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Joint Pain से परेशान हैं तो यह patient journey ज़रूर सुनें

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 20 Jun, 2026
  • category-iconUpdated on 20 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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अक्सर हम शरीर के एक या दो जोड़ों में होने वाले दर्द को थकान, मौसम का असर या बढ़ती उम्र का तकाजा समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन जब यह दर्द शरीर के हर छोटे-बड़े जोड़ को अपनी गिरफ्त में ले लेता है, तो ज़िंदगी थम सी जाती है। अगर आप भी लंबे समय से जोड़ों में होने वाले दर्द से जूझ रहे हैं, तो मंजू मिश्रा जी की यह कहानी आपको ज़रूर सुननी चाहिए।

मंजू जी के लिए यह तकलीफदेह सफर शरीर में एक हल्की सी थकावट और उंगलियों में सुबह-सुबह होने वाली जकड़न से शुरू हुआ था। शुरू में लगा कि काम की अधिकता के कारण ऐसा हो रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द उनके घुटनों, कंधों, कलाइयों और टखनों तक फैल गया। पिछले 2 सालों से जॉइंट पेन ने उनकी ज़िंदगी को एक बुरे सपने में बदल दिया था।

वक्त बीतने के साथ मंजू जी को समझ आ गया कि यह कोई सामान्य दर्द नहीं है। शरीर के अंदर कुछ ऐसा गंभीर असंतुलन चल रहा था, जिसने उनके सभी जोड़ों को एक साथ निशाना बना लिया था और उनकी अपनी आज़ादी उनसे छीन ली थी।

सुबह की जकड़न और दर्द के साये में रोज़ की जंग

मल्टीपल जॉइंट पेन (Multiple Joint Pain/Arthritis) इंसान को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से तोड़कर रख देता है। 2 सालों से मंजू जी के लिए हर सुबह दर्द का एक नया पहाड़ लेकर आती थी:

  • बिस्तर से उठने की लाचारी: सुबह उठते ही शरीर इतना जकड़ (Morning Stiffness) जाता था कि बिस्तर से सीधा खड़ा होना भी नामुमकिन लगता था। जोड़ों को खोलने और सामान्य रूप से चलने-फिरने में ही घंटों लग जाते थे।
  • हर जोड़ में सूजन और टीस: घुटनों और कलाइयों में हमेशा लालिमा और सूजन बनी रहती थी। कोई हल्का सा भी छू ले तो ऐसा लगता था जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो।
  • रोज़मर्रा के काम करने में दिक्कत: जो मंजू जी कल तक पूरे घर का काम अकेले हंसते-हंसते संभाल लेती थीं, उनके लिए एक गिलास पानी उठाना या आटा गूंधना भी एक सज़ा बन गया था। इस लाचारी ने उन्हें अंदर तक निराश कर दिया था।

2 साल तक पेनकिलर्स का सहारा और अधूरा संतोष

तकलीफ जब बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो मंजू जी ने डॉक्टरों के चक्कर लगाने शुरू किए। लेकिन इन 2 सालों में उन्हें सिर्फ एक अस्थायी धोखा ही मिला:

  • गोलियों का जाल: उन्हें भारी-भरकम पेनकिलर्स (Painkillers) और स्टेरॉयड दिए गए। दवा खाने के कुछ घंटों तक शरीर सुन्न हो जाता और दर्द कम लगता, लेकिन जैसे ही असर खत्म होता, दर्द पहले से ज़्यादा ताकत के साथ वापस आ जाता।
  • साइड इफेक्ट्स की नई बीमारी: 2 साल तक लगातार दवाइयां खाने की वजह से उनके पेट में एसिडिटी (Acid reflux) और जलन रहने लगी। लिवर भी कमज़ोर पड़ने लगा था।
  • असली जड़ को समझने की शुरुआत: बार-बार लौटते दर्द और पेट की नई बीमारियों ने उन्हें यह साफ कर दिया था कि दर्द को सुन्न करने वाली ये गोलियां उन्हें अंदर से और खोखला कर रही हैं, ठीक नहीं कर रही हैं।

आयुर्वेद की तरफ उठाया पहला कदम

पेनकिलर्स के साइड इफेक्ट्स और 2 साल की लाचारी से तंग आकर मंजू जी ने तय किया कि अब वे सिर्फ दर्द को दबाएंगी नहीं, बल्कि इसके असली कारण को जड़ से खत्म करेंगी।

इसी दौरान उन्होंने आयुर्वेद का रास्ता चुना। जब उन्हें पता चला कि आयुर्वेद सिर्फ बाहरी जोड़ों पर नहीं, बल्कि पाचन (Digestion), टॉक्सिन्स (आम) और शरीर के वात दोष पर काम करके बीमारी को रिवर्स करता है, तो उनके मन में एक नई उम्मीद जगी।

बीमारी की असली जड़ः जाँच के बाद क्या सामने आया?

