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Nerve Pain इतना बढ़ गया था कि चलना भी मुश्किल हो गया था

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 19 Jun, 2026
  • category-iconUpdated on 19 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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अक्सर हम कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द को सिर्फ काम की थकान या बढ़ती उम्र का असर समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि असल में इसका सीधा कनेक्शन हमारी रीढ़ की हड्डी, दबी हुई नसों (Nerve Compression) और शरीर के अंदरूनी असंतुलन से होता है। शांति देवी जी की कहानी इसी बात का उदाहरण है।

शांति जी के लिए यह तकलीफदेह सफर कमर के एक हल्के दर्द से शुरू हुआ था। शुरू में लगा कि यह आराम करने से ठीक हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द रूप लेने लगा। कमर से शुरू होकर यह दर्द एक करंट की तरह उनके दोनों पैरों तक जाने लगा (Sciatica Pain)। हालत इतनी खराब हो गई कि उनके लिए साधारण चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया। जब वे एक अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर के क्लिनिक में पहली बार आईं, तो उनकी स्थिति ऐसी थी कि बिना किसी के सहारे वे एक कदम भी नहीं रख पा रही थीं।

वक्त बीतने के साथ शांति जी को यह समझ आ गया कि यह कोई मामूली कमर दर्द नहीं है। शरीर के अंदर यानी नसों के तंत्र (Nervous System) में कुछ ऐसा गंभीर असंतुलन चल रहा था, जिसका पूरा असर उनके पैरों की ताकत और मूवमेंट पर पड़ रहा था।

कमर से पैरों तक उठने वाली टीस और रोज़ की जंग

नसों का दर्द (Nerve Pain/Sciatica) कोई आम दर्द नहीं है। यह इंसान को शारीरिक रूप से पूरी तरह लाचार कर देता है। शांति जी के लिए भी हर एक दिन एक नई जंग की तरह था, जहाँ उन्हें अपनी ही नसों की तकलीफों से लड़ना पड़ रहा था:

  • करंट लगने जैसा भयानक दर्द: कमर से लेकर दोनों पैरों की एड़ियों तक एक ऐसा तीखा दर्द होता था जैसे नसों में कोई सुई चुभो रहा हो।
  • चलने-फिरने की आज़ादी छिन जाना: दर्द और पैरों के सुन्न (Numbness) हो जाने की वजह से उठकर खड़ा होना या कुछ कदम चलना भी एक बड़ी सज़ा लगता था। रात के समय दर्द इतना भड़क जाता था कि करवट लेना भी मुश्किल हो जाता था।
  • टूटता हुआ आत्मविश्वास: घर के छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना शांति जी को अंदर से तोड़ रहा था। इस बीमारी ने धीरे-धीरे उनके मानसिक सुकून और आत्मविश्वास को पूरी तरह खत्म कर दिया था।

नसों का दबना और वात दोष ने बढ़ाई मुश्किलें

शांति जी की तकलीफ सिर्फ बाहरी दर्द तक ही सीमित नहीं थी। शरीर के अंदर, उनकी रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (Lumbar region) में नसें बुरी तरह दब चुकी थीं। आयुर्वेद हमेशा से कहता है कि नसों से जुड़ी हर बीमारी का सीधा कनेक्शन हमारे शरीर में बढ़े हुए 'वात दोष' से होता है, और शांति जी अनजाने में इसी को झेल रही थीं:

  • पैरों में भारीपन और झनझनाहट: वात के असंतुलन के कारण नसों में रक्त संचार (Blood circulation) ठीक से नहीं हो पा रहा था, जिससे उनके दोनों पैरों में हमेशा भारीपन और झनझनाहट (Tingling) बनी रहती थी।
  • मांसपेशियों में जकड़न: नसों के दबने के कारण आस-पास की मांसपेशियां भी सख्त हो गई थीं। हर वक्त एक अजीब सी जकड़न बनी रहती थी, जिससे शरीर का लचीलापन पूरी तरह खत्म हो गया था।
  • उलझन भरी बीमारी: शांति जी अक्सर इसी सोच में रहती थीं कि क्या उम्र भर उन्हें बिस्तर पर ही रहना पड़ेगा? ये दर्द और लाचारी मिलकर उनके मानसिक सुकून को पूरी तरह बर्बाद कर रहे थे।

पेनकिलर्स के बावजूद अधूरा संतोष

सिर्फ बाहरी दर्द निवारक गोलियां (Painkillers) खाने या कुछ दिन मलहम लगाने से शांति जी को कोई स्थायी आराम नहीं मिल रहा था। वो इस बीमारी के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुकी थीं जहाँ राहत सिर्फ चंद घंटों की मेहमान होती थी:

  • कुछ ही घंटों का धोखा: उन्होंने कई तरह की तेज़ पेनकिलर्स और नसों को सुन्न करने वाली दवाइयाँ आजमाकर देखीं। शुरू में लगता कि दर्द कम हो रहा है, लेकिन जैसे ही दवा का असर खत्म होता, समस्या दोबारा और ज़्यादा ताकत के साथ वापस आ जाती।
  • न खत्म होने वाला वही दर्द: यह एक ऐसा सिलसिला बन गया था जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। कुछ घंटों की शांति के बाद फिर से वही करंट जैसा दर्द और असहनीय बेचैनी लौट आती थी।
  • असली जड़ को समझने की शुरुआत: गोलियों के साइड इफेक्ट्स (जैसे पेट में जलन) और बार-बार लौटते दर्द ने उन्हें यह साफ कर दिया था कि सिर्फ नसों को सुन्न करना इस परेशानी का कोई स्थायी हल नहीं है।

आयुर्वेद की तरफ उठाया पहला कदम

लगातार बढ़ते नसों के दर्द, पैरों के सुन्नपन और चलने-फिरने की लाचारी ने शांति जी को काफी निराश कर दिया था। उन्हें महसूस होने लगा था कि समस्या को सिर्फ ऊपर से दबाने के बजाय इसकी जड़ पर काम करने की ज़रूरत है।

इसी दौरान उन्होंने आयुर्वेद की शरण ली। जब शांति जी को पता चला कि आयुर्वेद केवल दर्द को सुन्न करने पर नहीं, बल्कि दबी हुई नसों को खोलने, वात संतुलन को ठीक करने और नसों को अंदर से ताकत देने पर काम करता है, तो उनके मन में एक नई उम्मीद जगी।

पहली मुलाकातः इलाज की एक नई दिशा

आयुर्वेदिक डॉक्टर से पहली ही कंसल्टेशन (मुलाकात) में शांति जी को समझ आ गया कि यहाँ बीमारी को देखने का तरीका बिल्कुल अलग है। डॉक्टर ने सिर्फ उनके एमआरआई (MRI) या पैरों के दर्द को नहीं देखा, बल्कि उनके खान-पान, पाचन शक्ति (अग्नि) और उनके मानसिक तनाव को भी पूरी बारीकी से समझा:

  • लक्षणों से आगे की सोच: डॉक्टर ने सिर्फ नसों के दर्द पर फोकस नहीं किया, बल्कि उस पूरी लाइफस्टाइल और खराब हाज़मे की पड़ताल की, जो शरीर में 'वात' को भड़का रहे थे।
  • बीमारी की असली जड़: शांति जी को पहली बार यह एहसास हुआ कि असली इलाज सिर्फ एक पेनकिलर खाना नहीं है। असली काम तो शरीर के अंदर आए उस वात असंतुलन को ठीक करना है, जिसने उनकी रीढ़ की हड्डी और नसों को सूखा और कमज़ोर कर दिया था।

बीमारी की असली जड़ः जाँच के बाद क्या सामने आया?

डॉक्टर ने जब शांति जी की सेहत की गहराई से जाँच की, तो यह बात साफ़ हो गई कि उनकी समस्या का कारण आयुर्वेद के अनुसार 'गृध्रसी' (Sciatica) और गंभीर वात प्रकोप था:

  • वात का असंतुलन: गलत खान-पान और बढ़ती उम्र के कारण शरीर में 'वात' (हवा और सूखापन) बहुत अधिक बढ़ गया था। बढ़े हुए वात ने नसों को सिकोड़ कर उन्हें कठोर बना दिया था।
  • गृध्रसी (Sciatica): आयुर्वेद में साइटिका को गृध्रसी कहा जाता है। इसमें वात दोष के कारण कमर से लेकर पैरों की उंगलियों तक दर्द होता है और चाल एक गिद्ध (Vulture) की तरह लंगड़ाती हुई हो जाती है।
  • हड्डियाँ और नसें की कमज़ोरी: सही पोषण न मिलने के कारण हड्डियाँ और नसें (मज्जा) कमज़ोर पड़ गई थीं, जिससे वे शरीर का भार नहीं उठा पा रही थीं।

आयुर्वेदिक उपचार की शुरुआत

डॉक्टर की सलाह पर शांति जी ने पक्का इरादा कर लिया कि अब इस बीमारी को सिर्फ दबाना नहीं है, बल्कि जड़ से मिटाना है। इसके लिए उन्होंने नया इलाज शुरू किया और अपने रूटीन में ये ज़रूरी बदलाव किए:

  • नसों को ताकत देने वाली औषधियाँ: उन्होंने दर्द सुन्न करने वाली गोलियाँ नहीं लीं। इसकी जगह निर्गुण्डी, अश्वगंधा, रास्ना और गुग्गुल जैसी आयुर्वेदिक दवाइयाँ दी गईं। इन जड़ी-बूटियों ने नसों की सूजन को अंदर से कम किया और उन्हें पूरी खुराक दी, जिससे वात कंट्रोल होने लगा।
  • 'कटी बस्ती' का कमाल: रीढ़ की हड्डी और दबी नसों को खोलने के लिए पंचकर्म की इस खास तकनीक का इस्तेमाल हुआ। इसमें कमर के निचले हिस्से पर एक घेरा बनाकर औषधियों वाला गुनगुना तेल रोका जाता है। इस गर्माहट ने नसों का सूखापन दूर कर उन्हें पूरी तरह रिलैक्स कर दिया।
  • पोटली से सिकाई (पत्र पिंड स्वेद): पैरों की जकड़न और भदर्द को खींचने के लिए खास आयुर्वेदिक पत्तों की पोटली बनाई गई। जब इस पोटली को गर्म तेल में डुबोकर सिकाई की गई, तो पैरों में रुका हुआ खून का दौरा (ब्लड सर्कुलेशन) एकदम से चालू हो गया।
  • गैस और वात न बढ़ाने वाला खाना: फ्रिज में रखा ठंडा, बासी और रूखा-सूखा खाना बिल्कुल बंद कर दिया गया। राजमा-छोले जैसी वात बढ़ाने वाली चीजें भी डाइट से पूरी तरह हटा दी गईं। अब उनकी थाली में हल्का गर्म और आसानी से पचने वाला ताज़ा खाना होता था, जिसमें थोड़ा शुद्ध गाय का घी ज़रूर शामिल था।

सेहतमंद बदलाव: बदल गई खाने-पीने की आदतें

शांति जी की दिनचर्या अब पहले जैसी बिल्कुल नहीं रही है। उन्हें एक बात गहराई से समझ आ चुकी है कि अच्छी सेहत रातों-रात नहीं बनती। ये तो हमारी उन छोटी-छोटी आदतों का नतीजा है, जिन्हें हम रोज़ दोहराते हैं:

  • खाने में ज़रूरी बदलाव: डाइट में अब उन्होंने गाय के घी जैसी प्राकृतिक चिकनाई और थोड़ी गर्म तासीर वाली चीज़ें शामिल कर ली हैं। मकसद सिर्फ एक है शरीर में 'वात' (गैस या वायु) को किसी भी कीमत पर बढ़ने न देना।
  • पॉश्चर पर ध्यान और हल्का योग: हर वक्त झुककर काम करने की पुरानी आदत से उन्होंने एकदम से तौबा कर लिया। इसके अलावा, नसों की भीतरी मज़बूती के लिए रोज़ सुबह हल्के-फुल्के व्यायाम (सूक्ष्म योगासन) उनके रूटीन का पक्का हिस्सा बन चुके हैं।

इलाज का असर: कैसे लौटी शरीर की ताकत

सही आयुर्वेदिक इलाज और उनकी खुद की लगन ने मिलकर कमाल किया। कुछ ही हफ्तों के अंदर शरीर में बदलाव साफ महसूस होने लगे:

  • पहला महीना (दर्द और जकड़न में कमी): शुरुआती हफ्तों में ही सबसे बड़ा आराम दर्द में मिला। कमर से लेकर पैरों तक जो करंट जैसी झनझनाहट और टीस उठती थी, वो काफी हद तक दब गई। आयुर्वेद की 'कटी बस्ती' ने कमर की उस पुरानी जकड़न को ऐसे खोला जैसे कोई फंसी हुई नस आजाद हो गई हो।
  • दूसरा महीना (अपने पैरों पर चलने की खुशी): नसों की सूजन जैसे-जैसे उतरी, पैरों में एक नई जान आने लगी। एक वक्त था जब बिना किसी सहारे के उनका खड़ा होना भी मुश्किल था, लेकिन अब वे घर के अंदर बड़े आराम से, बिना किसी दर्द के टहलने लगी थीं।
  • तीसरा महीना (पुरानी ज़िंदगी की वापसी): लगातार तीन महीने का कड़ा अनुशासन और सही दवाइयों ने अपना असली जादू दिखाया। नसों का वो असहनीय दर्द अब जैसे कोई पुरानी बात हो गया था। आज वे बिना किसी लाठी या सहारे के अपने सारे काम खुद मजे से कर रही हैं।

