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Self-medication आपकी condition को कैसे बिगाड़ सकती है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

सेल्फ-मेडिकेशन (Self-medication) यानी बिना डॉक्टर को दिखाए अपनी मर्जी से कोई भी दवा खा लेना। अक्सर हम सोचते हैं कि यार थोड़ा सिर दर्द, बुखार या पेट दर्द ही तो है, इसके लिए क्या डॉक्टर के पास जाना। बस उठाई गोली और खा ली। लेकिन हर दर्द सिर्फ कोई आम दिक्कत नहीं होता, कई बार ये शरीर के अंदर पल रही किसी बड़ी बीमारी का अलार्म होता है।

जब हम बिना असली वजह जाने बस दवा खाकर दर्द को दबा देते हैं, तो बीमारी अंदर ही अंदर बढ़ती रहती है। शुरू में लगता है कि चलो आराम मिल गया, लेकिन धीरे-धीरे ये आदत शरीर के पूरे सिस्टम की बैंड बजा देती है। इसलिए खुद डॉक्टर बनना कई बार एक छोटी सी गलती से बहुत भारी नुकसान करवा सकता है।

Self-medication का बढ़ता चलन

आजकल किसी के पास सब्र नहीं है। जरा सी तकलीफ हुई नहीं कि तुरंत आराम चाहिए। भागदौड़ वाली जिंदगी, टाइम की कमी और "कौन क्लिनिक जाकर धक्के खाए" वाली सोच ने अपनी मर्जी से दवा खाने की इस आदत को हर घर तक पहुँचा दिया है।

इसके अलावा, इंटरनेट पर मिलने वाले आधे-अधूरे ज्ञान ने भी लोगों को अपना इलाज खुद करने की हिम्मत दे दी है। केमिस्ट की दुकान से बिना पर्चे के दवाइयां इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम इसके नुकसान के बारे में सोचते ही नहीं। और यही 'सुविधा' आगे चलकर शरीर को अंदर से खोखला कर देती है।

क्या Self-Medication वाकई सुरक्षित है? इसके पीछे छिपे खतरे क्या हैं?

आजकल 5 मिनट में आराम पाने के चक्कर में लोग बिना सोचे-समझे गोलियां निगलने लगे हैं। लेकिन ये आदत कभी-कभी शरीर पर बहुत भारी पड़ती है:

  • असली बीमारी छुप जाती है: जल्दी आराम के चक्कर में हम दर्द तो दबा देते हैं, लेकिन जो मेन बीमारी है, वो बिना इलाज के अंदर ही रह जाती है।
  • गलत डोज़ का खतरा: बिना पूरी जानकारी के गलत दवा या ज्यादा पावर की गोली शरीर का पूरा बैलेंस बिगाड़ सकती है।
  • साइड इफेक्ट्स: बार-बार अपनी मर्जी से दवाइयां खाने से किडनी-लिवर पर बुरा असर पड़ता है और नए साइड इफेक्ट्स का रिस्क बढ़ जाता है।
  • जड़ खत्म नहीं होती: दवा खाने से लक्षण (जैसे दर्द या बुखार) तो कुछ देर के लिए गायब हो जाते हैं, लेकिन बीमारी जड़ से खत्म नहीं होती।
  • छोटी दिक्कत का बड़ा बन जाना: आज की ये छोटी सी लापरवाही कल को किसी खतरनाक और लंबी चलने वाली बीमारी (Chronic disease) का रूप ले सकती है।

बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेना क्यों आम हो गया है?

अपनी मर्जी से दवा खाना आजकल हर घर की कहानी बन गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है दवाइयों का मेडिकल स्टोर पर बड़ी आसानी से मिल जाना। कुछ भी हुआ, सीधे मेडिकल स्टोर गए और 'भैया एक दर्द की गोली दे दो' बोलकर दवा ले ली, बिना ये जाने कि दर्द आखिर हो क्यों रहा है।

दूसरा सबसे बड़ा कारण है हमारा 'गूगल ज्ञान'। इंटरनेट पर दो-चार बातें पढ़कर लोग खुद को 'Google Doctor' समझने लगते हैं। गूगल से मिला ये थोड़ा बहुत ज्ञान उन्हें लगता है कि सब ठीक कर देगा, लेकिन ये कभी भी असली डॉक्टर की चेकिंग (Diagnosis) की जगह नहीं ले सकता। इसी 'खुद के इलाज' के चक्कर में कई बार छोटी सी बीमारी अंदर ही अंदर दबकर एक बहुत खतरनाक रूप ले लेती है।

दवाओं का लिवर और किडनी पर क्या असर पड़ता है?

