Diseases Search
Close Button
 
 

बुज़ुर्ग माता -पिता की Memory कम हो रही - Normal Ageing या Dementia?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 16 May, 2026
  • category-iconUpdated on 10 Jun, 2026
  • category-iconMental Health
  • blog-view-icon5067

शाम का समय है, आपके बुज़ुर्ग पिता अपने चश्मे को पूरे घर में ढूँढ रहे हैं, जबकि चश्मा उनके सिर पर ही रखा है। या फिर आपकी माँ ने गैस पर दूध उबलने के लिए रखा और उसे पूरी तरह भूल गईं। अक्सर हम इन छोटी-छोटी घटनाओं को देखकर मुस्कुरा देते हैं या यह सोचकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि "उम्र हो गई है, बुढ़ापे में याददाश्त कमज़ोर होना तो आम बात है।" लेकिन क्या हर भूलक्कड़पन महज़ ढलती उम्र का हिस्सा होता है?

जब आपके माता-पिता बार-बार एक ही सवाल पूछने लगें, रोज़मर्रा के उन कामों को भूलने लगें जो वे दशकों से करते आ रहे हैं, या अपने ही घर के आस-पास का रास्ता भटक जाएँ, तो यह महज़ साधारण 'बुढ़ापा' नहीं है। यह उनके दिमाग के अंदर तेज़ी से सिकुड़ रही कोशिकाओं और नसों का एक गंभीर संकेत है। याददाश्त का यह लगातार गिरता स्तर डिमेंशिया Dementia या अल्ज़ाइमर Alzheimer's की शुरुआत हो सकता है। उम्र के इस नाज़ुक पड़ाव पर उन्हें आपके धैर्य से ज़्यादा, सही समय पर सही आयुर्वेदिक मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, ताकि उनके दिमाग की यादों का यह ख़ज़ाना हमेशा के लिए खाली न हो जाए।

बुज़ुर्गों में भूलने की आदत शरीर और दिमाग में क्या संकेत देती है?

उम्र बढ़ने के साथ शरीर के अन्य अंगों की तरह दिमाग की कार्यक्षमता में भी थोड़ा बदलाव आना प्राकृतिक है, लेकिन 'नॉर्मल एजिंग' और 'डिमेंशिया' के बीच एक बहुत बारीक लेकिन स्पष्ट रेखा होती है।

  • सामान्य उम्र बढ़ना Normal Ageing: इसमें व्यक्ति कभी-कभार किसी का नाम या कोई तारीख भूल सकता है, लेकिन कुछ समय बाद उसे वह याद आ जाता है। उन्हें यह एहसास होता है कि वे कुछ भूल रहे हैं। उनके निर्णय लेने की क्षमता और रोज़मर्रा के काम जैसे नहाना, खाना, कपड़े पहनना स्वतंत्र रूप से चलते रहते हैं।
  • डिमेंशिया Dementia: यह दिमाग की नसों Neurons के लगातार डैमेज होने की एक प्रगतिशील Progressive बीमारी है। इसमें याददाश्त के साथ-साथ सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता पूरी तरह खत्म होने लगती है। व्यक्ति यह भूल जाता है कि फोन का इस्तेमाल कैसे करना है, या कंघी से बाल कैसे संवारने हैं। यह दिमाग में एक ऐसे खालीपन का संकेत है जहाँ से पुरानी यादें और वर्तमान की समझ तेज़ी से मिट रही है।

डिमेंशिया Dementia और मेमोरी लॉस किन प्रकारों में सामने आता है?

