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Fibroids होने पर क्या Surgery ही आखिरी रास्ता है? हर केस में ज़रूरी नहीं

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 24 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 17 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
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महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में आज के समय में यूटेराइन फाइब्रॉएड्स (Uterine Fibroids) का नाम बहुत आम हो गया है। जब कोई महिला पेट में भारीपन, पीरियड्स के दौरान असहनीय दर्द या अत्यधिक ब्लीडिंग की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास जाती है और अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट में 'फाइब्रॉएड' या बच्चेदानी में गाँठ होने की बात सामने आती है, तो पूरी दुनिया जैसे वहीं रुक जाती है। सबसे ज़्यादा डर तब लगता है जब डॉक्टर बिना कोई दूसरा विकल्प दिए सीधे सर्जरी (Surgery) या यहाँ तक कि यूट्रस (बच्चेदानी) निकाल देने की सलाह दे देते हैं। फाइब्रॉएड का नाम सुनते ही महिलाओं के मन में कैंसर का डर और सर्जरी की घबराहट बैठ जाती है।

लेकिन रुकिए और खुद से पूछिए, क्या सच में सर्जरी ही इसका इकलौता और आखिरी रास्ता है? क्या शरीर के एक बेहद महत्वपूर्ण अंग को निकाल देना किसी बीमारी का सही इलाज हो सकता है? सच्चाई यह है कि हर केस में सर्जरी की बिल्कुल ज़रूरत नहीं होती। इस ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि फाइब्रॉएड्स असल में क्या हैं, सर्जरी के बाद भी ये वापस क्यों आ जाते हैं, आधुनिक जीवनशैली इसमें क्या रोल प्ले कर रही है, और कैसे आयुर्वेद की मदद से आप बिना किसी चीर-फाड़ के इन गांठों को प्राकृतिक रूप से सिकोड़ सकती हैं।

फाइब्रॉएड्स (Fibroids) असल में क्या हैं?

फाइब्रॉएड्स के बारे में सबसे बड़ा भ्रम यह है कि लोग इसे कैंसर मान लेते हैं। लेकिन आपको यह जानकर बहुत राहत मिलेगी कि यूटेराइन फाइब्रॉएड्स बिना कैंसर वाली (Non-cancerous) गांठें होती हैं।

  • माँसपेशियों की गाँठ: ये गांठें गर्भाशय (Uterus) की दीवारों की माँसपेशियों के असामान्य रूप से बढ़ने के कारण बनती हैं। इनका कैंसर से कोई संबंध नहीं होता है।
  • आकार में भिन्नता: इन गांठों का आकार एक छोटे से सेब के बीज से लेकर एक बड़े अंगूर या तरबूज़ जितना भी हो सकता है।
  • स्थिति के आधार पर प्रकार: ये गर्भाशय के अंदर (Submucosal), उसकी दीवार के बीच में (Intramural), या बाहर की तरफ (Subserosal) विकसित हो सकती हैं।
  • लक्षणों का अभाव: ज़्यादातर महिलाओं में ये गांठें बहुत छोटी होती हैं और पूरी ज़िंदगी चुपचाप पड़ी रहती हैं, लेकिन जब इनका आकार तेज़ी से बढ़ता है, तब ये भयंकर दर्द और तकलीफ देती हैं।

सर्जरी (Surgery) का खौफ: क्या गर्भाशय निकालना ही उपाय है?

जब फाइब्रॉएड्स का पता चलता है, तो आधुनिक चिकित्सा में अक्सर दो ही रास्ते सुझाए जाते हैं, जो महिलाओं के मन में खौफ पैदा कर देते हैं। सर्जरी कभी भी बीमारी का पहला इलाज नहीं होना चाहिए।

  • मायोमेक्टोमी (Myomectomy): इस सर्जरी में सिर्फ गाँठ को काटकर बाहर निकाला जाता है। यह सर्जरी दर्दनाक होती है और गर्भाशय की दीवारों को कमज़ोर कर देती है।
  • हिस्टेरेक्टोमी (Hysterectomy): यह सबसे खतरनाक रास्ता है जिसमें पूरे गर्भाशय को ही शरीर से काटकर बाहर निकाल दिया जाता है। महिलाओं को डराया जाता है कि आगे चलकर जान का खतरा हो सकता है।
  • सर्जरी के साइड इफेक्ट्स: गर्भाशय को निकाल देना कोई छोटी बात नहीं है; यह एक महिला के शरीर में भयंकर हार्मोनल असंतुलन, डिप्रेशन, कमज़ोर हड्डियाँ और समय से पहले मेनोपॉज़ (Early Menopause) ला देता है।

क्या सर्जरी के बाद फाइब्रॉएड्स वापस नहीं आते?

