलने-फिरने का मौका नहीं देते, तो जोड़ों की ताक़त धीरे-धीरे कम होने लगती है।

तनाव और नींद की कमी 

लगातार तनाव में रहना और पूरी नींद न लेना भी जोड़ों की सेहत को प्रभावित करता है। शरीर को आराम और संतुलन की ज़रूरत होती है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो उसका असर सिर्फ मन पर नहीं, बल्कि शरीर पर भी पड़ता है।

आयुर्वेद के अनुसार युवाओं में आर्थराइटिस क्यों होता है?

आयुर्वेद युवाओं में होने वाले आर्थराइटिस को अचानक आई हुई बीमारी नहीं मानता। इसके अनुसार यह समस्या समय के साथ बने शरीर के अंदरूनी असंतुलन का नतीजा होती है। जब आप रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शरीर की ज़रूरतों को अनदेखा करते हैं, तब यह असंतुलन धीरे-धीरे बढ़ता है और जोड़ों तक पहुँच जाता है।

आयुर्वेद की सरल समझ यह कहती है कि आपका शरीर तभी स्वस्थ रहता है जब पाचन, गतिविधि और आराम—तीनों में संतुलन हो। लेकिन आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में यह संतुलन अक्सर बिगड़ जाता है। आप समय पर भोजन नहीं कर पाते, ज़्यादा देर तक बैठे रहते हैं और शरीर को पूरा आराम नहीं दे पाते। इसका असर सीधे जोड़ों पर नहीं, बल्कि पहले शरीर के अंदर पड़ता है।

जब पाचन ठीक से काम नहीं करता, तो शरीर में ऐसे अपचय पदार्थ बनने लगते हैं जो साफ़ नहीं हो पाते। आयुर्वेद के अनुसार ये पदार्थ धीरे-धीरे शरीर के कमज़ोर हिस्सों में जमा होने लगते हैं। युवाओं में यह कमज़ोरी अक्सर जोड़ों में दिखती है, क्योंकि लगातार बैठना, कम चलना और गलत आदतें जोड़ों को पहले ही थका चुकी होती हैं। ऐसे में हल्का दर्द, अकड़न और सूजन शुरू हो जाती है।

आयुर्वेद आर्थराइटिस को सिर्फ जोड़ों की समस्या क्यों नहीं मानता?

आधुनिक सोच में आर्थराइटिस को अक्सर सिर्फ जोड़ों की खराबी मान लिया जाता है। लेकिन आयुर्वेद की नज़र में जोड़ों का दर्द, शरीर के अंदर चल रही किसी गड़बड़ी का संकेत होता है, न कि पूरी समस्या।

आयुर्वेद मानता है कि आपका शरीर एक-दूसरे से जुड़े हिस्सों का समूह है। अगर पाचन कमज़ोर है, तो उसका असर खून, मांसपेशियों और जोड़ों तक पहुँचता है। अगर आप लगातार तनाव में रहते हैं, तो उसका असर भी शरीर की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। इसलिए आयुर्वेद सिर्फ दर्द वाले हिस्से को नहीं, बल्कि पूरे शरीर की स्थिति को देखता है।

यह दृष्टिकोण आपको यह समझने में मदद करता है कि:

  • जोड़ों का दर्द अक्सर अंदरूनी असंतुलन का परिणाम होता है

  • सिर्फ बाहरी आराम से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती

  • जब तक कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब तक राहत अस्थायी रहती है

युवाओं में यह समझ और भी ज़रूरी है, क्योंकि इस उम्र में शरीर खुद को सुधारने की क्षमता रखता है। अगर आप समय रहते कारणों पर ध्यान दें, तो जोड़ों की समस्या को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।

क्या गलत खान-पान और पाचन की कमज़ोरी आर्थराइटिस से जुड़ी है?

आयुर्वेद के अनुसार, पेट और जोड़ों का गहरा संबंध होता है। आप जो खाते हैं, वही तय करता है कि आपका शरीर कितनी अच्छी तरह काम करेगा। अगर खान-पान सही नहीं है, तो जोड़ों पर उसका असर दिखना तय है।

आजकल युवाओं में कुछ आदतें बहुत आम हो गई हैं:

  • बार-बार भारी और तला-भुना भोजन

  • ज़्यादा मसालेदार और खट्टा खाना

  • पैकेट या डिब्बे में मिलने वाला भोजन

  • कभी बहुत देर से खाना, कभी खाना छोड़ देना

इन आदतों की वजह से पाचन धीरे-धीरे कमज़ोर हो जाता है। जब भोजन ठीक से नहीं पचता, तो शरीर में बोझ बढ़ता है। यह बोझ सीधे जोड़ों तक पहुँचकर दर्द और सूजन का कारण बन सकता है।

इसके अलावा, अनियमित खाने की आदतें शरीर की दिनचर्या को बिगाड़ देती हैं। जब आप कभी सुबह खाना छोड़ देते हैं और कभी देर रात भारी भोजन करते हैं, तो शरीर को समझ ही नहीं आता कि उसे कैसे काम करना है। इसका असर सबसे पहले उन हिस्सों पर पड़ता है जो पहले से कमज़ोर होते हैं, जैसे कि जोड़।

अगर आप ध्यान से देखें, तो कई युवाओं को जोड़ों के साथ-साथ पेट की समस्या, गैस, भारीपन या थकान भी रहती है। आयुर्वेद इसे एक ही कड़ी का हिस्सा मानता है। जब पाचन सुधरता है, तो जोड़ों की परेशानी में भी सुधार आने लगता है।

इसलिए आयुर्वेद यह सिखाता है कि आर्थराइटिस से निपटने के लिए सिर्फ दर्द पर ध्यान देना काफी नहीं है। आपको अपनी थाली, समय और आदतों पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। यही समझ युवाओं के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, क्योंकि सही समय पर की गई छोटी-छोटी बदलाहटें आगे चलकर बड़ी परेशानी से बचा सकती हैं।

युवाओं में कौन-से प्रकार के आर्थराइटिस ज़्यादा देखने को मिल रहे हैं?

