Diseases Search
Close Button
 
 

Ayurveda Natural है तो Side Effects नहीं होंगे" ये सोच खतरनाक हो सकती है

Information By Dr. Keshav Chauhan

जीवाग्राम गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

  • प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक उपचार सेवाएं
  • आरामदायक आवास
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएं

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम आपकी बीमारी पर तुक्के नहीं लगाते, हम विज्ञान और आयुर्वेद के सिद्धांतों पर काम करते हैं।

  • जड़ से इलाज: हम सिर्फ लक्षणों को नहीं दबाते, न ही आपको जीवन भर दवाइयों पर रखते हैं। हमारा उद्देश्य शरीर के असंतुलन को जड़ से खत्म करना है।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर (BAMS/MD): हमारे पास 500 से अधिक योग्य और प्रमाणित आयुर्वेदिक डॉक्टर्स की टीम है। हम 'क्वाक्स' (Quacks) या व्हाट्सएप की जानकारी पर नहीं, शास्त्रों और क्लीनिकल अनुभव पर भरोसा करते हैं।
  • कस्टमाइज्ड केयर: आपका इलाज आपके पड़ोसी से अलग होगा, क्योंकि आपकी प्रकृति आपके पड़ोसी से अलग है।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: हमारी फार्मेसी में बनी हर औषधि भारी धातुओं (Heavy Metals) और रसायनों से मुक्त होती है। सुरक्षा और गुणवत्ता (Quality Control) हमारा सबसे बड़ा वादा है।

"यह तो बस जड़ी-बूटी है, फायदा नहीं करेगी तो कम से कम नुकसान भी नहीं करेगी।" क्या आपने भी कभी ऐसा सोचकर इंटरनेट या व्हाट्सएप (WhatsApp) पर पढ़कर कोई आयुर्वेदिक चूर्ण, काढ़ा या गोली खानी शुरू की है? 

आज के समय में हर दूसरे इंसान को लगता है कि आयुर्वेद का मतलब 'जीरो साइड इफेक्ट्स' (Zero Side Effects) है। हल्की सी खाँसी हुई तो दिन में चार बार कड़क काढ़ा पी लिया, कमज़ोरी लगी तो बिना डॉक्टर से पूछे अश्वगंधा या शिलाजीत के डिब्बे खाली कर दिए, और वज़न घटाना हो तो सुबह-सुबह खाली पेट नींबू और तरह-तरह के चूर्ण फांक लिए।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही 'नेचुरल' (Natural) चीज़ें अगर गलत मात्रा, गलत समय और आपकी प्रकृति (Body Type) के खिलाफ ली जाएं, तो ये आपके लिवर, किडनी और पेट की आंतों को भयंकर नुकसान पहुँचा सकती हैं? आयुर्वेद एक संपूर्ण चिकित्सा विज्ञान है, कोई दादी-नानी के नुस्खों की किताब मात्र नहीं। यह मान लेना कि "प्राकृतिक चीज़ों का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता" 21वीं सदी का एक बहुत बड़ा और खतरनाक भ्रम है।

क्या सच में 'नेचुरल' का मतलब 'सुरक्षित' है?

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत ही यह है कि इस ब्रह्मांड की हर चीज़ औषधि (Medicine) हो सकती है और हर चीज़ ज़हर (Poison) भी बन सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल कौन, कैसे और कितनी मात्रा में कर रहा है।

  • प्रकृति (Body Constitution) का विज्ञान: हर इंसान का शरीर अलग होता है (वात, पित्त या कफ प्रधान)। जो 'नेचुरल' जड़ी-बूटी एक वात प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए अमृत है, वही पित्त (गर्मी) प्रकृति वाले के लिए तेज़ाब बन सकती है।
  • सक्रिय तत्व (Active Compounds): जड़ी-बूटियों में भी केमिकल्स (Phytochemicals) होते हैं। जब आप बिना सोचे-समझे किसी जड़ी-बूटी का लगातार सेवन करते हैं, तो शरीर में कुछ खास तत्वों की अधिकता हो जाती है, जिसे प्रोसेस करने में आपके लिवर (Liver) और किडनी (Kidney) पर भारी दबाव पड़ता है।

इस समस्या के मुख्य प्रकार: लोग आयुर्वेद के नाम पर कहाँ गलती कर रहे हैं?

