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Weight gain joints पर कितना pressure डालता है? simple calculation समझिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 23 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 19 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5057

वज़न का बढ़ना सिर्फ हमारी बाहरी पर्सनैलिटी या कपड़ों के टाइट होने तक की बात नहीं है। यह अंदर ही अंदर हमारे शरीर के पूरे ढांचे को हिला कर रख देता है। जैसे ही हमारा वज़न बढ़ता है, इसका सबसे पहला और सीधा असर हमारे जोड़ों (Joints) पर होता है। असल में, शरीर पर बढ़ा हुआ हर एक एक्स्ट्रा किलो हमारे घुटनों और कूल्हों पर कई गुना ज्यादा बोझ डाल देता है। इसी बोझ की वजह से जोड़ों के बीच की कुदरती गद्दी (Cartilage) धीरे-धीरे घिसने लगती है। यही वजह है कि मोटापा और जोड़ों का दर्द आपस में बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। वज़न शरीर पर दबाव बढ़ाता है, और हमारे बेचारे जोड़ इस अनचाहे बोझ के नीचे दबते चले जाते हैं।

क्या हर एक एक्स्ट्रा किलो जोड़ों पर असर डालता है?

हाँ, बिल्कुल! वज़न और जोड़ों के दर्द का बहुत सीधा कनेक्शन है। साइंस के मुताबिक, जब हम नॉर्मल तरीके से चलते हैं, तो हमारे घुटनों पर हमारे असली वज़न का 3 से 4 गुना ज्यादा प्रेशर पड़ता है। इसे ऐसे समझिए कि अगर आपका वज़न सिर्फ 1 किलो बढ़ा है, तो चलते वक्त आपके घुटनों को हर कदम पर 3 से 4 किलो का एक्स्ट्रा बोझ उठाना पड़ रहा है। यही वज़न धीरे-धीरे जोड़ों की गद्दी (कार्टिलेज) को पूरी तरह बर्बाद कर देता है, जिससे दर्द और सूजन की समस्या शुरू हो जाती है।

घुटनों पर ही सबसे ज्यादा मार क्यों पड़ती है?

हमारे घुटने किसी गाड़ी के 'शॉक एब्जॉर्बर' (झटके सहने वाली मशीन) की तरह काम करते हैं। लेकिन जब वज़न बढ़ने लगता है, तो धीरे-धीरे इनकी भी हिम्मत जवाब दे जाती है। घुटनों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने के पीछे ये मेन कारण हैं:

  • ज़न का कई गुना बढ़ जाना (Multiplier Effect): वैज्ञानिक तौर पर देखें तो, आपके एक कदम चलने पर घुटनों पर शरीर के वज़न का तीन से चार गुना ज्यादा प्रेशर आता है। मतलब, अगर आपने सिर्फ 5 किलो वज़न बढ़ाया है, तो आपके घुटनों को 15 से 20 किलो का एक्स्ट्रा बोझ ढोना पड़ेगा।
  • घुटनों की गद्दी (Cartilage) का घिसना: हमारी हड्डियों को आपस में टकराने से बचाने के लिए जोड़ों के बीच एक चिकनी परत या गद्दी होती है। लगातार वज़न पड़ने से यह परत धीरे-धीरे पतली होने लगती है। आयुर्वेद में इसी घिसावट को 'संधिवात' की शुरुआत माना जाता है।
  • चलते वक्त लगने वाले झटके (Mechanical Shock): जब हम चलते हैं तो जमीन से लगने वाला सीधा झटका हमारे जोड़ों पर आता है। अगर शरीर भारी है, तो यह झटका जोड़ों के लिए एक बहुत बड़ा 'मैकेनिकल स्ट्रेस' बन जाता है। और यहीं से जोड़ों में सूजन और भयानक दर्द की शुरुआत होती है।

बढ़ता वज़न और जोड़ों का दर्द: अंदर ही अंदर क्या चल रहा है?

