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Frequent antacid use आपकी problem को छुपा रहा है या बढ़ा रहा है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

सीने में जलन हुई, तो हमने झट से एंटासिड (Antacid) की गोली खा ली। आजकल ये हर घर की कहानी बन चुकी है। गोली खाते ही कुछ मिनटों में आराम तो मिल जाता है, लेकिन सच कहूं तो बीमारी अपनी जगह जस की तस रहती है। आयुर्वेद इसे सिर्फ 'एसिड कंट्रोल' करने का मामला नहीं मानता। असल में यह जलन एक बड़ा इशारा है कि शरीर में 'पित्त' भड़क गया है, पाचन अग्नि ठंडी पड़ गई है और पेट में कचरा (आम) इकट्ठा हो रहा है। अगर हम बार-बार गोली खाकर इस जलन को दबाते रहेंगे, तो हमारा प्राकृतिक पाचन तंत्र अंदर से पूरी तरह खोखला हो जाएगा। इसलिए असली समझदारी लक्षणों को दबाने में नहीं, बल्कि पाचन को वापस पटरी पर लाने में है।

एसिडिटी आखिर होती क्या है?

एसिडिटी सिर्फ छाती की जलन नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि आपके पेट का पूरा सिस्टम बिगड़ चुका है। होता यह है कि जब खाना पचाने वाला तेजाब (एसिड) पेट में जरूरत से ज्यादा बनने लगता है, या फिर उल्टी दिशा में यानी भोजन नली की तरफ ऊपर चढ़ने लगता है, तब हमें यह जलन महसूस होती है। सीधी-सी बात है, यह एक अलर्ट है कि आपके पेट ने अपना कुदरती तरीके से काम करना बंद कर दिया है।

क्यों लोग बार-बार एंटासिड पर निर्भर हो जाते हैं?

इसका असर किसी जादू की तरह होता है। सीने की जलन कुछ ही मिनटों में शांत हो जाती है, दर्द गायब हो जाता है और इंसान को लगता है कि चलो, आफत टली। लेकिन यही 'तुरंत मिलने वाला आराम' हमारे दिमाग के साथ एक खेल खेलता है। हमें उस गोली की ऐसी लत लग जाती है कि हम बीमारी की असली जड़ को नजरअंदाज कर देते हैं। शरीर क्या कहना चाह रहा है उसे समझने के बजाय, हर बार जरा सी तकलीफ होने पर हम उसी गोली पर आंख मूंदकर भरोसा करने लगते हैं।

बार-बार एंटासिड लेने के छुपे हुए नुकसान

ये गोलियां आपको उस वक्त तो तुरंत राहत दे देती हैं, लेकिन पीठ पीछे ये आपके शरीर के साथ जो खिलवाड़ कर रही हैं, उसे हम अक्सर भांप नहीं पाते:

  • पाचन एकदम सुस्त पड़ जाना: पेट की जो कुदरती आग (जठराग्नि) खाना पचाती है, ये गोलियां उसे बिल्कुल धीमा कर देती हैं।
  • खाने का असली अर्क न मिलना: आप चाहें कितने भी अच्छे फल या मेवे खा लें, आपका शरीर उन विटामिन्स और मिनरल्स को सही से सोख (absorb) ही नहीं पाता।
  • गोली की पक्की लत: धीरे-धीरे आपका शरीर और दिमाग दोनों इसके इतने आदी हो जाते हैं कि बिना दवा के पेट को राहत ही नहीं मिलती।

लक्षण दबाने का क्या खतरा हो सकता है?

सोचिए, आपके घर में आग लगने का अलार्म बज रहा है और आप आग बुझाने के बजाय सिर्फ अलार्म का तार काट दें! बीमारी के लक्षणों को गोली से दबाना बिल्कुल ऐसा ही है। शुरुआत में तो लगता है कि सब ठीक हो गया है, पर अंदर ही अंदर बीमारी पनपती रहती है:

  • असली बीमारी पर्दा डाल लेती है: आपको लगता है जलन ठीक हो गई, लेकिन बीमारी की असली वजह अंदर वैसी की वैसी ही बनी रहती है।
  • अंदर ही अंदर जड़ें मजबूत होना: पेट का जो बैलेंस बिगड़ा था, वह वक्त के साथ और भी गहराई तक खराब हो जाता है।
  • जिंदगी भर की बीमारी (क्रॉनिक रोग): आज की ये छोटी सी दिखने वाली समस्या कल को किसी बड़ी और लंबी बीमारी का रूप ले लेती है।
  • वक्त निकलने पर बीमारी पकड़ में आना: जब तक हमें असली खतरे का एहसास होता है, तब तक बात बहुत आगे बढ़ चुकी होती है।
  • इलाज में पसीने छूटना: जाहिर है, जो बीमारी सालों से अंदर पल रही थी, उसे जड़ से बाहर निकालने में फिर बहुत लंबा समय और भारी मशक्कत लगती है।

आयुर्वेद एसिडिटी को कैसे देखता है?

आयुर्वेद एसिडिटी को सिर्फ 'पेट खराब होना' या 'कुछ उल्टा-सीधा खा लेना' नहीं मानता। इसके हिसाब से, यह सारा खेल 'पित्त' (शरीर की गर्मी) के बिगड़ने का है। जब शरीर में पित्त हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो अंदर की गर्मी और खटास उफान मारने लगती है और हमारा पाचन पूरी तरह डगमगा जाता है। फिर यही चीज़ सीने में जलन, खट्टी डकारों और गले तक आने वाले खट्टे पानी के रूप में हमें परेशान करती है।

पित्त दोष और एसिडिटी का गहरा कनेक्शन

जब पित्त भड़कता है, तो पेट की 'आग' (पाचन अग्नि) ज़रूरत से ज्यादा तेज़ हो जाती है। अब यह आग खाने को पचाने के बजाय पेट में फालतू का एसिड बनाने लगती है। इसी वजह से पेट और खाने की नली (Food pipe) में छिलने जैसी जलन महसूस होती है। खाना पचता नहीं है, बल्कि पेट में ही पड़े-पड़े सड़ने लगता है, जिससे और ज्यादा खटास (एसिड) बनता है।

आयुर्वेद साफ कहता है कि बार-बार होने वाली जलन और बेचैनी की असली वजह यही है। इसलिए यहां एसिड को सिर्फ कुछ देर के लिए 'दबाने' का काम नहीं होता, बल्कि उस भड़की हुई आग (पित्त) को हमेशा के लिए शांत किया जाता है।

एसिडिटी को ठीक करने का आयुर्वेदिक तरीका 

आयुर्वेद इसे सिर्फ एसिड बढ़ने की बीमारी नहीं मानता। यह शरीर के अंदर तीन बड़ी गड़बड़ियों का नतीजा है भड़का हुआ पित्त, कमज़ोर पाचन और पेट में जमा टॉक्सिन्स (आम)। 

  • असली जड़ पर वार: सिर्फ जलन कम करने वाला कोई ठंडी सिरप (Antacid) नहीं दिया जाता। पहले यह देखा जाता है कि पित्त भड़का है या पाचन सुस्त है, और सीधा उसी गड़बड़ी का इलाज किया जाता है।
  • पाचन (अग्नि) को ठीक करना: पेट की जो आग या तो बहुत सुस्त पड़ गई है या हद से ज्यादा तेज़ हो गई है, उसे जड़ी-बूटियों से एकदम नॉर्मल (बैलेंस) किया जाता है।
  • पित्त को शांत करना: शरीर में जो गर्मी और खटास बढ़ गई है, उसे ठंडी तासीर वाली चीज़ों से शांत किया जाता है ताकि सीने की आग बुझ सके।
  • गंदगी (Toxins) की सफाई: पेट में जो अधपचा खाना और आम जमा होकर एसिड बना रहा है, उसे शरीर से बाहर निकालकर पूरे सिस्टम को अंदर से एकदम साफ किया जाता है।
  • सादा और सही खाना: आपको ऐसा सात्विक खाना खाने को कहा जाता है जो पेट पर भारी न पड़े, एकदम ताज़ा हो और जिसे पचाने में पेट को ज्यादा मेहनत न करनी पड़े।
  • लाइफस्टाइल की सेटिंग: टाइम पर खाना, पूरी नींद लेना और सबसे ज़रूरी दिमाग से टेंशन को निकालना। अगर आपका रूटीन सही नहीं है, तो दुनिया की कोई भी दवा पूरी तरह काम नहीं करेगी।
  • योग और प्राणायाम का सहारा: पेट और दिमाग, दोनों को रिलैक्स रखने के लिए योग और सांसों की कुछ आसान एक्सरसाइज (प्राणायाम) भी इस इलाज का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा मानी जाती हैं।

