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Shopkeepers जो दिन भर खड़े रहते हैं — उनमें veins क्यों उभर जाती हैं

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 18 May, 2026
  • category-iconUpdated on 15 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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जो लोग अपनी दुकान पर रोज़ 10-12 घंटे लगातार खड़े रहकर ग्राहकों को संभालते हैं, उनके पैरों की नसों और रीढ़ की हड्डी पर भयंकर दबाव पड़ता है। काम की आपाधापी में अक्सर पैरों के दर्द और नीली पड़ती नसों को हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर नसों के बुरी तरह फूलने और कमर से पैरों तक उतरने वाले तेज़ दर्द का रूप ले लेती है।

आयुर्वेद मानता है कि लंबे समय तक खड़े रहने और खराब पाचन से शरीर का 'वात' बहुत ज़्यादा बिगड़ जाता है। इससे खून को ऊपर धकेलने वाले नसों के अंदरूनी ढक्कन (दरवाज़े) कमज़ोर पड़ जाते हैं और नसें सख्त व टेढ़ी हो जाती हैं। आजकल 30-35 साल के जवान दुकानदारों में भी यह दिक्कत आम हो गई है। जीवा आयुर्वेद में हम सिर्फ दर्द की गोली नहीं देते, बल्कि नाड़ी देखकर इस बिगड़े हुए वात को शांत करते हैं और नसों को अंदर से दोबारा मज़बूत बनाते हैं।

वैरिकॉज़ नसें क्या होती हैं और उनकी शुरुआत कैसे होती है?

हमारी नसों के अंदर छोटे-छोटे दरवाज़े होते हैं, जिनका काम खून को पैरों से वापस ऊपर दिल की तरफ भेजना है। जब ये दरवाज़े अपना काम ठीक से नहीं कर पाते, तो खून पैरों में ही रुकने लगता है। इस रुके हुए खून से नसों पर इतना भारी दबाव पड़ता है कि वो फूलकर बाहर की तरफ नीली और उभरी हुई दिखने लगती हैं। ये सब एक दिन में नहीं होता, इसकी शुरुआत बहुत दबे पांव होती है।

अगर आपको शाम होते-होते पैरों में भारीपन लगने लगे, मोज़े उतारने पर पैरों में सूजन के गहरे निशान दिखें, पिंडलियों में अजीब सा खिंचाव हो और नसें नीली पड़ने लगें, तो तुरंत सतर्क हो जाइए। अक्सर लोग इसे दिन भर की थकान मानकर टाल देते हैं। लेकिन अगर ये सब लगातार हो रहा है, तो इसे भूलकर भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

दुकानदारों और लंबे समय तक खड़े रहकर काम करने वालों में यह समस्या ज्यादा क्यों होती है?

जो लोग दिन का ज़्यादातर वक्त खड़े होकर बिताते हैं जैसे दुकानदार, शिक्षक, पहरेदार या कारखानों में काम करने वाले उन्हें ये दिक्कत सबसे ज़्यादा पकड़ती है। दरअसल, जब हम चलते-फिरते हैं, तो हमारे पैरों का गोश्त (मांसपेशियां) खून को ऊपर धकेलने में बड़ी मदद करता है। लेकिन जब आप घंटों एक ही जगह बुत बनकर खड़े रहते हैं, तो पैरों की हलचल एकदम रुक जाती है। ऐसे में खून नीचे ही जमा होने लगता है और नसों की दीवारें जवाब देने लगती हैं। यही वजह है कि पैर भारी हो जाते हैं और नसें उभर आती हैं। इसे सिर्फ काम की थकावट समझना आगे चलकर बहुत भारी पड़ सकता है, इसलिए समय रहते इस ओर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।

दुकानदारों और लंबे समय तक खड़े रहकर काम करने वालों में यह समस्या ज्यादा क्यों होती है?