कई लोग सोचते हैं कि वज़न बढ़ने से सिर्फ दबाव बढ़ता है, लेकिन असल में यह शरीर के अंदर सूजन को भी बढ़ा देता है, जो धीरे-धीरे जोड़ों को नुकसान पहुँचाती है।

  • छुपी हुई सूजन: शरीर में जमा फैट inflammatory chemicals छोड़ता है, जो अंदर ही अंदर सूजन बढ़ाते हैं
  • दर्द का असली कारण: यही सूजन joints में दर्द, जलन और stiffness की वजह बनती है
  • हर कदम पर ज्यादा दबाव: बढ़ा हुआ वज़न घुटनों और कूल्हों पर कई गुना दबाव डालता है
  • मूवमेंट कम होना: वज़न बढ़ने से चलना-फिरना कम हो जाता है, जिससे joints और जकड़ जाते हैं
  • पोषण की कमी: खराब blood circulation के कारण जोड़ों तक जरूरी पोषण नहीं पहुँच पाता
  • धीमी रिकवरी: सूजन की वजह से tissues की healing भी धीमी हो जाती है

यानी बढ़ता वज़न सिर्फ बाहर से नहीं, अंदर से भी जोड़ों को कमजोर करता है, और यही दर्द की असली जड़ बनता है।

क्या सिर्फ वज़न कम कर लेने से जोड़ों का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाता है?

जोड़ों के दर्द से छुटकारा पाने के लिए वज़न कम करना सबसे बड़ा और जरूरी कदम है। यह बात सही है कि वज़न कम होते ही घुटनों पर पड़ने वाला बोझ (Mechanical Pressure) एकदम कम हो जाता है, जिससे दर्द में तुरंत बहुत आराम मिलता है। लेकिन शरीर के अंदर जो सालों से सूजन और गड़बड़ी चल रही है, उसका क्या?

सिर्फ पतले हो जाने से जोड़ों की घिस चुकी गद्दी (कार्टिलेज) या शरीर में जमा  Toxins रातों-रात गायब नहीं हो जाते। इस दर्द को जड़ से खत्म करने के लिए जोड़ों को अंदर से असली पोषण देना, मांसपेशियों को मजबूत बनाना और शरीर के बिगड़े हुए बैलेंस को ठीक करना भी उतना ही जरूरी है।

बढ़ता वज़न और हमारे जोड़ों पर इसका सीधा असर

मोटापा सिर्फ कपड़ों के साइज या हमारी पर्सनैलिटी तक सीमित नहीं रहता, यह सीधे तौर पर हमारी हड्डियों और जोड़ों की सेहत पर हमला करता है:

  • जोड़ों पर दबाव: शरीर का बढ़ा हुआ हर एक किलो आपके घुटनों, टखनों और कूल्हों पर कई गुना ज्यादा बोझ बढ़ा देता है।
  • जल्दी घिसना (Wear & Tear): लगातार पड़ने वाले इसी भारी बोझ की वजह से जोड़ों के बीच की गद्दी (Cartilage) समय से पहले ही बहुत तेजी से घिसने लगती है।
  • सूजन का बढ़ना: हमारे शरीर में जमा चर्बी (Fat) कुछ ऐसे केमिकल छोड़ती है जो जोड़ों के अंदर सूजन बढ़ा देते हैं। इसी वजह से जोड़ों में दर्द और जकड़न महसूस होती है।
  • चलने-फिरने में दिक्कत: शरीर भारी होने की वजह से इंसान ज्यादा चल-फिर नहीं पाता और एक्टिविटी कम होने से धीरे-धीरे जोड़ एकदम जकड़ जाते हैं।
  • कमजोर मांसपेशियां: वज़न ज्यादा होने से हमारी भागदौड़ कम हो जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि हमारी मांसपेशियां (Muscles) ढीली और कमजोर पड़ जाती हैं, और फिर वो जोड़ों को सही से सपोर्ट नहीं दे पातीं।
  • ठीक होने में देरी (Slow Recovery): घुटनों पर लगातार पड़ने वाले दबाव और पुरानी सूजन की वजह से, शरीर के खुद को ठीक करने की स्पीड (Healing प्रोसेस) बहुत धीमी पड़ जाती है।