एसिडिटी को जड़ से मिटाने वाली आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद का तरीका सिर्फ कोई सिरप देकर गैस या एसिड को दबाना नहीं है। ये औषधियाँ भड़के हुए पित्त को शांत करने, पाचन की आग को सही करने और पेट में से आम को बाहर निकालने का काम करती हैं:

  • अविपत्तिकर चूर्ण: अगर सीने और गले में जलन हो रही है या खट्टी डकारें आ रही हैं, तो यह चूर्ण 'पित्त' की उस एक्स्ट्रा गर्मी को एकदम शांत कर देता है।
  • मुस्तादि चूर्ण: यह आपके पाचन को इतना दुरुस्त कर देता है कि कुछ भी खाने के बाद जो गैस बनती है या पेट भारी हो जाता है, वो दिक्कत खत्म हो जाती है।
  • आंवला (Amalaki): यह पेट की भड़की हुई आग और अंदरूनी गर्मी को तुरंत ठंडा करता है।
  • यष्टिमधु (मुलेठी): जब एसिड की वजह से पेट की अंदरूनी दीवारें छिलने जैसी हो जाती हैं, तो यह मुलेठी अंदर एक ठंडी सी परत (कोटिंग) बना देती है। इससे जलन में बहुत गज़ब का आराम मिलता है।

एसिडिटी को ठीक करने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

जब एसिडिटी बहुत पुरानी और ज़िद्दी हो जाए, तो सिर्फ चूर्ण या गोलियों से काम नहीं चलता। ऐसे में शरीर के अंदरूनी सिस्टम को दोबारा सेट करने के लिए ये कुछ खास तरीके अपनाए जाते हैं:

  • विरेचन (Virechana): इसमें एक खास तरीके (पेट साफ करने की प्रक्रिया) से शरीर के अंदर जमा सारी गर्मी (पित्त) को बाहर निकाल कर फेंक दिया जाता है।
  • पित्त शमन बस्ती (आयुर्वेदिक एनिमा): यह शरीर में वात और पित्त का बैलेंस बिठाती है, जिससे आपका पाचन तंत्र और आंतें एकदम शांत और रिलैक्स हो जाती हैं।
  • अभ्यंग (औषधीय तेल मालिश): जब जड़ी-बूटियों वाले तेल से मालिश होती है, तो शरीर की सारी जकड़न और स्ट्रेस दूर होता है। जब शरीर रिलैक्स होता है, तो पाचन भी अपने आप सही काम करने लगता है।
  • शिरोधारा: इसमें माथे के बीचों-बीच लगातार तेल की धार गिराई जाती है। हम सब जानते हैं कि टेंशन से एसिडिटी सबसे ज्यादा बढ़ती है। यह थेरेपी दिमाग का सारा स्ट्रेस पिघला देती है, जिससे पेट भी शांत हो जाता है।

एसिडिटी के लिए डाइट चार्ट (क्या खाएं और क्या न खाएं)

क्या खाएं (Eat) क्या न खाएं (Avoid)
मूंग दाल व खिचड़ी तला-भुना भोजन
छाछ (भुना जीरा के साथ) मैदा व जंक फूड
लौकी, तोरई, कद्दू बहुत मसालेदार भोजन
अनार, केला, सेब खट्टे अचार व पिकल्स
नारियल पानी चाय-कॉफी अधिक मात्रा में
सीमित घी कोल्ड ड्रिंक्स/सोडा
उबली सब्जियाँ देर रात भारी भोजन