निष्कर्ष

शांति देवी जी का ये सफर महज़ नसों के दर्द से आज़ादी पाने तक सीमित नहीं है। असल में, ये एक मिसाल है कि जब आप बीमारी की जड़ को सही समय पर पकड़ लेते हैं, तो नतीजे कितने हैरान करने वाले हो सकते हैं। उनकी कहानी ये साबित करती है कि साइटिका या नर्व पेन में, मुट्ठी भर पेनकिलर खाकर नसों को सुन्न करना ही इकलौता रास्ता नहीं है। अगर शरीर में बिगड़े हुए 'वात' को बैलेंस किया जाए और पंचकर्म की मदद ली जाए, तो कोई भी इंसान सच में अपने पैरों पर फिर से मज़बूती के साथ खड़ा हो सकता है। 

References

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC6431761/

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC2768555/

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK507908/

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार 'वात' का स्वभाव ठंडा और रूखा होता है। रात के समय और सर्दियों के मौसम में शरीर और वातावरण दोनों में वात दोष बढ़ जाता है। इसी ठंडक के कारण नसें सिकुड़ने लगती हैं और दर्द कई गुना तेज़ महसूस होता है।

अक्सर लोग दर्द होने पर तेज़ हाथों से तेल रगड़ने लगते हैं, जो गलत है। दबी हुई नस पर ज़ोर से मालिश करने से उसकी सूजन और बढ़ सकती है। इसलिए आयुर्वेद में 'कटी बस्ती' या 'पोटली सिकाई' की जाती है, ताकि बिना रगड़े नसों तक गर्माहट और दवा पहुंच सके।

शुरुआती दर्द में थोड़ा आराम करना ठीक है, लेकिन लगातार हफ्तों तक लेटे रहने से नसें और मांसपेशियां और ज़्यादा सख्त (Stiff) हो जाती हैं। आयुर्वेद सलाह देता है कि दर्द थोड़ा सहने लायक होते ही धीरे-धीरे हल्के व्यायाम और चलना-फिरना शुरू कर देना चाहिए।

जब शरीर में वात बढ़ता है, तो वह शरीर की सारी चिकनाई सोख लेता है और नसें अंदर से सूखकर कड़क हो जाती हैं। शुद्ध गाय का घी इसी रूखेपन को खत्म करता है। यह शरीर को अंदर से प्राकृतिक चिकनाई (Lubrication) देता है और नसों को फिर से लचीला बनाता है।

इनका बहुत गहरा कनेक्शन है। अगर पेट साफ नहीं होता और गैस बनती है, तो वह गैस (अपान वायु) नीचे की तरफ नसों पर भारी दबाव डालती है। कई मरीजों में पेट साफ होते ही साइटिका के दर्द में तुरंत राहत मिल जाती है।

बिल्कुल। पहले यह सिर्फ बढ़ती उम्र की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन आज के समय में 8-10 घंटे कंप्यूटर के सामने गलत पॉश्चर में बैठने, भारी वजन उठाने और खराब डाइट के कारण 25-30 साल के युवा भी स्लिप डिस्क और नसों के दबने का शिकार हो रहे हैं।

यह प्रक्रिया बिल्कुल दर्द रहित (Painless) और बहुत सुकून देने वाली होती है। इसमें करीब 30 से 45 मिनट लगते हैं। जब कमर पर हल्का गर्म औषधीय तेल रखा जाता है, तो मरीज़ को दर्द से इतनी राहत मिलती है कि कई बार उन्हें इस दौरान नींद ही आ जाती है।

आयुर्वेदिक औषधियां (जैसे गुग्गुल, रास्ना) सिर्फ दर्द सुन्न नहीं करतीं, बल्कि सूजन उतारती हैं। अगर इन्हें किसी नाड़ी वैद्य या अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में लिया जाए, तो इनका शरीर या पेट की आंतों पर कोई बुरा असर (Side effect) नहीं होता।

दर्द ठीक होने का मतलब यह नहीं कि आप तुरंत अपनी पुरानी गलतियों में लौट जाएं। इलाज के बाद भी कम से कम कुछ महीनों तक झटके से नीचे झुकने या भारी वजन उठाने से बचना चाहिए, ताकि नसों को पूरी तरह से अपनी पुरानी ताकत वापस पाने का समय मिल सके।

ऐसा बिल्कुल नहीं है। एमआरआई रिपोर्ट सिर्फ नस दबने की स्थिति बताती है। ज्यादातर मामलों में आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, पंचकर्म और जीवनशैली में सही बदलाव करके दबी हुई नसों को प्राकृतिक रूप से खोल लिया जाता है और सर्जरी की कोई नौबत नहीं आती।

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