साफ शब्दों में कहें तो, यह बढ़ता हुआ वज़न चुपचाप आपके जोड़ों को अंदर से खोखला कर रहा है और दर्द को बढ़ाने की सबसे बड़ी जड़ बन जाता है।

आयुर्वेद में वज़न बढ़ने को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद मोटापे और जोड़ों के दर्द को दो अलग-अलग बीमारियाँ नहीं मानता। सच तो ये है कि इन दोनों की जड़ एक ही है हमारा खराब पाचन। जब पेट की पाचन शक्ति यानी 'आग' सुस्त पड़ जाती है, तो हम जो भी खाते हैं, वह शरीर को ताकत देने के बजाय एक चिपचिपे ज़हर (जिसे 'आम' कहते हैं) और चर्बी में बदलने लगता है।

यही गंदगी जब शरीर की छोटी-छोटी नसों में जम जाती है, तो उनके रास्ते ब्लॉक हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि जोड़ों तक सही पोषण नहीं पहुंच पाता और वहां भारीपन और जकड़न महसूस होने लगती है।

  • मंदाग्नि (सुस्त पाचन): अगर पाचन कमजोर है, तो समझ लीजिए यही वज़न बढ़ने और बाकी तमाम बीमारियों की सबसे असली जड़ है।
  • कफ और चर्बी का बढ़ना: जब शरीर में चर्बी बढ़ती है और भारीपन आता है, तो इसका सबसे ज्यादा और सीधा दबाव हमारे घुटनों और जोड़ों पर पड़ता है।
  • 'आम' (Toxins) का इकट्ठा होना: जो खाना ठीक से नहीं पचता, वह अंदर ही अंदर सड़ने लगता है। यही गंदगी जोड़ों के बीच फंस जाती है और वहां सूजन और दर्द शुरू हो जाती है।
  • नसों का ब्लॉक होना: शरीर में जब यह टॉक्सिन्स जमता है, तो नसें ब्लॉक होने लगती हैं। इससे घुटनों और जोड़ों को जो कुदरती चिकनाई (ग्रीस) मिलनी चाहिए, वह रुक जाती है।
  • जकड़न (Stiffness): अंदर की यही सारी गड़बड़ियां मिलकर जोड़ों को इस कदर जकड़ लेती हैं कि दर्द फिर जल्दी जाने का नाम ही नहीं लेता।

आयुर्वेद का तरीका: वज़न को सही रखने का पूरा और पक्का इलाज

आयुर्वेद में वज़न कम करने का मतलब ये कतई नहीं है कि आपको भूखा रखा जाएगा या सिर्फ खाना कम कर दिया जाएगा। हमारा पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि आपका पाचन फिर से पहले की तरह एक्टिव हो जाए। वज़न को सही जगह पर वापस लाने के लिए यहाँ कुछ इस तरह से काम किया जाता है:

  • पेट की आग को भड़काना (Metabolic Boost): इलाज की शुरुआत में सबसे पहले कुछ देसी औषधियाँ दी जाती हैं, ताकि आपके सुस्त पाचन की आग फिर से तेज़ हो सके। सीधी सी बात है, जब पाचन तेज़ होगा, तो खाया हुआ हर निवाला अच्छे से पचेगा और शरीर में नया कचरा बनना अपने आप बंद हो जाएगा।
  • फैट को निकालना (Fat Scraping): आयुर्वेद के खजाने में कुछ ऐसी कमाल की औषधियाँ मौजूद हैं जो एक 'स्क्रबर' की तरह काम करती हैं। ये शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जमे पुराने और जिद्दी फैट को धीरे-धीरे खुरचकर बाहर निकाल देती हैं।
  • फैट का सही बैलेंस बनाना (मेद धातु संतुलन): आयुर्वेद की नजर में मोटापा असल में शरीर में फालतू चर्बी के बेतहाशा बढ़ने का नाम है। यहाँ इलाज इस तरह किया जाता है कि ये चर्बी बननी ही बंद हो जाए और शरीर के बाकी हिस्सों को उनकी जरूरत के हिसाब से सही खुराक मिलती रहे।
  • खास आपके लिए डाइट प्लान: एक बात तो पक्की है कि हर इंसान का शरीर एक जैसा नहीं होता। किसी की प्रकृति वात होती है, तो किसी की पित्त या कफ। इसी को ध्यान में रखते हुए, हम आपकी बॉडी के हिसाब से सिर्फ आपके लिए एक खास डाइट प्लान बनाते हैं। इससे वज़न भी कम होता है और शरीर में दिनभर अच्छी एनर्जी भी बनी रहती है।
  • दिमागी शांति और योग का साथ: क्या आप जानते हैं कि बहुत ज्यादा टेंशन लेने से भी वज़न बढ़ता है? इसलिए आयुर्वेद में प्राणायाम और कुछ चुनिंदा योगासनों के जरिए दिमाग को शांत रखने पर भी पूरा जोर दिया जाता है। इसका फायदा ये होता है कि स्ट्रेस में आकर बेवजह कुछ भी खाने-पीने की आदत (इमोशनल ईटिंग) छूट जाती है।

वज़न कम करने वाली कुछ खास आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद में वज़न घटाने के लिए कुछ ऐसी कमाल की जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता है, जो सीधा आपके पाचन (मेटाबॉलिज्म) को तेज़ करती हैं और शरीर में जमी हुई चर्बी को काटने का काम करती हैं:

  • वृक्षाम्ल (Garcinia): यह जड़ी-बूटी शरीर के अंदर नई चर्बी (Fat) बनने ही नहीं देती। साथ ही, यह हमारी बे-वक्त लगने वाली भूख को भी एकदम नेचुरल तरीके से कंट्रोल में रखती है।
  • गुग्गुल (Guggulu): यह हमारे शरीर में जमा जिद्दी फैट को पिघलाने की स्पीड बढ़ा देता है। इसके अलावा, यह नसों और जोड़ों के बीच फंसी हुई सारी गंदगी और रुकावटों को भी साफ कर देता है।
  • त्रिकटु (Trikatu): सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली को मिलाकर बनाया गया यह नुस्खा पेट की आग को इतना तेज़ कर देता है कि आप जो भी खाते हैं, वह चर्बी बनने के बजाय आपको फुल एनर्जी देने लगता है।
  • त्रिफला (Triphala): यह हमारी आंतों की बहुत अच्छे से डीप-क्लीनिंग (सफाई) करता है। जब शरीर से सारा आम बाहर निकल जाता है, तो वज़न घटने की स्पीड अपने आप तेज़ हो जाती है।

वज़न घटाने वाली बेहद असरदार आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेद में वज़न कम करने के लिए सिर्फ दवाइयां नहीं, बल्कि कुछ ऐसी खास थेरेपी भी दी जाती हैं जो सीधे शरीर के खास पॉइंट्स पर काम करके चर्बी को पिघला देती हैं:

  • उद्वर्तन (Udvartana): मोटापा कम करने के लिए आयुर्वेद में इसका नाम सबसे ऊपर आता है। इसमें जड़ी-बूटियों वाले खास पाउडर से पूरे शरीर की सूखी मालिश की जाती है। यह मालिश स्किन के ठीक नीचे जमे हुए जिद्दी फैट को खुरच-खुरच कर (Scraping) कम कर देती है।
  • लेखन बस्ती (Lekhana Basti): यह जड़ी-बूटियों से तैयार किया गया एक बहुत ही खास एनीमा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर के उन गहरे हिस्सों से भी चर्बी खींच निकालता है, जहां जिम या एक्सरसाइज का भी कोई खास असर नहीं हो पाता।
  • स्वेदन (Swedana): इस थेरेपी में जड़ी-बूटियों वाली भाप (Steam) दी जाती है, जिससे शरीर के सारे रोमछिद्र (Pores) खुल जाते हैं। पसीने के रास्ते शरीर की सारी अंदरूनी गंदगी बाहर बह जाती है, और आपका शरीर रुई जैसा एकदम हल्का महसूस करने लगता है।

