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Workout के बाद Joint Pain बढ़ जाता है - क्या Exercise Uric Acid बढ़ाती है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 29 May, 2026
  • category-iconUpdated on 09 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5029

बहुत से लोग जब कसरत शुरू करते हैं, तो कुछ दिनों बाद उन्हें घुटनों में, एड़ियों में या उंगलियों के जोड़ों में दर्द होने लगता है और फिर मन में एक सवाल आता है "कहीं कसरत की वज़ह से ही तो यह दर्द नहीं बढ़ रहा?" यह सवाल बिल्कुल सही है और इसका जवाब जानना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि बिना सही जानकारी के कई लोग या तो कसरत छोड़ देते हैं या फिर ग़लत तरीके से करते रहते हैं दोनों ही शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।

कुछ लोगों को लगता है कि शायद उनका शरीर कसरत के लिए बना ही नहीं है। कुछ सोचते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ यह तो होना ही था। लेकिन असल में इस दर्द के पीछे एक और वजह भी हो सकती है और वह है शरीर में बढ़ा हुआ यूरिक एसिड। जी हाँ, जोड़ों के दर्द और यूरिक एसिड का गहरा रिश्ता है और कसरत इस पूरे मामले में कैसे जुड़ती है यह समझना आज बहुत ज़रूरी है।

Uric Acid क्या होता है? 

सीधी और साफ़ भाषा में कहें तो यूरिक एसिड हमारे शरीर का वो कचरा है, जो खाना पचाने के दौरान बनता है। जब हम कुछ ख़ास चीज़ें खाते हैं, तो हमारी बॉडी उन्हें तोड़कर एनर्जी बनाती है। इसी तोड़-फोड़ के बीच एक बाय-प्रोडक्ट निकलता है, जिसे यूरिक एसिड कहते हैं। वैसे तो हमारी किडनी बहुत समझदार है, वो इसे फ़िल्टर करके पेशाब के रास्ते शरीर से बाहर खदेड़ देती है। यही इसका नॉर्मल रूटीन है।

पेंच तब फंसता है जब शरीर में यूरिक एसिड ज़रूरत से ज़्यादा बनने लगे, या फिर किडनी सुस्त पड़ जाए और इसे बाहर न निकाल पाए। ऐसी स्थिति में यह कचरा बाहर जाने की बजाय हमारे जोड़ों में जाकर क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगता है। फिर शुरू होता है असली दर्द का खेल। जोड़ों में सूजन आ जाती है, वो अकड़ जाते हैं और उठने-बैठने में नानी याद आ जाती है। कई लोगों को तो इसका सबसे पहला और ख़तरनाक झटका पैरों के अंगूठे, घुटनों, टखनों या हाथों की उंगलियों में महसूस होता है।

वर्कआउट के बाद जोड़ों का यह दर्द क्यों भड़क जाता है?

वैसे तो कसरत करने के बाद मांसपेशियों में हल्की मीठी सी थकान या दर्द होना बहुत आम बात है, इसे हम 'गुड पेन' भी कह देते हैं। लेकिन अगर कसरत ख़त्म होते ही आपके जोड़ों में भयंकर तीखा दर्द, सूजन या ऐसी अकड़न हो जाए कि अंग हिलाना मुश्किल हो जाए, तो समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला है। इसके पीछे अक्सर हमारी ही कुछ लापरवाही ज़िम्मेदार होती हैं।

सबसे पहली वज़ह है औकात से ज़्यादा ज़ोर लगा देना। जोश-जोश में अपनी क्षमता से बाहर जाकर भारी डंबल्स उठा लेना या बिना रुके घंटों कार्डियो करना जोड़ों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव डाल देता है। दूसरी बड़ी ग़लती है पानी से दुश्मनी। वर्कआउट में पसीना तो खूब बहाया, लेकिन अगर बाद में पर्याप्त पानी नहीं पिया, तो यूरिक एसिड अंदर ही अंदर गाढ़ा होकर जमने लगता है। इसके अलावा, अगर किसी का यूरिक एसिड पहले से ही बॉर्डर पार कर चुका है, तो भारी कसरत उसके दर्द में घी डालने का काम करती है। कई बार बिना वॉर्म-अप किए सीधे कठिन कसरत शुरू करना या ग़लत पोस्चर में व्यायाम करना भी जोड़ों को चोटिल कर देता है। और हाँ, अगर आप शरीर को रिकवरी के लिए पूरा आराम नहीं दे रहे, तो यह दर्द परमानेंट वीज़ा लेकर आपके जोड़ों में बस जाएगा।

क्या सच में एक्सरसाइज़ करने से यूरिक एसिड बढ़ जाता है?

