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बच्चा 7 साल का, अब भी रात को बिस्तर गीला - आयुर्वेदिक उपाय

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 08 Jun, 2026
  • category-iconUpdated on 08 Jun, 2026
  • category-iconChild Health
  • blog-view-icon5008

एक छोटा बच्चा जब पहली बार बिना बताए बिस्तर पर पेशाब करता है, तो माता-पिता इसे उसकी नादानी समझकर मुस्कुरा देते हैं। लेकिन जब वही बच्चा 5 साल, 6 साल और अब 7 साल का हो चुका हो, और फिर भी लगभग हर रात या हफ्ते में तीन-चार बार बिस्तर गीला (Bedwetting) कर देता है, तो यह माता-पिता के लिए चिंता का बहुत बड़ा विषय बन जाता है।

अक्सर माता-पिता को लगता है कि बच्चा जानबूझकर ऐसा कर रहा है या वह आलसी है। इस चक्कर में कई बार बच्चे को डांट पड़ती है, उसे शर्मिंदा होना पड़ता है और कभी-कभी तो उसकी पिटाई भी हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आयुर्वेद के अनुसार, 7 साल की उम्र में बिस्तर गीला करना कोई आदत या बदमाशी नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदरूनी दोषों के असंतुलन की वजह से होता है|

क्या 7 साल की उम्र के बाद बिस्तर गीला करना सामान्य है?

अगर आपका बच्चा 7 साल का हो गया है और अब भी रात में बिस्तर गीला कर देता है, तो परेशान होने या उसे दोष देने की ज़रूरत नहीं है। कई बच्चों में यह समस्या 5–7 साल की उम्र के बाद भी देखी जा सकती है। ज़्यादातर  मामलों में बच्चा जानबूझकर ऐसा नहीं करता और उसका इस पर पूरा नियंत्रण नहीं होता।

कभी-कभार ऐसा होना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे, तो इसके पीछे के कारण को समझना ज़रूरी है। सही समय पर कदम उठाने से स्थिति में सुधार आ सकता है। 

बच्चा रात में बिस्तर गीला क्यों करता है?

अगर आपका बच्चा रात में बिस्तर गीला करता है, तो उसे डांटने या दोष देने की ज़रूरत नहीं है। वह यह काम जानबूझकर नहीं करता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं और हर बच्चे की स्थिति अलग हो सकती है। 

कुछ आम कारण इस प्रकार हैं:

  • गहरी नींद आना: बच्चा पेशाब की ज़रूरत महसूस होने पर भी जाग नहीं पाता।
  • मूत्राशय का पूरी तरह विकसित न होना: कुछ बच्चों में मूत्राशय को नियंत्रित करने की क्षमता देर से विकसित होती है।
  • परिवार में पहले किसी को यह समस्या होना: कई बार यह समस्या परिवार में पहले भी देखी गई होती है।
  • तनाव या भावनात्मक बदलाव: स्कूल, घर या दिनचर्या में बदलाव का असर बच्चे पर पड़ सकता है।
  •  कब्ज़ की समस्या:  कब्ज़ होने पर मूत्राशय पर दबाव पड़ सकता है।
  • कुछ स्वास्थ्य समस्याएं: कुछ मामलों में इसके पीछे कोई स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकता है।

कारण चाहे जो भी हो, बच्चे को डांटने के बजाय उसकी समस्या को समझना ज्यादा ज़रूरी होता है।

किन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए?

कभी-कभी यह समस्या बिना किसी इलाज के भी ठीक हो जाती है। फिर भी, अगर यह बार-बार हो रही है या कुछ और परेशानियां भी साथ में दिख रही हैं, तो डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर हो सकता है। ऐसे कुछ संकेत नीचे दिए गए हैं। 

  • हफ्ते में कई बार बिस्तर गीला होना: समस्या लगातार बनी हुई हो।
  • दिन में भी पेशाब निकल जाना: बच्चे को पेशाब रोकने में परेशानी हो।
  • पेशाब करते समय दर्द या जलन होना: यह किसी दूसरी समस्या का संकेत हो सकता है।
  • बार-बार पेशाब आना: सामान्य से ज्यादा बार पेशाब की ज़रूरत महसूस होना।
  • बार-बार मूत्र संक्रमण होना: संक्रमण की समस्या बार-बार हो रही हो।
  • बच्चे का परेशान या शर्मिंदा महसूस करना: इसका असर उसके आत्मविश्वास पर पड़ने लगे।

क्या बच्चे की गलती है?