डाइट और लाइफस्टाइल टिप्स

क्या खाएं:

  • गरम पानी: दिनभर गुनगुना पानी पिएं; यह प्राकृतिक 'फैट बर्नर' का काम करता है। ☕
  • पुराना अनाज: जौ (Barley), बाजरा और पुराने चावल का सेवन करें, जो पचाने में हल्के और ऊर्जा में भरपूर होते हैं।
  • सब्जियां: लौकी, तोरई, करेला और सहजन (Drumstick) जैसी कड़वी व कसैली सब्जियां मेद (Fat) को कम करती हैं।
  • शहद: सुबह खाली पेट हल्के गरम पानी में शहद डालकर पीना चर्बी घटाने में मददगार है।

क्या न खाएं:

  • मीठा और भारी भोजन: मिठाई, कोल्ड ड्रिंक्स और अधिक कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें कफ और मेद बढ़ाती हैं। 
  • दिन में सोना: दोपहर की नींद मेटाबॉलिज्म को सुस्त कर देती है, जिससे वज़न तेजी से बढ़ता है।
  • मैदा और तला हुआ: ये चीजें शरीर में 'आम' (Toxins) बढ़ाती हैं और नसों को ब्लॉक करती हैं।
  • ठंडा पानी: फ्रिज का पानी पाचन अग्नि को बुझा देता है, जिससे वज़न घटाना मुश्किल हो जाता है। 

पेशेंट टेस्टिमोनियल 

मेरा नाम उर्मिला राय है, मेरी उम्र 55 वर्ष है और मैं नोएडा सेक्टर 50 से हूँ। मुझे पैरों और हाथों में दर्द, घुटनों की समस्या और गैस्ट्रिक परेशानी थी। मुझे किसी ने जीवा आयुर्वेद के बारे में बताया, जिसके बाद मैंने यहाँ उपचार शुरू किया। यहाँ का ट्रीटमेंट, डाइट और लाइफस्टाइल गाइडेंस बहुत अच्छा है। थेरेपी और योग से भी मुझे काफी लाभ मिला। जीवाग्राम रहने के लिए भी बहुत अच्छी जगह है और यहाँ का वातावरण बहुत सकारात्मक है। अब मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करती हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

यदि आपको घुटनों या कूल्हों में ऐसा दर्द हो रहा है जो आराम करने पर भी ठीक नहीं होता, या जोड़ों में स्पष्ट सूजन और लाली दिखाई दे रही है, तो इसे नजरअंदाज न करें। इसके अलावा, यदि सुबह उठने पर जोड़ों में 30 मिनट से ज्यादा जकड़न रहती है, वज़न बढ़ने के साथ-साथ चलने में 'कटकट' की आवाज आती है, या सीढ़ियां चढ़ने में अत्यधिक कठिनाई होती है, तो तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें। समय पर सही आयुर्वेदिक हस्तक्षेप जोड़ों को स्थायी क्षति और सर्जरी (जैसे Knee Replacement) से बचा सकता है।