यह बड़ा दिलचस्प सवाल है। असल में एक्सरसाइज़ बुरी नहीं है, लेकिन जब हम शरीर पर अचानक बहुत ज़्यादा और ग़लत तरीके से दबाव डालते हैं, तो अंदर का सिस्टम गड़बड़ा जाता है। ख़ास तौर पर बहुत तेज़ और बिना ब्रेक के की जाने वाली कसरत शरीर में ऐसे बदलाव लाती है जो यूरिक एसिड के ग्राफ़ को ऊपर चढ़ा देते हैं।

जब आप बिना रुके बहुत हैवी वर्कआउट करते हैं, तो शरीर की कोशिकाएं तेज़ी से टूटने लगती हैं, जिससे यूरिक एसिड का प्रोडक्शन अचानक बढ़ जाता है। ऊपर से पसीने के ज़रिए पानी कम हुआ, तो किडनी उसे ढंग से फ्लश आउट नहीं कर पाती। इसके साथ ही, आजकल जिम जाने वाले युवाओं में एक नया ट्रेंड है ज़रूरत से ज़्यादा प्रोटीन और सप्लीमेंट्स ठूंसना। बिना सोचे-समझे लिया गया यह भारी प्रोटीन यूरिक एसिड को सीधे बुलावा देता है। सोने पर सुहागा तब होता है जब लोग हफ़्ते के सातों दिन बिना आराम किए जिम में पसीना बहाते हैं, जिससे शरीर को संभलने का मौका ही नहीं मिलता।

किन लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है?

अगर हम गौर करें, तो कुछ ख़ास आदतें और लाइफस्टाइल वाले लोग इस समस्या के रडार पर सबसे पहले आते हैं। आइए देखते हैं कि इसमें कौन-कौन शामिल हैं:

  • बढ़े हुए वज़न वाले लोग: जिनका वज़न ज़्यादा होता है, उनके घुटनों और टखनों पर पहले ही एक्स्ट्रा लोड रहता है, जिससे कसरत करते ही सूजन आ जाती है।
  • हड़बड़ी में जिम शुरू करने वाले: जो बिना शरीर को धीरे-धीरे तैयार किए, पहले ही दिन से सुपरमैन बनने की कोशिश करते हैं।
  • कम पानी पीने के आदी: जो दिन भर में बस नाम मात्र का पानी पीते हैं, जिससे शरीर का कचरा अंदर ही रुक जाता है।
  • चटपोरे और शौकीन लोग: जो दिन भर तला-भुना, मैदा और भारी जंक फ़ूड उड़ाने से बाज़ नहीं आते।
  • ज़रूरत से ज़्यादा मांसाहार करने वाले: जो भारी मात्रा में रेड मीट या सप्लीमेंट्स का सेवन करते हैं।
  • कुर्सी से चिपके रहने वाले: जो दिन भर ऑफिस में बिना हिले-डुले बैठे रहते हैं, जिससे उनकी बॉडी का पूरा मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ जाता है।

यूरिक एसिड बढ़ने के वो लक्षण, जिन्हें हम अक्सर मामूली समझ लेते हैं

जब शरीर में यूरिक एसिड अपनी हदें पार करने लगता है, तो वो चिल्ला-चिल्लाकर कई तरह के सिग्नल देता है। शुरुआत में लोग इसे मामूली थकान या मोच समझकर नज़रांदाज़ कर देते हैं, जो कि बहुत बड़ी भूल है। इसके मुख्य लक्षण कुछ इस तरह दिखाई देते हैं:

  • पैरों के अंगूठे, घुटनों या टखनों में अचानक ऐसा तेज़ दर्द होना कि पैर ज़मीन पर न रखा जाए।
  • प्रभावित जोड़ का एकदम लाल हो जाना, वहाँ सूजन आना और छूने पर वह हिस्सा गर्म महसूस होना।
  • सुबह सोकर उठते ही हाथ-पैरों में ऐसी जकड़न होना कि उंगलियाँ मोड़ने में भी तकलीफ़ हो।
  • सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त घुटनों में कट-कट की आवाज़ आना या तेज चुभन होना।
  • कई बार दिन भर सब ठीक रहता है, लेकिन आधी रात को अचानक जोड़ों में असहनीय दर्द शुरू हो जाना।

