गर्मियों में तेज़ धूप,बढ़ता तापमान और लगातार पसीना निकलना हमारे शरीर पर गहरा असर डालता है।इस मौसम में डिहाइड्रेशन (Dehydration) होना एक आम समस्या है,लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गर्मी बढ़ने के साथ-साथ गुर्दे की पथरी (किडनी स्टोन) का खतरा भी काफी बढ़ जाता है कई वैज्ञानिक शोधों और चिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार, गर्मियों के महीनों में किडनी स्टोन होने की संभावना लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जो स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है
अक्सर लोगों को लगता है कि गर्मियों में सिर्फ अधिक पानी पी लेने से पथरी से पूरी तरह बचा जा सकता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक व्यापक है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा, दोनों मानते हैं कि पथरी बनने का संबंध केवल पानी की कमी से नहीं, बल्कि हमारे खानपान, पाचन तंत्र की स्थिति और शरीर के अंदर मौजूद असंतुलनों से भी जुड़ा होता है। इसलिए इस मौसम में केवल पानी पीना पर्याप्त नहीं है। शरीर की जठराग्नि को संतुलित रखना, पाचन को मजबूत बनाना और शरीर में जमा विषैले तत्वों को समय पर बाहर निकालना भी उतना ही आवश्यक है। तभी किडनी को स्वस्थ रखा जा सकता है और पथरी बनने के खतरे को कम किया जा सकता है।
गर्मी के मौसम में किडनी स्टोन का ख़तरा क्यों बढ़ जाता है?
- गर्मियों के दिनों में तापमान सामान्य से कहीं अधिक बढ़ जाता है, जिसका सीधा असर हमारे शरीर की कार्यप्रणालियों पर पड़ता है। यदि इस दौरान हम अपनी दिनचर्या, खानपान और पानी पीने की आदतों पर ध्यान नहीं देते, तो इसका प्रभाव सबसे पहले पाचन तंत्र और किडनी पर दिखाई देने लगता है। शरीर में पानी की कमी और बढ़ते हुए विषैले तत्व मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ बना सकते हैं, जो धीरे-धीरे किडनी स्टोन (गुर्दे की पथरी) के खतरे को बढ़ा देती हैं। आइए समझते हैं कि गर्मियों में पथरी बनने की संभावना क्यों बढ़ जाती है।
- अत्यधिक पसीना और डिहाइड्रेशन
गर्मियों में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए लगातार पसीना निकलता है। यदि पसीने के साथ बाहर निकले पानी की भरपाई समय पर नहीं की जाए, तो शरीर में डिहाइड्रेशन होने लगता है। इससे यूरिन की मात्रा कम हो जाती है और किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। - यूरिन में खनिजों का गाढ़ा होना
जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो यूरिन अधिक गाढ़ा और पीले रंग का हो जाता है। ऐसी स्थिति में यूरिन में मौजूद कैल्शियम, ऑक्सलेट और यूरिक एसिड जैसे खनिज तत्वों की सांद्रता बढ़ जाती है। समय के साथ ये तत्व आपस में मिलकर छोटे-छोटे क्रिस्टल बनाते हैं, जो आगे चलकर पथरी का रूप ले सकते हैं। - बदलती जीवनशैली का प्रभाव
आजकल कई लोग लंबे समय तक एसी वाले कमरों में रहते हैं और प्यास लगने पर पानी की बजाय कोल्ड ड्रिंक या अन्य कृत्रिम पेय पदार्थों का सेवन करते हैं। इससे शरीर की प्राकृतिक जल संतुलन प्रणाली प्रभावित हो सकती है। साथ ही, शारीरिक गतिविधियों की कमी और अनियमित दिनचर्या भी किडनी के सामान्य कार्यों पर नकारात्मक असर डाल सकती है। - गलत खानपान और अधिक नमक का सेवन
गर्मियों में बाहर का पैकेटबंद भोजन, नमकीन स्नैक्स, चिप्स और प्रोसेस्ड फूड खाने की आदत बढ़ जाती है। इनमें मौजूद अधिक मात्रा का सोडियम शरीर में कैल्शियम के उत्सर्जन को बढ़ा सकता है। यूरिन में कैल्शियम की बढ़ी हुई मात्रा पथरी बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है, इसलिए नमक का संतुलित सेवन बेहद आवश्यक माना जाता है।
किडनी स्टोन के विभिन्न प्रकार कौन से हैं?
चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार, शरीर के भीतर बनने वाली पथरी हमेशा एक ही तत्व से नहीं बनती, बल्कि यह अलग-अलग रासायनिक अवयवों के जमा होने का परिणाम होती है। इन प्रकारों को गहराई से समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि इनके मूल कारणों को जानकर सही उपचार और खानपान का चयन किया जा सके।
- कैल्शियम ऑक्सलेट स्टोन (Calcium Oxalate Stone): यह सबसे आम प्रकार की पथरी है जो लगभग 80% मरीज़ों में देखी जाती है। यह तब बनती है जब यूरिन में कैल्शियम के साथ ऑक्सलेट नामक तत्व जुड जाता है, जो कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों जैसे पालक या चॉकलेट में पाया जाता है।
- यूरिक एसिड स्टोन (Uric Acid Stone): यह पथरी तब विकसित होती है जब शरीर में प्यूरीन नामक प्रोटीन का पाचन ठीक से नहीं होता या जब यूरिन बहुत अधिक अम्लीय (Acidic) हो जाता है। यह आमतौर पर उन लोगों में ज़्यादा होती है जो पानी कम पीते हैं या अत्यधिक नॉन-वेज खाते हैं।
- स्ट्रुवाइट स्टोन (Struvite Stone): यह प्रकार मुख्य रूप से यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) यानी मूत्र मार्ग के संक्रमण के कारण महिलाओं में अधिक देखा जाता है। यह पथरी बहुत तेज़ी से बढ़ती है और इसका आकार काफी बड़ा हो सकता है।
- सिस्टिन स्टोन (Cystine Stone): यह एक अत्यंत दुर्लभ और आनुवंशिक (Genetic) प्रकार की पथरी है। यह उन लोगों में होती है जिनके शरीर में सिस्टिन नामक अमीनो एसिड प्राकृतिक रूप से यूरिन के माध्यम से अत्यधिक मात्रा में रिसने लगता है।
पथरी के मुख्य लक्षण क्या हैं और इन्हें कैसे पहचानें?
जब किडनी के भीतर खनिज तत्वों के क्रिस्टल का आकार बढने लगता है और वे मूत्र वाहिनी में रुकावट पैदा करते हैं, तो शरीर कई तरह के अलार्म बजाना शुरू कर देता है। इन लक्षणों को कभी भी सामान्य पेट दर्द समझकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि सही समय पर पहचान ही बडी जटिलताओं से बचा सकती है।
- पीठ और पसलियों के नीचे तेज़ दर्द: यह पथरी का सबसे प्रमुख लक्षण है, जिसमें पीठ के निचले हिस्से या पसलियों के ठीक नीचे अचानक असहनीय दर्द उठता है। यह दर्द तरंगों की तरह आता है और धीरे-धीरे पेट के निचले हिस्से व जाँघों की ओर बढ़ता है।
- यूरिन करते समय जलन और दर्द (Dysuria): जब पथरी मूत्र वाहिनी में खिसकती है, तो यूरिन पास करते समय मूत्र मार्ग में भयंकर चुभन, दर्द और असहनीय जलन महसूस होती है।
- यूरिन का रंग बदलना या खून आना (Hematuria): पथरी की कडी और नुकीली सतह के कारण मूत्र मार्ग की अंदरूनी दीवारों पर रगड़ लगती है, जिससे यूरिन का रंग गुलाबी, लाल या गहरा भूरा दिखाई देने लगता है।
- मतली और उल्टी आना (Nausea and Vomiting): किडनी की नसें सीधे हमारे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट यानी पाचन तंत्र से जुडी होती हैं, इसलिए तीव्र दर्द के कारण मरीज़ को उल्टी आने जैसा महसूस होता है।
- तेज़ बुख़ार और कंपकंपी आना: यदि किडनी स्टोन के साथ-साथ मूत्र मार्ग में बैक्टीरिया का संक्रमण भी फैल जाए, तो मरीज़ को तेज ठंड लगकर बुख़ार आता है, जो एक गंभीर स्थिति का संकेत है।
लोग इसमें क्या ग़लतियाँ करते हैं?
