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शुगर कंट्रोल में है फिर भी हाथ-पैर सुन होते हैं — Nerve Damage रुका क्यों नहीं?

Information By Dr. Keshav Chauhan

जब शरीर में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ता है, तो डॉक्टर अक्सर दवाइयों और लाइफस्टाइल में बदलाव के जरिए इसे नियंत्रित करने की सलाह देते हैं कई मरीज़ अपनी मेहनत और अनुशासन से ब्लड शुगर रिपोर्ट को पूरी तरह नॉर्मल रेंज में ले आते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि अब वे पूरी तरह सुरक्षित हैं लेकिन इसके बावजूद, अचानक एक दिन पैरों के तलवों या हाथों की उँँगलियों में अजीब सा सुन्नपन और चींटियाँ चलने जैसी झुनझुनी महसूस होने लगती है

शुगर कंट्रोल में होने के बाद भी हाथ-पैर सुन्न होने की यह स्थिति बेहद भ्रमित करने वाली और चिंताजनक होती है लोग समझ नहीं पाते कि जब ग्लूकोमीटर पर रीडिंग बिल्कुल सही आ रही है, तो शरीर के अंदरूनी तंत्र में यह गड़बड़ी क्यों हो रही है वास्तव में, यह इस बात का सीधा संकेत है कि सतह पर दिखने वाला नियंत्रण अंदरूनी नसों की हो चुकी क्षति को पूरी तरह रोकने या सुधारने में नाकाम रहा है, जिसे समय रहते समझना बेहद आवश्यक है।

शुगर नॉर्मल होने के बाद भी हाथ-पैर सुन्न क्यों होते हैं?

जब कोई मरीज़ अपनी रिपोर्ट में शुगर का स्तर बिल्कुल सामान्य देखता है, तो वह मान लेता है कि उसका पूरा शरीर अब खतरे से बाहर है। लेकिन नसों की कार्यप्रणाली और उनके पोषण का विज्ञान बेहद जटिल होता है, जिसे केवल ग्लूकोज काउंट से नहीं नापा जा सकता। ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित हो जाने का मतलब यह नहीं है कि पहले से डैमेज हो चुकी नसें रातों-रात बिल्कुल ठीक हो गई हैं।

  • पुरानी नर्व क्षति का असर (Past Nerve Damage Effect): लंबे समय तक शरीर में हाई ब्लड शुगर रहने के कारण नसों के सुरक्षा कवच यानी मायलिन शीथ (myelin sheath) को जो गंभीर नुकसान पहुँचता है, वह शुगर कंट्रोल होने के बाद भी तुरंत रिपेयर नहीं होता, जिसके कारण नर्व डैमेज के लक्षण जैसे सुन्नपन लंबे समय तक बने रहते हैं।
  • सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में रुकावट (Microvascular Blockage): नसों को पोषण और ऑक्सीजन देने वाली बेहद बारीक रक्त वाहिकाएँ यानी कैपिलरीज (capillaries) में अगर पुराना अवरोध बना रहे, तो ब्लड सप्लाई बाधित होने से नसों को पर्याप्त ताकत नहीं मिलती, जिससे नसों की कमजोरी की समस्या जस की तस बनी रहती है।
  • मेटाबॉलिक मेमोरी (Metabolic Memory): चिकित्सा विज्ञान में इसे 'मेटाबॉलिक मेमोरी' कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब है कि शरीर की कोशिकाएँ पुराने हाई शुगर के बुरे प्रभावों को लंबे समय तक याद रखती हैं और शुगर नॉर्मल होने के बाद भी नसों में अंदरूनी सूजन या ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (oxidative stress) पैदा करती रहती हैं।
  • विटामिन और पोषण की कमी (Nutritional Deficiencies): डायबिटीज की कुछ आधुनिक एलोपैथिक दवाइयों के लगातार कई वर्षों तक सेवन करने से शरीर में विटामिन बी12 (vitamin B12) की भारी कमी हो जाती है, जो स्वस्थ नसों के लिए सबसे ज़रूरी पोषक तत्व है, जिसके परिणामस्वरूप हाथों का सुन्न होना शुरू हो जाता है।

शुगर से जुड़े नर्व डैमेज के कौन-से प्रकार हो सकते हैं?

