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Psoriasis और पेट की परेशानी में आयुर्वेद से मिला राहत का अनुभव

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर हम त्वचा की बीमारियों को सिर्फ बाहरी समस्या समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि असल में इनका सीधा कनेक्शन हमारे पेट और शरीर के अंदरूनी असंतुलन से होता है। सतीश पांडे जी की कहानी इसी बात का एक जीता-जागता उदाहरण है। सतीश जी के लिए यह सफर त्वचा पर उभरे कुछ मामूली लाल धब्बों से शुरू हुआ था। शुरू में लगा कि यह कोई आम एलर्जी है। लेकिन धीरे-धीरे धब्बे फैलने लगे, खुजली असहनीय हो गई और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पूरी तरह डिस्टर्ब होने लगी।

वक्त बीतने के साथ सतीश जी को यह समझ आ गया कि यह कोई ऊपरी स्किन इन्फेक्शन नहीं है। शरीर के अंदर यानी पाचन में कुछ ऐसा गंभीर असंतुलन चल रहा था, जिसका पूरा असर सीधे उनकी त्वचा पर फूट रहा था।

खुजली, जलन और खून निकलने वाले धब्बों के साथ रोज़ की जंग

सोरायसिस (Psoriasis) कोई आम स्किन प्रॉब्लम नहीं है। यह सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि इंसान को अंदर तक थका देती है। सतीश जी के लिए भी हर एक दिन एक नई जंग की तरह था, जहाँ उन्हें अपनी ही त्वचा की तकलीफों से लड़ना पड़ रहा था:

  • खून निकाल देने वाली खुजली: शरीर पर बने सोरायसिस के लाल और सूखे चकत्ते (पैच) इतनी खुजली करते थे कि बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था। कई बार खुजलाते-खुजलाते स्किन बुरी तरह फट जाती थी और उसमें से खून तक निकलने लगता था।
  • दिन का चैन और रातों की नींद गायब: सबसे बुरा वक्त तब होता था जब त्वचा में जलन और खुजली एक साथ भड़क उठती थी। ऐसे हालात में दिन के समय अपना नॉर्मल काम करना एक सजा लगता था और रात में शांति से सो पाना तो जैसे कोई सपना बनकर रह गया था।
  • टूटता हुआ आत्मविश्वास: यह तकलीफ सिर्फ शरीर के दर्द तक सीमित नहीं थी। लगातार रहने वाली इस बेचैनी और अपनी स्किन की हालत देखकर उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगा था। इस बीमारी ने धीरे-धीरे उनके मानसिक सुकून को भी छीनना शुरू कर दिया था।

 पेट की गड़बड़ी ने बढ़ाई मुश्किलें 

सतीश जी की तकलीफ सिर्फ बाहरी त्वचा तक ही सीमित नहीं थी। शरीर के अंदर, उनका पाचन तंत्र भी लंबे समय से पूरी तरह बिगड़ चुका था। आयुर्वेद हमेशा से कहता है कि स्किन की हर बीमारी का सीधा कनेक्शन हमारे पाचन से होता है, और सतीश जी अनजाने में इसी दोहरी मार को झेल रहे थे:

  • खाते ही भारीपन: खाना खाते ही ऐसा महसूस होता था जैसे पेट में पत्थर रखा हो। हर वक्त एक अजीब सी बेचैनी और भारीपन बना रहता था, जिससे कुछ भी खाने का मन नहीं करता था।
  • सीने और पेट की लगातार जलन: पाचन सुस्त होने की वजह से उनके सीने और पेट में अक्सर तेज़ जलन होती थी। धीरे-धीरे ये एसिडिटी और जलन उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक दर्दनाक हिस्सा बन गई थी।
  • उलझन भरी बीमारी: सतीश जी अक्सर इसी सोच में रहते थे कि कहीं उनकी स्किन की इस खौफनाक बीमारी के तार उनके खराब पेट से तो नहीं जुड़े हैं? ये दोनों ही दिक्कतें साथ-साथ चल रही थीं और मिलकर उनके मानसिक सुकून को पूरी तरह बर्बाद कर रही थीं।

दवाइयों के बावजूद अधूरा संतोष

सिर्फ बाहरी क्रीम लगाने या कुछ दिन दवाइयां खाने से सतीश जी को कोई स्थायी आराम नहीं मिल रहा था। वो इस बीमारी के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुके थे जहाँ राहत सिर्फ चंद दिनों की मेहमान होती थी:

  • कुछ ही दिनों का धोखा: उन्होंने कई तरह के इलाज और नुस्खे आजमाकर देखे। शुरू में लगता कि बीमारी कम हो रही है, लेकिन जैसे ही दवा का असर खत्म होता, समस्या दोबारा वापस आजाती।
  • न खत्म होने वाला वही दर्द: यह एक ऐसा सिलसिला बन गया था जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। कुछ दिनों की शांति के बाद फिर से वही खुजली, लाल धब्बे और असहनीय बेचैनी लौट आती थी।
  • असली जड़ को समझने की शुरुआत: बार-बार की इस निराशा ने उन्हें एक बात बिल्कुल साफ कर दी थी सिर्फ बाहरी लक्षणों (Symptoms) को क्रीम या मरहम से दबाना इस परेशानी का कोई स्थायी हल नहीं है। 

आयुर्वेद की तरफ उठाया पहला कदम

लगातार बढ़ती खुजली, त्वचा पर बनने वाले मोटे धब्बे, जलन, खून निकल आना, पेट की परेशानी और नींद की कमी ने सतीश जी को शारीरिक और मानसिक रूप से काफी परेशान कर दिया था। उन्हें महसूस होने लगा था कि समस्या सिर्फ त्वचा तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर के अंदर भी कोई असंतुलन मौजूद है।

इसी दौरान किसी परिचित ने उन्हें आयुर्वेद के बारे में बताया। जब सतीश जी ने जाना कि आयुर्वेद केवल त्वचा पर दिखाई देने वाले लक्षणों पर नहीं, बल्कि शरीर की आंतरिक स्थिति, पाचन शक्ति और जीवनशैली को भी महत्व देता है, तो उनके मन में एक नई उम्मीद जगी।

पहली मुलाकात: इलाज की एक नई दिशा

पहली ही कंसल्टेशन (मुलाकात) में सतीश जी को समझ आ गया कि यहाँ बीमारी को देखने का तरीका बिल्कुल अलग है। डॉक्टर ने सिर्फ उनकी त्वचा के लाल धब्बे और खुजली को नहीं देखा, बल्कि उनके खाने-पीने की आदतों, पेट की पुरानी दिक्कतों (भारीपन और जलन) और उनके तनाव को भी पूरी बारीकी से समझा:

  • लक्षणों से आगे की सोच: डॉक्टर ने सिर्फ ऊपर दिख रही स्किन की परेशानी पर फोकस नहीं किया, बल्कि उस पूरी लाइफस्टाइल और खराब हाज़मे की गहराई से पड़ताल की, जो अंदर ही अंदर सोरायसिस को भड़का रहे थे।
  • बीमारी की असली जड़: सतीश जी को पहली बार यह एहसास हुआ कि असली इलाज सिर्फ स्किन पर लगाने वाले मरहम या क्रीम पर निर्भर रहना नहीं है। असली काम तो शरीर के अंदर आए उस असंतुलन को ठीक करना है, जिसने उनके पूरे सिस्टम (खासकर पाचन तंत्र) को खराब कर दिया था।

बीमारी की असली जड़: जाँच के बाद क्या सामने आया?

डॉक्टर ने जब सतीश जी की सेहत की गहराई से जाँच की, तो यह बात साफ़ हो गई कि उनकी समस्या का कारण सिर्फ त्वचा नहीं, बल्कि अंदरूनी सिस्टम में जमा 'अग्नि' का असंतुलन था:

  • पाचन की गड़बड़ी (मंद अग्नि): गलत खान-पान और अनियमित समय के कारण शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) जमा हो रहे थे। आयुर्वेद के अनुसार, जब पेट में खाना ठीक से नहीं पचता, तो वह ज़हर बनकर रक्त के ज़रिए त्वचा तक पहुँचता है, जिससे सोरायसिस के लक्षण भड़कते हैं।
  • दोषों का असंतुलन: शरीर में वात और पित्त का असंतुलन बढ़ गया था, जो खुजली, जलन और त्वचा के सूखेपन (पैच) का मुख्य कारण था।
  • बिगड़ी जीवनशैली: देर रात तक जागना और तनाव के कारण शरीर का प्राकृतिक तालमेल बिगड़ चुका था, जिससे स्किन सेल्स का नवीनीकरण (regeneration) प्रोसेस बहुत तेज़ और अनियमित हो गया था।
  • मानसिक तनाव: काम और बीमारी की चिंता ने नर्वस सिस्टम को लगातार तनाव में रखा था, जिससे शरीर की 'हीलिंग क्षमता' (Healing capacity) बिल्कुल कम हो गई थी और घाव जल्दी नहीं भर रहे थे।