आजकल 'सेल्फ-मेडिकेशन' (खुद अपना डॉक्टर बनना) के कारण लोग मुख्य रूप से 4 तरह की गलतियाँ कर रहे हैं:

  • व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी (WhatsApp University): बिना यह जाने कि मेसेज किसने लिखा है, लोग गिलोय, हल्दी और काली मिर्च के भारी-भरकम काढ़े रोज़ाना पीने लगते हैं। इससे पेट में भयंकर गर्मी (Acidity) और अल्सर तक हो रहे हैं।
  • ओवरडोज़िंग (Overdosing): लोगों को लगता है कि "अगर 1 चम्मच चूर्ण से 10 दिन में फायदा होगा, तो 4 चम्मच खाने से 2 दिन में हो जाएगा।" आयुर्वेद में मात्रा (Dosage) का बहुत कड़ा नियम है।
  • अनुपान की अनदेखी (Wrong Vehicle): आयुर्वेद में दवा किसके साथ खानी है (पानी, दूध, शहद या घी), यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसे अनुपान कहते हैं। गर्म तासीर वाली दवा अगर बिना दूध या घी के ले ली जाए, तो शरीर में खुश्की और गर्मी बढ़ जाती है।
  • भस्मों का गलत प्रयोग (Misuse of Bhasmas): स्वर्ण भस्म, अभ्रक भस्म या लौह भस्म जैसी रसौषधियाँ अगर किसी झोलाछाप या अशुद्ध तरीके से बनी हों, और बिना योग्य वैद्य की सलाह के ली जाएं, तो ये शरीर में 'हेवी मेटल टॉक्सिसिटी' (Heavy Metal Toxicity) कर सकती हैं।

अगर इसे 'नॉर्मल' मानकर इग्नोर किया, तो क्या होंगी जटिलताएं?

अगर आप बिना डॉक्टरी सलाह के महीनों तक आयुर्वेदिक या हर्बल सप्लीमेंट्स खाते रहते हैं, तो ये गंभीर बीमारियाँ जन्म ले सकती हैं:

  • लिवर डैमेज (Hepatotoxicity): कई जड़ी-बूटियाँ अगर अशुद्ध रूप में या अत्यधिक मात्रा में ली जाएं, तो लिवर के एन्ज़ाइम्स बढ़ जाते हैं और लिवर में सूजन (Hepatitis) आ सकती है।
  • भयंकर पित्त प्रकोप (Severe Acid Reflux & Ulcers): रोज़ाना अत्यधिक गर्म मसालों (जैसे सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली) का सेवन करने से पेट की म्यूकस लाइनिंग (Mucus Lining) जल जाती है, जिससे अल्सर और नकसीर (Nosebleeds) फूटने का खतरा रहता है।
  • किडनी पर लोड (Kidney Strain): बिना सही जानकारी के कुछ खास जड़ी-बूटियों (जैसे अत्यधिक मुलेठी) का लंबे समय तक सेवन ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है और किडनी पर दबाव डाल सकता है।
  • धातुओं का सूखना (Tissue Depletion): जो लोग वज़न घटाने के लिए बहुत ज़्यादा त्रिफला या रूखे चूर्ण खाते हैं, उनका 'वात' दोष इतना भड़क जाता है कि जोड़ों का दर्द और नसों की कमज़ोरी शुरू हो जाती है।

आयुर्वेद इसे कैसे समझता है? (प्रकृति, मात्रा और काल)

आयुर्वेद कभी भी 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' (सबके लिए एक इलाज) पर विश्वास नहीं करता। महर्षि चरक और सुश्रुत ने स्पष्ट कहा है:

  • मात्रा का महत्व (Importance of Dosage): "अति सर्वत्र वर्जयेत" - अधिकता हर चीज़ की बुरी है। सही मात्रा में विष (ज़हर) भी दवा बन जाता है और अधिक मात्रा में अमृत (दवा) भी विष बन जाता है।
  • प्रकृति परीक्षण: बीमारी का इलाज करने से पहले बीमार व्यक्ति का इलाज किया जाता है। पित्त प्रकृति वाले को ठंडी तासीर की दवाइयाँ (जैसे मुक्ता पिष्टी, गिलोय सत्व) दी जाती हैं, जबकि कफ वालों को गर्म तासीर (त्रिकटु आदि) की ज़रूरत होती है।
  • काल (Time of consumption): आयुर्वेदिक दवा खाना खाने से पहले खानी है, बीच में खानी है या रात को सोते समय? इसे 'भेषज काल' कहते हैं। गलत समय पर ली गई दवा शरीर में काम ही नहीं करती।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

हम आपको इंटरनेट से पढ़कर कोई भी डिब्बा खरीद लेने की सलाह नहीं देते। हमारा मानना है कि असली आयुर्वेद कस्टमाइज़्ड (Customized) होता है।

  • मूल्यांकन और निदान (Proper Diagnosis): हमारी पहली कोशिश यह होती है कि हम आपकी प्रकृति और विकृति (असंतुलन) को समझें।
  • सही मार्गदर्शन: जड़ी-बूटी कौन सी खानी है, कितनी खानी है, किसके साथ (अनुपान) खानी है और कितने दिनों के लिए खानी है, इसका सटीक प्रोटोकॉल हमारे डॉक्टर्स तय करते हैं।
  • शुद्ध औषधियाँ (Quality Medicines): जीवा आयुर्वेद की फार्मेसी में हर जड़ी-बूटी और भस्म को प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों और आधुनिक वैज्ञानिक मानकों (GMP Certified) पर कठोरता से परखा और शुद्ध किया जाता है।

स्वस्थ शरीर के लिए संतुलित आहार (अति-हर्बल प्रयोगों से बचें)

दवाइयों पर निर्भर रहने से बेहतर है कि आप अपने रोज़मर्रा के आहार को ही औषधि बनाएं।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद और सुरक्षित) क्या न खाएं (अत्यधिक या गलत प्रयोग)
सुपरफूड्स और वसा (Fats) गाय का शुद्ध घी (यह सभी जड़ी-बूटियों के तीखेपन को शांत करता है), बादाम, अखरोट, ताज़ा मक्खन। इंटरनेट पर देखकर रोज़ाना सुबह-सुबह बहुत सारा कच्चा लहसुन या अत्यधिक मेथी दाना खाना (पित्त बढ़ाता है)।
पेय पदार्थ (Beverages) ताज़ा पानी, छाछ, धनिया या सौंफ का पानी (पित्त शामक), नारियल पानी। रोज़ाना 3-4 बार कड़क काढ़ा (काली मिर्च, लौंग, दालचीनी) पीना, जिससे एसिडिटी हो।
मसाले (Spices) जीरा, सौंफ, धनिया, इलायची, सीमित मात्रा में हल्दी। भोजन में अत्यधिक सूखी लाल मिर्च, या बिना डॉक्टर से पूछे रोज़ाना कई ग्राम हल्दी फांकना।
अनाज और दालें पुराना चावल, मूंग की दाल (सबसे सुपाच्य और त्रिदोष शामक), दलिया। वज़न घटाने के चक्कर में कार्ब्स पूरी तरह छोड़कर सिर्फ सलाद और रूखा भोजन करना (वात बढ़ाता है)।

आम जड़ी-बूटियाँ जिन्हें लोग गलत तरीके से लेते हैं

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): लोग इसे कमज़ोरी दूर करने के लिए पानी के साथ खूब खाते हैं। लेकिन यह तासीर में बहुत गर्म होता है। अगर पित्त प्रकृति का व्यक्ति इसे बिना दूध या घी के खा ले, तो उसे नींद न आना, घबराहट और शरीर में गर्मी बढ़ने की समस्या हो सकती है।
  • त्रिफला (Triphala): कब्ज़ के लिए लोग सालों तक रोज़ रात को त्रिफला खाते हैं। त्रिफला 'रुक्ष' (Dry) होता है। बिना स्निग्धता (घी/तेल) के लंबे समय तक खाने से यह आंतों की प्राकृतिक चिकनाई को सुखा देता है।
  • गिलोय (Giloy): गिलोय अमृत है, लेकिन अत्यधिक गिलोय का रस या काढ़ा पीने से कई लोगों में कब्ज़ और मल के सूखने की समस्या देखी गई है।
  • नींबू और शहद (Lemon & Honey in warm water): वज़न घटाने के लिए लोग उबलते पानी में शहद डालते हैं। आयुर्वेद में गर्म चीज़ के साथ शहद लेना 'विरुद्ध आहार' माना गया है, जो शरीर में धीमा ज़हर (Ama/Toxins) बनाता है।

