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आपको बीमारी नहीं, Habits नुकसान पहुँचा रही हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan

क्या आप अक्सर बिना बीमारी के थका हुआ, गैस से भरा या सिरदर्द से परेशान महसूस करते हैं? हम टेस्ट कराते हैं, लेकिन रिपोर्ट 'नॉर्मल' आती है। हमें लगता है कि कोई अनजान बीमारी हो गई है। सच्चाई यह है कि आपको कोई बीमारी नहीं, बल्कि आपकी अपनी खराब आदतें (Habits) नुकसान पहुँचा रही हैं। देर से सोना, पानी कम पीना, हर समय तनाव लेना और खड़े होकर खाना—ये छोटी-छोटी आदतें शरीर की अंदरूनी मशीनरी को दीमक की तरह चाट रही हैं। आइए समझें कि कैसे आपकी लाइफस्टाइल भविष्य की भयंकर बीमारियों का अलार्म है और आयुर्वेद की मदद से इन्हें कैसे सुधारें।

गलत आदतें जो खामोशी से शरीर को बर्बाद कर रही हैं

हम अक्सर अपनी रोज़मर्रा की हरकतों को 'आधुनिक लाइफस्टाइल' मानकर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन शरीर के लिए यह एक भयंकर तबाही है।

  • खड़े होकर और जल्दबाज़ी में खाना: आज हम टीवी या फोन देखते हुए 5 मिनट में खाना निगल लेते हैं। बिना चबाए और खड़े होकर खाने से 'पाचन अग्नि' कनफ्यूज़ हो जाती है, जिससे खाना पचने के बजाय आँतों में सड़ने लगता है और भारीपन पैदा करता है।
  • पानी पीने का गलत तरीका: खाना खाते ही तुरंत गट-गट करके ठंडा या बर्फ का पानी पीना शरीर के लिए ज़हर है। यह पेट की अग्नि को पूरी तरह बुझा देता है, जिससे मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है और वज़न तेज़ी से बढ़ता है।
  • प्लास्टिक और माइक्रोवेव का इस्तेमाल: प्लास्टिक के डिब्बों में गर्म खाना या माइक्रोवेव का रोज़ाना इस्तेमाल आपके शरीर में ज़हरीले केमिकल्स (Toxins) छोड़ रहा है। यही आदत आज थायरॉयड और पीसीओडी (PCOD) जैसी हार्मोनल बीमारियों की सबसे बड़ी जड़ है।
  • नींद के साथ भयंकर समझौता: रात को 12-1 बजे तक स्क्रीन (फोन/लैपटॉप) देखना और सुबह अलार्म बंद करके दोबारा सो जाना। यह आदत आपकी बायोलॉजिकल क्लॉक (Biological Clock) को क्रैश कर रही है, जिससे दिन भर चिड़चिड़ापन और भयंकर थकान रहती है।

आयुर्वेद इस खामोशी को कैसे समझता है? (प्रज्ञापराध और वात प्रकोप)

आधुनिक विज्ञान जिसे केवल 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' कहता है, आयुर्वेद ने उसे हज़ारों साल पहले ही 'प्रज्ञापराध' (अपनी समझ के खिलाफ जाकर गलती करना) के रूप में गहराई से समझाया था।

    • प्रज्ञापराध (Crime against Wisdom): हमें पता होता है कि देर रात तक जागना या जंक फूड खाना खराब है, फिर भी हम वह करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यही 'प्रज्ञापराध' शरीर के त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) को बिगाड़कर सभी बीमारियों को जन्म देता है।
    • वात दोष का बेकाबू होना: गलत आदतें (जैसे रूखा खाना, भाग-दौड़ और तनाव) शरीर में सबसे पहले 'वात' (वायु) को भड़काती हैं। बढ़ा हुआ वात शरीर की नसों को रूखा कर देता है, जिससे घबराहट, गैस और जोड़ों का दर्द होता है।
    • अग्नि का बुझना और 'आम' का निर्माण: जब आप गलत समय पर सोते और खाते हैं, तो पेट की अग्नि बुझ जाती है। बिना पचा खाना आँतों में चिपककर 'आम' (ज़हरीला कचरा) बनाता है, जो खून में घुलकर चेहरे की चमक और बालों की जड़ों को खत्म कर देता है।

जीवा आयुर्वेद का समग्र प्रबंधन क्या है?