आयुर्वेद का नज़रिया: समस्या सिर्फ जोड़ों की नहीं, सिस्टम की है

जब मॉडर्न मेडिकल साइंस यूरिक एसिड को सिर्फ एक केमिकल मानकर उसे कम करने की दवा देता है, तब आयुर्वेद इस समस्या की बिल्कुल जड़ में जाता है। आयुर्वेद कहता है कि यह जो यूरिक एसिड का बढ़ना और जोड़ों का दर्द है ना, यह दरअसल आपके शरीर के अंदरूनी बैलेंस के बिगड़ने की कहानी है।

इसकी शुरुआत होती है हमारे सुस्त या कमज़ोर पाचन से। जब पेट का चूल्हा धीमा पड़ता है, तो खाना पूरी तरह पच नहीं पाता। इसी अधपचे खाने से शरीर के अंदर एक बेहद ज़हरीला और चिपचिपा पदार्थ बनता है, जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहा जाता है। यह 'आम' धीरे-धीरे खून के ज़रिए हमारे जोड़ों में जाकर बैठने लगता है।

इसके साथ ही, खेल में एंट्री होती है भड़के हुए वात दोष की। जब शरीर में वात यानी हवा का संतुलन बिगड़ता है, तो वह जोड़ों में जाकर बैठ जाता है और वहाँ सूखापन, भयंकर खिंचाव, चुभन वाला दर्द और अकड़न पैदा कर देता है। रोज़-रोज़ का वही तला-भुना खाना, कम पानी पीना, ज़रूरत से ज़्यादा मानसिक तनाव और ख़राब लाइफस्टाइल इस आग में घी डालने का काम करते हैं। इसलिए, आयुर्वेद में इलाज का मतलब सिर्फ दर्द की गोली खाना नहीं है। असली मकसद है पाचन को दुरुस्त करना, जोड़ों में जमे इस 'आम रस' रूपी कचरे को बाहर निकालना और वात को वापस शांत करना।

जोड़ों के दर्द और यूरिक एसिड को ढीला करने वाली जड़ी-बूटियां

आयुर्वेद में ऐसी कई बेमिसाल जड़ी-बूटियाँ हैं जो जोड़ों की सूजन को सोख लेती हैं और अंदर से शरीर की सर्विसिंग करती हैं। ये दवाइयाँ सिर्फ ऊपर-ऊपर से दर्द को दबाती नहीं, बल्कि अंदरूनी सिस्टम को मज़बूत बनाती हैं। हाँ, इन्हें शुरू करने से पहले किसी अच्छे विशेषज्ञ की सलाह लेना हमेशा सही रहता है।

  • गिलोय: इसे आयुर्वेद में 'अमृता' कहा गया है। यह जोड़ों में जमे यूरिक एसिड को पिघलाकर बाहर निकालने और सूजन को कम करने में सबसे आगे रहती है। साथ ही, यह शरीर की इम्यूनिटी को भी टॉप गियर में ले आती है।
  • त्रिफला: आंवला, बहेड़ा और हरड़ का यह कॉम्बिनेशन पेट को साफ़ रखता है। जब पेट साफ़ होगा, तो शरीर में ज़हरीला 'आम रस' बनेगा ही नहीं और पुराना कचरा भी साफ़ हो जाएगा।
  • गुग्गुल: जोड़ों के दर्द और जकड़न के लिए यह आयुर्वेद की सबसे मशहूर दवा है। यह घुटनों और उंगलियों की अकड़न को ख़त्म करके उन्हें फिर से लचीला बनाने का दम रखती है।
  • अश्वगंधा: जब दर्द की वज़ह से शरीर टूटने लगता है और हर वक़्त कमज़ोरी महसूस होती है, तब अश्वगंधा मांसपेशियों को ताक़त देता है और थकान को जड़ से मिटाता है।
  • पुनर्नवा: जैसा कि इसके नाम से ही साफ़ है 'जो फिर से नया कर दे'। यह शरीर में पानी के ठहराव को दूर करती है और जोड़ों की सूजन व भारीपन को खींच लेती है।
  • सोंठ: सूखी अदरक यानी सोंठ पेट की अग्नि को बढ़ाती है, जिससे खाना अच्छे से पचता है और वात दोष का तांडव शांत होता है।

आयुर्वेदिक थेरेपी और केयर: जब दवा के साथ चाहिए आराम का स्पर्श

अगर यूरिक एसिड की वज़ह से उठना-बैठना दूभर हो गया है, तो सिर्फ दवाइयाँ खाने से बात नहीं बनेगी। शरीर को बाहर से भी थोड़े लाड-प्यार और सही देखभाल की ज़रूरत होती है।