आयुर्वेद के अनुसार, हर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक प्रकृति दोष अलग होती है। बुढ़ापे में जब दिमाग की नसें कमज़ोर होती हैं, तो शरीर के बिगड़े हुए दोषों के आधार पर इसके लक्षण मुख्य रूप से तीन प्रकारों में देखे जा सकते हैं:

  • वात-प्रधान मेमोरी लॉस: बुढ़ापा वैसे भी वात का काल होता है। इस स्थिति में दिमाग में अत्यधिक रूखापन आ जाता है। मरीज़ बहुत ज़्यादा एंग्जायटी Anxiety और डर का शिकार रहता है। याददाश्त अचानक से गायब हो जाती है और उनके स्वभाव में भारी घबराहट और अस्थिरता देखने को मिलती है। बात करते-करते अचानक विषय भूल जाना वात के असंतुलन का स्पष्ट लक्षण है।
  • पित्त-प्रधान मेमोरी लॉस: इस स्थिति में नसों के डैमेज होने के साथ-साथ मरीज़ में भारी गुस्सा और चिड़चिड़ापन देखा जाता है। जब वे कोई चीज़ भूलते हैं, तो वे अपनी हताशा दूसरों पर निकालते हैं। आयुर्वेद इसे दिमाग मस्तिष्क में अत्यधिक 'ऊष्मा' या इन्फ्लेमेशन Inflammation का बढ़ना मानता है।
  • कफ-प्रधान मेमोरी लॉस: इसमें दिमाग बहुत सुस्त Sluggish हो जाता है। मरीज़ के अंदर कुछ भी नया सीखने या समझने की इच्छा खत्म हो जाती है। वे भारी डिप्रेशन में चले जाते हैं, घंटों एक ही जगह चुपचाप बैठे रहते हैं और दिमागी प्रतिक्रियाएं बहुत धीमी हो जाती हैं।

क्या आपके माता-पिता में भी डिमेंशिया के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

दिमाग का डैमेज रातों-रात नहीं होता। डिमेंशिया बहुत पहले से कुछ अलार्म बजाता है, जिसे हम अक्सर सामान्य थकावट या 'बुढ़ापे की सठियाहट' मानकर टाल देते हैं। अगर आपको अपने माता-पिता में रोज़ाना ये संकेत दिख रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • हाल ही की घटनाएँ भूल जाना: बीस साल पुरानी बातें उन्हें साफ याद रहती हैं, लेकिन सुबह नाश्ते में क्या खाया था या कल कौन मिलने आया था, यह वे बिल्कुल भूल जाते हैं।
  • चीज़ों को अजीब जगहों पर रखना: चाबियों को फ्रिज में रख देना, या टीवी का रिमोट अलमारी में कपड़ों के बीच रख देना और फिर उसे ढूँढते हुए परेशान होना।
  • समय और जगह का भ्रम Disorientation: अपने ही मोहल्ले में टहलते हुए रास्ता भूल जाना या दिन और रात के बीच का फर्क समझने में असमर्थ होना।
  • व्यक्तित्व में अचानक बदलाव: जो माता-पिता पहले बहुत शांत और समझदार थे, उनका अचानक बहुत शक्की हो जाना, डर जाना या छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक हो जाना।

इस कमज़ोर याददाश्त को नज़रअंदाज़ करने में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

अक्सर परिवार वाले जानकारी के अभाव में कुछ ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं, जो बुज़ुर्गों की मानसिक स्थिति को और ज़्यादा खराब कर देती हैं:

  • बीमारी को स्वीकार न करना: इसे केवल 'बुढ़ापा' मानकर इलाज न कराना, जिससे दिमाग की जो नसें बचाई जा सकती थीं, वे भी हमेशा के लिए डेड Dead हो जाती हैं।
  • गुस्सा करना या बहस करना: जब बुज़ुर्ग बार-बार एक ही सवाल पूछते हैं, तो उन पर झल्लाना या उन्हें गलत साबित करने की कोशिश करना। इससे उनके अंदर असुरक्षा और डर बढ़ जाता है।
  • नींद की गोलियों का अत्यधिक प्रयोग: उनकी बेचैनी शांत करने के लिए उन्हें रोज़ाना भारी स्लीपिंग पिल्स Sleeping pills देना, जो उनके दिमाग को और ज़्यादा सुन्न कर देती हैं और मेमोरी लॉस की गति को दुगना कर देती हैं।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएँ: अगर सही समय पर इलाज न हो, तो यह स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि मरीज़ खाना निगलना भूल जाता है, अपने बच्चों को पहचानने से इंकार कर देता है और पूरी तरह बिस्तर पर निर्भर Bedridden हो जाता है।