जो लोग घंटों खड़े होकर काम करते हैं, उनके पैरों की नसों पर लगातार दबाव बना रहता है। धीरे-धीरे यही दबाव नसों को कमजोर करने लगता है और वैरिकोज़ नसों की समस्या शुरू हो सकती है।

  • लंबे समय तक एक ही जगह खड़े रहना: दुकानदार, सुरक्षा गार्ड या शिक्षक जैसे लोग कई घंटों तक बिना बैठे काम करते हैं। इससे पैरों में खून नीचे की तरफ रुकने लगता है और नसों पर दबाव बढ़ जाता है।
  • पैरों की हलचल कम होना: चलते रहने से पिंडलियों की मांसपेशियां खून को ऊपर भेजने में मदद करती हैं। लेकिन जब शरीर ज्यादा देर तक स्थिर रहता है, तो यह प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।
  • पैरों में दबाव बढ़ना: लगातार खड़े रहने से पैरों की नसों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। धीरे-धीरे नसें फूलने लगती हैं और बाहर दिखाई देने लगती हैं।
  • शुरुआत में हल्के संकेत दिखना: शुरुआत में पैरों में भारीपन, सूजन या खिंचाव महसूस हो सकता है। ज़्यादातर लोग इसे सिर्फ थकान समझकर नजरअंदाज करते रहते हैं।
  • समय के साथ परेशानी बढ़ना: अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो दर्द और सूजन बढ़ सकती हैं। बाद में लंबे समय तक खड़ा रहना या चलना भी मुश्किल लगने लगता है।

शुरुआती संकेत जिन्हें लोग सामान्य थकान समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं

वैरिकोज़ नसों की समस्या अचानक गंभीर नहीं होती। शरीर पहले ही छोटे-छोटे संकेत देना शुरू कर देता है, लेकिन ज़्यादातर लोग इन्हें रोज़ की थकान या ज्यादा काम का असर मान लेते हैं।

  • शाम होते-होते पैरों में जलन: दिनभर काम करने के बाद पैरों में गर्माहट या जलन महसूस हो सकती है। यह नसों पर बढ़ते दबाव का शुरुआती संकेत हो सकता है।
  • लंबे समय तक खड़े रहने पर खुजली: कई लोगों को पैरों की नसों के आसपास खुजली होने लगती है। अक्सर लोग इसे त्वचा की सामान्य परेशानी समझ लेते हैं।
  • रात में पैरों में ऐंठन: रात को सोते समय पिंडलियों में अचानक खिंचाव या ऐंठन महसूस होना भी एक संकेत हो सकता है। यह खून के बहाव के ठीक से न होने की वजह से होता है।
  • टखनों के आसपास सूजन: शाम तक मोजे के निशान गहरे दिखना या टखनों के पास सूजन आना भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह पैरों में खून रुकने का इशारा हो सकता है।
  • पैरों में बेचैनी महसूस होना: कुछ लोगों को बार-बार पैर हिलाने का मन करता है या पैरों में अजीब सी बेचैनी रहती है। लंबे समय तक ऐसा होना सामान्य बात नहीं होती।

लंबे समय तक खड़े रहने से शरीर के अंदर आखिर होता क्या है?

जब आप घंटों बिना रुके एक ही जगह जमे रहते हैं, तो पैरों की नसों पर भयंकर दबाव पड़ता है। शुरू में तो हमें कुछ पता नहीं चलता, पर अंदर ही अंदर बड़ा खेल शुरू हो जाता है। अगर हम इस हल्के दर्द को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो परेशानी काफी बढ़ सकती है।

  • लगातार ज़ोर पड़ने से नसें पहले जैसी मज़बूत नहीं रह जातीं और धीरे-धीरे उनकी पकड़ एकदम ढीली पड़ जाती है।
  • जब खून ठीक से ऊपर दिल की तरफ नहीं चढ़ पाता, तो वो पैरों में ही जमा होने लगता है, जिससे पैर बहुत भारी लगने लगते हैं।
  • इसी रुके हुए खून की वजह से टखनों और पिंडलियों के आस-पास अच्छी-खासी सूजन आ जाती है।
  • शरीर तो सीधा खड़ा रहता है, लेकिन पैरों में खून की रफ़्तार एकदम सुस्त पड़ जाती है। इसी वजह से पैरों में तेज़ खिंचाव और बेचैनी शुरू हो जाती है।