शुगर के मरीज़ों में नसों की यह खराबी अलग-अलग रूपों में सामने आ सकती है, जिन्हें सही समय पर पहचानना बेहद ज़रूरी होता है। यह केवल एक आम लक्षण नहीं बल्कि एक गंभीर स्थिति का हिस्सा हो सकता है जिसे नज़रअंदाज़ करने पर शरीर के अन्य हिस्से भी प्रभावित हो सकते हैं।

यह समस्या मुख्य रूप से एक व्यापक न्यूरोलॉजिकल बीमारियाँ का रूप ले सकती है, जिसके विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं:

  • पेरीफेरल न्यूरोपैथी (Peripheral Neuropathy): यह सबसे आम प्रकार है जो मुख्य रूप से पैरों के तलवों, उँँगलियों और हाथों की नसों को प्रभावित करता है। इसमें पेरीफेरल न्यूरोपैथी के कारण सबसे पहले पैरों में जलन, भारीपन और सुन्नता का अहसास होता है।
  • ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी (Autonomic Neuropathy): यह शरीर के आंतरिक अंगों जैसे दिल, पेट और मूत्राशय को नियंत्रित करने वाली नसों को प्रभावित करता है। इसके कारण मरीज़ का पाचन तंत्र सुस्त पड़ जाता है और कब्ज़ या भयंकर गैस की समस्या होने लगती है।
  • प्रोक्सिमल न्यूरोपैथी (Proximal Neuropathy): यह मुख्य रूप से जाँँघों, कूल्हों या पैरों के ऊपरी हिस्से की नसों को नुकसान पहुँचाती है, जिससे मरीज़ को उठने-बैठने और सीढ़ियाँ चढ़ने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
  • फोकल न्यूरोपैथी (Focal Neuropathy): इसमें किसी एक विशेष नस को अचानक नुकसान पहुँचता है, जिससे शरीर के किसी एक हिस्से जैसे चेहरे, आँख या हाथ की किसी खास नस में अचानक कमज़ोरी आ जाती है।

नसों की इस खराबी को किन लक्षणों से पहचानें?

अगर आपकी शुगर पूरी तरह नियंत्रण में है, तो भी आपको अपने शरीर में होने वाले इन छोटे-छोटे बदलावों और शुरुआती अलार्म को बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। ये लक्षण बताते हैं कि अंदरूनी नसें अभी भी संकट में हैं।

  • पैरों के तलवों में हर वक्त ऐसा महसूस होना मानो आपने बहुत मोटे मोज़े पहन रखे हैं या तलवों के नीचे कोई रुई या कपड़ा चिपका हुआ है।
  • रात के समय पैरों में भयंकर झुनझुनी होना, सुइयाँ चुभने जैसा अहसास या अचानक तेज़ जलन होना जिससे मरीज़ की नींद बार-बार टूट जाती है।
  • पैरों या हाथों में ठंडे या गर्म का अहसास पूरी तरह खत्म हो जाना, जिससे अनजाने में पैर जलने या चोट लगने का खतरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है।
  • चलते समय पैरों का संतुलन बिगड़ना या अचानक ऐसा लगना कि पैरों में ज़मीन का सही स्पर्श महसूस नहीं हो रहा है, जिससे गिरने का डर बना रहता है।

इससे आगे चलकर क्या जटिलताएँ होती हैं?