लिवर और किडनी शरीर के प्राकृतिक फिल्टर सिस्टम हैं, जो दवाओं और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने का काम करते हैं। जब बिना जरूरत या बार-बार दवाओं का सेवन किया जाता है, तो इन अंगों पर लगातार दबाव बढ़ने लगता है। धीरे-धीरे उनकी सफाई और फिल्टर करने की क्षमता कमजोर होने लगती है, जिससे शरीर में विषैले तत्व जमा होने का खतरा बढ़ जाता है।

Self-Medication का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है? 

लगातार बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेने की आदत सिर्फ शरीर ही नहीं, बल्कि मन पर भी गहरा असर डालती है। धीरे-धीरे यह मानसिक निर्भरता (psychological dependence) पैदा कर देती है, जिससे व्यक्ति अपनी सेहत को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगता है।

  • बार-बार दवा लेने से मानसिक निर्भरता बढ़ती है
  • व्यक्ति को लगने लगता है कि बिना दवा वह ठीक नहीं हो सकता
  • anxiety और health-related overthinking बढ़ जाती है
  • शरीर पर भरोसा कम और दवा पर भरोसा ज्यादा हो जाता है
  • धीरे-धीरे over-dependence की आदत बन जाती है

क्रॉनिक बीमारियों में Self-Medication कितना खतरनाक हो सकता है?

डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और थायरॉइड जैसी क्रॉनिक बीमारियों में Self-medication करना शरीर के संतुलन को गंभीर रूप से बिगाड़ सकता है। इन स्थितियों में दवा की सही मात्रा (dose) और नियमित निगरानी बेहद जरूरी होती है, क्योंकि जरा सी गड़बड़ी भी बड़े स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है।

  • गलत दवा लेने से शुगर या BP अचानक असंतुलित हो सकता है
  • ओवरडोज या अंडरडोज से शरीर पर गंभीर असर पड़ता है
  • लक्षण तो दब जाते हैं, लेकिन बीमारी अंदर से बढ़ती रहती है
  • हार्मोनल और मेटाबॉलिक संतुलन बिगड़ सकता है
  • लंबे समय में जटिलताएं (complications) बढ़ने का खतरा रहता है

बच्चों और बुजुर्गों के लिए अपनी मर्जी से दवा लेना सबसे ज्यादा खतरनाक क्यों है?

बच्चों और घर के बड़े-बुजुर्गों को बिना डॉक्टर से पूछे दवा देना बहुत बड़ा रिस्क है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका शरीर हमारी तरह हर चीज़ नहीं झेल सकता। बच्चों का शरीर अभी बन ही रहा होता है, इसलिए उनका पाचन और बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यूनिटी) बड़ों से एकदम अलग तरीके से काम करती है। वहीं, उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों के शरीर की मशीनरी पहले जैसी मजबूत नहीं रहती। कोई भी उल्टी-सीधी दवा या थोड़ी सी भी गलत डोज़ उनके शरीर पर बहुत गहरा और लंबा असर छोड़ सकती है, जो बाद में किसी बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है।

देसी और घरेलू नुस्खों का गलत इस्तेमाल कितना भारी पड़ सकता है?

