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गर्मी में Hyperthyroidism और बढ़ जाता है — Heat और Metabolism

Information By Dr. Keshav Chauhan

गर्मी के मौसम में हाइपरथायरायडिज़्म (Hyperthyroidism) के मरीज़ों की परेशानी तेज़ी से बढ़ जाती है। इस बीमारी में थायरॉइड ग्रंथि ज़रूरत से ज़्यादा हार्मोन बनाती है, जिससे शरीर का मेटाबॉलिज़्म तेज़ हो जाता है और अंदरूनी गर्मी भड़क उठती है। बाहर की तेज़ धूप और शरीर की यह अंदरूनी गर्मी मिलकर मरीज़ को पसीने, घबराहट और भयंकर कमज़ोरी से भर देते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यह सीधे तौर पर 'पित्त दोष' के बेकाबू होने का परिणाम है। सही आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और ठंडी तासीर वाले आहार से इस बढ़ी हुई गर्मी और मेटाबॉलिज़्म को प्राकृतिक रूप से शांत किया जा सकता है।

Hyperthyroidism और गर्मी (Heat) का क्या संबंध है?

हाइपरथायरायडिज़्म एक ऐसी स्थिति है जहाँ गले में मौजूद थायरॉइड ग्रंथि बहुत ज़्यादा मात्रा में थायरॉक्सिन हार्मोन बनाने लगती है। एक स्वस्थ इंसान का मेटाबॉलिज़्म खाने को पचाकर सामान्य ऊर्जा बनाता है, लेकिन हाइपरथायरायडिज़्म के मरीज़ का मेटाबॉलिज़्म एक तेज़ भागते हुए इंजन की तरह हो जाता है जो हर समय शरीर में गर्मी (Heat) पैदा करता है। जब गर्मियों में बाहर का तापमान बढ़ता है, तो शरीर इस दोहरी गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाता (Heat Intolerance)। लोग इससे बचने के लिए एसी या भारी दवाओं का सहारा लेते हैं, जो कुछ समय के लिए राहत देते हैं। बिना डॉक्टर की सलाह के सिर्फ एंटी-थायरॉइड दवाओं पर निर्भर रहना लिवर को कमज़ोर कर देता है।

Hyperthyroidism और पित्त वृद्धि से जुड़ी मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

थायरॉइड के अति-सक्रिय होने और गर्मी से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • ग्रेव्स डिज़ीज़ (Graves' Disease): यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो हाइपरथायरायडिज़्म का सबसे बड़ा कारण है।
  • थायरॉइड नोड्यूल्स (Thyroid Nodules): ग्रंथि में छोटी-छोटी गाँठें बन जाना जो अतिरिक्त हार्मोन बनाती हैं।
  • थायरॉइडाइटिस (Thyroiditis): थायरॉइड ग्रंथि में भारी सूजन आ जाना, जिससे हार्मोन खून में लीक होने लगता है।
  • हीट एक्जॉशन (Heat Exhaustion): शरीर का तापमान बढ़ने से चक्कर आना और भयंकर कमज़ोरी महसूस होना

गर्मी में Hyperthyroidism के लक्षण और संकेत

दवाओं से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • अत्यधिक पसीना आना: एसी में बैठने के बावजूद शरीर से भयंकर पसीना छूटना और त्वचा का हमेशा गर्म रहना।
  • दिल की धड़कन तेज़ होना
  •  (Palpitations): बिना कोई काम किए भी छाती में तेज़ धड़कन और घबराहट महसूस होना।
  • तेज़ी से वज़न गिरना: बहुत ज़्यादा खाने के बावजूद शरीर का वज़न लगातार कम होते जाना।
  • हाथों में कंपन (Tremors): हाथों की उँगलियों में हल्का-हल्का काँपना महसूस होना।
  • नींद न आना और चिड़चिड़ापन: शरीर की गर्मी के कारण रात भर करवटें बदलना और बात-बात पर गुस्सा आना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