हम आपको सिर्फ मल्टीविटामिन या एसिडिटी की गोलियाँ देकर इन चेतावनियों को दबाने का काम नहीं करते। हमारा लक्ष्य आपकी दिनचर्या को सुधारकर असली जड़ को हमेशा के लिए ठीक करना है।

  • नाड़ी से बीमारी की पहचान: हम लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि नाड़ी परीक्षा से शरीर के अंदर चल रहे वात, पित्त और कफ के असली असंतुलन को पकड़ते हैं।
  • अग्नि दीपन और डिटॉक्स: सबसे पहले आपकी मेटाबॉलिक अग्नि को मज़बूत किया जाता है और शरीर में फैले हुए 'आम' (गंदगी) को जड़ी-बूटियों के ज़रिए बाहर निकाला जाता है।
  • दिनचर्या की स्थापना: आपकी प्रकृति के अनुसार सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक का एक सही और आसान रूटीन (Lifestyle Modification) सेट किया जाता है।

आदतों के नुकसान को खत्म करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें शरीर की बिखरी हुई मशीनरी को दोबारा सेट करने और वात को शांत करने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं।

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): खराब आदतों के कारण शरीर में आई भयंकर कमज़ोरी और स्ट्रेस को दूर कर यह शरीर में नई प्राकृतिक ऊर्जा (Stamina) भरता है।
  • त्रिफला (Triphala): खाने की गलत टाइमिंग और पानी कम पीने के कारण खराब हुए पाचन और कब्ज़ को जड़ से खत्म करने के लिए त्रिफला आँतों की डीप क्लीनिंग करता है।
  • गिलोय (Giloy): यह गलत लाइफस्टाइल से कमज़ोर हुई इम्युनिटी को दोबारा ताकतवर बनाती है और खून में फैले हुए टॉक्सिन्स को साफ करती है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): देर रात तक जागने के कारण होने वाले ब्रेन फॉग (Brain Fog) और दिमागी थकान को दूर करने के लिए यह सीधा नर्वस सिस्टम पर काम करती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी शरीर को कैसे नया बनाती है?

जब गलत आदतों के कारण शरीर में गंदगी बहुत ज़्यादा भर जाती है और ये वॉर्निंग साइंस भयंकर बीमारियों का रूप लेने लगते हैं, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी शरीर की डीप क्लीनिंग करती है।

  • अभ्यंग (Abhyanga): भागदौड़ और तनाव से बढ़े हुए वात को शांत करने के लिए औषधीय तेलों से पूरे शरीर की मालिश की जाती है। यह रूखी त्वचा और कमज़ोर नसों को तुरंत ताकत देती है।
  • शिरोधारा (Shirodhara): नींद न आना और भयंकर एंग्जायटी के लिए यह एक जादुई थेरेपी है। माथे पर तेल की लगातार धारा गिराने से दिमाग का सारा तनाव बहकर निकल जाता है।
  • विरेचन (Virechana): यह बाहर का जंक फूड खाने से खराब हुए फैटी लिवर के लिए सबसे अचूक इलाज है। इसमें दस्त लगाकर लिवर और खून की सारी एसिडिटी बाहर निकाल दी जाती है।

नुकसान से बचने के लिए वात-शामक डाइट प्लान

आप जो खाते हैं और जिस तरह खाते हैं, वही आपके शरीर को बचाता या बीमार करता है। अपनी आदतों को सुधारने के लिए सही डाइट का पालन करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

आहार का सिद्धांत:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): सात्विक, हल्का, गर्म और ताज़ा भोजन लें। हमेशा बैठकर, शांति से और अच्छी तरह चबाकर खाएं।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): बासी, फ्रिज में रखा ठंडा खाना, खड़े होकर या चलते-फिरते खाना, और बहुत देर रात भोजन करना।

प्राकृतिक पोषण:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): गाय का शुद्ध घी, ताज़ी हरी सब्ज़ियाँ, मूंग की दाल और मौसमी फल।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): पैकेटबंद और प्रोसेस्ड भोजन, रिफाइंड चीनी, और बहुत ज़्यादा मैदा।

विरुद्ध आहार से बचें:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): संतुलित और संगत (Compatible) खाद्य संयोजन अपनाएँ।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): दूध के साथ खट्टे फल, नमक या मछली का सेवन जो पेट में सीधे ज़हर बनाता है।