यह फाइब्रॉएड्स से जुड़ी सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई है जिसे अक्सर मरीज़ों से छुपाया जाता है। सर्जरी करवा लेना इस बीमारी का पक्का समाधान बिल्कुल नहीं है।

  • बीमारी की जड़ मौजूद रहना: सर्जरी सिर्फ उस गाँठ को काटती है, वह शरीर के उस 'हार्मोनल असंतुलन' (Hormonal Imbalance) को ठीक नहीं करती जिसने उस गाँठ को जन्म दिया था।
  • गांठों का दोबारा पनपना: जब तक फाइब्रॉएड्स बनाने वाला माहौल शरीर के अंदर मौजूद रहेगा, पुरानी गाँठ कटने के बाद गर्भाशय में नई गांठें तेज़ी से बननी शुरू हो जाएंगी।
  • बार-बार सर्जरी का चक्र: कई महिलाओं को अपने जीवन में दो से तीन बार तक मायोमेक्टोमी करवानी पड़ जाती है, जो उनके शरीर को अंदर से पूरी तरह खोखला कर देती है।

हार्मोनल असंतुलन (Estrogen Dominance): असली मुजरिम

फाइब्रॉएड्स के पनपने और बड़े होने का सबसे मुख्य कारण आपके शरीर के अंदर मौजूद हार्मोन्स का बिगड़ना है। हार्मोन्स का यही खेल गांठों को भोजन देता है।

  • एस्ट्रोजन की अधिकता: जब किसी महिला के शरीर में 'एस्ट्रोजन' (Estrogen) हार्मोन की मात्रा बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है, तो गर्भाशय की माँसपेशियाँ तेज़ी से बढ़ने लगती हैं।
  • प्रोजेस्टेरोन की कमी: एस्ट्रोजन को संतुलित करने के लिए शरीर में 'प्रोजेस्टेरोन' हार्मोन होता है। जब इसकी कमी हो जाती है, तो एस्ट्रोजन बेकाबू होकर गांठों का रूप ले लेता है।
  • गांठों का भोजन: फाइब्रॉएड्स एस्ट्रोजन को खाकर ही बड़े होते हैं। प्रेगनेंसी के दौरान एस्ट्रोजन बढ़ने से ये तेज़ी से बढ़ते हैं, और मेनोपॉज़ के बाद एस्ट्रोजन कम होने पर ये अपने आप सिकुड़ने लगते हैं।

फाइब्रॉएड्स के मुख्य लक्षण: शरीर की चेतावनियाँ

फाइब्रॉएड्स की सबसे भयानक बात इसके लक्षण हैं, जो एक महिला की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को नर्क बना देते हैं। इन लक्षणों को कभी इग्नोर नहीं करना चाहिए।

  • हैवी और लंबे पीरियड्स: पीरियड्स के दौरान बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग होना, खून के बड़े-बड़े थक्के (Clots) आना और पीरियड्स का 7 से 10 दिनों तक लगातार चलना।
  • पेडू (Pelvic) में असहनीय दर्द: गर्भाशय में ऐंठन और पेडू वाले हिस्से में लगातार भारीपन और चुभने वाला दर्द बने रहना।
  • बार-बार यूरिन आना: जब फाइब्रॉएड का आकार बढ़ जाता है, तो वह पेशाब की थैली (Bladder) पर भारी दबाव डालता है, जिससे महिला को बार-बार वॉशरूम भागना पड़ता है।
  • कमर और पैरों में दर्द: बड़ी गाँठ का दबाव गर्भाशय के पीछे से गुज़रने वाली नसों पर भी पड़ता है, जिससे लोअर बैक और पैरों में भयंकर और लगातार दर्द होता है।

एनीमिया (Anemia) का खतरा: जब शरीर से खून बहता है

फाइब्रॉएड्स के कारण होने वाली अत्यधिक ब्लीडिंग कोई मामूली बात नहीं है। यह महिलाओं के शरीर से उनका सारा जीवन रस (खून) निचोड़ लेती है।