आयुर्वेद डिमेंशिया और याददाश्त कम होने को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे डिमेंशिया, अल्ज़ाइमर या न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग Neurodegenerative disease कहता है, आयुर्वेद उसे 'स्मृति नाश', 'मज्जा धातु क्षय' और 'प्राण वात' के गंभीर प्रकोप के विज्ञान से बहुत गहराई से समझता है।

  • प्राण वात और मनोवह स्रोतस की रुकावट: दिमाग को चलाने वाली मुख्य ऊर्जा 'प्राण वात' है। जब गलत खान-पान, मानसिक तनाव और बढ़ती उम्र के कारण प्राण वात बिगड़ता है, तो यह 'मनोवह स्रोतस' दिमाग के चैनल्स को ब्लॉक कर देता है, जिससे बुद्धि समझने की क्षमता और स्मृति याद रखने की क्षमता का संपर्क टूट जाता है।
  • मज्जा धातु Nervous Tissue का सूखना: शरीर में सातों धातुओं का पोषण सही से न होने पर अंतिम धातुएं मज्जा Nerves और शुक्र Ojas/Immunity सूखने लगती हैं। मज्जा के सूखने से दिमाग सिकुड़ने लगता है Brain Atrophy।
  • ओजस Ojas का कम होना: आयुर्वेद के अनुसार, 'ओजस' हमारे शरीर और दिमाग की जीवन शक्ति है। जब शरीर में 'आम' Toxins बढ़ता है और पाचन कमज़ोर होता है, तो ओजस खत्म होने लगता है और बुज़ुर्गों के चेहरे की चमक और याददाश्त दोनों गायब होने लगती हैं।

दिमाग को पोषण देने और याददाश्त बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक डाइट

बुज़ुर्गों का आहार ऐसा होना चाहिए जो पचने में आसान हो और सीधे उनके दिमाग मज्जा धातु को ताक़त दे। डिमेंशिया की गति को रोकने के लिए इस सात्विक और आयुर्वेदिक डाइट का पालन करना अनिवार्य है।

आहार की श्रेणी क्या खाएं फायदेमंद - दिमाग को ताक़त देने वाले क्या न खाएं ट्रिगर फूड्स - रूखापन और वात बढ़ाने वाले
अनाज Grains पुराना चावल, मूंग दाल की खिचड़ी, दलिया, ओट्स, ज्वार। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, पिज़्ज़ा, अत्यधिक बासी रोटी।
वसा Fats देसी गाय का शुद्ध घी दिमाग के लिए सर्वश्रेष्ठ अमृत, ऑलिव ऑयल, थोड़ा सा नारियल तेल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, डालडा, बहुत अधिक प्रसंस्कृत मक्खन।
सब्ज़ियाँ Vegetables लौकी, तरोई, कद्दू पेठा, पालक, गाजर सभी अच्छी तरह पकी हुई और नर्म। कच्चा सलाद, अत्यधिक फूलगोभी, भारी कटहल, बैंगन वात बढ़ाते हैं।
फल और मेवे Fruits & Nuts रात भर भीगे हुए बादाम और अखरोट दिमाग की शेप वाले, सेब, पपीता, मुनक्का। डिब्बाबंद और बिना मौसम के फल, बाज़ार के पैकेटबंद रूखे नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ Beverages रात में हल्दी और अश्वगंधा वाला गर्म दूध, ताज़ा नारियल पानी, ब्राह्मी की चाय। बहुत ज़्यादा कैफीन कॉफी नसों को सुखाती है, कोल्ड ड्रिंक्स, शराब।