पंचकर्म थेरेपी: शरीर में जमे 'टॉक्सिन्स' (Ama) का बाहर निकलना

अगर गलत दवाओं, अधिक काढ़ों या गलत खानपान से शरीर में गर्मी, वात या टॉक्सिन्स भर गए हैं, तो पंचकर्म इस कचरे को शरीर से सुरक्षित बाहर निकालता है।

  • विरेचन (Virechana): अत्यधिक गर्म जड़ी-बूटियों (काढ़ों) या गलत दवाओं से जब पित्त भड़क जाता है और लिवर पर ज़ोर पड़ता है, तो औषधीय विरेचन (Therapeutic Purgation) से लिवर और आंतों की सारी गर्मी बाहर निकाली जाती है।
  • बस्ती (Basti): रूखे-सूखे चूर्ण या डाइट से भड़के हुए वात (जोड़ों के दर्द) को शांत करने के लिए औषधीय तेलों और काढ़ों का एनीमा दिया जाता है, जो नसों और आंतों को दोबारा चिकनाई और ताकत देता है।
  • शिरोधारा (Shirodhara): 'सेल्फ-मेडिकेशन' और इंटरनेट की आधी-अधूरी जानकारी से उपजे मानसिक तनाव और एंग्जायटी को शांत करने के लिए माथे पर तेल की धारा संजीवनी का काम करती है।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

हम आपको केवल जड़ी-बूटियों का डिब्बा देकर घर नहीं भेजते; हम आपकी 'बैटरी' चेक करते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले पल्स चेक करके यह समझना कि आपके अंदर वात, पित्त या कफ का क्या स्तर है और कौन सी जड़ी-बूटी आपको सूट करेगी।
  • शारीरिक मूल्याँकन: आपकी जीभ, त्वचा, नाखून और आँखों की जाँच से शरीर के अंदर चल रही बीमारियों और टॉक्सिन्स (Ama) का पता लगाया जाता है।
  • हिस्ट्री टेकिंग (History Taking): आप कौन-कौन से सप्लीमेंट्स, चूर्ण या काढ़े पहले से ले रहे हैं? क्या आप एलोपैथी और आयुर्वेद को बिना गैप दिए एक साथ खा रहे हैं? इन सब बातों का बारीकी से विश्लेषण किया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

हम आपको व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के भ्रम से निकालकर प्रमाणित आयुर्वेद (Authentic Ayurveda) की ओर ले जाते हैं।

  • जीवा से संपर्क करें: बेझिझक होकर सीधे हमारे नंबर 0129 4264323 पर कॉल करें।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से भी ज़्यादा क्लिनिक में आकर आराम से डॉक्टर से आमने-सामने मिल सकते हैं।
  • ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन: अगर आप घर बैठे किसी भी शहर से एक्सपर्ट आयुर्वेद डॉक्टर से बात करना चाहते हैं, तो ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन बुक करें।
  • व्यक्तिगत प्लान: आपकी प्रकृति और बीमारी के अनुसार एकदम सुरक्षित औषधियाँ, सही अनुपान (शहद, दूध या घी) और सही डाइट का रूटीन तैयार किया जाता है।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