  • अभ्यंग (गुनगुने तेल की मालिश): जोड़ों पर हल्के हाथों से औषधीय तेल की मालिश करने से वहाँ का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इससे वात का सूखापन ख़त्म होता है और अकड़े हुए जोड़ धीरे-धीरे खुलने लगते हैं।
  • स्वेदन (हल्की भाप): तेल मालिश के बाद जब जोड़ों को जड़ी-बूटियों की हल्की भाप दी जाती है, तो अंदर जमी अकड़न और भारीपन पसीने के रास्ते ढीला पड़ जाता है।
  • हल्की-फुल्की स्ट्रेचिंग: दर्द के डर से बिल्कुल बिस्तर पकड़ लेना सबसे बड़ी ग़लती है। जोड़ों को जाम होने से बचाने के लिए बहुत ही हल्के हाथों से स्ट्रेचिंग या वॉक करना ज़रूरी है ताकि मूवमेंट बनी रहे।
  • भरपूर आराम: जोश में आकर थके हुए या दर्द करते जोड़ों पर और ज़्यादा कसरत का बोझ डालना बेवकूफ़ी है। शरीर जब तक पूरी तरह रिकवर न हो जाए, भारी वर्कआउट से तौबा कर लें।
  • दिन भर गुनगुना पानी: फ्रिज के ठंडे पानी को भूल जाइए। दिन भर थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी पीते रहने से किडनी एक्टिव रहती है और यूरिक एसिड को शरीर में टिकने का मौका ही नहीं मिलता।
  • गर्म सिकाई: जिस हिस्से में अचानक तेज़ दर्द या सूजन उठ खड़ी हो, वहाँ हॉट वॉटर बैग या पोटली से हल्की गर्म सिकाई करने पर तुरंत आराम महसूस होता है।

सहायक आहार: क्या खाएं और क्या न खाएं

सही खान-पान शरीर में संतुलन बनाए रखने और जोड़ों की परेशानी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर भोजन हल्का, सुपाच्य और संतुलित हो, तो शरीर को आराम महसूस हो सकता है। वहीं गलत खान-पान यूरिक एसिड और जोड़ों के दर्द की समस्या बढ़ा सकता है। 

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • गुनगुना पानी
  • मूंग दाल और सुपाच्य भोजन
  • सीमित मात्रा में घी
  • सूखे मेवे और पौष्टिक आहार

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अत्यधिक ठंडी चीजें
  • बहुत ज्यादा चाय और कॉफी
  • पैकेट बंद और कृत्रिम खाद्य पदार्थ
  • देर रात तक जागना

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम आशा है और मैं कानपुर से हूं। कुछ समय पहले मेरी तबीयत इतनी खराब हो गई थी कि मुझे लगता था जैसे मैं सामान्य जीवन कभी नहीं जी पाऊंगी। मुझे जोड़ों में बहुत दर्द रहता था, पैरों में सूजन आ जाती थी और थोड़ा चलने पर भी चलना मुश्किल हो जाता था। रात को नींद नहीं आती थी और मैं शारीरिक व मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगी थी।

इसी दौरान मैं जीवा आयुर्वेद से जुड़ी। यहां मेरी पूरी स्थिति को समझा गया और मुझे भरोसा दिलाया गया कि सही उपचार और धैर्य से मैं बेहतर हो सकती हूं। मैंने डॉक्टरों की सलाह के अनुसार अपने खान-पान और दिनचर्या में बदलाव किए और नियमित उपचार लिया। लगभग 4-5 महीनों में मेरे पैरों की सूजन काफी कम हो गई और स्वास्थ्य में स्पष्ट सुधार महसूस होने लगा। बाद में मैंने पंचकर्म थेरेपी भी करवाई, जिससे मुझे और अधिक लाभ मिला। आज मैं पहले से कहीं अधिक स्वस्थ और आत्मविश्वास से भरी महसूस करती हूं। मेरे लिए जीवा आयुर्वेद वास्तव में एक नई जिंदगी की शुरुआत साबित हुआ।

आख़िर कब समझें कि डॉक्टर के पास जाने का वक़्त आ गया है?