अगर आपका बच्चा रात में बिस्तर गीला करता है, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि वह ऐसा जानबूझकर नहीं कर रहा है। कई बार बच्चों को नींद में पता ही नहीं चलता कि उनसे पेशाब हो गया।

ऐसी स्थिति में बच्चे को डांटना, सजा देना या शर्मिंदा करना ठीक नहीं है। इससे वह परेशान, शर्मिंदा या तनावग्रस्त महसूस कर सकता है, और समस्या कम होने के बजाय बढ़ भी सकती है। बच्चे को समझने की कोशिश करें और उसका साथ दें। प्यार, धैर्य और सहयोग से उसका आत्मविश्वास बना रहता है, जिससे वह इस स्थिति को बेहतर तरीके से संभाल पाता है।

माता-पिता को कैसे व्यवहार करना चाहिए?

अगर आपका बच्चा रात में बिस्तर गीला करता है, तो आपका व्यवहार उसकी भावनाओं और आत्मविश्वास पर बड़ा असर डाल सकता है। ऐसे समय में बच्चे को डांटने या शर्मिंदा करने के बजाय उसे समझने और सहयोग देने की ज़रूरत होती है।

इन बातों का ध्यान रखें:

  • बच्चे को डांटें नहीं: इससे वह डर या शर्म महसूस कर सकता है।
  • उसे दोष न दें: याद रखें कि वह जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा है।
  • धैर्य रखें: कई बच्चों में यह समस्या समय के साथ ठीक हो जाती है।
  • बच्चे का हौसला बढ़ाएं: उसे भरोसा दिलाएं कि यह समस्या ठीक हो सकती है।
  • छोटी-छोटी प्रगति की तारीफ करें: इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • खुलकर बात करें: बच्चे को अपनी बात कहने का मौका दें।

आपका सहयोग और सकारात्मक व्यवहार बच्चे को इस स्थिति से बेहतर तरीके से बाहर आने में मदद कर सकता है।

घर पर क्या-क्या सावधानियां रखी जा सकती हैं?

अगर आपका बच्चा रात में बिस्तर गीला करता है, तो कुछ आसान बातों का ध्यान रखकर आप उसकी मदद कर सकते हैं। ये छोटी-छोटी आदतें समस्या को संभालने में सहायक हो सकती हैं।

  • सोने से पहले बच्चे को पेशाब करवाएं: इससे रात में पेशाब की संभावना कम हो सकती है।
  • रात में बहुत ज्यादा तरल पदार्थ न दें: खासकर सोने से ठीक पहले।
  • नियमित दिनचर्या बनाएं: सोने और उठने का समय तय रखने की कोशिश करें।
  •  कब्ज़ की समस्या पर ध्यान दें:  कब्ज़ होने पर यह समस्या बढ़ सकती है।
  • बच्चे को डांटें नहीं: उसे समझें और उसका हौसला बढ़ाएं।
  • छोटी-छोटी सफलताओं की तारीफ करें: इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है।

धैर्य रखना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि कई बच्चों में यह समस्या समय के साथ धीरे-धीरे ठीक हो जाती है।

आयुर्वेद की नजर में यह समस्या क्यों होती है? 

बहुत से लोग सोचते हैं कि बच्चा बड़ा हो गया है फिर भी रात को बिस्तर गीला कर रहा है, तो यह उसकी कोई गंदी आदत है या वह जानबूझकर आलस कर रहा है। लेकिन आयुर्वेद इस बात को बिल्कुल अलग नजरिए से देखता है। आयुर्वेद कहता है कि रात में बिस्तर गीला करना (Bedwetting) सिर्फ एक आदत नहीं है, बल्कि यह बच्चे के शरीर के अंदरूनी असंतुलन, सुस्त डाइजेशन या यूरिन कंट्रोल करने वाली नसों की कमजोरी का एक साफ इशारा हो सकता है। इसलिए ऊपर-ऊपर से बच्चे को डांटने या केवल लक्षण को दबाने के बजाय, इसके पीछे की असली वजह को समझना बहुत ज़रूरी है।

यहाँ एक बात गाँठ बांध लीजिए आयुर्वेद मानता है कि दुनिया के सारे बच्चे एक जैसे नहीं होते, हर बच्चे के शरीर की प्रकृति और उसकी ज़रूरतें बिल्कुल अलग होती हैं। यही वजह है कि जब इसका इलाज किया जाता है, तो सिर्फ कोई एक दवा देकर पल्ला नहीं झाड़ लिया जाता। बल्कि बच्चे की रोज़ की डाइट क्या है, वह किस रूटीन को फॉलो करता है, उसकी नींद कैसी है और उसकी ओवरऑल हेल्थ कैसी चल रही है, इन सब बातों को बारीकी से परखा जाता है।

बच्चे को क्या खिलाएं और क्या न खिलाएं?

क्या दबाकर खिलाएं?