निष्कर्ष

बढ़ता वज़न और जोड़ों का दर्द केवल कैलोरी का गणित नहीं है, बल्कि यह शरीर की पाचन अग्नि और अस्थि धातु के बीच के असंतुलन का परिणाम है। जहाँ आधुनिक चिकित्सा वज़न घटाने और दर्द को कम करने पर तुरंत ध्यान देती है, वहीं आयुर्वेद आपकी अग्नि (Metabolism) को पुनर्जीवित करने, शरीर से 'आम' को हटाने और जोड़ों को अंदर से पोषण देने पर काम करता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली के तालमेल से आप न केवल वज़न कम कर सकते हैं, बल्कि अपने जोड़ों को ताउम्र मजबूत और सक्रिय बनाए रख सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, शोध बताते हैं कि यदि आप अपने वर्तमान वजन का केवल 5% हिस्सा भी कम करते हैं, तो जोड़ों के दर्द और कार्यक्षमता में महत्वपूर्ण सुधार दिखाई देने लगता है। यह छोटा सा बदलाव घुटनों पर पड़ने वाले 'मैकेनिकल लोड' को बहुत हद तक कम कर देता है।

आश्चर्यजनक रूप से हाँ। उंगलियां वजन नहीं उठातीं, फिर भी मोटे लोगों में उंगलियों के जोड़ों का दर्द (Osteoarthritis) होने की संभावना अधिक होती है। इसका कारण वजन का दबाव नहीं, बल्कि शरीर में फैला हुआ 'इंफ्लेमेशन' (सूजन पैदा करने वाले केमिकल्स) है जो छोटे जोड़ों को भी प्रभावित करता है।

नहीं, बहुत सख्त या असंतुलित डाइट शरीर में 'वात' को बढ़ा सकती है, जिससे जोड़ों में रूखापन बढ़ सकता है। वजन घटाने के लिए 'क्रैश डाइट' के बजाय ऐसी डाइट लेनी चाहिए जो पोषण दे और मेटाबॉलिज्म को धीरे-धीरे सुधारे।

अगर जोड़ों में दर्द ज्यादा है, तो तैराकी (Swimming) या साइकिल चलाना सबसे अच्छा है। ये 'लो-इम्पैक्ट' एक्सरसाइज हैं, जिनमें जोड़ों पर शरीर का भार नहीं पड़ता लेकिन मांसपेशियां मजबूत होती हैं और कैलोरी बर्न होती है।

हाँ, गलत जूते घुटनों पर दबाव को और बढ़ा सकते हैं। वजन ज्यादा होने पर ऐसे जूतों का चुनाव करें जो झटकों को सोख सकें (Cushioned shoes)। इससे वजन का 'गुणक प्रभाव' (Multiplier effect) जोड़ों पर कम पड़ता है।

बिलकुल। नींद की कमी मेटाबॉलिज्म को सुस्त करती है और शरीर में 'कोर्टिसोल' (स्ट्रेस हार्मोन) बढ़ाती है, जिससे वजन बढ़ता है और दर्द सहने की क्षमता कम हो जाती है।

 पानी न केवल मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, बल्कि जोड़ों के बीच मौजूद 'साइनोवियल फ्लूइड' (चिकनाई) को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है। निर्जलीकरण (Dehydration) से जोड़ों में घर्षण बढ़ जाता है।

हाँ, एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर गिरने से जोड़ों की सुरक्षा कम हो जाती है और मेटाबॉलिज्म धीमा होने से वजन तेजी से बढ़ता है। ऐसी स्थिति में मांसपेशियों की मजबूती पर ध्यान देना बहुत जरूरी हो जाता है।

सप्लीमेंट्स केवल अस्थायी राहत दे सकते हैं। जब तक मुख्य 'मैकेनिकल लोड' (अतिरिक्त वजन) कम नहीं होता, तब तक कोई भी दवा या सप्लीमेंट जोड़ों को घिसने से स्थायी रूप से नहीं बचा सकता।

सही तेल और तकनीक से की गई मालिश रक्त संचार बढ़ाती है, जिससे जमे हुए टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकालने में मदद मिलती है। यह सीधे तौर पर वजन तो नहीं घटाती, लेकिन मेटाबॉलिज्म को सक्रिय करने और जोड़ों के लचीलेपन को बढ़ाने में सहायक है।

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