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पुराना जोड़ों का दर्द क्यों बना रहता है? कारण और आयुर्वेदिक उपाय

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 08 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 18 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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आजकल जोड़ों का दर्द एक बड़ी समस्या बन गया है जो न केवल बुज़ुर्गों को बल्कि युवाओं को भी परेशान कर रहा है कई लोग सालों से घुटनों कंधों या कूल्हों के दर्द से जूझ रहे हैं। शुरुआत में इसे थकान समझकर नजरअंदाज किया जाता है लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द रोजमर्रा के कामों में रुकावट बनने लगता है। लोग अक्सर पेनकिलर का सहारा लेते हैं जो कुछ समय के लिए तो आराम देती हैं लेकिन दवा बंद करते ही दर्द फिर से लौट आता है।

आयुर्वेद के अनुसार पुराना जोड़ों का दर्द केवल एक बाहरी चोट नहीं है बल्कि शरीर के अंदरूनी असंतुलन का संकेत है। जब तक हम इस असंतुलन को नहीं सुधारते तब तक स्थायी आराम मिलना मुश्किल है। इस लेख में हम समझेंगे कि लंबे समय से रहने वाले जोड़ों के दर्द के पीछे असली कारण क्या हैं और आयुर्वेद इसे कैसे संभालता है।

पुराना जोड़ों का दर्द क्या होता है?

आसान शब्दों में कहें तो जब हमारे शरीर के जोड़ों में होने वाला दर्द 3 महीने से ज्यादा समय तक बना रहता है तो उसे पुराना या क्रोनिक जोड़ों का दर्द कहा जाता है।

हमारे जोड़ों के बीच में एक नर्म गद्दी और एक प्राकृतिक तेल होता है जो हड्डियों को आपस में टकराने से रोकता है। समय के साथ या शरीर में गंदगी जमा होने की वजह से जब यह गद्दी घिस जाती है या तेल सूख जाता है तो हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं। इसी रगड़ की वजह से जोड़ों में भयंकर दर्द सूजन और जकड़न पैदा होती है। यह केवल बुढ़ापे की निशानी नहीं है बल्कि शरीर के अंदरूनी असंतुलन का एक साफ संकेत है।

पुराने जोड़ों के दर्द के प्रकार और स्टेज 

पुराना जोड़ों का दर्द मुख्य रूप से इन तीन रूपों में देखा जाता है जिन्हें समझना आपके इलाज के लिए बहुत ज़रूरी है

ऑस्टियोआर्थराइटिस 

यह सबसे सामान्य प्रकार है जो अक्सर उम्र बढ़ने या जोड़ों के बहुत ज़्यादा इस्तेमाल से होता है। इसमें जोड़ों की सुरक्षा करने वाली गद्दी धीरे-धीरे घिसने लगती है। यह ज़्यादातर घुटनों और कूल्हों में देखा जाता है।

रूमेटॉइड आर्थराइटिस

यह एक ऑटो-इम्यून बीमारी है जिसका मतलब है कि हमारे शरीर का सुरक्षा तंत्र ग़लती से अपने ही जोड़ों पर हमला करने लगता है। इसमें जोड़ों में बहुत ज़्यादा सूजन लाली और सुबह के वक़्त भयंकर जकड़न महसूस होती है।

पोस्ट-ट्रॉमैटिक आर्थराइटिस

यह दर्द किसी पुरानी चोट जैसे एक्सीडेंट या खेल के दौरान लगी चोट की वज़ह से होता है। कई बार चोट उस वक़्त तो ठीक हो जाती है लेकिन सालों बाद वही जगह कमज़ोर होकर पुराने दर्द का रूप ले लेती है।

पुराने जोड़ों के दर्द के मुख्य कारण 

जोड़ों का दर्द रातों-रात पैदा नहीं होता; इसके पीछे ये मुख्य कारण ज़िम्मेदार होते हैं

कार्टिलेज का घिसना जोड़ों के बीच की नर्म गद्दी Cartilage वक़्त के साथ या पोषण की कमी से घिसने लगती है।

ग़लत जीवनशैली बहुत ज़्यादा ठंडा या सूखा खाना देर रात तक जागना और शारीरिक गतिविधि की कमी शरीर के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ देती है।

पोषक तत्वों की कमी कैल्शियम विटामिन-D3 और मैग्नीशियम की कमी से हड्डियाँ अंदर से खोखली और कमज़ोर हो जाती हैं।

मोटापा शरीर का अधिक वज़न सीधा घुटनों पर दबाव डालता है जिससे घिसाव की रफ़्तार तेज़ हो जाती है।

पुरानी चोट का प्रभाव कई बार बचपन या युवावस्था की कोई अंदरूनी चोट ठीक से नहीं भर पाती और बाद में पुराने दर्द का रूप ले लेती है।