  • ताजे और रसीले फल: मौसमी फल बच्चों को वो सारे ज़रूरी विटामिंस और पोषण देते हैं, जो उनकी नसों और मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए चाहिए।
  • हरी-भरी सब्जियां: इन्हें बच्चे की डाइट का पक्का हिस्सा बना लीजिए। यह एक संतुलित शरीर की बुनियाद हैं।
  • फाइबर से भरपूर खाना: कब्ज बेडवेटिंग का एक बहुत बड़ा और छुपा हुआ कारण है। जब पेट साफ नहीं होता, तो मलाशय यूरिनरी ब्लैडर पर दबाव डालता है। इसलिए दलिया, ओट्स और फाइबर वाली चीजें खिलाएं ताकि उसका डाइजेशन एकदम फिट रहे।
  • सूरज ढलने से पहले भरपूर पानी: ऐसा नहीं है कि बच्चे का पानी बंद कर देना है। दिन के समय उसे खूब पानी पिलाएं ताकि उसके शरीर की ज़रूरतें पूरी हों और ब्लैडर की क्षमता भी बढ़े।

किन चीजों पर सख्त ब्रेक लगाएं?

  • सोने से ठीक पहले पानी या दूध का लोटा: यह तो सीधा सा हिसाब है भाई! सोने से एक-डेढ़ घंटे पहले बच्चे को बहुत ज्यादा पानी, जूस या दूध देने से बचें। जो पिलाना है, शाम को ही पिलाकर फुर्सत कर लें।
  • मीठी चीजों की अति: चॉकलेट, पेस्ट्री या एक्स्ट्रा शक्कर वाली चीजें बच्चों के ब्लैडर को इरिटेट कर सकती हैं, जिससे रात में कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है। इन्हें जितना कम करें, उतना अच्छा।
  • पैकेट बंद कचरा: चिप्स, कुरकुरे और प्रोसेस्ड फूड में सोडियम और प्रिजर्वेटिव्स बहुत ज्यादा होते हैं। ये चीजें शरीर का नेचुरल वाटर बैलेंस बिगाड़ देती हैं।
  • कैफीन से बिल्कुल तौबा: सॉफ्ट ड्रिंक्स, कोला या चाय-कॉफी जैसी चीजें बच्चों को भूलकर भी न दें। कैफीन एक 'डाइयुरेटिक' है, यानी यह शरीर में यूरिन बनने की रफ़्तार को बहुत तेज कर देता है।

कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि एक साफ-सुथरा, संतुलित खान-पान और सही समय पर सोने-जागने का रूटीन बच्चे की सेहत को ट्रैक पर ले आएगा और धीरे-धीरे यह समस्या अपने आप दम तोड़ देगी।

इस समस्या में काम आने वाली आयुर्वेदिक औषधियां और थेरेपीज़

आयुर्वेद में 'एक ही लाठी से सबको हांकने' वाला काम नहीं होता। यहाँ बच्चे की उम्र कितनी है, उसके शरीर का मिजाज़ (प्रकृति) कैसा है और बिस्तर गीला करने की असली वजह क्या है इन सब बातों को परखने के बाद ही वैद्य जी कोई दवा तय करते हैं। इसलिए खुद से डॉक्टर बनने की भूल मत कीजिएगा, हमेशा किसी अच्छे आयुर्वेदिक एक्सपर्ट से मिलकर ही आगे बढ़ें।

ये आयुर्वेदिक औषधियां ला सकती हैं बदलाव:

  • ब्राह्मी: जब बच्चा गहरी नींद में होता है, तो कई बार उसका दिमाग ब्लैडर का सिग्नल नहीं पकड़ पाता। ब्राह्मी बच्चे के नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र को मजबूत करती है और दिमागी अलर्टनेस बढ़ाती है।
  • अश्वगंधा: यह बच्चे की मांसपेशियों और नसों को अंदरूनी ताकत देती है। इससे बच्चे का अपने यूरिनरी ट्रैक पर कंट्रोल बेहतर होने लगता है।
  • शंखपुष्पी: सदियों से बच्चों के ओवरऑल डेवलपमेंट के लिए इसे बेस्ट माना गया है। यह न सिर्फ दिमाग को शांत रखती है, बल्कि बच्चे के पूरे हेल्थ सिस्टम को एक नया बैलेंस देती है।
  • यष्टिमधु (मुलेठी): इसका इस्तेमाल अलग-अलग आयुर्वेदिक नुस्खों में किया जाता है, जो बच्चे के पेट और अंदरूनी चक्र को दुरुस्त रखने में मदद करता है।

ये थेरेपीज़ कर सकती हैं कमाल:

  • अभ्यंग : खास आयुर्वेदिक तेलों से जब बच्चे के शरीर की, खासकर उसके पेट के निचले हिस्से और पीठ की हल्की मालिश की जाती है, तो वहां की नसें रिलैक्स होती हैं और उन्हें मजबूती मिलती है।
  • शिरोधारा: अगर बच्चा किसी बात को लेकर डरा हुआ है, स्कूल का स्ट्रेस है या वह बहुत ज्यादा सेंसिटिव है, तो डॉक्टर की सलाह पर शिरोधारा की जाती है। माथे पर गिरती तेल की धार उसके मन को शांत करती है।
  • पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट: हर बच्चा यूनिक है। इसलिए डॉक्टर बच्चे की कंडीशन देखकर कुछ और थेरेपीज़ भी तय कर सकते हैं जो सीधे उसकी जरूरत पर काम करें।

कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?