- अत्यधिक बीयर या कोल्ड ड्रिंक्स पीना: यह समाज में फैला एक बहुत बडा भ्रम है कि बीयर पीने से पथरी निकल जाती है। वास्तव में बीयर में अल्कोहल होता है जो शरीर को और ज़्यादा डिहाइड्रेट करता है तथा यूरिक एसिड को बढाकर पथरी के खतरे को दोगुना कर देता है।
- बिना सोचे-समझे पेनकिलर खाना: दर्द उठने पर लोग बार-बार काउंटर से दर्द निवारक दवाइयाँ खरीदकर खा लेते हैं। इन दवाओं का अत्यधिक सेवन किडनी की कार्यक्षमता को कमज़ोर करता है और उसे हमेशा के लिए खराब कर सकता है।
- केवल पानी पीने पर ही ज़ोर देना: लोग भोजन और आहार के नियमों में बदलाव किए बिना केवल गैलन भर पानी पीते रहते हैं। इससे शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है, पाचन बिगड जाता है और किडनी पर अत्यधिक दबाव पडता है।
- लगातार रहने वाली कब्ज़ को अनदेखा करना: यदि मरीज़ का पेट साफ नहीं होता, तो आंतों में सडा हुआ मल विषैले तत्वों को बढाता है, जो रक्त के माध्यम से किडनी तक पहुँचकर पथरी बनने की प्रक्रिया को तेज करते हैं।
इससे शरीर में क्या तकलीफ होती हैं?
- मूत्र मार्ग में पूर्ण रुकावट (Urinary Obstruction): जब पथरी का आकार मूत्र वाहिनी की चौड़ाई से बडा हो जाता है, तो वह मार्ग में फँसकर यूरिन के प्रवाह को पूरी तरह रोक देती है, जिससे यूरिन बाहर नहीं आ पाता।
- किडनी में सूजन (Hydronephrosis): यूरिन का प्रवाह रुकने के कारण वह पीछे की ओर जमा होने लगता है, जिससे किडनी में पानी भर जाता है और उसमें भयंकर सूजन आ जाती है जो बेहद दर्दनाक होती है।
- क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD): यदि लंबे समय तक बार-बार होने वाली पथरी का सही और जड से इलाज न किया जाए, तो यह किडनी के टिश्यूज को स्थायी रूप से नष्ट कर देती है जिससे किडनी फेलियर का खतरा बढ जाता है।
- शरीर में क्रोनिक फटीग की स्थिति: जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर के विषैले तत्व बाहर नहीं निकल पाते। इसके कारण मरीज़ को हर वक़्त अत्यधिक कमजोरी, मानसिक सुस्ती और लगातार थकान का सामना करना पड़ता है।
किडनी स्टोन पर आयुर्वेद का दृष्टिकोण क्या है?
आयुर्वेद विज्ञान में किडनी स्टोन को 'अश्मरी' (Ashmari) के नाम से जाना जाता है। प्राचीन संहिताओं के अनुसार, यह समस्या केवल मूत्र प्रणाली की कोई स्थानीय गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर के तीनों मुख्य दोषों वात, पित्त और कफ के असंतुलन तथा मंद जठराग्नि का परिणाम है।
- वात दोष का प्रकोप: जब शरीर में वात की अधिकता होती है, तो यह अपनी रूखी तासीर के कारण मूत्र में मौजूद तरल को सुखाने का काम करता है। वात दोष को कम करने के उपाय न करने से यूरिन के रासायनिक तत्व सूखकर ठोस कणों में बदलने लगते हैं।
- कफ दोष का चिपचिपापन: कफ दोष के असंतुलन से शरीर में एक गाढा और लेसदार तत्व उत्पन्न होता है। यह चिपचिपा कफ वात द्वारा सुखाए गए खनिजों के छोटे कणों को आपस में सीमेंट की तरह बांधने का काम करता है, जिससे अश्मरी (पथरी) का आकार बढने लगता है।
- मंदाग्नि और 'आम' (Toxins) का निर्माण: जब हमारी पाचन अग्नि कमज़ोर होती है, तो खाया गया भोजन पूरी तरह नहीं पचता और पेट में सडकर 'आम' नामक विषैला पदार्थ बनाता है। यह आम विष किडनी में पहुँचकर खनिजों के साथ मिल जाता है और पथरी के निर्माण को गति देता है।
- पित्त दोष के कारण अम्लता: पित्त दोष के भडकने से यूरिन में अत्यधिक गर्मी और अम्लता (Acidity) बढ जाती है। यह अम्लीय वातावरण क्रिस्टल्स के आपस में जुडने की प्रक्रिया को और तेज़ कर देता है।
किडनी स्टोन से राहत के लिए आयुर्वेदिक डाइट चार्ट
किडनी स्टोन की समस्या से पूरी तरह मुक्ति पाने और गर्मियों में इसके खतरे को कम करने के लिए सही आहार का चयन करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट किया गया है कि आपको अपनी थाली में किन चीज़ों को शामिल करना चाहिए और किनसे पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए।