  • आयरन की भयंकर कमी: जब हर महीने शरीर से इतनी भारी मात्रा में खून निकलता है, तो शरीर में आयरन की कमी हो जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में एनीमिया कहते हैं।
  • कमज़ोरी और थकान: इस कमज़ोरी के कारण महिला को हर समय थकान रहना, चक्कर आना और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए साँस फूलने की समस्या शुरू हो जाती है।
  • खून चढ़वाने की नौबत: कई मामलों में ब्लीडिंग इतनी ज़्यादा और जानलेवा होती है कि महिला का हीमोग्लोबिन 6 या 7 तक गिर जाता है और उसे अस्पताल में खून चढ़वाना (Blood Transfusion) पड़ जाता है।

आधुनिक जीवनशैली: फाइब्रॉएड्स को भड़काने वाले कारण

आजकल की महिलाओं में फाइब्रॉएड्स तेज़ी से बढ़ने के पीछे सिर्फ हार्मोन्स नहीं, बल्कि हमारी खराब जीवनशैली और काम करने का तरीका भी ज़िम्मेदार है।

  • मोटापा (Obesity): हमारे शरीर की फैट सेल्स (चर्बी) खुद भी 'एस्ट्रोजन' हार्मोन बनाती हैं। जितना ज़्यादा शरीर में फैट होगा, उतना ही ज़्यादा एस्ट्रोजन बनेगा और गांठें तेज़ी से बढ़ेंगी।
  • कुर्सी से चिपके रहना: घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करने से पेल्विक एरिया में ब्लड सर्कुलेशन रुक जाता है। ताज़ा खून न पहुँचने से वहां टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं जो गाँठ बनाते हैं।
  • जंक फूड का ज़हर: पैकेटबंद खाना और कीटनाशकों से भरी सब्ज़ियों में 'जेनोएस्ट्रोजन' (नकली एस्ट्रोजन) होते हैं। शरीर इन्हें असली हार्मोन समझ लेता है और गांठें भड़क उठती हैं।
  • मानसिक तनाव (Stress): लगातार भारी तनाव 'कॉर्टिसोल' हार्मोन छोड़ता है जो पूरे प्रजनन तंत्र (Reproductive system) को कंफ्यूज़ कर देता है और फाइब्रॉएड्स को बढ़ने का माहौल देता है।

आयुर्वेद फाइब्रॉएड्स को कैसे समझता है? (ग्रंथि रोग)

आधुनिक विज्ञान जिसे फाइब्रॉएड या ट्यूमर कहता है, आयुर्वेद ने उसे बहुत पहले ही 'ग्रंथि' (Granthi) या 'गर्भाशय अर्बुद' के रूप में समझा था।

  • कफ और वात का असंतुलन: आयुर्वेद के अनुसार, फाइब्रॉएड शरीर में मुख्य रूप से 'कफ दोष' (भारीपन और वृद्धि) और 'वात दोष' के भयंकर असंतुलन का परिणाम है।
  • गाँठ का बनना: जब कफ बिगड़ता है, तो वह माँसपेशियों को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा देता है, और वात उसे एक जगह इकट्ठा करके सख़्त गाँठ का रूप दे देता है।
  • पित्त का प्रकोप (हैवी ब्लीडिंग): जब इस गाँठ के साथ 'पित्त दोष' जुड़ जाता है, तो वह गर्भाशय में भयंकर गर्मी पैदा करता है जो अत्यधिक ब्लीडिंग (रक्त प्रदर) का कारण बनता है।

फाइब्रॉएड्स के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें बिना किसी सर्जरी के गांठों को पिघलाने वाली कुछ बहुत ही ताकतवर और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं। ये दवाइयाँ बिना साइड इफेक्ट के काम करती हैं।