आयुर्वेदिक डॉक्टर से पहली ही मुलाकात में मंजू जी को अपनी बीमारी की असली वजह समझ आ गई। डॉक्टर ने सिर्फ उनके सूजे हुए जोड़ों को नहीं देखा, बल्कि उनकी खराब पाचन शक्ति और शरीर में भरे हुए ज़हरीले तत्वों (Toxins) को भी समझा:

  • आम और वात का गठजोड़ (आमवात): डॉक्टर ने बताया कि पिछले कई सालों से उनका पाचन ठीक नहीं था। खाया हुआ भोजन पच नहीं रहा था, बल्कि सड़कर एक चिपचिपा ज़हरीला पदार्थ (जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं) बना रहा था।
  • जोड़ों में ब्लॉकेज: बढ़ा हुआ 'वात दोष' इस ज़हरीले 'आम' को शरीर के हर जोड़ तक ले गया। वहां जाकर यह आम चिपक गया, जिससे जोड़ों की चिकनाई खत्म हो गई और सूजन व दर्द (Amavata / Rheumatoid Arthritis के लक्षण) पैदा हो गया।
  • मंद अग्नि: उनके शरीर की पाचन अग्नि बहुत कमज़ोर हो गई थी, इसलिए किसी भी बाहरी दवा का असर उनके शरीर पर नहीं हो पा रहा था।

आयुर्वेदिक उपचार की शुरुआत

डॉक्टर की बात मानकर मंजू जी ने इस बीमारी को ठीक करने की ठान ली। इसके लिए उन्होंने एक कड़ा आयुर्वेदिक रूटीन फॉलो किया:

  • आम (टॉक्सिन्स) को पचाने की दवाइयां: सबसे पहले उनके जोड़ों में जमे टॉक्सिन को पिघलाने के लिए दीपन-पाचन (पाचन अग्नि बढ़ाने वाली) औषधियाँ दी गईं। जब तक पेट साफ नहीं होगा, जोड़ों की सूजन नहीं जा सकती।
  • वातनाशक और सूजन कम करने वाली औषधियां: रास्ना, एरंड, निर्गुंडी और सिंहनाद गुग्गुल जैसी जड़ी-बूटियां दी गईं, जिन्होंने शरीर के वात को शांत किया और जोड़ों की लालिमा खींची।
  • वालुका स्वेद (रेत की पोटली से सिकाई): चूंकि उनके जोड़ों में 'आम' फंसा था, इसलिए सीधे तेल की मालिश मना की गई। इसके बजाय गर्म रेत की विशेष पोटली (वालुका स्वेद) से उनके जोड़ों की सूखी सिकाई की गई, जिससे जकड़न में तुरंत आराम मिला।
  • डाइट में कड़े बदलाव: वात और आम बढ़ाने वाला खाना (जैसे दही, चावल, राजमा, मैदा और ठंडी चीजें) पूरी तरह बंद कर दिया गया। इसकी जगह अदरक, सोंठ, लहसुन और गर्म पानी को डाइट में शामिल किया गया।

सेहतमंद बदलाव: कैसे बदली मंजू जी की आदतें

मंजू जी की लाइफस्टाइल रातों-रात नहीं बदली थी। 2 साल पुराने दर्द को हराने में थोड़ा वक्त लगा। पर जब ये नई आदतें उनके रूटीन का हिस्सा बनीं, तो उन्हें समझ आ गया कि दर्द-मुक्त शरीर कोई चमत्कार नहीं है भाई, ये बस आपकी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी आदतों का कमाल है:

  • गर्म और देसी खान-पान: ठंडी छाछ और दही की जगह उनकी थाली में हल्दी, लहसुन, मेथी और सोंठ शामिल हो गए। इन देसी चीजों ने शरीर के सारे टॉक्सिन्स पिघला दिए और सूजन छूमंतर हो गई।
  • टाइमिंग पर फोकस: घर के काम चाहे जितने हों, अब लंच-डिनर और सोने का वक्त एकदम फिक्स था। इससे उनके कमज़ोर पाचन और शरीर को हील (Heal) होने का पूरा टाइम मिला।
  • ठंडक से बचाव: फ्रिज का पानी और सीधे AC की ठंडी हवा को उन्होंने एकदम छोड़ दिया। दिन भर सिर्फ गुनगुना पानी पीने से 'वात दोष' शांत रहा और जोड़ों की सिकुड़न खत्म हो गई।
  • सुबह की हल्की स्ट्रेचिंग: बिस्तर से झटके से उठने के बजाय, 10 मिनट की हल्की स्ट्रेचिंग (सूक्ष्म व्यायाम) करना उनका नियम बन गया। इस छोटी सी आदत से सुबह की वो भयंकर जकड़न गायब हो गई।
  • वात बढ़ाने वाले खाने से तौबा: राजमा, छोले, चावल, बासी या जंक फूड? उसे तो मंजू जी ने हमेशा के लिए 'ना' बोल दिया। घर की सादी दाल-रोटी ही उनके लिए सबसे तगड़ी दवा साबित हुई।