दैनिक पेय:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): दिन भर में कम से कम 3 लीटर गुनगुना पानी (बैठकर घूंट-घूंट करके पिएं)।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): खाने के तुरंत बाद भरपेट पानी पीना, बर्फ का ठंडा पानी और कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

जब आप इन छोटी-छोटी गलतियों को इग्नोर करके किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो जाते हैं, तब हम आपकी परेशानी की जड़ तक पहुँचने के लिए गहराई से जाँच करते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले पल्स चेक करके यह गहराई से समझना कि आपके अंदर 'वात', 'पित्त', और 'कफ' का स्तर कितना बिगड़ चुका है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: डॉक्टर आपकी जीभ, आँखें, और त्वचा का रूखापन बहुत बारीकी से चेक करते हैं।
  • पाचन का विश्लेषण: यह देखना कि आपका पेट साफ रहता है या नहीं, क्योंकि कब्ज़ और ब्लोटिंग ही खराब आदतों का सबसे पहला अलार्म होते हैं।
  • लाइफस्टाइल चेक: आपके सोने, जागने, काम करने के तरीके और पानी पीने की आदतों को बहुत गहराई से समझा जाता है, क्योंकि बीमारी का ट्रिगर यहीं है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी जादुई गोली नहीं है जो बिना आपकी आदत बदले आपको रातों-रात ठीक कर दे। शरीर की अंदरूनी मशीनरी को दोबारा रीसेट होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; भारीपन, गैस और एसिडिटी काफी कम होने लगेगी। शरीर हल्का महसूस होगा और नींद अच्छी आएगी।
  • 1 से 3 महीने तक: मेटाबॉलिज़्म सुधरने से वज़न का प्राकृतिक रूप से संतुलन शुरू होगा। दिन भर रहने वाली सुस्ती और चिड़चिड़ापन गायब हो जाएगा।
  • 3 से 6 महीने और उससे अधिक: आपका पूरा शरीर अंदर से डिटॉक्स हो जाएगा। इम्युनिटी इतनी मज़बूत हो जाएगी कि आप पुरानी खराब आदतों के डर से मुक्त होकर एक स्वस्थ जीवन जी सकेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

अपनी आदतों से पैदा हुई बीमारियों के इलाज के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना बहुत ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को लेकर दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द, एसिडिटी जैसे लक्षणों को गोलियों से दबाना ‘अग्नि’ को संतुलित कर और दिनचर्या सुधारकर जड़ से समाधान
शरीर को देखने का नजरिया शरीर को मशीन मानकर केवल प्रभावित हिस्से का इलाज शरीर को संपूर्ण इकाई मानकर ‘प्रज्ञापराध’ (गलत आदतों) को मूल कारण मानना
डाइट और जीवनशैली दवाइयों पर अधिक निर्भरता, आदतों पर कम ध्यान ‘दिनचर्या’ (उठना, खाना, सोना) को ही मुख्य उपचार मानना
इलाज का तरीका त्वरित राहत के लिए दवाओं का उपयोग आहार, दिनचर्या और जड़ी-बूटियों से प्राकृतिक संतुलन
लंबा असर दवा बंद करते ही समस्या दोबारा उभरना शरीर को अंदर से मज़बूत कर स्थायी स्वास्थ्य और अनुशासन

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

अपनी खराब आदतों के साइड इफ़ेक्ट्स को सिर्फ 'आलस' मानकर इग्नोर न करें। अगर आपको शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

  • बिना कारण लगातार वज़न गिरना या बढ़ना: अगर आपकी लाइफस्टाइल खराब है और अचानक आपका वज़न अनियंत्रित हो रहा है, तो यह शुगर या थायरॉयड का अलार्म है।
  • सीने में भारीपन और साँस फूलना: अगर थोड़ा सा काम करने पर ही साँस फूलती है और सीने में जकड़न होती है, तो यह हृदय (Heart) की कमज़ोरी का सीधा संकेत है।
  • मल में खून आना या भयंकर कब्ज़: अगर घंटों टॉयलेट में बैठने की आदत है और मल के साथ खून आ रहा है, तो यह आँतों के डैमेज (बवासीर) की निशानी है।
  • लगातार कई रातों तक नींद न आना: अगर फोन चलाने की आदत के कारण नींद पूरी तरह उड़ चुकी है और भयंकर एंग्जायटी होती है, तो यह नर्वस सिस्टम के क्रैश होने का संकेत है।