  • कचनार (Kanchanar): आयुर्वेद में कचनार को 'ग्रंथि भेदन' (गाँठ को तोड़ने) के लिए सबसे जादुई औषधि माना गया है। यह फाइब्रॉएड्स को प्राकृतिक रूप से पिघलाकर सिकोड़ने का काम करती है।
  • अशोक (Ashoka): यह महिलाओं के गर्भाशय के लिए एक अमृत के समान है। यह यूट्रस की माँसपेशियों को ताकत देता है और हैवी ब्लीडिंग को तेज़ी से रोकता है।
  • शतावरी (Shatavari): यह बिगड़े हुए हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन) को दोबारा संतुलित करती है और अत्यधिक ब्लीडिंग से आई शरीर की कमज़ोरी को दूर करती है।
  • हल्दी (Haridra) और गुग्गुलु: ये दोनों शरीर की भयंकर अंदरूनी सूजन को खींच लेते हैं और फाइब्रॉएड्स के आकार को कम करने में मदद करते हैं।

आयुर्वेदिक थेरेपी फाइब्रॉएड्स में कैसे काम करती है?

जब गाँठ बड़ी हो और दर्द बर्दाश्त से बाहर हो रहा हो, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी बहुत ही गहराई से शरीर को डिटॉक्स करती है।

  • विरेचन (Virechana): फाइब्रॉएड्स और हार्मोनल इम्बैलेंस के लिए यह सबसे अचूक पंचकर्म है। इसमें जड़ी-बूटियों के माध्यम से शरीर और लीवर में जमा हुए अतिरिक्त 'एस्ट्रोजन' और टॉक्सिन्स को मल के रास्ते बाहर निकाल दिया जाता है।
  • उत्तर बस्ती (Uttar Basti): इसमें औषधीय तेल या काढ़े को विशेष तरीके से सीधे गर्भाशय के अंदर पहुँचाया जाता है। यह दवा सीधे गाँठ पर काम करती है, गर्भाशय की सूजन कम करती है और उसे अंदरूनी ताकत देती है।
  • बस्ती (Basti): पेडू (Pelvic region) में बढ़े हुए 'वात दोष' को शांत करने और वहां दर्द को पूरी तरह खत्म करने के लिए औषधीय एनिमा दिया जाता है।

फाइब्रॉएड्स को सिकोड़ने के लिए कफ-वात शामक डाइट प्लान

आप जो खाते हैं, वह या तो आपके फाइब्रॉएड को बड़ा कर रहा है या उसे सिकोड़ रहा है। सर्जरी से बचने के लिए सही डाइट का पालन करना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य हार्मोनल पिल्स से ब्लीडिंग दबाना या सर्जरी (मायोमेक्टोमी/हिस्टेरेक्टोमी) से गाँठ/यूट्रस हटाना अशुद्ध आंतरिक माहौल को सुधारकर फाइब्रॉएड को प्राकृतिक रूप से पिघलाने पर फोकस
शरीर को देखने का नज़रिया गाँठ को अतिरिक्त हिस्सा मानकर सर्जरी द्वारा निकाल देना मेटाबॉलिज़्म व हार्मोनल असंतुलन मानकर जड़ी-बूटियों से हीलिंग को बढ़ावा
डाइट और जीवनशैली की भूमिका वज़न और खान-पान पर सीमित ध्यान, मुख्य फोकस सर्जरी कफ-शामक डाइट, फाइबर और संतुलित दिनचर्या को उपचार का मुख्य आधार
लंबा असर सर्जरी के बाद भी हार्मोनल असंतुलन रहने पर फाइब्रॉएड्स दोबारा बन सकते हैं प्राकृतिक रूप से हार्मोन संतुलित कर फाइब्रॉएड्स की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में कार्य

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी छुरी नहीं है जो एक दिन में गाँठ को काटकर बाहर निकाल दे। शरीर के अंदरूनी माहौल को बदलकर गाँठ को प्राकृतिक रूप से पिघलाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: सबसे पहले आपकी पाचन शक्ति सुधरेगी। पेट का भारीपन, पेडू का दर्द और सूजन कम होने लगेगी।
  • 1 से 3 महीने तक: भड़का हुआ वात-पित्त शांत होने से हैवी ब्लीडिंग कंट्रोल में आ जाएगी और खून के बड़े थक्के आना लगभग बंद हो जाएंगे। आपके शरीर में कमज़ोरी दूर होकर ताकत आएगी।
  • 3 से 6 महीने तक: लगातार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (कचनार आदि) और सही डाइट के प्रभाव से फाइब्रॉएड्स का आकार सिकुड़ना शुरू हो जाएगा। अगर गाँठ छोटी है, तो वह घुल सकती है, और अगर बड़ी है, तो उसका आकार इतना छोटा हो जाएगा कि वह आपको जीवन भर कोई तकलीफ नहीं देगी।