| आहार की श्रेणी | क्या खाएँ (फायदेमंद - पथरी को पिघलाने वाले) | क्या न खाएँ (ट्रिगर फूड्स - पथरी बढाने वाले) |
| अनाज (Grains) | पुराना चावल, जौ का दलिया, कुल्थी की दाल का पानी, मूंग की पतली दाल। | मैदा, वाइट ब्रेड, बाजरा, अत्यधिक गरिष्ठ और पुराना बासी भोजन। |
| सब्जियाँ (Vegetables) | लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, खीरा, करेला, टिंडा। | टमाटर (विशेषकर बीज वाले), पालक, बैंगन, अरबी, कटहल। |
| फल (Fruits) | तरबूज, खरबूजा, नारियल पानी, पका हुआ पपीता, पका हुआ केला। | चीकू, काजू, किशमिश, अत्यधिक खट्टे और अधपके फल। |
| पेय पदार्थ (Beverages) | गुनगुना पानी, धनिए का उबला पानी, जौ का पानी, ताजी छाछ। | कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेटबंद सिंथेटिक जूस, बीयर, अत्यधिक डार्क कॉफी, चाय। |
| मसाले व वसा (Fats) | गाय का शुद्ध देसी घी (सीमित मात्रा), धनिया, जीरा, सौंफ, हल्दी। | अत्यधिक लाल मिर्च, गरम मसाला, रिफाइंड सोयाबीन तेल, अत्यधिक सफ़ेद नमक। |
पथरी की समस्या को दूर करने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ
प्रकृति ने हमें अपने खजाने से ऐसी कई जादुई जडी-बूटियाँ प्रदान की हैं जो बिना किसी दर्दनाक सर्जरी या चीर-फाड़ के किडनी स्टोन को अंदर ही अंदर टुकड़ों में तोड़कर बाहर निकालने की अचूक क्षमता रखती हैं। इन औषधियों का सेवन हमेशा एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
- पाषाणभेद (Pashanbhed): जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह जडी-बूटी पत्थरों को भेदने यानी तोडने का गुण रखती है। यह किडनी स्टोन के क्रिस्टल्स के बीच के बंधन को ढीला करके उन्हें महीन रेत में बदल देती है।
- वरुण (Varuna): यह अद्भुत औषधि मूत्र मार्ग की अंदरूनी सूजन और दर्द को कम करती है। यह एक प्राकृतिक मूत्रल (Diuretic) के रूप में काम करती है, जिससे यूरिन का वेग बढता है और पथरी आसानी से बाहर धकेल दी जाती है।
- पुनर्नवा (Punarnava): यह बूटी किडनी की कोशिकाओं को नया जीवन देती है। यह किडनी को पूरी तरह डिटॉक्सिफाई करती है और शरीर में जमा अतिरिक्त पानी, यूरिया और यूरिक एसिड जैसे टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है।
- त्रिफला (Triphala): आमला, हरड़ और बहेड़ा का यह मिश्रण पाचन क्रिया को दुरुस्त रखता है, कब्ज़ को जड से खत्म करता है और शरीर में उस 'आम' दोष को बनने से रोकता है जो पथरी की बुनियाद है।
- धनिया (Coriander): धनिए के बीजों की तासीर ठंडी होती है। गर्मियों में इसका पानी पीने से मूत्र मार्ग की भयंकर जलन शांत होती है और यह किडनी के फिल्टरेशन रेट को प्राकृतिक रूप से सुधारता है।
- गुडुची (Guduchi): जिसे गिलोय भी कहा जाता है, यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती है और यूरिनरी ट्रैक्ट में होने वाले बार-बार के संक्रमण (UTI) से किडनी की रक्षा करती है।
इलाज और सुधार की समय-सीमा
लगातार रूखेपन, गलत खानपान और तापमान के कारण किडनी के भीतर जमी हुई पथरी को प्राकृतिक रूप से पिघलाकर बाहर निकालने में थोडा अनुशासित समय और धैर्य की आवश्यकता होती है। यह समय-सीमा पथरी के आकार, उसकी संख्या और मरीज़ के कोष्ठ (पाचन तंत्र की क्रूरता) पर निर्भर करती है।
- शुरुआती 1 से 2 महीने: दवाओं के नियमित सेवन और आहार नियमों से यूरिन की अत्यधिक अम्लता कम होने लगती है। मूत्र मार्ग की जलन और अचानक उठने वाले तेज़ दर्द में भारी कमी आती है तथा छोटे आकार की पथरी पिघलकर बाहर निकलने लगती है।
- 3 से 4 महीने: इस अवधि के दौरान मध्यम आकार की पथरी 5mm से 9mm धीरे-धीरे टूटकर रेत के कणों की तरह मूत्र मार्ग से साफ हो जाती है। जठराग्नि मज़बूत होने से शरीर में नए क्रिस्टल्स का जमा होना पूरी तरह बंद हो जाता है।
- 5 से 6 महीने: इस चरण तक पुरानी और जटिल पथरी पूरी तरह साफ़ हो जाती है, किडनी के टिश्यूज की सूजन समाप्त हो जाती है और मरीज़ अन्य पाचन संबंधी समस्याओं से पूरी तरह मुक्त होकर शरीर में एक नया हल्कापन और ऊर्जा महसूस करने लगता है।
डॉक्टर को तुरंत कब दिखाएं?