जब युवाओं में जोड़ों की समस्या की बात आती है, तो ज़रूरी है कि डर फैलाने के बजाय सही समझ दी जाए। हर जोड़ों का दर्द आर्थराइटिस नहीं होता और हर आर्थराइटिस एक जैसा भी नहीं होता। लेकिन आज की जीवनशैली की वजह से कुछ प्रकार ऐसे हैं, जो युवाओं में पहले की तुलना में ज़्यादा देखने को मिल रहे हैं। इन्हें समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि आप समय रहते संकेत पहचान सकें।

युवाओं में आम तौर पर दिखने वाले आर्थराइटिस के प्रकार इस तरह हैं:

  • ऑस्टियोआर्थराइटिस: इसे अक्सर उम्र से जोड़ा जाता है, लेकिन गलत बैठने की आदत, कम चलना और शरीर पर बढ़ता दबाव युवाओं में भी इसका कारण बन रहा है। इसमें जोड़ धीरे-धीरे कमज़ोर होते हैं और दर्द हल्के से शुरू होकर बढ़ सकता है।

  • रूमेटाइड आर्थराइटिस: यह शरीर की अपनी रक्षा प्रणाली से जुड़ी समस्या होती है, जिसमें शरीर गलती से अपने ही जोड़ों को नुकसान पहुँचाने लगता है। लंबे समय तक सूजन, अकड़न और थकान इसके संकेत हो सकते हैं।

  • गाउट: जब खान-पान बहुत बिगड़ा हुआ हो, तब युवाओं में भी यह समस्या दिखने लगी है। इसमें अचानक तेज़ दर्द, सूजन और चलने में परेशानी हो सकती है, जिसे लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

  • रीढ़ और पीठ से जुड़ी आर्थराइटिस: लंबे समय तक गलत तरीके से बैठना, झुककर काम करना और शरीर को सही सहारा न मिलना इसकी बड़ी वजह बन रहा है।

इन बिंदुओं का मतलब यह नहीं है कि हर दर्द गंभीर समस्या है, बल्कि यह याद दिलाने के लिए है कि लगातार होने वाली तकलीफ को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं होता। समय पर ध्यान देने से स्थिति को संभालना आसान रहता है।

निष्कर्ष

आर्थराइटिस को सिर्फ बुज़ुर्गों की बीमारी मान लेना आज के समय में सही नहीं है। अगर आप युवा हैं और फिर भी आपके जोड़ों में बार-बार दर्द, अकड़न या थकान महसूस होती है, तो यह शरीर का दिया हुआ संकेत हो सकता है। इसे उम्र का बहाना बनाकर टालना आगे चलकर परेशानी बढ़ा सकता है। आयुर्वेद आपको डराने के बजाय यह समझाता है कि शरीर कब असंतुलन की ओर बढ़ रहा है और उसे समय रहते कैसे संभाला जा सकता है।

आपकी रोज़मर्रा की आदतें, खान-पान, नींद और तनाव, ये सभी मिलकर आपकी जोड़ों की सेहत तय करते हैं। अच्छी बात यह है कि सही समझ और छोटे बदलावों से इस समस्या को शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रित किया जा सकता है। जब आप अपने शरीर की ज़रूरतों को समझने लगते हैं, तो राहत का रास्ता अपने आप खुलने लगता है।

अगर आप आर्थराइटिस या जोड़ों के दर्द से सम्बंधित किसी अन्य समस्या से जूझ रहे हैं, तो आज ही हमारे प्रमाणित जीवा डॉक्टरों से व्यक्तिगत परामर्श के लिए संपर्क करें। डायल करें 0129-4264323

FAQs

  1. क्या युवाओं में आर्थराइटिस पूरी तरह ठीक हो सकता है?

अगर समस्या शुरुआती अवस्था में पहचानी जाए और सही जीवनशैली अपनाई जाए, तो युवाओं में आर्थराइटिस को काफी हद तक नियंत्रित और संभाला जा सकता है।

  1. क्या वज़न बढ़ने से आर्थराइटिस का खतरा बढ़ता है?

हाँ, ज़्यादा वज़न होने से जोड़ों पर दबाव बढ़ता है, जिससे दर्द और अकड़न की समस्या जल्दी शुरू हो सकती है।

  1. क्या भारी व्यायाम आर्थराइटिस बढ़ा सकता है?

गलत तरीके से या ज़रूरत से ज़्यादा भारी व्यायाम करने से जोड़ों पर असर पड़ सकता है, खासकर जब शरीर पहले से कमज़ोर हो।

  1. क्या मौसम बदलने पर जोड़ों का दर्द बढ़ना सामान्य है?

कई लोगों को मौसम बदलने पर जोड़ों में जकड़न या दर्द महसूस होता है, जिसे शरीर की संवेदनशीलता से जोड़ा जाता है।

  1. क्या आर्थराइटिस में पूरी तरह आराम करना सही होता है?

लगातार आराम करना सही नहीं होता। हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि जोड़ों को सक्रिय रखने में मदद करती है।

  1. क्या जोड़ों का दर्द अपने आप ठीक हो सकता है?

कभी-कभी हल्का दर्द आराम से कम हो सकता है, लेकिन बार-बार होने वाला दर्द किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है।

  1. क्या कम उम्र का आर्थराइटिस भविष्य में बढ़ सकता है?

अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो युवाओं में शुरू हुई जोड़ों की समस्या आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है, इसलिए सावधानी ज़रूरी है।

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