दिमाग को ताक़त देने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य 'मेध्य रसायन' Brain Tonics दिए हैं, जो याददाश्त को सुरक्षित रखने और डैमेज हो चुकी नसों को दोबारा जीवंत करने में अचूक हैं:

  • ब्राह्मी Brahmi: यह दिमाग के लिए सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है। यह मस्तिष्क की नसों को शांत करती है, एकाग्रता बढ़ाती है और डिमेंशिया के कारण हो रहे नर्वस सिस्टम के डैमेज को तेज़ी से रोकती है।
  • अश्वगंधा Ashwagandha: बुज़ुर्गों के दिमाग में जो स्ट्रेस और एंग्जायटी रहती है, अश्वगंधा उसे कम करता है। यह शरीर और दिमाग दोनों को बल ताक़त प्रदान करता है और नींद की गुणवत्ता को सुधारता है।
  • शंखपुष्पी Shankhpushpi: यह जड़ी-बूटी याददाश्त Memory recall को बढ़ाने के लिए एक जादुई टॉनिक है। यह दिमाग के ब्लड फ्लो को बेहतर बनाती है और भूलने की बीमारी को जड़ से कम करती है।
  • जटामांसी Jatamansi: जब डिमेंशिया के मरीज़ बहुत ज़्यादा आक्रामक हो जाते हैं या उन्हें रात में नींद नहीं आती, तो जटामांसी उनके नर्वस सिस्टम को गहरी शांति और ठंडक प्रदान करती है।
  • ज्योतिष्मती Jyotishmati: इसे 'मालकांगनी' भी कहा जाता है। इसका तेल दिमाग के बंद पड़े चैनल्स को खोलता है और संज्ञानात्मक Cognitive कार्यों को तेज़ करता है।

नसों को खोलने और याददाश्त तेज़ करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब डिमेंशिया के कारण मज्जा धातु बहुत ज़्यादा सूख जाती है, तो केवल गोलियां काफी नहीं होतीं। पंचकर्म की ये एक्सटर्नल थेरेपीज़ बुज़ुर्गों के दिमाग को एक नई ऊर्जा देती हैं:

  • शिरोधारा Shirodhara: माथे के ठीक बीच में आज्ञा चक्र पर औषधीय तेल या काढ़े की एक निरंतर धार गिराई जाती है। यह थेरेपी दिमाग की गहराई में जाकर वात को शांत करती है, स्ट्रेस को शून्य कर देती है और नींद न आने की समस्या को जादुई रूप से खत्म करती है।
  • नस्य Nasya: आयुर्वेद में नाक को दिमाग का दरवाज़ा 'नासा हि शिरसो द्वारम' कहा गया है। नाक के ज़रिए अणु तेल या पंचगव्य घृत डालने से यह सीधे दिमाग के मृत पड़े न्यूरॉन्स को पोषण देता है और याददाश्त की क्षमता को बढ़ाता है।
  • शिरो अभ्यंग Shiro Abhyanga: औषधीय तेलों से सिर की हल्की और गहरी मालिश करने से खोपड़ी Scalp का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और दिमाग की खुश्की दूर होती है।
  • पादभ्यंग Padabhyanga: रात को सोते समय पैरों के तलवों की गाय के घी या औषधीय तेल से मालिश करने से दिमाग की नसें शांत होती हैं और बुज़ुर्गों को गहरी और सुकून भरी नींद आती है।

दिमाग के रिपेयर होने और याददाश्त सुधरने में कितना समय लगता है?