पेशेंट टेस्टिमोनियल 

मेरा नाम मनोरमा है, मेरी उम्र 63 वर्ष है और मैं कानपुर की एक सोशल वर्कर हूँ। समय पर खाना न खाने की आदत के कारण मुझे गैस, एसिडिटी और मानसिक तनाव की समस्या होने लगी थी। मैं रोज़ टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान का कार्यक्रम देखती थी, जिससे प्रेरित होकर मैंने आयुर्वेदिक उपचार लेने का फैसला किया और जीवाग्राम आई। यहाँ डॉक्टरों ने मुझे शिरोधारा और पंचकर्म उपचार दिया, साथ ही एसिडिटी के लिए कुछ घरेलू उपाय भी बताए। जीवाग्राम के शांत और समग्र वातावरण, पौष्टिक आहार और रोज़ योग से मेरे मानसिक तनाव में भी काफी कमी आई। आज मैं खुद को पहले से ज्यादा स्वस्थ और संतुलित महसूस करती हूँ और अपने परिचितों को भी जीवाग्राम आने की सलाह देती हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

अगर आपको बार-बार सीने में तेज जलन हो रही है, खट्टी डकारें लगातार आ रही हैं, खाना खाने के बाद पेट में भारीपन या दर्द लंबे समय तक बना रहता है, या एंटासिड लेने के बावजूद राहत नहीं मिल रही है—तो इसे नजरअंदाज न करें। यदि यह समस्या हफ्तों से बनी हुई है या नींद और रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर रही है, तो तुरंत किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।

निष्कर्ष

एसिडिटी सिर्फ पेट की जलन नहीं, बल्कि शरीर में पित्त और पाचन अग्नि के असंतुलन का संकेत है। मॉडर्न अप्रोच जहाँ तुरंत एसिड कम करके राहत देता है, वहीं आयुर्वेद शरीर की अग्नि को संतुलित करके और पित्त को शांत करके समस्या को जड़ से ठीक करने पर ध्यान देता है। सही आहार, जीवनशैली और उपचार के साथ एसिडिटी को लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। एंटासिड का लंबे समय तक उपयोग शरीर की प्राकृतिक पाचन अग्नि (Digestive Fire) को धीमा कर देता है। इससे पोषक तत्वों का अवशोषण (Absorption) कम हो जाता है और शरीर धीरे-धीरे दवा पर निर्भर होने लगता है।

हाँ। तनाव सीधे 'पित्त दोष' को बढ़ाता है, जिससे पेट में एसिड का उत्पादन तेज हो जाता है। इसे अक्सर "Stress-induced Acidity" कहा जाता है, जहाँ मन की चिंता पेट में जलन पैदा करती है। 

जी हाँ। सोने से ठीक पहले खाना खाने से शरीर को भोजन पचाने का पर्याप्त समय नहीं मिलता। लेटने पर पेट का एसिड आसानी से भोजन नली (Esophagus) की ओर आ जाता है, जिसे 'नाइट एसिडिटी' या रिफ्लक्स कहते हैं।

 हाँ। जब पेट में लगातार एसिड और 'आम' (Toxins) जमा रहते हैं, तो पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है। इससे भूख कम लगना, भोजन के बाद भारीपन और मितली (Nausea) जैसे लक्षण महसूस होते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में बढ़ा हुआ 'पित्त' जब ऊपर की ओर बढ़ता है, तो वह सिरदर्द या माइग्रेन का कारण बन सकता है। कई बार पेट साफ होने या एसिडिटी कम होने पर सिरदर्द में भी राहत मिल जाती है।

 शुरुआती एसिडिटी में डाइट और लाइफस्टाइल सुधार काफी प्रभावी हैं। लेकिन अगर समस्या पुरानी (Chronic) है, तो पित्त को शांत करने के लिए 'अविपत्तिकर चूर्ण' जैसी औषधियों और 'विरेचन' जैसी थेरेपी की आवश्यकता होती है।

नारियल पानी पीना या भोजन के बाद आधा चम्मच सौंफ और मिश्री चबाना तुरंत राहत देता है। यह पेट की गर्मी को ठंडा करता है और पित्त को संतुलित रखता है। 

हाँ। जब पेट का एसिड गले तक पहुँचता है (GERD), तो यह गले की संवेदनशील परत में जलन पैदा करता है। इससे सूखी खांसी, गले में कुछ फंसे होने का अहसास या आवाज में भारीपन आ सकता है।

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