गर्मी में मेटाबॉलिज़्म और पित्त भड़कने के मुख्य कारण

गर्मियों में हाइपरथायरायडिज़्म बढ़ने के पीछे सिर्फ धूप नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • पित्त दोष का अति-प्रकोप: आयुर्वेद के अनुसार गर्मी का मौसम और मसालेदार खाना 'पित्त' को भड़काता है, जो थायरॉइड ग्रंथि को ओवरएक्टिव कर देता है।
  • मेटाबॉलिज़्म का अनियंत्रित होना: बढ़ा हुआ थायरॉइड हार्मोन शरीर की बेसल मेटाबॉलिक रेट (BMR) को बहुत तेज़ कर देता है।
  • तनाव और एंग्जायटी: मानसिक तनाव नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करता है, जिससे हार्मोनल असंतुलन और गर्मी बढ़ जाती है।

आयोडीन की अधिकता: डाइट में ज़रूरत से ज़्यादा आयोडीन का सेवन ग्रंथि को और ज़्यादा हार्मोन बनाने पर मजबूर कर देता है।

Hyperthyroidism के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इस अत्यधिक गर्मी और तेज़ मेटाबॉलिज़्म को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • थायरॉइड स्टॉर्म (Thyroid Storm): यह एक जानलेवा स्थिति है जहाँ बुखार, धड़कन और घबराहट अचानक बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है।
  • हृदय रोग का खतरा: लगातार तेज़ धड़कन (Atrial Fibrillation) से हार्ट फेलियर या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
  • हड्डियों की कमज़ोरी (Osteoporosis): तेज़ मेटाबॉलिज़्म हड्डियों से कैल्शियम को सोखने लगता है, जिससे वे भुरभुरी हो जाती हैं।
  • आँखों की समस्या (Graves' Ophthalmopathy): आँखें सूजकर बाहर की तरफ निकलने लगती हैं और उनमें भयंकर लालपन आ जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

Hyperthyroidism (भस्मक रोग) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से हाइपरथायरायडिज़्म सिर्फ एक हार्मोन की अधिकता नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'भस्मक रोग', 'पित्त वृद्धि' और 'अति-अग्नि' की श्रेणी में रखा जाता है। जब पाचक अग्नि ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ हो जाती है, तो वह शरीर की सातों धातुओं को भस्म (जलाने) करने लगती है, जिससे इंसान कितना भी खाए, उसका वज़न गिरता ही जाता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर ढूँढते हैं कि पित्त और वात का स्तर कितना बिगड़ चुका है। आयुर्वेद में बस हार्मोन को ज़बरदस्ती दबाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि अति-अग्नि शांत हो, शरीर को अंदरूनी ठंडक मिले और ग्रंथि प्राकृतिक रूप से अपना काम सामान्य करे।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: घबराहट, पसीना आने के समय और धड़कन की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पुरानी T3, T4, TSH रिपोर्ट और खायी जा रही एंटी-थायरॉइड दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, मसालेदार खाने की आदत और नींद को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: पित्त असंतुलन को पकड़ने के बाद ही ग्रंथि को शांत करने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

पित्त शांत करने और Metabolism को बैलेंस करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में शरीर की गर्मी कम करने, मेटाबॉलिज़्म को धीमा करने और थायरॉइड को संतुलित करने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • गिलोय (Giloy): यह इम्युनिटी को बैलेंस करती है और शरीर की भयंकर गर्मी (पित्त) को तुरंत शांत करती है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): यह नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती है, धड़कन को सामान्य करती है और एंग्जायटी व चिड़चिड़ापन मिटाती है।
  • शतावरी (Shatavari): यह शरीर के अंदरूनी रूखेपन और धातु क्षय को रोकती है, जिससे वज़न गिरने की प्रक्रिया थम जाती है।
  • धनिया (Coriander): सूखे धनिये का पानी थायरॉइड के लिए प्राकृतिक रूप से ठंडा और संतुलनकारी होता है।

अति-अग्नि को शांत करने के लिए पंचकर्म: पित्त शोधन और शिरोधारा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, अति-सक्रिय मेटाबॉलिज़्म को शांत करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन और शिरोधारा: जब बीमारी पुरानी हो और इंसान गर्मी से बेहाल हो, तो पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के गहरे डिटॉक्स की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • पित्त का डिटॉक्स (विरेचन): इसमें औषधीय घी पिलाकर आँतों और लिवर में जमे हुए दूषित पित्त और गर्मी को मल के रास्ते पूरी तरह बाहर निकाला जाता है।
  • मानसिक शांति के लिए शिरोधारा: माथे पर ठंडे औषधीय तेल या दूध की धार गिराई जाती है, जो स्ट्रेस हार्मोन को कम कर थायरॉइड ग्रंथि को रिलैक्स करती है।