डिमेंशिया एक प्रगतिशील बीमारी है, इसे पूरी तरह रिवर्स करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन आयुर्वेद इसकी गति को रोककर जीवन की गुणवत्ता को शानदार बना सकता है:

  • शिरुआती 1-2 महीने: मेध्य रसायनों के प्रभाव से उनकी एंग्जायटी, घबराहट और रात को नींद न आने की समस्या में भारी कमी आएगी। वे शांत महसूस करेंगे।
  • 3-4 महीने: दिमाग की नसों को पोषण Lubrication मिलना शुरू होगा। उनके रोज़मर्रा के काम करने की समझ स्थिर होने लगेगी और भूलने की गति धीमी पड़ जाएगी।
  • 5-6 महीने और निरंतर: मज्जा धातु और ओजस मज़बूत होने से उनका स्वभाव संतुलित हो जाएगा। वे परिवार के साथ बेहतर तरीके से जुड़ पाएंगे और बिना किसी भारी एलोपैथिक सिडेटिव के एक सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

डिमेंशिया और मेमोरी लॉस के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा Symptomatic care आयुर्वेद Holistic care
इलाज का मुख्य लक्ष्य लक्षणों को कुछ समय के लिए थामने के लिए केमिकल्स Acetylcholinesterase inhibitors और नींद की गोलियां देना। प्राण वात को शांत करना, ओजस बढ़ाना और मेध्य रसायनों से दिमाग को प्राकृतिक रूप से पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल दिमाग के न्यूरॉन्स के सिकुड़ने की एक लाइलाज बीमारी मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और मज्जा धातु के सूखने का एक संपूर्ण सिंड्रोम स्मृति नाश मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल मानसिक खेलों Puzzles की सलाह, लेकिन जठराग्नि पाचन और आहार पर कोई खास ज़ोर नहीं दिया जाता। वात-शामक डाइट, सात्विक भोजन, सही दिनचर्या और औषधीय तेलों नस्य/शिरोधारा को ही इलाज का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।
लंबा असर दवाइयों के भारी साइड इफेक्ट्स होते हैं, बुज़ुर्ग सुस्त और हर समय नींद में रहने लगते हैं। शरीर अंदर से मज़बूत होता है, नर्वस सिस्टम को शांति मिलती है, जिससे इंसान अधिक सचेत और एक्टिव रहता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

डिमेंशिया के शुरुआती दौर में आयुर्वेद बहुत तेज़ी से असर करता है, लेकिन अगर आपको अपने बुज़ुर्ग माता-पिता में ये कुछ गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल हस्तक्षेप ज़रूरी हो जाता है:

  • खाना निगलना भूल जाना Dysphagia: अगर वे भोजन मुँह में रखकर चबाना या उसे निगलना पूरी तरह भूल जाएं, जिससे चोकिंग गले में अटकने का खतरा हो।
  • अचानक हिंसक व्यवहार: अगर वे अचानक बहुत ज़्यादा हिंसक हो जाएं, मारने-पीटने लगें या उन्हें ऐसी चीज़ें दिखने लगें जो वहां हैं ही नहीं Hallucinations।
  • घर से निकलकर खो जाना Wandering: अगर वे घर का दरवाज़ा खोलकर अचानक कहीं चले जाएं और उन्हें अपना नाम या घर का पता बिल्कुल भी याद न रहे।
  • बिल्कुल बोलना बंद कर देना: अगर वे एकदम मूक हो जाएं और आपके किसी भी सवाल या इशारे पर कोई प्रतिक्रिया Response न दें।

निष्कर्ष

बुज़ुर्ग माता-पिता बचपन में हमारी उंगली पकड़कर हमें दुनिया दिखाते हैं, और आज जब उनके अपने दिमाग की दुनिया धुंधली पड़ रही है, तो उन्हें हमारे सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। डिमेंशिया या बढ़ती उम्र की कमज़ोर याददाश्त को केवल 'बुढ़ापा' कहकर नज़रअंदाज़ मत कीजिए। यह उनके सूखते हुए 'ओजस' और भड़के हुए 'प्राण वात' की पुकार है। उन्हें भारी भरकम केमिकल वाली नींद की गोलियों के सहारे सुस्त और लाचार मत बनाइए। आयुर्वेद की मेध्य जड़ी-बूटियों ब्राह्मी, अश्वगंधा और शिरोधारा जैसी जादुई पंचकर्म थेरेपीज़ के ज़रिए उनके दिमाग की सूखी हुई ज़मीन को दोबारा हरा-भरा कीजिए। उनके भोजन में शुद्ध गाय का घी शामिल करें और उन्हें प्यार भरा सात्विक माहौल दें। इस मुश्किल सफर में आप अकेले नहीं हैं। अपने माता-पिता की यादों को सुरक्षित रखने और उन्हें एक स्वस्थ, सम्मानजनक बुढ़ापा देने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नॉर्मल एजिंग में व्यक्ति कोई बात भूलकर बाद में याद कर लेता है, लेकिन डिमेंशिया में वे बात को पूरी तरह भूल जाते हैं। डिमेंशिया में व्यक्ति रोज़मर्रा के काम (जैसे ब्रश करना, नहाना) भी भूलने लगता है, जो सामान्य एजिंग में नहीं होता।