हम अक्सर सोचते हैं कि "अरे ये तो नेचुरल चीज़ है, इसका क्या ही नुकसान होगा!" बिना पूरी जानकारी के इनका इस्तेमाल भी बहुत भारी पड़ सकता है। व्हाट्सएप या इंटरनेट से पढ़कर अपनाए गए नुस्खे शरीर का पूरा सिस्टम हिला सकते हैं:

  • अगर सही तरीका न पता हो, तो कुदरती और देसी चीज़ें भी शरीर को उल्टा नुकसान पहुंचा सकती हैं।
  • हर इंसान के शरीर की तासीर (नेचर) अलग होती है। जो नुस्खा मेरे लिए काम कर गया, ज़रूरी नहीं कि वो आप पर भी सूट करे।
  • आधे-अधूरे ज्ञान से किया गया घरेलू इलाज कई बार बीमारी को कम करने के बजाय और भड़का देता है।
  • बिना किसी वैद्य या डॉक्टर से पूछे अपने ही डॉक्टर बनने से शरीर के अंदरूनी बैलेंस के बिगड़ने का पूरा चांस रहता है।
  • इसलिए, अपनी मर्जी से कोई भी काढ़ा या चूर्ण फांकने से बेहतर है कि किसी जानकार की सलाह ली जाए।

आयुर्वेद क्या कहता है: अपनी मर्जी से दवा खाने पर शरीर के अंदर क्या होता है?

हमारी बॉडी वात, पित्त और कफ इन तीन पिलर्स पर टिकी है। जब तक ये बैलेंस में हैं, हम एकदम फिट हैं। लेकिन जब हम बिना सोचे-समझे मेडिकल स्टोर से लाकर कोई भी दवा खा लेते हैं, तो ये बैलेंस बुरी तरह डगमगा जाता है। अपनी मर्जी से खाई गई दवा सिर्फ दर्द या बुखार को कुछ देर के लिए सुन्न कर देती है, जबकि आयुर्वेद उस बीमारी की असली जड़ को खत्म करने की बात करता है।

  • वात-पित्त-कफ का बैलेंस बिगड़ना: आपकी बॉडी का नेचर क्या है, ये जाने बिना दवा खाने से वात, पित्त या कफ भड़क सकते हैं। इससे शरीर का पूरा कुदरती सिस्टम हिल जाता है।
  • पेट की 'आग' (पाचन) का कबाड़ा: गलत दवाइयां आपके पाचन की आग को या तो एकदम बुझा देती हैं या फिर हद से ज्यादा भड़का देती हैं। नतीजा? गैस, भयंकर एसिडिटी, अपच और पेट में भारीपन।
  • शरीर में ज़हर (Toxins) का भरना: जब पाचन खराब होता है, तो खाना पचने के बजाय सड़ने लगता है और टॉक्सिन्स ('आम') बनने लगते हैं। बिना पूछे दवा खाने की आदत इस टॉक्सिन को शरीर में और बढ़ा देती है।
  • नसों और रास्तों का ब्लॉक होना: शरीर में जमा हुए टॉक्सिन्स की वजह से वो छोटे-छोटे रास्ते (Channels) ब्लॉक हो जाते हैं, जहाँ से शरीर को खून और ताकत मिलनी होती है।
  • दिमाग और शरीर का तालमेल टूटना: हर बात पर गोलियां खाने की आदत आपको मानसिक तौर पर भी परेशान और बेचैन कर देती है। दिमाग और शरीर का जो एक कनेक्शन होता है, वो कमजोर पड़ जाता है।
  • इम्यूनिटी (ओजस) का खत्म होना: रोज़-रोज़ की गलत दवाइयों से शरीर की असली ताकत जिसे आयुर्वेद में 'ओजस' कहते हैं, वो खत्म होने लगती है। इसके बाद आप बात-बात पर बीमार पड़ने लगते हैं।
  • खुद को ठीक करने की ताकत खोना: धीरे-धीरे हमारी बॉडी खुद से ठीक होने की अपनी कुदरती ताकत एकदम भूल जाती है। हालत ये हो जाती है कि जरा सा सिर भी दुखे तो बिना गोली के आराम ही नहीं मिलता।

डॉक्टर की सलाह लेना क्यों जरूरी है?