  • डायबिटिक फुट अल्सर (Diabetic Foot Ulcer): नसों के सुन्न होने के कारण पैरों की छोटी चोटें बड़े घाव का रूप ले लेती हैं, जो जल्दी ठीक नहीं होतीं और संक्रमण फैलने पर पैर काटने तक की नौबत आ सकती है।
  • माँँसपेशियों का सूखना (Muscle Wasting): नसों से सही सिग्नल और पोषण न मिलने के कारण पैरों और हाथों की माँँसपेशियाँ धीरे-धीरे कमज़ोर होकर सूखने लगती हैं, जिससे शरीर का ढांचा कमज़ोर हो जाता है।
  • क्रोनिक फटीग और डिप्रेशन: लगातार बने रहने वाले दर्द और झुनझुनी के कारण मरीज़ अनिद्रा का शिकार हो जाता है, जिससे शरीर में क्रोनिक फटीग और भयंकर मानसिक अवसाद जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं।

नसों को ताकत देने वाली विशेष आयुर्वेदिक डाइट

खानपान में सही बदलाव करके हम नसों में बढ़े हुए वात दोष को बहुत आसानी से शांत कर सकते हैं और उन्हें आवश्यक पोषण प्रदान कर सकते हैं। इसके लिए एक संतुलित डाइट चार्ट नीचे दिया गया है जो नसों को अंदर से चिकनाई और मजबूती देगा:

आहार की श्रेणी क्या खाएँ (नसों को ताकत और चिकनाई देने वाले) क्या न खाएँ (वात बढ़ाने वाले और नुकसानदेह)
अनाज (Grains) पुराना शाली चावल, गेहूं, जौ, रागी और ओट्स (दूध के साथ)। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी रोटी, बहुत ज़्यादा बाजरा या मक्का।
वसा और तेल (Fats) शुद्ध गाय का देसी घी, तिल का तेल, बादाम का तेल। रिफाइंड तेल, वनस्पति घी, अत्यधिक तली-भुनी चीजें।
सब्जियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, बथुआ (घी और हींग-जीरे में पकी हुई)। कच्चा सलाद, बंदगोभी, फूलगोभी, अरबी, भिंडी और बैंगन।
फल (Fruits) पका हुआ पपीता, अनार, सेब, भीगे हुए बादाम और अखरोट। खट्टे फल, तरबूज, बहुत ठंडे या फ्रिज में रखे हुए फल।
पेय पदार्थ (Beverages) गुनगुना पानी, दालचीनी या अदरक की हर्बल चाय। कोल्ड ड्रिंक्स, डार्क कॉफी, शराब और अत्यधिक ठंडी चीजें।

नसों का सुन्नपन दूर करने वाली जादुई जड़ी-बूटियाँँ

प्रकृति ने हमें ऐसी शक्तिशाली जड़ी-बूटियाँँ दी हैं जो नसों की अंदरूनी कमज़ोरी को मिटाकर नर्वस सिस्टम को दोबारा एक्टिव करने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। इन बूटियों का सही कॉम्बिनेशन नसों के कायाकल्प में मदद करता है।

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह नसों के लिए एक परम रसायन माना जाता है। अश्वगंधा नसों की अंदरूनी सूजन को कम करता है, कोशिकाओं को मजबूती देता है और डैमेज नर्व्स के पुनर्निर्माण में मदद करता है।
  • गुडूची (Guduchi): इसे गिलोय भी कहा जाता है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। गुडूची शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करती है और बढ़े हुए ब्लड शुगर के पुराने साइड इफेक्ट्स को साफ करती है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): नर्वस सिस्टम को शांत और मजबूत करने के लिए ब्राह्मी का उपयोग प्राचीन समय से किया जा रहा है, यह नसों के सिग्नलों और दिमाग के तालमेल को बेहतर बनाती है।
  • शतावरी (Shatavari): शरीर की सभी धातुओं को गहरा पोषण देने और बढ़े हुए रूखे वात दोष को शांत करने में शतावरी बेहद फायदेमंद है, जिससे पैरों का सूखापन दूर होता है।
  • त्रिफला (Triphala): शरीर से हानिकारक टॉक्सिन्स को बाहर निकालने और पाचन को दुरुस्त रखने के लिए त्रिफला का नियमित सेवन नसों के सूक्ष्म ब्लॉकेज को खोलने में मदद करता है।

नसों को रीबूट करने वाली सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब कस्टमाइज्ड आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ-साथ बाहरी पंचकर्म चिकित्सा का सहारा लिया जाता है, तो नसों में खून का दौरा बहुत तेज़ी से बढ़ता है। इससे सुन्नपन और जकड़न में मरीज़ को बहुत तीव्र राहत महसूस होती है।