निष्कर्ष

हमारा शरीर एक वफादार साथी है जो हमारी गलतियों को लंबे समय तक सहता है। लेकिन जब हम अपनी आदतों (Habits) को नहीं बदलते, तो वह बीमारी के रूप में जवाब देता है। कोई भी बीमारी रातों-रात नहीं होती; आपकी थाली, आपका फोन और आपके सोने का तरीका ही आपके सबसे बड़े दुश्मन बन चुके हैं। गोलियों के सहारे शरीर को खींचना बंद करें। इन अलार्म्स को नज़रअंदाज़ करके जीवन भर दवाइयों का गुलाम बनने की कोई ज़रूरत नहीं है। आयुर्वेद और सही 'दिनचर्या' को अपनाकर आप अंदरूनी मशीनरी को रिपेयर कर सकते हैं। अपनी आदतों को सुधारें, और जीवा आयुर्वेद के साथ हमेशा के लिए स्वस्थ बनें।

FAQs

खड़े होकर पानी पीने से पानी सीधे और बहुत तेज़ी से आँतों में गिरता है, जिससे 'पाचन अग्नि' बुझ जाती है। यह वात दोष को भड़काता है, जो आगे चलकर घुटनों के दर्द (गठिया) का सबसे बड़ा कारण बनता है।

खाना खाते ही शरीर का सारा ब्लड सर्कुलेशन पेट की तरफ चला जाता है ताकि खाना पच सके। नहाने से ब्लड सर्कुलेशन पेट से हटकर त्वचा की तरफ आ जाता है, जिससे पाचन रुक जाता है और भयंकर एसिडिटी होती है।

फोन की नीली रोशनी दिमाग को दिन होने का सिग्नल देती है। इससे 'मेलाटोनिन' (नींद का हार्मोन) बनना बंद हो जाता है। नींद पूरी न होने से शरीर की इम्युनिटी और मरम्मत (Repair) की प्रक्रिया रुक जाती है।

प्रज्ञापराध का मतलब है—अपनी बुद्धि के खिलाफ जाकर जानबूझकर गलती करना। जैसे यह जानते हुए भी कि बाहर का जंक फूड खराब है, फिर भी उसे रोज़ाना खाना। आयुर्वेद इसे सभी बीमारियों की जड़ मानता है।

जी हाँ! प्लास्टिक में गर्म खाना या चाय डालने से उसमें मौजूद केमिकल्स (BPA) खाने में घुल जाते हैं। यह शरीर के हार्मोन्स को पूरी तरह बिगाड़ देता है और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है।

बिल्कुल नहीं! खाली पेट चाय पीने से पेट का एसिड तेज़ी से बढ़ता है। यह आँतों की अंदरूनी परत को जला देता है, जिससे सारा दिन गैस, एसिडिटी और कब्ज़ की शिकायत रहती है।

सबसे पहले अपने खाने और सोने का समय फिक्स करें। 'अश्वगंधा' जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी का इस्तेमाल करें, जो शरीर के स्ट्रेस हार्मोन को कम कर प्राकृतिक स्टैमिना वापस लाती है।

बिल्कुल! औषधीय तेलों से मालिश करने से नसों का रूखापन खत्म होता है। यह गलत आदतों के कारण बढ़े हुए वात (वायु) को तुरंत शांत करती है और शरीर को भारी आराम देती है।

कब्ज़ दूर करने के लिए पानी बैठकर घूंट-घूंट पिएं, खाने में फाइबर और गाय का शुद्ध घी बढ़ाएं, और रात का खाना हल्का रखें। त्रिफला चूर्ण का इस्तेमाल आँतों को अंदर से साफ करता है।

एकदम से सब कुछ न बदलें। सबसे पहले सुबह उठने के तुरंत बाद 2 गिलास गुनगुना पानी पीने की आदत डालें। खाने का समय फिक्स करें और रात को सोने से 1 घंटे पहले स्क्रीन (फोन/टीवी) बंद कर दें। धीरे-धीरे शरीर खुद स्वस्थ होने लगेगा।

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