हम भारतीयों की एक बड़ी ख़राब आदत होती है जब तक पैर ज़मीन पर पड़ना पूरी तरह बंद न हो जाए, हम दर्द को 'मामूली मोच' या 'थकान' कहकर टालते रहते हैं। लेकिन यूरिक एसिड और जोड़ों के दर्द के मामले में यह लापरवाही बहुत भारी पड़ सकती है। अगर आपकी बॉडी नीचे दिए गए ये सिग्नल देने लगे, तो समझ जाइए कि अब घर पर बैठने का नहीं बल्कि डॉक्टर या वैद्य के पास भागने का वक़्त है:

  • जब जोड़ों का दर्द कोई मेहमान न रहे, बल्कि चौबीसों घंटे का परमानेंट सिरदर्द बन जाए
  • जब घुटने, टखने या उँगलियाँ टमाटर की तरह लाल होने लगें और उन पर भारी सूजन आ जाए
  • जब सुबह उठकर बेड से नीचे पहला कदम रखने में भी आंसू निकल आएं और चलना-फिरना दूभर हो जाए
  • जब दिन भर सब ठीक रहे, लेकिन रात को सोते समय अचानक सुई चुभने जैसा असहनीय दर्द शुरू हो जाए
  • जब जोड़ों की अकड़न कम होने के बजाय रोज़ बढ़ती जाए और ऐसा लगे कि वो जाम हो रहे हैं
  • जब आपकी ब्लड रिपोर्ट में यूरिक एसिड का लेवल बार-बार ख़तरे के निशान को पार कर रहा हो

निष्कर्ष

तो पूरी कहानी का सार यह है कि जोड़ों का यह दर्द और बढ़ा हुआ यूरिक एसिड कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सिर्फ बूढ़े लोगों को होती है। आज की तारीख़ में हमारा बिगड़ा हुआ खान-पान, जिम में अंधाधुंध भारी कसरत करना, दिन भर में दो ग्लास पानी भी ढंग से न पीना और ये भागदौड़ वाली लाइफस्टाइल इस बीमारी के सबसे बड़े ज़िम्मेदार हैं। इसलिए सिर्फ दर्द की गोली खाकर बीमारी को दबाने की बेवकूफ़ी मत कीजिए, बल्कि दर्द की असली वज़ह को पकड़िए।

एक बैलेंस्ड डाइट, सही समय पर सोने-जागने का रूटीन, शरीर को पूरा आराम देना और अपनी औकात के हिसाब से कसरत करना ये वो चाबियाँ हैं जो इस समस्या को हमेशा के लिए ताले में बंद कर सकती हैं। आयुर्वेद हमें यही सिखाता है कि अगर आपका पेट साफ़ है, पाचन दुरुस्त है और वात शांत है, तो यूरिक एसिड जैसी चीज़ें आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। आज से ही अपनी बॉडी का ख़्याल रखना शुरू कीजिए, ताकि आने वाले कल में आपके जोड़ आपका पूरा साथ दे सकें और आप हमेशा एक्टिव बने रहें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

 बहुत ज्यादा भारी और जरूरत से ज्यादा कसरत कुछ लोगों में यूरिक एसिड बढ़ाने की वजह बन सकती है। हालांकि संतुलित और सही तरीके से की गई कसरत शरीर के लिए फायदेमंद मानी जाती है।

हाँ, हल्की सैर और नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को सक्रिय रखने और जोड़ों की अकड़न कम करने में मदद कर सकती है।

कुछ लोगों में जरूरत से ज्यादा भारी प्रोटीन वाला भोजन या पूरक आहार यूरिक एसिड बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।

कई लोगों में पैरों के अंगूठे, घुटनों, टखनों और उंगलियों के जोड़ों में ज्यादा दर्द और सूजन महसूस हो सकती है।

हाँ, शरीर में पानी की कमी होने पर यूरिक एसिड सही तरीके से बाहर नहीं निकल पाता, जिससे परेशानी बढ़ सकती है।

केवल दवा ही नहीं, बल्कि सही खान-पान, पर्याप्त पानी, संतुलित दिनचर्या और शरीर की देखभाल भी जरूरी मानी जाती है।

बहुत ज्यादा तला-भुना और भारी भोजन शरीर के संतुलन को बिगाड़ सकता है और परेशानी बढ़ा सकता है।

नहीं, हर जोड़ों का दर्द केवल यूरिक एसिड की वजह से नहीं होता। इसके पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

हाँ, बढ़ा हुआ वजन जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है और दर्द की परेशानी बढ़ा सकता है

 आयुर्वेद में शरीर के संतुलन, पाचन सुधार और सही दिनचर्या पर ध्यान देकर इस परेशानी को संभालने की दिशा में काम किया जाता है।

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