वैरिकोज़ नसें और आयुर्वेद: दोष असंतुलन का संबंध 

आयुर्वेद में पैरों की सूजी और नीली नसों को कोई आम बीमारी नहीं माना जाता। इसे सीधे तौर पर शरीर के अंदर बिगड़े हुए 'वात' से जोड़कर देखा जाता है। जब वात बढ़ता है, तो खून का बहाव अटकने लगता है और नसें धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ जाती हैं। इसी वजह से पैरों में भारीपन और सूजन आ जाती है। अगर आप लंबे समय तक खड़े रहते हैं, वक्त पर खाना नहीं खाते, कम पानी पीते हैं और रोज़ की टेंशन लेते हैं, तो वात बहुत तेज़ भड़कता है। ऐसे में सिर्फ बाहर उभरी हुई नसों पर लेप लगाने से काम नहीं चलता, अंदरूनी बैलेंस को समझना बहुत ज़रूरी है।

आयुर्वेद का इलाज करने का तरीका

यहाँ सिर्फ सूजी हुई नसों को छिपाने या ऊपरी दर्द मिटाने का काम नहीं होता। आयुर्वेद इस बात की जड़ तक जाता है कि आखिर वात क्यों बिगड़ा और खून का बहाव क्यों रुका।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ सूजन या भारीपन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाता। आप कितने घंटे खड़े रहते हैं, आपका रूटीन क्या है और अंदर क्या गड़बड़ है, इस पर बारीकी से काम होता है। 
  • रक्त प्रवाह को बेहतर बनाने पर फोकस: सारा ज़ोर पैरों में रुके हुए खून को तेज़ दौड़ाने पर रहता है, ताकि नसों पर पड़ा भारी दबाव कम हो सके। 
  • वात और जमा अवरोध को संतुलित करना: जब वात हवा की तरह नसों को सुखाकर उनमें खिंचाव पैदा करता है, तो सबसे पहले इसी हवा को शांत करके नसों की रुकावट खोली जाती है। 
  • पाचन और दिनचर्या में सुधार: खराब पाचन और उल्टा-सीधा खानपान शरीर को भारी कर देता है। इसीलिए हल्का खाना और एक पक्की दिनचर्या इस इलाज के लिए बहुत ज़रूरी है। 
  • प्राकृतिक थेरेपी और सहयोगी देखभाल: कुछ खास देसी तरीकों और मालिश से शरीर को अंदर से साफ किया जाता है, ताकि बीमारी दोबारा लौटकर न आए। 

नसों के लिए गज़ब की आयुर्वेदिक औषधियाँ

इन जड़ी-बूटियों का काम सिर्फ दर्द सुन्न करना नहीं है, बल्कि ये नसों को कुदरती तरीके से अपनी पुरानी हालत में लाती हैं:

  • गुग्गुलु: शरीर में कहीं भी खून का थक्का जम रहा हो या सूजन बहुत ज़्यादा हो, तो ये उस रुकावट को पिघलाने में गज़ब का असर दिखाती है।
  • त्रिफला चूर्ण: पेट को साफ रखने और पाचन को सुधारने के लिए इसका इस्तेमाल बहुत बढ़िया है, जिससे शरीर की सारी गंदगी बाहर आ जाती है।
  • मंजिष्ठा: खून को एकदम साफ करने और उसकी रफ़्तार बढ़ाने के लिए इसका खूब इस्तेमाल होता है। यह नसों की दिक्कत में किसी जादू से कम नहीं है।
  • अश्वगंधा: दिन भर खड़े रहने से जो थकान आती है, ये उसे चूस लेता है और शरीर को अंदर से मज़बूत बनाता है।

नसों को ठीक करने वाली कुछ खास आयुर्वेदिक थेरेपी

दवाओं के अलावा, शरीर को रिलैक्स करने के लिए कुछ ऐसे अचूक तरीके भी हैं जो नसों की जकड़न खोल देते हैं:

  • अभ्यंग: खास जड़ी-बूटियों वाले तेल से हल्के हाथों से मालिश करने पर पैरों का भारीपन पल भर में छूमंतर हो जाता है और खून दौड़ने लगता है।
  • स्वेदन: हल्की-हल्की भाप लेने से शरीर की सारी जकड़न पिघल जाती है और गज़ब का हल्कापन महसूस होता है।
  • बस्ती (एनीमा): वात को जड़ से शांत करने के लिए की प्रक्रिया सबसे ज़रूरी मानी जाती है, क्योंकि नसों की बीमारी को बढ़ाने में इसी बिगड़े वात का सबसे बड़ा हाथ होता है।

वैरिकोज़ नसों के लिए आहार: क्या खाएं और क्या न खाएं

क्या खाएं?