डॉक्टर सिर्फ दवा नहीं देते, बल्कि सबसे पहले बीमारी के असली कारण को समझते हैं। हर मरीज में लक्षण एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन उनकी जड़ अलग होती है, और यही फर्क इलाज को सही या गलत बनाता है। बिना सही diagnosis के लिया गया इलाज अक्सर सिर्फ लक्षणों को दबाता है, बीमारी की वजह को नहीं हटाता। इससे थोड़ी राहत तो मिल सकती है, लेकिन समस्या अंदर ही अंदर बनी रहती है और समय के साथ बढ़ भी सकती है। 

डॉक्टर मरीज की पूरी हिस्ट्री, लाइफस्टाइल और शरीर की स्थिति को समझकर इलाज तय करते हैं, जिससे दवा सही मात्रा और सही दिशा में काम कर सके। यही वजह है कि विशेषज्ञ की सलाह लेना न सिर्फ इलाज को प्रभावी बनाता है, बल्कि अनावश्यक साइड इफेक्ट और जटिलताओं से भी बचाता है।

निष्कर्ष 

Self-medication एक छोटी और आसान आदत लग सकती है, लेकिन इसके परिणाम लंबे समय तक और गंभीर हो सकते हैं। बिना सही समझ और सलाह के लिया गया इलाज कई बार बीमारी को दबा देता है, लेकिन उसे पूरी तरह ठीक नहीं करता। शरीर को सही तरीके से समझकर और विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही वास्तविक स्वास्थ्य सुरक्षा पाई जा सकती है। अक्सर जल्दबाजी में लिया गया फैसला आगे चलकर लंबे इलाज और परेशानियों की शुरुआत बन जाता है, इसलिए सोच-समझकर कदम उठाना ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, Self-medication से लक्षण temporarily दब जाते हैं, जिससे बीमारी की असली पहचान देर से होती है। जब तक मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है, स्थिति पहले से ज्यादा complex हो सकती है। इससे treatment शुरू करने में valuable समय निकल जाता है।

हाँ, जल्दी राहत मिलने की वजह से शरीर और दिमाग दोनों इसकी आदत डाल लेते हैं। धीरे-धीरे हर छोटे लक्षण में दवा लेने की tendency बढ़ जाती है। यह एक psychological dependency भी develop कर सकता है।

हाँ, बार-बार गलत या अनावश्यक दवाएं लेने से शरीर की sensitivity बदल सकती है। कुछ दवाएं पहले जैसी प्रभावी नहीं रहतीं या unusual reaction दे सकती हैं। यह long-term में treatment को मुश्किल बना देता है।

हाँ, खासकर एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड के गलत उपयोग से immunity कमजोर हो सकती है। शरीर की natural defense system पर दबाव बढ़ता है। इससे future infections से लड़ने की क्षमता कम हो सकती है।

नहीं, इंटरनेट general जानकारी देता है, personal medical diagnosis नहीं। हर व्यक्ति का शरीर और condition अलग होते हैं। गलत interpretation से गलत treatment होने का खतरा बढ़ जाता है।

हाँ, जैसे सिर दर्द stress, migraine या blood pressure का संकेत हो सकता है। सिर्फ लक्षण देखकर बीमारी समझना बहुत risky हो सकता है। इसलिए proper diagnosis जरूरी होता है।

हाँ, अगर पहले से कोई दवा चल रही हो तो नई दवा reaction कर सकती है। इससे side effects बढ़ सकते हैं या दवा का असर कम हो सकता है। यह स्थिति कई बार अचानक health complications भी पैदा करती है।

नहीं, दर्द सिर्फ एक symptom है, disease नहीं। दवा से दर्द दब सकता है लेकिन मूल कारण अभी भी मौजूद हो सकता है। इसलिए केवल pain relief को cure मानना गलत है।

हाँ, बार-बार दवाएं शरीर के natural signals को suppress कर देती हैं। इससे body की self-healing capacity धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। शरीर dependence mode में चला जाता है।

हाँ, कई लोग हल्की असुविधा में भी तुरंत दवा लेने लगते हैं। यह एक conditioned behavior बन जाता है जो समय के साथ बढ़ता है। धीरे-धीरे व्यक्ति को दवा के बिना ठीक महसूस नहीं होता।

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