जोड़ों के दर्द के मुख्य लक्षण

जकड़न Stiffness सुबह सोकर उठने पर जोड़ों का भारीपन महसूस होना।

कट-कट की आवाज़ चलते या बैठते समय जोड़ों से चटकने जैसी आवाज़ आना।

सूजन और लाली जोड़ के आसपास हल्का उभार आना या छूने पर वहां गर्मी महसूस होना।

सीमित गति ज़मीन पर बैठना या सीढ़ियाँ चढ़ना में बहुत ज़्यादा तकलीफ़ होना।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

इन स्थितियों में जोड़ों का दर्द होने की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है

 बढ़ती उम्र Aging 45-50 की उम्र के बाद हड्डियों का घनत्व Density कम होने लगता है और जोड़ों के बीच का लुब्रिकेशन सूखने लगता है जिससे घर्षण Friction बढ़ जाता है।

 मोटापा Obesity शरीर का हर एक किलो अतिरिक्त वज़न घुटनों पर चार गुना ज़्यादा दबाव डालता है। अधिक वज़न जोड़ों की गद्दी को तेज़ी से घिसने पर मजबूर कर देता है।

पुरानी चोट Previous Injury अगर आपको पहले कभी एक्सीडेंट खेलकूद या गिरने की वज़ह से जोड़ों में चोट लगी है तो वह हिस्सा कमज़ोर हो जाता है और सालों बाद पोस्ट-ट्रॉमैटिक आर्थराइटिस का रूप ले लेता है।

 ग़लत पोस्चर Bad Posture घंटों एक ही जगह झुककर बैठना या ग़लत तरीक़े से भारी सामान उठाना रीढ़ की हड्डी और कूल्हों के जोड़ों पर बुरा असर डालता है।

 आनुवंशिक कारण Genetics अगर आपके परिवार में माता-पिता या भाई-बहन को जोड़ों के दर्द की शिकायत रही है तो आपको यह समस्या होने का ख़तरा दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा होता है।

 महिलाओं में हार्मोनल बदलाव मेनोपॉज के दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर गिर जाता है जिससे हड्डियाँ तेज़ी से कमज़ोर होने लगती हैं।

पुराने जोड़ों के दर्द में क्या खाएं और क्या न खाएं?

क्या खाएं Pathya - Dos क्या न खाएं Apathya - Donts
गर्म और ताज़ा भोजन हल्का गर्म और आसानी से पचने वाला खाना बासी और ठंडा भोजन फ्रिज का पुराना खाना वात बढ़ाता है
स्वस्थ वसा घी या तिल के तेल का उपयोग रूखा और सूखा खाना भुने चने पॉपकॉर्न कुरकुरी चीज़ें
अदरक और लहसुन प्राकृतिक सूजनरोधी खट्टी और ठंडी चीज़ें अचार इमली रात का दही कोल्ड ड्रिंक
कैल्शियम युक्त आहार दूध रागी मखाने पनीर वायु बढ़ाने वाली सब्जियां गोभी भिंडी अरबी राजमा छोले
मेथी और सहजन जोड़ों के लिए फायदेमंद मैदा और जंक फूड नूडल्स पिज़्ज़ा समोसे

मरीज़ों का अनुभव

मुझे 6 साल से घुटने में बहुत दर्द था और मैंने कई डॉक्टरों को दिखाया। एलोपैथिक में तो मेरा काम का लोड बढ़ने के साथ पैर में सूजन बहुत ज़्यादा हो जाता था। चलने में मुझे प्रॉब्लम होता था। कभी-कभी लगता था जैसे मैं चल रही हूँ तो गिर जाऊँगी तो काफी अंदर से मुझे भय रहता था।

बहुत ज़्यादा मेरे पैर में प्रॉब्लम आ गई। लेफ्ट और राइट पैर में जैसे मुझे लेफ्ट पैर में प्रॉब्लम है दोनों में बहुत फर्क आने लगा। फिर मैंने उन्हें सब बात अपने घुटने के बारे में और कमर के बारे में बताई।

जीवा की दवा से मुझे कमर दर्द में बहुत आराम है और घुटना तो 70% मेरा सूजन और दर्द बहुत कम हो गया है। यदि आप लोगों को जोड़ों में दर्द घुटनों में दर्द कमर दर्द काफी सालों से है तो आप लोग जीवा आयुर्वेदा  में संपर्क जरूर करें। थैंक यू।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

तुलना का आधार आधुनिक एलोपैथिक इलाज आयुर्वेदिक जीवा इलाज
काम करने का तरीका यह मुख्य रूप से दर्द के संकेतों Pain signals को दिमाग तक पहुंचने से रोकता है। यह दर्द की जड़बढ़े हुए वात और घुटनों के सूखेपन Lack of Lubrication पर काम करता है।
दवाओं का असर पेनकिलर और स्टेरॉयड का असर अस्थायी होता है; दवा छोड़ते ही दर्द वापस आ जाता है। जड़ी-बूटियां और तेल धीरे-धीरे घुटनों के ग्रीस Synovial Fluid को दोबारा बनाने में मदद करते हैं।
दुष्प्रभाव Side-effects लंबे समय तक पेनकिलर लेने से किडनी लिवर और पेट में अल्सर होने का खतरा रहता है। आयुर्वेदिक उपचार प्राकृतिक हैं जो न सिर्फ घुटने बल्कि पूरे शरीर के मेटाबॉलिज्म को सुधारते हैं।
सर्जरी का विकल्प जब दर्द बढ़ जाता है तो अक्सर नी रिप्लेसमेंट Knee Replacement ही आखिरी रास्ता बचता है। आयुर्वेद का लक्ष्य पंचकर्म और दवाओं के जरिए सर्जरी की नौबत को टालना और जोड़ों को बचाना है।
इलाज का आधार यह केवल घुटने के एक्सरे और गैप को देखता है। यह शरीर की प्रकृति वात पित्त कफ दोषों के असंतुलन और जोड़ों की अंदरूनी स्थिति को ध्यान में रखकर इलाज करता है।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