डिमेंशिया एक बड़ा शब्द (Umbrella term) है जो कमज़ोर याददाश्त और सोचने की क्षमता में गिरावट को दर्शाता है। अल्ज़ाइमर इसी डिमेंशिया का सबसे आम प्रकार है, जिसमें दिमाग की कोशिकाएं सबसे तेज़ी से नष्ट होती हैं।

बिल्कुल। आयुर्वेद के अनुसार शुद्ध देसी गाय का घी मेध्य और वात-शामक होता है। यह ब्लड-ब्रेन बैरियर (Blood-Brain Barrier) को पार करके सीधे दिमाग की नसों (मज्जा धातु) को पोषण और चिकनाई देता है, जिससे डिमेंशिया का रूखापन खत्म होता है।

इसे मेडिकल भाषा में सनडाउनिंग (Sundowning) कहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार शाम होते ही वात दोष का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे दिमाग में रूखापन और घबराहट बढ़ती है और मरीज़ रात भर जागता या बेचैन रहता है।

हाँ, सुडोकू, पहेलियां या नई भाषा सीखना दिमाग को एक्टिव रखता है। यह न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) को बढ़ाता है, जिससे दिमाग के बंद पड़े चैनल्स खुलते हैं और बीमारी की गति धीमी हो जाती है।

आयुर्वेद के अनुसार 100% संबंध है। जब पेट साफ नहीं होता, तो शरीर में गैस (अपान वात) और आम (Toxins) बनता है। यह वात ऊपर की ओर जाकर दिमाग के चैनल्स (मनोवह स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है, जिससे याददाश्त और मूड दोनों खराब होते हैं।

शिरोधारा सीधे नर्वस सिस्टम पर काम करती है। माथे पर लगातार गिरने वाली तेल की धार प्राण वात को शांत करती है। यह स्ट्रेस हार्मोन (कॉर्टिसोल) को घटाकर मरीज़ को गहरी मानसिक शांति और नींद प्रदान करती है।

कुछ हद तक यह आनुवंशिक हो सकता है (विशेषकर अल्ज़ाइमर)। लेकिन आयुर्वेद मानता है कि अगर आपकी दिनचर्या, आहार और मानसिक स्वास्थ्य सही है (सतोगुण की प्रधानता है), तो आप इस आनुवंशिक प्रवृत्ति (Genetic tendency) को ट्रिगर होने से रोक सकते हैं।

ब्राह्मी एक उत्कृष्ट मेध्य रसायन है और आमतौर पर सुरक्षित है। लेकिन डिमेंशिया की स्थिति में, इसे किस अनुपान (घी, शहद या दूध) के साथ और कितनी मात्रा में देना है, इसके लिए आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह लेना बेहद ज़रूरी है।

उनसे हमेशा धीमे और प्यार भरे स्वर में बात करें। उनसे बहस न करें, भले ही वे गलत हों। छोटे और सीधे वाक्य बोलें। उनकी पुरानी यादों को ताज़ा करने के लिए उन्हें पुराने एल्बम दिखाएं, इससे उनका दिमाग शांत और सुरक्षित महसूस करता है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us