  • अभ्यंग मालिश (Abhyanga Massage): विशेष वात-शामक औषधीय तेलों से पूरे शरीर या प्रभावित अंगों पर की जाने वाली अभ्यंग मालिश नसों की जकड़न को खत्म करती है और ब्लड सर्कुलेशन को बहुत तेज़ कर देती है।
  • स्वेदन थेरेपी (Swedana Therapy): औषधीय काढ़े की भाप से शरीर को सेंकने की स्वेदन थेरेपी त्वचा के रोमछिद्रों को खोलती है, जमे हुए कफ को पिघलाती है और नसों के भयंकर दर्द को शांत करती है।
  • शिरोधारा (Shirodhara): गुनगुने औषधीय तेल की निरंतर धार माठे पर गिराने की शिरोधारा थेरेपी सीधे नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती है और न्यूरोपैथी के कारण होने वाले तनाव से राहत दिलाती है।
  • उद्वर्तन थेरेपी (Udvartana Therapy): जड़ी-बूटियों के विशिष्ट सूखे चूर्ण से शरीर पर की जाने वाली उद्वर्तन थेरेपी शरीर के अतिरिक्त कफ और मेद को कम करती है, जिससे नसों के सूक्ष्म रास्तों के ब्लॉकेज आसानी से खुल जाते हैं।

ठीक होने का समय

नसों का डैमेज होना एक क्रोनिक और पुरानी समस्या है जो धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिए इन्हें दोबारा पूरी तरह स्वस्थ, पोषित और क्रियाशील होने में कुछ महीनों का धैर्यपूर्ण और अनुशासित समय लगता है।

मरीज़ के शरीर में सुधार की यह प्रक्रिया निम्नलिखित समय चक्र के अनुसार धीरे-धीरे आगे बढ़ती है:

  • शुरुआती 1 से 2 महीने: आयुर्वेदिक औषधियों, शुद्ध घी और आहार के प्रभाव से नसों का रूखापन कम होने लगता है। रात के समय होने वाली भयंकर जलन, सुइयों जैसी चुभन और पैरों के भारीपन में मरीज़ को स्पष्ट राहत महसूस होने लगती है।
  • 3 से 4 महीने: नसों के सुरक्षा कवच (Myelin sheath) का पुनर्निर्माण तेज होता है। हाथों और पैरों का सुन्नपन धीरे-धीरे कम होने लगता है, खून का दौरा सुधरता है और त्वचा पर स्पर्श का अहसास वापस लौटने लगता है।
  • 5 से 6 महीने: नर्वस सिस्टम पूरी तरह मजबूत हो जाता है, माँँसपेशियों की कमजोरी दूर होती है और मरीज़ बिना किसी सहारे या दर्द के सामान्य रूप से चलने-फिरने और एक बेहद सक्रिय जीवन जीने में सक्षम हो जाता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस बढ़े हुए वात और नसों की कमजोरी को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो आपको बिना समय गंवाए तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जाँँच करवानी चाहिए:

  • अगर पैरों के तलवों में कोई ऐसा घाव, कट या छाला दिखाई दे जिसमें आपको बिल्कुल भी दर्द महसूस न हो रहा हो, क्योंकि यह गंभीर असंवेदनशीलता का संकेत है।
  • अगर पैरों या हाथों की उँँगलियों का रंग अचानक नीला या काला पड़ने लगे, जो उस हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन के पूरी तरह रुकने का खतरनाक अलार्म हो सकता है।
  • अगर अचानक पैरों में इतनी कमजोरी आ जाए कि चलते समय चप्पल पैर से अपने आप निकल जाए या पैर ज़मीन पर घिसटने लगे, जिसे मेडिकल भाषा में फुट ड्रॉप (Foot Drop) कहते हैं।
  • यदि सुन्नपन और कमजोरी बहुत तेज़ी से पैरों से ऊपर की ओर जाँँघों तक या हाथों से बाजुओं की तरफ बढ़ने लगे, तो यह एक इमरजेंसी स्थिति हो सकती है।