Hyperthyroidism के रोगी के लिए सही और शुद्ध आहार

अति-अग्नि को शांत करने के लिए पित्त दोष को कम करने वाला, ठंडा और स्निग्ध आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • ठंडा और सुपाच्य भोजन: पुराना चावल, मूंग की दाल, लौकी और परवल का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह पेट को ठंडा रखते हैं।
  • ताज़े और मीठे फल: खरबूज़ा, तरबूज़, सेब और नारियल पानी शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाते हैं और पित्त शांत करते हैं।
  • दूध और शुद्ध घी: डाइट में देसी घी शामिल करें, यह 'भस्मक रोग' (अति-अग्नि) को बुझाने का सबसे बेहतरीन उपाय है।

क्या न खाएँ?

  • तीखा और खट्टा खाना: लाल मिर्च, अचार, टमाटर और खट्टे फल शरीर में सीधे पित्त भड़काते हैं, इनका सेवन बिल्कुल बंद कर दें।
  • गर्म तासीर वाली चीज़ें: लहसुन, अदरक, बाजरा और गुड़ का सेवन कम से कम करें।
  • चाय-कॉफी और कैफीन: ये चीज़ें नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करती हैं और दिल की धड़कन (Palpitations) को भयंकर रूप से बढ़ा देती हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और गर्मी लगने के लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी थायरॉइड रिपोर्ट और रोज़ाना खायी जाने वाली गोलियों के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और तीखी चीज़ें लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और वज़न घटने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो मेटाबॉलिज़्म को नॉर्मल कर सके।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगता है?

हाइपरथायरायडिज़्म का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे बीमारी कितनी पुरानी है और दवाओं पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर बीमारी की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही घबराहट और धड़कन नॉर्मल होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर वज़न बहुत ज़्यादा गिर चुका है, तो थायरॉइड नॉर्मल होने और धातुओं के वापस बनने में 6 महीने से 1 साल भी लग सकता है।
  • स्थायी परिणाम: डाइट का कड़ाई से पालन करने पर अति-अग्नि शांत हो जाती है और भविष्य में बिना भारी दवाओं के जीवन सामान्य हो जाता है।

मरीज़ों का भरोसा – रोग मुक्त जीवन का अनुभव

मैं फरीदाबाद से सुनील सिंह हूँ। कुछ समय पहले मेरा वजन अचानक बढ़ने लगा, जिसके बाद जांच कराने पर पता चला कि मुझे थायरॉइड की समस्या है। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन उनसे मेरे वजन और स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हुआ।इसके बाद मेरी हालत और बिगड़ गई और दोबारा जांच में पता चला कि मुझे फैटी लिवर (ग्रेड 3) और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याएँ भी हैं। इस दौरान मैं बहुत तनाव में रहने लगा और मेरी नींद भी प्रभावित हो गई।फिर मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा और उसी के अनुसार इलाज शुरू किया।मुझे आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ-साथ मेरे लिए विशेष डाइट प्लान भी दिया गया। धीरे-धीरे मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरा फैटी लिवर ग्रेड 3 से घटकर ग्रेड 1 हो गया।आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ और आयुर्वेदिक जीवनशैली को सभी को अपनाने की सलाह देता हूँ।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक उपचार और पित्त-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य Anti-thyroid दवाओं, रेडियोआयोडीन या सर्जरी से ग्रंथि की गतिविधि रोकना पित्त दोष और अति-अग्नि को शांत कर थायरॉइड को प्राकृतिक संतुलन में लाना
नज़रिया थायरॉइड को केवल अत्यधिक हार्मोन बनाने वाली ग्रंथि मानना दोष असंतुलन और बढ़ी हुई अग्नि को मूल कारण मानना
उपचार तरीका भारी दवाएँ, रेडियोएक्टिव आयोडीन और सर्जरी पर निर्भरता गिलोय, ब्राह्मी और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से ग्रंथि को शांत करना
डाइट और लाइफस्टाइल दवाओं और हार्मोन कंट्रोल पर मुख्य फोकस पित्त-शामक आहार, तनाव नियंत्रण और संतुलित दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर जीवनभर Hypothyroidism की गोली पर निर्भरता का खतरा प्राकृतिक हार्मोन संतुलन और दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ मिलना