  • हल्का और ताजा भोजन
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • पर्याप्त मात्रा में पानी
  • फाइबर वाला भोजन ताकि कब्ज न हो
  • मूंग दाल और हल्की खिचड़ी
  • सीमित मात्रा में घी

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • जरूरत से ज्यादा मसालेदार खाना
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना
  • पैकेट बंद और बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड चीजें
  • बहुत ज्यादा मीठा
  • जरूरत से ज्यादा चाय और कॉफी

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम आशा कुमारी है, मेरी उम्र 50 वर्ष है और मैं कानपुर से हूँ। पिछले 7–8 सालों से मैं जोड़ों के दर्द से परेशान थी। मैंने एलोपैथिक और होम्योपैथिक दोनों तरह की दवाइयाँ लीं, लेकिन कोई स्थायी राहत नहीं मिली। एक दिन डॉक्टर ने मुझे MRI करवाने की सलाह दी। रिपोर्ट में पता चला कि मुझे वैरिकोज वेन्स की समस्या है। इस वजह से मेरे पैरों में हमेशा सूजन रहती थी और मुझे ठीक से चलने-फिरने में भी बहुत परेशानी होती थी। मेरी बहन ने मुझे टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान को कार्यक्रम देखने के लिए कहा गया। जब मैंने उनका कार्यक्रम देखा, तो मुझे जोड़ों के दर्द और आयुर्वेदिक उपचार के बारे में काफी जानकारी मिली। इसके बाद मैंने अपने नजदीकी जीवा क्लिनिक जाने का फैसला किया। वहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा। मुझे वैरिकोज वेन्स के लिए आयुर्वेदिक उपचार और सही काउंसलिंग दी गई। धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा। पैरों की सूजन कम हुई और अब मैं पहले से बेहतर तरीके से चल-फिर पा रही हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?

वैरिकोज़ नसों की समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब यह रोज़मर्रा की जिंदगी और चलने-फिरने को प्रभावित करने लगे।

  • पैरों में लगातार भारीपन और दर्द बने रहना
  • टखनों या पिंडलियों में रोज़ सूजन आना
  • नसों का ज्यादा उभरकर दिखाई देना
  • लंबे समय तक खड़े रहने पर जलन या खिंचाव बढ़ना
  • रात में पैरों में ऐंठन या बेचैनी होना
  • त्वचा का रंग बदलना या खुजली बढ़ना
  • आराम करने के बाद भी पैरों को हल्का महसूस न होना
  • चलने-फिरने या काम करने में परेशानी होने लगना

निष्कर्ष

वैरिकोज़ नसें केवल बाहर उभरी हुई नसों की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह शरीर के अंदर रक्त प्रवाह और नसों पर बढ़ते दबाव का संकेत भी हो सकती हैं। लंबे समय तक खड़े रहना, गलत दिनचर्या, बढ़ता वजन और शरीर की कम हलचल इस परेशानी को धीरे-धीरे बढ़ा सकते हैं।

आधुनिक चिकित्सा इसे नसों और रक्त प्रवाह से जुड़ी समस्या मानती है, जबकि आयुर्वेद इसे बढ़े हुए वात, खराब रक्त प्रवाह और शरीर के अंदर बने असंतुलन से जोड़कर देखता है। इसलिए केवल लक्षणों को दबाने के बजाय सही दिनचर्या, संतुलित खान-पान और समय रहते देखभाल करना बहुत जरूरी माना जाता है। शुरुआती संकेतों को समझकर समय पर ध्यान दिया जाए, तो आगे चलकर होने वाली परेशानी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, यह परेशानी केवल बढ़ती उम्र तक सीमित नहीं है। आजकल कम उम्र के लोगों में भी यह समस्या देखने को मिल रही है, खासकर उन लोगों में जो लंबे समय तक खड़े रहकर काम करते हैं। गलत दिनचर्या, बढ़ता वजन और शरीर की कम हलचल भी इसका कारण बन सकते हैं। कई बार शुरुआती उम्र में केवल हल्के संकेत दिखाई देते हैं, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं। समय के साथ यही परेशानी बढ़ सकती है।