अगर आपने गलत दवाओं या सप्लीमेंट्स से शरीर को नुकसान पहुँचाया है, तो उसे रिपेयर होने में अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती 2-3 हफ्ते: सही इलाज और औषधियों से एसिडिटी, पेट की गर्मी, त्वचा के रैशेज़ या सिरदर्द जैसे शुरुआती लक्षणों में तुरंत आराम मिलना शुरू होगा।
  • 1 से 2 महीने तक: लिवर और आंतों की लाइनिंग जो 'ओवरडोज़' के कारण सूज गई थी, वह हील (Heal) होने लगेगी। आपकी भूख सामान्य होगी और ऊर्जा का स्तर बढ़ेगा।
  • 3 से 6 महीने तक: आपका पूरा सिस्टम (विशेषकर लिवर और किडनी) डिटॉक्स हो जाएगा। धातुएं दोबारा पोषित होंगी और आप सही आयुर्वेदिक लाइफस्टाइल के साथ जीवन जीना सीख जाएंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

  • दवा
  • परामर्श
  • मानसिक स्वास्थ्य सत्र
  • योग और ध्यान मार्गदर्शन
  • आहार योजना
  • थेरेपी

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

सेल्फ-मेडिकेशन (Self-Medication) और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

श्रेणी इंटरनेट/व्हाट्सएप आयुर्वेद (खतरनाक) जीवा आयुर्वेद क्लीनिकल अप्रोच (सुरक्षित)
दवा का चुनाव इंटरनेट पर बीमारी का नाम टाइप किया और कोई भी जड़ी-बूटी खरीद ली। नाड़ी और प्रकृति के परीक्षण के बाद ही कस्टमाइज़्ड औषधि तय की जाती है।
मात्रा (Dosage) अंदाज़े से चम्मच भरकर फांक लेना या दिन में कई बार काढ़े पीना। ग्राम और मिलीग्राम (mg) में सटीक मात्रा, जो शरीर बर्दाश्त कर सके।
अनुपान (दवा किसके साथ लें) बस पानी के साथ दवा गटक लेना। तासीर के अनुसार दूध, शहद, घी या विशेष काढ़े के साथ दवा देना।
साइड इफेक्ट्स का रिस्क भारी धातुओं की विषाक्तता, एसिडिटी, लिवर और किडनी पर दबाव। 100% सुरक्षित, क्योंकि डॉक्टर हर 15 दिन में फॉलो-अप (Follow-up) करते हैं।

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

अगर आपने बिना सोचे-समझे किसी आयुर्वेदिक चूर्ण, काढ़े या भस्म का सेवन किया है और ये लक्षण दिखें, तो तुरंत दवा बंद करें और एक्सपर्ट डॉक्टर को दिखाएं:

  • आँखों और पेशाब का अत्यधिक पीला होना: यह लिवर टॉक्सिसिटी या पीलिया (Jaundice) का सीधा संकेत हो सकता है।
  • पेट में भयंकर जलन और उल्टी: अगर कुछ भी खाने पर सीने में तेज़ जलन हो या उल्टी में हल्का खून/कॉफी जैसा रंग आए, तो यह अत्यधिक गर्म औषधियों से हुआ अल्सर हो सकता है।
  • अचानक चक्कर आना या हार्ट रेट बढ़ना: कुछ उत्तेजक जड़ी-बूटियाँ ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट को अचानक बढ़ा सकती हैं।
  • पेशाब में कमी या दर्द: अगर अचानक पेशाब कम आने लगे या शरीर में सूजन (Edema) आ जाए, तो यह किडनी पर दबाव का संकेत है।

निष्कर्ष

प्रकृति ने हमें जड़ी-बूटियों के रूप में अनमोल खजाना दिया है, लेकिन चाबी के बिना खजाना खोलना खतरनाक हो सकता है। "आयुर्वेद नेचुरल है इसलिए 100% सुरक्षित है", इस सोच को आज ही बदल दें। कोई भी जड़ी-बूटी, चूर्ण या काढ़ा तब तक अमृत नहीं बनता जब तक उसे सही प्रकृति वाले व्यक्ति को, सही मात्रा में और सही समय पर न दिया जाए। अपनी सेहत के साथ प्रयोग (Experiments) करना बंद करें। इंटरनेट की आधी-अधूरी जानकारी आपको फायदा पहुँचाने से ज़्यादा बीमार कर सकती है। आपके शरीर का नर्वस सिस्टम, लिवर और किडनी बहुत नाज़ुक हैं, इन्हें 'सेल्फ-मेडिकेशन' के ज़हर से बचाएं। आज ही जीवा आयुर्वेद के योग्य और प्रमाणित डॉक्टरों से परामर्श लें। आयुर्वेद के असली, सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप को अपनाएं, क्योंकि सही ज्ञान ही सबसे अच्छी औषधि है।