आयुर्वेद से किडनी स्टोन की समस्या को जड़ से और हमेशा के लिए ठीक किया जा सकता है यह बात बिल्कुल सच है। फिर भी, कभी-कभी हालात गंभीर हो जाते हैं। ऐसे में मरीज को बिना कोई देरी किए, तुरंत एक अच्छे डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
आपको इन स्थितियों में डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए:
- लगातार और तेज दर्द: कभी-कभी पेट के निचले हिस्से या पीठ में बहुत तेज मरोड़ उठती है। दर्द इतना ज्यादा होता है कि लेटने, बैठने या करवट बदलने पर भी जरा सा आराम नहीं मिलता।
- पेशाब का पूरी तरह बंद होना (Anuria): कई बार पथरी रास्ते में पूरी तरह से अटक जाती है। इससे पेशाब आना बिल्कुल बंद हो जाता है। नतीजतन पेट फूलने लगता है और मरीज की बेचैनी बहुत बढ़ जाती है।
- ठंड और कंपकंपी के साथ तेज बुखार: यह इस बात का सीधा इशारा है कि यूरिन इन्फेक्शन बढ़ गया है। यह संक्रमण अब किडनी तक पहुँच चुका है। ऐसे में मरीज को तुरंत इलाज और दवाओं की जरूरत होती है।
- पेशाब में बहुत ज्यादा खून आना: अगर पेशाब के रास्ते से ज्यादा ब्लीडिंग हो रही हो और गाढ़ा लाल खून आए, तो सतर्क हो जाएं। खासकर तब, जब मरीज को चक्कर आने लगें या उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगे।
निष्कर्ष
किडनी हमारे शरीर का एक बेहद जरूरी अंग है। यह जिंदगी भर बिना थके हमारे स्वास्थ्य का ध्यान रखती है। इसलिए, किडनी की देखभाल करना हमारी सबसे पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।
गर्मियों के मौसम में तापमान काफी बढ़ जाता है। पसीना भी ज्यादा आता है। इससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है और हमारी किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यही मुख्य वजह है कि गर्मियों में गुर्दे की पथरी (किडनी स्टोन) का खतरा काफी बढ़ जाता है।
पथरी से बचने के लिए सिर्फ ज्यादा पानी पीना ही काफी नहीं है। अपनी पाचन शक्ति को भी ठीक रखना चाहिए। इसके साथ ही, एक अच्छा और सही भोजन लेना बहुत जरूरी है। ऐसा करने से शरीर में मिनरल्स (खनिजों) का संतुलन नहीं बिगड़ता। कोल्ड ड्रिंक या बहुत ज्यादा मीठे डिब्बाबंद जूस पीने से बचें। इनकी जगह प्राकृतिक और ताजे पेय पदार्थों को अपनाना हमारी सेहत के लिए हमेशा ज्यादा अच्छा होता है।
Reference
https://www.niddk.nih.gov/health-information/urologic-diseases/kidney-stones/definition-facts
https://www.auanet.org/guidelines-and-quality/guidelines/kidney-stones-medical-mangement-guideline