यह सच है कि ज़्यादातर बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह समस्या अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ इशारे ऐसे होते हैं जिन्हें 'चलो कोई नहीं, अपने आप ठीक हो जाएगा' कहकर टाला नहीं जा सकता। अगर नीचे लिखी बातें दिखें, तो तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से मिलें ताकि बीमारी की असली जड़ पकड़ी जा सके:

  • बच्चा 7 साल पार कर चुका हो और फिर भी लगातार बिस्तर गीला कर रहा हो।
  • हफ्ते में एक-आध बार नहीं, बल्कि लगभग हर दूसरी-तीसरी रात यही कहानी दोहराई जा रही हो।
  • रात तो रात, बच्चा दिन में भी कपड़ों में पेशाब कर देता हो।
  • यूरिन पास करते समय बच्चा दर्द या जलन की शिकायत करे या रोने लगे।
  • उसे बार-बार यूरिन इन्फेक्शन (UTI) घेर लेता हो।
  • बच्चा इस बात को लेकर खुद बहुत ज़्यादा तनाव में रहने लगा हो या शर्मिंदगी महसूस करता हो।

निष्कर्ष

अगर आपका लाडला या लाडली 7 साल की उम्र पार करने के बाद भी रात को बिस्तर गीला कर रहे हैं, तो सबसे पहले तो आप खुद पैनिक होना बंद कीजिए। यह कोई ऐसी अनोखी बीमारी नहीं है जो सिर्फ आपके बच्चे को है; दुनिया भर के लाखों बच्चे इस दौर से गुज़रते हैं। यकीन मानिए, वह यह सब जानबूझकर या आलस में नहीं कर रहा है। ऐसे में उसे डांटने या सबके सामने शर्मिंदा करने से उसका कॉन्फिडेंस ज़ीरो हो जाएगा, जिससे समस्या सुधरने के बजाय और बिगड़ सकती है।

इसके पीछे बहुत सारे साइंटिफिक और मेडिकल कारण हो सकते हैं जैसे बच्चे का बहुत गहरी नींद में सो जाना, पुराना कब्ज, स्कूल या दोस्तों का कोई छुपा हुआ तनाव, या फिर कभी-कभी यह चीज़ें परिवार में जेनेटिक भी होती हैं।

बस ज़रूरत है तो इस बात की कि आप बच्चे के साथ एक दोस्त की तरह खड़े रहें, उसकी डाइट और सोने के रूटीन में छोटे-छोटे बदलाव करें, और अगर बात हाथ से बाहर लगे तो बिना झिझक डॉक्टर की सलाह लें। थोड़े से धैर्य, सही इलाज और आपके प्यार के साथ लगभग हर बच्चा इस समस्या से हंसते-खेलते बाहर निकल आता है।

FAQs

कुछ बच्चों में 7 साल की उम्र के बाद भी यह समस्या देखी जा सकती है। हालांकि, अगर यह लगातार बनी रहे तो इसके कारण को समझना ज़रूरी हो सकता है।

इसके पीछे गहरी नींद, मूत्राशय का देर से विकसित होना, तनाव,  कब्ज़ या अन्य कारण हो सकते हैं।

नहीं, ज़्यादातर  मामलों में बच्चा ऐसा जानबूझकर नहीं करता और उसका इस पर पूरा नियंत्रण नहीं होता।

नहीं, डांटने या शर्मिंदा करने से समस्या और बढ़ सकती है। बच्चे को सहयोग और समझ की ज़रूरत होती है।

हाँ, कुछ मामलों में  कब्ज़ मूत्राशय पर दबाव डाल सकता है, जिससे यह समस्या बढ़ सकती है।

हाँ, कई बार यह समस्या परिवार में पहले भी देखी गई होती है।

सोने से ठीक पहले बहुत ज्यादा तरल पदार्थ लेने से रात में पेशाब की संभावना बढ़ सकती है।

आयुर्वेद इसे केवल एक आदत नहीं मानता, बल्कि शरीर के असंतुलन, पाचन और दिनचर्या से भी जोड़कर देखता है।

अगर 7 साल की उम्र के बाद भी समस्या लगातार बनी रहे, दिन में भी पेशाब निकल जाए या दर्द और जलन जैसी परेशानी हो, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

आयुर्वेद में बच्चे की स्थिति और कारण को समझकर उपचार की सलाह दी जाती है। इसके लिए हमेशा योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

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