जोड़ों के दर्द को बढ़ती उम्र का तकाज़ा समझकर टालना आपके जोड़ों को स्थायी नुक़सान पहुँचा सकता है। अगर आपको नीचे दिए गए संकेत महसूस हों तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लें

  •  लगातार बना रहने वाला दर्द अगर जोड़ों में दर्द 2-3 हफ़्तों से ज़्यादा बना रहे और आराम करने या घरेलू नुस्खों से भी ठीक न हो।
  •  सुबह की भयंकर जकड़न Stiffness अगर सोकर उठने के बाद जोड़ों को खोलने में आधे घंटे से ज़्यादा का समय लगे या शरीर बहुत भारी महसूस हो।
  •  जोड़ों से आवाज़ आना चलते बैठते या सीढ़ियाँ चढ़ते समय जोड़ों से कट-कट या चटकने की आवाज़ के साथ तेज़ दर्द होना।
  •  सूजन और गर्माहट अगर जोड़ के आसपास की त्वचा लाल हो गई हो वहां सूजन हो और छूने पर वह हिस्सा गर्म महसूस हो रहा हो।
  •  चलने-फिरने में असमर्थता अगर दर्द की वज़ह से आप अपने रोज़मर्रा के काम जैसे नहाना बाज़ार जाना या सीढ़ियाँ चढ़ना ठीक से न कर पा रहे हों।

 निष्कर्ष 

पुराना जोड़ों का दर्द केवल एक शारीरिक तकलीफ़ नहीं है बल्कि यह आपके शरीर के अंदरूनी तंत्र के असंतुलन का इशारा है। केवल पेनकिलर खाकर दर्द को दबाना समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि यह बीमारी की जड़ पर काम नहीं करता और भविष्य में किडनी व लिवर पर बुरा असर डाल सकता है।

आयुर्वेद में होल्स्टिक हीलिंग पर ज़ोर दिया जाता है जिसका मतलब है कि हम केवल दर्द का नहीं बल्कि पूरे शरीर का इलाज करते हैं। सही समय पर आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ पंचकर्म थेरेपी और अनुशासित खान-पान अपनाकर आप न केवल दर्द से आज़ादी पा सकते हैं बल्कि अपने जोड़ों को दोबारा मज़बूत और लचीला बना सकते हैं। याद रखिए जल्दी इलाज ही स्वस्थ और सक्रिय जीवन की कुंजी है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद जड़ी-बूटियों और पंचकर्म के ज़रिए कार्टिलेज के घिसाव को रोकने और जोड़ों के लुब्रिकेशन को बढ़ाने में मदद करता है।

हाँ, ठंड के मौसम में वात दोष बढ़ जाता है, जिससे जोड़ों में जकड़न और दर्द अधिक महसूस होता है।

हाँ, वज़न कम होने से घुटनों पर दबाव कम होता है, जिससे दर्द में बहुत राहत मिलती है।

हाँ, औषधीय तेल (जैसे महानारायण तेल) से हल्की मालिश वात को शांत करती है और रक्त संचार सुधारती है।

आमतौर पर 15 दिन से 1 महीने में जकड़न कम होने लगती है और 3-6 महीने में स्थायी आराम मिलता है।

हाँ, घंटों एक ही पोज़िशन में बैठने से जोड़ों में जकड़न और ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है, जिससे दर्द धीरे-धीरे बढ़ सकता है।

नहीं, केवल कैल्शियम लेना काफी नहीं है। शरीर में उसका सही अवशोषण (Absorption) और पाचन भी ज़रूरी है, तभी फायदा मिलता है।

अगर सही समय पर कारण (Root Cause) पर काम किया जाए और नियमित इलाज व लाइफस्टाइल फॉलो किया जाए, तो दर्द को काफी हद तक नियंत्रित या खत्म किया जा सकता है।

पुराने (क्रोनिक) दर्द में ठंडी सिकाई के बजाय गर्म सिकाई या भाप ज्यादा फायदेमंद होती है, क्योंकि यह जकड़न कम करती है।

हाँ, लगातार तनाव शरीर में सूजन बढ़ाता है और मांसपेशियों को सख्त करता है, जिससे दर्द ज्यादा महसूस होता है।

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