आयुर्वेदिक उपचार की शुरुआत

डॉक्टर की बात मानकर सतीश जी ने इस बीमारी को ठीक करने की ठान ली। इसके लिए उन्होंने अपनी पूरी लाइफस्टाइल बदली और एक नया रूटीन फॉलो किया:

  • पेट को आराम देने वाला सादा खाना: बाहर का जंक फूड, तला-भुना, तेज़ मिर्च-मसाले और पैकेट वाला खाना बिल्कुल बंद कर दिया गया। इसकी जगह एकदम हल्का और सादा (सात्विक) खाना शुरू किया गया। 
  • पूरी नींद और फिक्स रूटीन: रात को सोने और सुबह उठने का टाइम एकदम फिक्स कर दिया गया। जब शरीर को सही टाइम पर आराम मिलता है, तो स्किन की सूजन अपने आप कम होने लगती है और शरीर अंदर से शांत होता है।
  • जड़ी-बूटियों का पक्का इलाज: बीमारी को सिर्फ ऊपर से क्रीम या लोशन लगाकर दबाने की बजाय, ऐसी असरदार जड़ी-बूटियां दी गईं जिन्होंने सीधे खून को साफ किया, लिवर की गंदगी धोई और स्किन को अंदर से असली खुराक दी।
  • योग और ध्यान: दिन भर के रूटीन में 20 मिनट का प्राणायाम और ध्यान शामिल किया गया। इसका काम सिर्फ दिमाग को शांत करना नहीं था, बल्कि शरीर की नसों को रिलैक्स करना था ताकि खुजली और जलन में तुरंत आराम मिल सके।
  • स्किन की अंदर से रिपेयरिंग: सिर्फ बाहरी मरहम पर भरोसा नहीं किया गया। ऐसी दवाइयां दी गईं जिन्होंने सीधे खून की क्वालिटी सुधारी और खराब हो चुकी स्किन को नई और हेल्दी बनाने में अंदर से मदद की।
  • पंचकर्म से शरीर की डीप क्लीनिंग: सतीश जी सिर्फ दवाइयों के भरोसे नहीं बैठे रहे। उन्होंने आयुर्वेद के सबसे तगड़े हथियार 'पंचकर्म' का भी सहारा लिया। इसके ज़रिए उनके शरीर की नसों और खून में सालों से जो ज़हरीला कचरा (टॉक्सिन्स) जमा था, उसे खींचकर बाहर निकाल दिया गया।

सेहतमंद बदलाव: बदल गई खाने-पीने की आदतें और दिनचर्या

सतीश जी ने अब अपनी जीवनशैली में पूरी तरह से बदलाव कर लिया है। उन्हें समझ आ गया है कि अच्छी सेहत कोई जादू नहीं, बल्कि रोज़ाना की अच्छी आदतों का नतीजा है:

  • खान-पान में अनुशासन: वे अब रात का भोजन जल्दी कर लेते हैं, ताकि सोते समय पेट हल्का रहे। भारी या बासी भोजन के बजाय, अब वे घर का बना सादा और सुपाच्य खाना ही खाते हैं ताकि पेट में 'आम' (टॉक्सिन्स) न बने।
  • नियमित दिनचर्या: सुबह की ताज़ी हवा में टहलना अब उनकी आदत है, जिससे शरीर में दिनभर फुर्ती रहती है। उन्होंने देर रात जागने की आदत को पूरी तरह छोड़ दिया है और जल्दी सोने का नियम बनाया है, ताकि शरीर को पूरी रिकवरी मिल सके।
  • शरीर के संकेतों के प्रति सचेत: सतीश जी अब अपने स्वास्थ्य के प्रति बेहद सतर्क हैं। वे त्वचा और पाचन तंत्र के किसी भी छोटे संकेत को अब अनदेखा नहीं करते, जिससे बीमारी को पनपने का मौका नहीं मिलता।

इलाज का सफर: धीरे-धीरे सुधरती सेहत

सतीश जी की मेहनत और सही आयुर्वेदिक उपचार का असर अब उनकी सेहत में साफ झलकने लगा था। हर गुज़रते महीने के साथ उनका शरीर नई ऊर्जा महसूस कर रहा था:

  • पहला महीना (पाचन और एनर्जी में सुधार): सबसे पहला फर्क उनके पाचन पर दिखा। पेट का वह पुराना भारीपन और जलन दूर होने लगी। शरीर में पहले से कहीं ज़्यादा फुर्ती महसूस होने लगी और उनकी पाचन अग्नि बेहतर हुई।
  • दूसरा महीना (त्वचा की हीलिंग): सोरायसिस के जो पैच (धब्बे) रूप ले चुके थे, उनकी लाली और पपड़ी में कमी आने लगी। खुजली और जलन का जो चक्र उन्हें दिन-रात परेशान करता था, वह काफी हद तक शांत हो गया।
  • तीसरा महीना (मानसिक सुकून और नींद): रात को अब नींद अच्छी आने लगी, जिससे सुबह उठने पर शरीर भारी नहीं बल्कि एकदम फ्रेश लगता था। जो बेवजह का स्ट्रेस और चिड़चिड़ापन था, वो न के बराबर रह गया, जिससे मन शांत रहने लगा।

निष्कर्ष

सतीश जी की ये कहानी सिर्फ सोरायसिस से मुक्ति पाने तक सीमित नहीं है। यह कहानी है सही वक्त पर लिए गए एक सही फैसले, पक्के धैर्य और थोड़े से अनुशासन की। उनके इस सफर ने साबित कर दिया कि सेहतमंद होना कोई जादू या चमत्कार नहीं है, बल्कि आपकी अपनी सही आदतों का ही नतीजा है।

आज सतीश जी पहले से कहीं ज़्यादा एक्टिव और अंदर से शांत महसूस करते हैं। उनका ये बदलाव इस बात का सबूत है कि अगर हम अपनी लाइफस्टाइल को सही कर लें और आयुर्वेद के सिद्धांतों को अपनाएं, तो हमारे शरीर के अंदर खुद को दोबारा रिपेयर (Heal) करने की अद्भुत ताकत मौजूद होती है।

References

https://www.niams.nih.gov/health-topics/psoriasis

https://www.psoriasis.org/about-psoriasis/#overview

https://www.who.int/publications/i/item/global-report-on-psoriasis

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जी हाँ, आयुर्वेद के अनुसार त्वचा की बीमारियाँ अक्सर पेट की 'मंद अग्नि' और शरीर में जमा 'आम' (टॉक्सिन्स) का परिणाम होती हैं। जब पाचन ठीक नहीं होता, तो शरीर में अशुद्धियाँ जमा होती हैं जो त्वचा पर सोरायसिस के रूप में उभरती हैं।

आयुर्वेद में हर व्यक्ति की प्रकृति अलग होती है। सतीश जी जैसे मामलों में, पहले महीने से ही पाचन में सुधार और ऊर्जा में वृद्धि महसूस होने लगती है, जबकि त्वचा के घावों को पूरी तरह ठीक होने में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

हाँ, सोरायसिस एक 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' है। केवल दवा लेने से राहत नहीं मिलेगी, जब तक कि आप नींद, आहार और तनाव प्रबंधन के अनुशासन को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाते।

हाँ, इसमें भारी, फर्मेंटेड, अत्यधिक मसालेदार और पैकेट बंद भोजन से बचने की सलाह दी जाती है। सात्विक और ताज़ा भोजन पाचन अग्नि को शांत रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

पंचकर्म शरीर की गहरी सफाई (Detoxification) की प्रक्रिया है। यह रक्त में घुले टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है, जिससे त्वचा की कोशिकाओं (skin cells) का नवीनीकरण स्वस्थ तरीके से होता है।

बिल्कुल। तनाव सीधे तौर पर नर्वस सिस्टम और इम्यून सिस्टम को प्रभावित करता है। आयुर्वेद में प्राणायाम और ध्यान जैसी तकनीकों के माध्यम से मन को शांत रखने पर जोर दिया जाता है, जो सोरायसिस के चक्र को तोड़ने में मदद करता है।

नहीं, बिना अपने डॉक्टर की सलाह के कभी भी कोई दवा बंद न करें। आयुर्वेदिक डॉक्टर आमतौर पर धीरे-धीरे आपकी पुरानी दवाओं को कम करते हुए आयुर्वेद को शामिल करते हैं।

सोरायसिस में त्वचा बहुत रूखी और बेजान हो जाती है। विशेष आयुर्वेदिक तेलों से अभ्यंग करने से त्वचा को गहरा पोषण मिलता है और खुजली कम होती है।

यदि सही और अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक (जैसे जिवा आयुर्वेद के विशेषज्ञ) के मार्गदर्शन में दवा ली जाए, तो आयुर्वेदिक उपचार प्राकृतिक होने के कारण सुरक्षित माने जाते हैं।

आयुर्वेद का लक्ष्य बीमारी को जड़ से मिटाना है। यदि आप सही अनुशासन, उपचार और जीवनशैली को अपनाते हैं, तो सोरायसिस के लक्षणों को लंबे समय तक या हमेशा के लिए नियंत्रित किया जा सकता है।

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