हल्का चलना और शरीर को सक्रिय रखना कई लोगों के लिए मददगार माना जाता है। इससे पैरों में खून का बहाव बेहतर बना रहने में सहायता मिल सकती है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठे या खड़े रहने से परेशानी बढ़ सकती है। हालांकि बहुत ज्यादा दबाव वाले व्यायाम हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होते। इसलिए शरीर की स्थिति के अनुसार गतिविधि चुनना जरूरी होता है।

कई लोगों को गर्मियों में पैरों में सूजन और भारीपन ज्यादा महसूस हो सकता है। गर्म मौसम में नसें थोड़ी फैल सकती हैं, जिससे पैरों में दबाव बढ़ने लगता है। लंबे समय तक खड़े रहने पर जलन और बेचैनी भी बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में शरीर को पानी की कमी से बचाना और पैरों को आराम देना जरूरी माना जाता है। हल्का और संतुलित भोजन भी मदद कर सकता है।

हां, लंबे समय तक नसों पर दबाव बने रहने से त्वचा प्रभावित हो सकती है। कुछ लोगों में त्वचा का रंग गहरा पड़ने लगता है या खुजली महसूस हो सकती है। कई बार त्वचा रूखी और संवेदनशील भी लग सकती है। अगर लंबे समय तक ध्यान न दिया जाए, तो परेशानी और बढ़ सकती है। इसलिए शुरुआती बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

जो लोग लंबे समय तक बस, कार या विमान में बैठे रहते हैं, उनमें भी पैरों में खून का बहाव धीमा पड़ सकता है। लगातार कई घंटों तक एक ही स्थिति में रहने से पैरों में भारीपन और सूजन बढ़ सकती है। इसलिए लंबे सफर के दौरान बीच-बीच में पैरों को हिलाना और थोड़ा चलना फायदेमंद माना जाता है। शरीर की हलचल बनाए रखना जरूरी होता है।

हल्की शारीरिक गतिविधि कई लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा दबाव डालना सही नहीं माना जाता। अगर सीढ़ियां चढ़ने पर ज्यादा दर्द, सूजन या खिंचाव महसूस हो, तो शरीर को आराम देना जरूरी हो सकता है। हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है, इसलिए गतिविधि भी उसी हिसाब से तय करनी चाहिए। धीरे-धीरे और संतुलित तरीके से चलना बेहतर माना जाता है।

शरीर में पानी की कमी होने पर कई बार शरीर में भारीपन और थकान बढ़ सकती है। पर्याप्त पानी न पीने से शरीर का संतुलन प्रभावित हो सकता है और कब्ज जैसी परेशानी भी बढ़ सकती है। यह स्थिति नसों पर दबाव बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है। इसलिए दिनभर पर्याप्त पानी और प्राकृतिक तरल पदार्थ लेना जरूरी माना जाता है। इससे शरीर को हल्का महसूस करने में मदद मिल सकती है।

कई लोगों को पैरों को थोड़ी ऊंचाई पर रखकर आराम करने से राहत महसूस हो सकती है। इससे पैरों में जमा दबाव कम करने और भारीपन घटाने में मदद मिल सकती है। खासकर लंबे समय तक खड़े रहने के बाद यह तरीका आरामदायक लग सकता है। हालांकि यह केवल सहायक उपाय माना जाता है। लगातार परेशानी होने पर सही सलाह लेना जरूरी होता है।

तनाव सीधे नसों को नहीं उभारता, लेकिन शरीर के संतुलन और दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। तनाव की वजह से नींद, खान-पान और शरीर की गतिविधि बिगड़ सकती है। इससे शरीर में थकान और भारीपन ज्यादा महसूस हो सकता है। लंबे समय तक तनाव बने रहने पर शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए मानसिक और शारीरिक संतुलन दोनों जरूरी माने जाते हैं।

हां, केवल लंबे समय तक खड़े रहना ही नहीं, बल्कि लगातार बैठे रहना भी परेशानी बढ़ा सकता है। जब पैरों की हलचल कम हो जाती है, तो खून का बहाव धीमा पड़ सकता है। इससे पैरों में सूजन, भारीपन और जकड़न महसूस हो सकती है। इसलिए बीच-बीच में उठकर चलना और पैरों को हिलाते रहना जरूरी माना जाता है। शरीर को लंबे समय तक एक ही स्थिति में नहीं रखना चाहिए।

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