मरीज़ों के अनुभव

मेरा नाम नीलम शाह है। मुझे 3 साल पहले फाइब्रॉइ की समस्या हुई थी, जिसके लिए मैंने ऑपरेशन करवाया था। लेकिन ढाई साल बाद यह समस्या फिर से हो गई। डॉक्टरों ने दोबारा ऑपरेशन की सलाह दी।

इसके बाद मैंने आयुर्वेदिक उपचार अपनाया और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयों व डाइट चार्ट का नियमित पालन किया। इससे मुझे राहत मिली और मेरी समस्या में काफी सुधार हुआ। अब मैं ठीक हो चुकी हूँ। आज मैं जीवा का धन्यवाद करती हूँ।

नीलम शाह

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

फाइब्रॉएड्स जैसी समस्या से बचने के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

श्रेणी क्या अपनाएँ (अनुशंसित) किनसे परहेज़ करें (वर्जित)
आहार का सिद्धांत हल्का, गर्म और सुपाच्य भोजन जो कफ न बढ़ाए और वात को शांत रखे भारी, ठंडा और कफ बढ़ाने वाला भोजन
पोषक तत्व फाइबर युक्त आहार (हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, ओट्स), सीमित मात्रा में गाय का शुद्ध घी कम फाइबर और प्रोसेस्ड भोजन
क्या न खाएं प्राकृतिक, ताज़ा और संतुलित आहार पैकेटबंद खाना, रिफाइंड चीनी, मैदा, सोया प्रोडक्ट्स
दैनिक पेय गुनगुना पानी, हल्दी-अदरक की चाय: सूजन कम करने में सहायक अधिक डेयरी (बाज़ार का दूध, पनीर), ठंडे पेय
जीवनशैली सहयोग योग (कपालभाति, अनुलोम-विलोम), ब्रिस्क वॉकिंग: सर्कुलेशन सुधारता है निष्क्रिय जीवनशैली और व्यायाम की कमी

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags of Fibroids)

फाइब्रॉएड्स के ज़्यादातर मामले दवाओं से कंट्रोल हो जाते हैं, लेकिन कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ आपको तुरंत मेडिकल हेल्प लेनी चाहिए।

  • अत्यधिक और बेकाबू ब्लीडिंग: अगर आपको अचानक से इतनी भयंकर ब्लीडिंग हो रही हो जो किसी भी पैड से कंट्रोल न हो रही हो और बड़े-बड़े थक्के आ रहे हों।
  • एनीमिया के गंभीर लक्षण: अगर ब्लीडिंग के कारण आपको बहुत ज़्यादा चक्कर आ रहे हों, बेहोशी महसूस हो रही हो, या आराम करते हुए भी आपकी साँस फूलने लगे।
  • पेडू में अचानक तेज़ दर्द: अगर पेडू (Pelvic) में अचानक चाकू चुभने जैसा बहुत तेज़ और असहनीय दर्द उठे (यह फाइब्रॉएड के अपनी जगह पर घूमने या फटने का संकेत हो सकता है)।
  • यूरिन पास करने में रुकावट: अगर आपको यूरिन पास करने में बहुत ज़्यादा तकलीफ हो रही हो या यूरिन बिल्कुल रुक जाए (गाँठ का ब्लैडर पर भारी दबाव)।
  • लगातार दर्द का बने रहना: अगर पीरियड्स खत्म होने के बाद भी लगातार कई हफ्तों तक तेज़ दर्द और ब्लीडिंग बनी रहे।