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

समय पर सलाह लेने से शरीर को हृदय की बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

गर्मी के मौसम में हाइपरथायरायडिज़्म का बढ़ना शरीर में 'पित्त दोष' के भड़कने और 'अति-अग्नि' का स्पष्ट संकेत है। इस बीमारी में थायरॉइड ग्रंथि मेटाबॉलिज़्म को इतना तेज़ कर देती है कि शरीर अंदर से जलने लगता है। बाहर की धूप और मसालेदार खाना इस भस्मक रोग को और भड़काते हैं, जिससे भयंकर पसीना, घबराहट और वज़न तेज़ी से गिरता है। आधुनिक दवाएँ ग्रंथि को ब्लॉक या नष्ट करने का काम करती हैं, जबकि आयुर्वेद शरीर की बढ़ी हुई इस आग (पित्त) को ब्राह्मी, गिलोय और ठंडे आहार से शांत करता है, जिससे थायरॉइड प्राकृतिक रूप से संतुलित हो जाता है।

FAQs

हाँ, हाइपरथायरायडिज़्म में शरीर का मेटाबॉलिज़्म तेज़ होने के कारण अंदरूनी गर्मी बहुत ज़्यादा होती है। जब गर्मियों में बाहर का तापमान बढ़ता है, तो शरीर 'हीट इनटॉलरेंस' (Heat Intolerance) का शिकार हो जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार यह 'भस्मक रोग' है। अति-सक्रिय थायरॉइड पाचक अग्नि को इतना तेज़ कर देता है कि वह शरीर की 'रस' और 'माँस' धातुओं को जलाने (भस्म करने) लगता है, जिससे वज़न तेज़ी से गिरता है।

बिल्कुल, बढ़ा हुआ पित्त शरीर में भयंकर गर्मी पैदा करता है और बढ़ा हुआ वात नर्वस सिस्टम को अस्थिर कर देता है, जिससे दिल की धड़कन तेज़ होती है और हाथों में कंपन (Tremors) आता है।

दूध और गाय का शुद्ध घी तासीर में ठंडे और स्निग्ध होते हैं। ये शरीर की 'अति-अग्नि' को बुझाते हैं, पित्त को शांत करते हैं और शरीर की सूखी हुई धातुओं को पोषण देकर वज़न गिरने से रोकते हैं।

हाँ, हाइपरथायरायडिज़्म के मरीज़ों को ज़्यादा आयोडीन युक्त नमक या सीफूड नहीं खाना चाहिए, क्योंकि यह थायरॉइड ग्रंथि को और ज़्यादा हार्मोन बनाने के लिए उत्तेजित कर देता है।

हाँ, ब्राह्मी दिमाग और नर्वस सिस्टम को गहरा आराम देती है। यह बढ़े हुए स्ट्रेस हार्मोन को कम कर थायरॉइड ग्रंथि को रिलैक्स करती है, जिससे चिड़चिड़ापन और घबराहट तुरंत शांत होती है।

बिल्कुल, कैफीन सीधे नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करता है। हाइपरथायरायडिज़्म में धड़कन पहले से तेज़ होती है, ऐसे में चाय-कॉफी का सेवन हार्ट रेट को खतरनाक स्तर तक बढ़ा सकता है।

ऑटोइम्यून प्रभाव के कारण आँखों के पीछे की माँसपेशियों और ऊतकों में भारी सूजन आ जाती है, जिससे आँखें बाहर की तरफ उभरी हुई (Bulging eyes) और लाल दिखने लगती हैं।

हाँ, मानसिक तनाव शरीर में पित्त और वात दोनों को बढ़ा देता है। यह हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ कर थायरॉइड ग्रंथि को ओवरएक्टिव कर देता है, जिससे बीमारी कई गुना भड़क जाती है।

हाँ, शिरोधारा पंचकर्म में माथे पर औषधीय तेल की धार गिराई जाती है, जो पिट्यूटरी ग्रंथि और नर्वस सिस्टम को शांत करती है। यह स्ट्रेस को मिटाकर हाइपरथायरायडिज़्म को प्राकृतिक रूप से बैलेंस करने में जादुई असर दिखाती है।

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