FAQs

 हाँ, अगर दवाइयों में अशुद्ध भस्में हों या आप बिना डॉक्टरी सलाह के बहुत अधिक मात्रा में गर्म तासीर वाली जड़ी-बूटियाँ (जैसे अश्वगंधा, चित्रक, गिलोय का अत्यधिक रस) लंबे समय तक लें, तो यह लिवर और किडनी पर भारी दबाव डाल सकता है।

 काढ़े में मौजूद काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ और लौंग तासीर में बेहद गर्म (उष्ण) होते हैं। यदि आपकी प्रकृति पित्त (गर्म) है, तो यह काढ़ा आपके पेट की लाइनिंग को छीलकर एसिडिटी और सीने में जलन पैदा कर देगा।

नहीं। गिलोय रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, लेकिन इसका बहुत लंबा या अत्यधिक सेवन शरीर में रुक्षता (सूखापन) पैदा कर सकता है, जिससे कब्ज़ और जोड़ों में कटकटाहट शुरू हो सकती है। इसे हमेशा वैद्य की सलाह से कोर्स के रूप में लेना चाहिए।

 अनुपान वह माध्यम है जिसके साथ आप दवा खाते हैं (जैसे पानी, दूध, घी या शहद)। अनुपान दवा के असर को सही अंग तक पहुँचाता है और उसके साइड इफेक्ट्स को काटता है। गर्म दवा को घी या दूध के साथ लेने से उसकी अनावश्यक गर्मी शांत हो जाती है।

 हाँ, लेकिन दोनों के बीच कम से कम 1 से 2 घंटे का गैप होना ज़रूरी है। साथ ही, आयुर्वेदिक डॉक्टर को अपनी एलोपैथी दवाओं का पूरा पर्चा दिखाना चाहिए ताकि कोई ड्रग इंटरेक्शन (Drug Interaction) न हो।

 आयुर्वेद में जनरल कुछ नहीं होता। एक ही बीमारी (जैसे सिरदर्द) वात, पित्त या कफ किसी भी दोष के बढ़ने से हो सकती है। इसलिए एक मरीज़ की सिरदर्द की दवा दूसरे मरीज़ के लिए बिल्कुल अलग हो सकती है।

भस्में (जैसे स्वर्ण भस्म) आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली दवाइयाँ हैं, लेकिन केवल तभी जब उन्हें सैकड़ों बार आग में तपाकर मारित (शुद्ध) किया गया हो। अगर भस्म कच्ची है या झोलाछाप तरीके से बनी है, तो वह सीधा ज़हर है। हमेशा जीवा जैसे प्रमाणित संस्थानों की दवाइयाँ ही लें।

लगातार खट्टे, तीखे और रुक्ष (सूखे) चूर्ण खाने से शरीर का वात दोष भड़क जाता है, जिससे वज़न तो थोड़ा कम होता है लेकिन नसों में कमज़ोरी, बाल झड़ना और हड्डियाँ कमज़ोर होने लगती हैं। गर्म पानी में शहद मिलाना आयुर्वेद में धीमा ज़हर (विरुद्ध आहार) माना जाता है।

अश्वगंधा बहुत गर्म और भारी (गुरु) होता है। अगर आपका पाचन कमज़ोर है (अग्नि मंद है) या शरीर में पित्त बढ़ा है, तो अश्वगंधा फायदा करने के बजाय पेट खराब कर देगा और गर्मी बढ़ा देगा। इसे हमेशा डॉक्टर से अपनी प्रकृति की जाँच करवाकर ही लें।

जीवा के डॉक्टर आपकी नाड़ी परीक्षा करते हैं, आपकी प्रकृति (वात/पित्त/कफ) समझते हैं, आपकी उम्र, पाचन शक्ति (अग्नि) और बीमारी की गंभीरता देखकर केवल आपके लिए एक खास और सुरक्षित नुस्खा (Customized plan) तैयार करते हैं।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us