निष्कर्ष

फाइब्रॉएड्स (Fibroids) का नाम सुनते ही घबराकर सर्जरी टेबल पर लेट जाना आपके स्वास्थ्य के लिए लिया गया एक बहुत ही जल्दबाज़ी भरा फैसला हो सकता है। यह सच है कि फाइब्रॉएड्स के लक्षण, जैसे हैवी ब्लीडिंग और दर्द, सहने बहुत मुश्किल होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गर्भाशय को ही शरीर से बाहर निकाल दिया जाए। सर्जरी आपके शरीर से उस गाँठ को तो निकाल सकती है, लेकिन वह उस बिगड़े हुए हार्मोनल असंतुलन (Estrogen dominance) और अशुद्ध जीवनशैली को नहीं बदल सकती जिसने उस गाँठ को जन्म दिया था। जब तक यह जड़ मौजूद है, गांठें दोबारा पनप सकती हैं। आयुर्वेद आपको बिना किसी चीर-फाड़ के इस समस्या की जड़ तक पहुँचने का एक सुरक्षित रास्ता देता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, कचनार जैसी गांठों को भेदने वाली जड़ी-बूटियों, पंचकर्म की डिटॉक्स थेरेपी (विरेचन) और सही कफ-शामक जीवनशैली को अपनाकर आप अपने फाइब्रॉएड्स को प्राकृतिक रूप से सिकोड़ सकती हैं और अपना गर्भाशय बचा सकती हैं। अपने शरीर की पुकार सुनें, सिर्फ ऑपरेशन्स के डर में न जिएं, और जीवा आयुर्वेद के साथ एक स्वस्थ और दर्द-मुक्त ज़िंदगी की ओर कदम बढ़ाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, आपको घबराने की ज़रूरत नहीं है। यूटेराइन फाइब्रॉएड्स लगभग 99% मामलों में नॉन-कैंसरस गांठें होती हैं। इनका कैंसर से कोई संबंध नहीं होता और न ही ये आगे चलकर कैंसर में बदलती हैं।

बिल्कुल नहीं। यूट्रस निकालना सबसे आखिरी विकल्प होना चाहिए, वह भी तब जब गाँठ जानलेवा हो। ज़्यादातर फाइब्रॉएड्स को सही आयुर्वेदिक दवाओं, डाइट और जीवनशैली में बदलाव करके सिकोड़ा जा सकता है।

सर्जरी सिर्फ गाँठ को काटती है, लेकिन गाँठ बनाने वाले हार्मोनल असंतुलन को ठीक नहीं करती। जब तक शरीर का अंदरूनी माहौल ठीक नहीं होगा, फाइब्रॉएड्स बार-बार बनते रहेंगे।

फाइब्रॉएड्स गर्भाशय की परत के क्षेत्रफल को बढ़ा देते हैं और गर्भाशय को ठीक से सिकुड़ने नहीं देते। इस कारण पीरियड्स के दौरान खून का बहाव बहुत ज़्यादा और लंबे समय तक होता है।

जी हाँ, बहुत बड़ा असर पड़ता है। शरीर की चर्बी अतिरिक्त एस्ट्रोजन हार्मोन बनाती है जो फाइब्रॉएड्स का मुख्य भोजन है। वज़न कम करने से एस्ट्रोजन का स्तर घटता है, जिससे गाँठ का बढ़ना रुक जाता है।

रिफाइंड चीनी, मैदा, जंक फूड, पैकेटबंद चीजें और सोया प्रोडक्ट्स से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। ये चीजें शरीर में भारी सूजन बढ़ाती हैं और नकली एस्ट्रोजन पैदा करके गांठों को भड़काती हैं।

बिल्कुल, आयुर्वेद में कचनार गुग्गुलु एक बहुत ही प्रसिद्ध और प्रमाणित औषधि है जो शरीर की किसी भी ग्रंथि  को तोड़ने और प्राकृतिक रूप से सिकोड़ने का जादुई काम करती है।

जब फाइब्रॉएड का आकार बहुत बड़ा हो जाता है, तो वह गर्भाशय के पीछे से गुज़रने वाली नसों पर भारी दबाव डालने लगता है। इसी दबाव के कारण कमर के निचले हिस्से और पैरों में तेज़ दर्द महसूस होता है।

हाँ। बहुत ज़्यादा तनाव लेने से कॉर्टिसोल स्ट्रेस हार्मोन बढ़ता है, जो आपके प्रजनन हार्मोन्स को असंतुलित कर देता है। इसके कारण प्रोजेस्टेरोन कम होता है और एस्ट्रोजन बढ़ता है, जो फाइब्रॉएड्स को बढ़ने में मदद करता है।

आयुर्वेद में दर्द और हैवी ब्लीडिंग जैसे लक्षणों में 1 से 3 महीने में भारी आराम मिल जाता है। लेकिन गाँठ के आकार को पूरी तरह सिकोड़ने और हार्मोन्स को जड़ से बैलेंस करने में आमतौर पर 6 महीने या उससे अधिक का समय लग सकता है।

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