इलाज का सफरः 2 साल का दर्द महीनों में हुआ कम

मंजू जी की कड़ी मेहनत और सही आयुर्वेदिक उपचार का असर अब उनकी सेहत में साफ झलकने लगा था:

  • पहला महीना (जकड़न से आज़ादी): सबसे पहला फर्क उनके पाचन और सुबह की जकड़न पर दिखा। गर्म पोटली की सिकाई और सही डाइट से जोड़ों का भारीपन कम होने लगा।
  • दूसरा महीना (सूजन में कमी): 2 साल से जो कलाइयों और घुटनों में लालिमा और सूजन थी, वह आधी रह गई। अब उन्हें आटा गूंधने या चलने-फिरने में चीख नहीं निकलती थी।
  • तीसरा और चौथा महीना (सामान्य जीवन की वापसी): महीनों के अनुशासन और आयुर्वेद के प्रभाव से उनका दर्द लगभग 80% तक खत्म हो गया। उन्होंने पेनकिलर्स खाना पूरी तरह बंद कर दिया और अब वे खुशी-खुशी अपने घर की ज़िम्मेदारी दोबारा संभाल रही हैं।

निष्कर्ष

मंजू जी का ये सफर उन सब लोगों के लिए उम्मीद है, जिन्हें लगता है कि अब तो ताउम्र जोड़ों के दर्द के साथ ही जीना पड़ेगा। उनके इस तजुर्बे ने एक बात तो एकदम साफ कर दी कि पेनकिलर खाते रहना कोई इलाज नहीं है। अगर आप अपने पेट (पाचन) को ठीक कर लें, शरीर की अंदरूनी गंदगी को बाहर का रास्ता दिखा दें और आयुर्वेद के देसी तरीकों को अपना लें... तो 2 साल तो क्या, सालों पुराने दर्द को भी हमेशा के लिए जड़ से उखाड़ फेंका जा सकता है। 

References

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC12680288/

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC2696782/

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार, जब खराब पाचन के कारण शरीर में 'आम' (टॉक्सिन) बनता है और बढ़े हुए 'वात' के साथ मिलकर जोड़ों में जाकर चिपक जाता है, तो शरीर के हर छोटे-बड़े जोड़ में दर्द और जकड़न शुरू हो जाती है (जिसे आमवात कहते हैं)।

नहीं! अगर जोड़ों में भारी सूजन, लालिमा और गर्माहट (आर्थराइटिस/Rheumatoid Arthritis) है, तो तेल की मालिश नुकसान कर सकती है और दर्द बढ़ा सकती है। ऐसे में सूखी सिकाई (जैसे बालू/रेत की पोटली) ज़्यादा असरदार होती है।

यदि बीमारी बहुत पुरानी होकर हड्डियों को पूरी तरह टेढ़ा (Deformity) न कर चुकी हो, तो आयुर्वेद में पंचकर्म, सही डाइट और औषधियों से इसे पूरी तरह नियंत्रित और ठीक किया जा सकता है।

 सोंठ (सूखी अदरक), लहसुन, हल्दी, मेथी दाना, अजवाइन और गुनगुना पानी ये सभी चीजें शरीर के वात को शांत करती हैं और जोड़ों के दर्द में जादुई असर दिखाती हैं।

आयुर्वेदिक इलाज शरीर के अंदरूनी तंत्र पर काम करता है। मंजू जी जैसे क्रॉनिक (पुराने) मामलों में आराम पहले महीने से महसूस होने लगता है, लेकिन बीमारी को जड़ से खत्म करने में 3 से 6 महीने या उससे थोड़ा अधिक समय लग सकता है।

हाँ, स्ट्रेस से शरीर में 'वात दोष' भड़कता है और इम्यूनिटी कमज़ोर होती है, जिससे जोड़ों का दर्द और जकड़न अचानक बहुत ज्यादा बढ़ सकती है।

सुबह उठकर खाली पेट गुनगुने पानी में थोड़ा सा सोंठ पाउडर या अजवाइन उबालकर पिएं। इसके अलावा सुबह उठते ही बिस्तर पर ही उंगलियों और टखनों की हल्की-हल्की स्ट्रेचिंग (सूक्ष्म व्यायाम) करें।

दही और खट्टी छाछ जोड़ों के दर्द (विशेषकर आमवात) में ज़हर का काम करती हैं, इन्हें बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। दूध में चुटकी भर हल्दी या सोंठ डालकर पिया जा सकता है।

नहीं। कोई भी एलोपैथिक दवा एकदम से बंद नहीं करनी चाहिए। जैसे-जैसे आयुर्वेदिक दवाओं से आराम मिलता है, डॉक्टर धीरे-धीरे पेनकिलर्स की डोज़ खुद कम कर देते हैं।

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