निष्कर्ष

अपने शरीर को एक अमूल्य धरोहर मानें और ग्लूकोमीटर की सामान्य रीडिंग देखकर अंदरूनी नसों की चीख को नज़रअंदाज़ करने की भूल बिल्कुल न करें। ब्लड शुगर कंट्रोल में होना एक बेहतरीन शुरुआत है, लेकिन नसों के सुन्नपन और झुनझुनी का बने रहना साफ इशारा करता है कि आपके नर्वस सिस्टम को गहरे पोषण, स्नेहन और वात संतुलन की तत्काल आवश्यकता है। आयुर्वेद की समृद्ध जड़ी-बूटियों जैसे अश्वगंधा और गिलोय को अपनाएं, भोजन में शुद्ध गाय के घी को शामिल करें और पंचकर्म की बेहतरीन थेरेपीज़ से अपनी कमज़ोर नसों को नया जीवन दें। इस छुपे हुए खतरे को अपनी नियति न बनने दें, और अपनी नसों को अंदर से पूरी तरह फौलादी और क्रियाशील बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

References

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC3395295/

https://www.icmr.gov.in/icmrobject/custom_data/pdf/resource-guidelines/ICMR_GuidelinesType2diabetes2018_0.pdf

https://www.who.int/india/diabetes

https://www.cdc.gov/diabetes/treatment/index.html

FAQs

नहीं। सुन्नपन में त्वचा की तापमान महसूस करने की क्षमता कम हो जाती है। सीधे गर्म पानी से जलने या छाले पड़ने का खतरा रहता है। हमेशा पानी का तापमान पहले शरीर के सामान्य हिस्से पर जांचकर ही इस्तेमाल करें।

नहीं। नसों के सुन्न होने पर त्वचा कटने का दर्द तुरंत महसूस नहीं होता। छोटा कट भी संक्रमण या अल्सर बन सकता है। नाखून हमेशा सीधे और सावधानी से काटें, किनारों को बहुत गहराई तक न काटें।

हां, ठंड में रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे हाथ-पैरों में ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है। इससे नसों को पोषण कम मिलता है और सुन्नपन, झुनझुनी तथा दर्द की समस्या अधिक बढ़ सकती है।

पूरी तरह सुन्न पैरों वाले मरीजों को नंगे पैर नहीं चलना चाहिए। कंकड़, कांटे या कीड़े के काटने का पता नहीं चलता, जिससे घाव और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। हमेशा आरामदायक और सुरक्षात्मक जूते पहनें।

हां, तलवों का एहसास कम होने पर शरीर संतुलन बनाए रखने के लिए चाल बदल लेता है। लंबे समय तक गलत Walking Posture रहने से घुटनों, कूल्हों और कमर में दर्द की समस्या बढ़ सकती है।

हां, आयुर्वेद में पादाभ्यंग लाभकारी माना गया है। रात को गुनगुने देसी घी या तिल के तेल से तलवों की हल्की मालिश करने से वात दोष शांत होता है और नसों को आराम मिलने में मदद मिल सकती है।

नहीं। बहुत टाइट मोज़े पहनने से ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित हो सकता है। न्यूरोपैथी के मरीजों को ढीले, सूती और बिना ज्यादा दबाव वाले मोज़े पहनने चाहिए ताकि पैरों में हवा और रक्त प्रवाह सही बना रहे।

हां, ज्यादा तनाव और चिंता नसों की समस्या बढ़ा सकते हैं

नहीं। पैकेटबंद जूस में अधिक शुगर और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं, जो नसों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। नसों को मजबूत रखने के लिए ताजा, हल्का और सुपाच्य भोजन बेहतर माना जाता है।

हां, लंबे समय तक पैर पर पैर चढ़ाकर बैठने से नसों और रक्त वाहिकाओं पर दबाव बढ़ता है। इससे पैरों में सुन्नपन और झुनझुनी की समस्या गंभीर हो सकती है। हमेशा पैरों को सीधा रखकर बैठना बेहतर होता है।

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