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गर्मी में चेहरे पर Dark Patches - Melasma और Pigmentation का सच

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

गर्मियों की तेज़ धूप चेहरे पर जो काले-भूरे धब्बे छोड़ जाती है, उसे हम अक्सर मेलास्मा (Melasma) या पिगमेंटेशन का नाम दे देते हैं। पर क्या आपको पता है? ये धब्बे सिर्फ चेहरे की ख़ूबसूरती नहीं बिगाड़ते, बल्कि शरीर के अंदर चल रही किसी बड़ी गड़बड़ी का सीधा इशारा होते हैं। आयुर्वेद की मानें तो ऐसा शरीर में बहुत ज़्यादा गर्मी (पित्त) बढ़ने और खून साफ न होने की वजह से होता है।

शुरू में तो ये निशान इतने छोटे और हल्के होते हैं कि हम इन्हें आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। पर जब आप रोज़ धूप (UV किरणों) की चपेट में आते हैं, तो यही निशान धीरे-धीरे गहरे और बिल्कुल साफ़ दिखने लगते हैं। बात सिर्फ धब्बों की नहीं है, स्किन की रंगत भी कहीं डार्क तो कहीं लाइट (Uneven Skin Tone) होने लगती है। कई बार तो धूप में कदम रखते ही चेहरे पर जलन और लाली आ जाती है। ज़ाहिर है, इससे आपका कॉन्फिडेंस भी काफी कम हो जाता है।

मेलास्मा क्या होता है?

मेलास्मा में चेहरे पर भूरे या कुछ स्लेटी (Greyish) रंग के पैच बनने लगते हैं। आपने गौर किया होगा कि ये धब्बे ज़्यादातर वहीं निकलते हैं जहाँ धूप सीधे टकराती है जैसे गाल, माथा, नाक और होठों के ठीक ऊपर।

यह दिक्कत तब शुरू होती है जब हमारी स्किन को रंग देने वाली कोशिकाएं (Cells) कुछ ज़्यादा ही एक्टिव होकर मेलानिन बनाने लगती हैं। मेलानिन का काम स्किन को उसका रंग देना है। पर जब यही मेलानिन किसी एक जगह पर बहुत ज़्यादा इकट्ठा हो जाए, तो वहां का नेचुरल रंग बिगड़ जाता है और गहरे पैच बन जाते हैं।

पिगमेंटेशन क्या होता है और यह कैसे बनता है?

पिगमेंटेशन का सीधा सा मतलब है मेलानिन का बैलेंस बिगड़ जाना। इसी वजह से चेहरे की रंगत एक जैसी नहीं रहती और काले-भूरे निशान दिखने लगते हैं। जब स्किन के अंदर मौजूद रंग बनाने वाली कोशिकाएं अपनी लिमिट से ज़्यादा काम करने लगें, तो वो चेहरे के कुछ हिस्सों में मेलानिन का ढेर लगा देती हैं। और बस, यहीं से स्किन पर साफ़ पैच बनने की शुरुआत हो जाती है।

पिगमेंटेशन और मेलास्मा में क्या अंतर है?

अक्सर लोग पिगमेंटेशन और मेलास्मा को एक ही बीमारी मान लेते हैं, पर इन दोनों के बीच का फर्क समझना बहुत ज़रूरी है। अगर आसान शब्दों में कहें तो पिगमेंटेशन एक बड़ी कैटेगरी है, और मेलास्मा उसी का एक छोटा हिस्सा है।

  • पिगमेंटेशन (Pigmentation): यह एक ऐसा आम शब्द है जो स्किन पर दिखने वाले किसी भी तरह के काले निशान के लिए इस्तेमाल हो जाता है। चाहे वो धूप से हुई टैनिंग (Tanning) हो, पिंपल्स के दाग हों, या किसी पुरानी चोट का निशान।
  • मेलास्मा (Melasma): यह पिगमेंटेशन का ही एक थोड़ा जिद्दी रूप है। इसके पीछे आमतौर पर धूप और हमारे अंदरूनी हॉर्मोन्स (जैसे प्रेग्नेंसी या थायराइड के दौरान) का मिला-जुला हाथ होता है। इसके धब्बे काफी पक्के होते हैं और ज़्यादातर चेहरे की दोनों तरफ बिल्कुल एक जैसे आकार में फैलते हैं।

सीधी बात यह है कि हर मेलास्मा पिगमेंटेशन की गिनती में आता है, पर हर पिगमेंटेशन मेलास्मा नहीं होता। इसे जड़ से खत्म करने के लिए सिर्फ स्किन की ऊपरी सफाई काफी नहीं है। शरीर के हॉर्मोन्स और पित्त का बैलेंस ठीक करना भी उतना ही ज़रूरी है।

सूर्य किरणों का असर (UV किरणों का प्रभाव)

सूरज की यूवी (UV) किरणें जैसे ही स्किन से टकराती हैं, वे सीधे अंदर की सेल्स को मेलानिन बनाने के लिए ट्रिगर कर देती हैं। असल में, मेलानिन हमारी स्किन का एक तरह से नेचुरल बॉडीगार्ड है। यह धूप से होने वाले डैमेज से हमें बचाता है।

यह कुदरत का अपना एक सुरक्षा कवच है। लेकिन दिक्कत तब होती है जब हम बार-बार या बहुत ज़्यादा तेज़ धूप में जाते हैं। ऐसे में यह सिस्टम ज़रूरत से ज़्यादा एक्टिव हो जाता है। नतीजतन, मेलानिन स्किन के कुछ हिस्सों में बहुत ज़्यादा इकट्ठा होने लगता है और वही काले धब्बों के रूप में चेहरे पर नज़र आने लगता है।

शुरुआती लक्षण जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

मेलास्मा और पिगमेंटेशन रातों-रात नहीं होते। इनकी शुरुआत बहुत ही मामूली इशारों से होती है। ज़्यादातर लोग शुरू में इन्हें कुछ खास नहीं मानते। पर सही समय पर इन्हें पहचानना बहुत ज़रूरी है ताकि बात आगे न बढ़े।

  • चेहरे पर हल्के भूरे धब्बे: चेहरे पर छोटे और हल्के रंग के निशान दिखने लगते हैं। शुरुआत में ये इतने फीके होते हैं कि हमारी नज़र भी नहीं जाती, पर वक्त के साथ ये गहरे और पक्के हो जाते हैं।
  • त्वचा के रंग में असमानता: पूरे चेहरे का रंग एक जैसा नहीं लगता। कुछ हिस्से अचानक ज़्यादा डार्क नज़र आने लगते हैं। यह इस बात का सीधा सिग्नल है कि स्किन में मेलानिन का बैलेंस बिगड़ रहा है।
  • हल्की जलन या संवेदनशीलता: कई बार चेहरे के उन हिस्सों पर हल्की जलन या चुभन महसूस होती है। इसका सीधा सा मतलब है कि आपकी स्किन बहुत ज़्यादा सेंसिटिव हो चुकी है।
  • धूप में धब्बों का गहरा होना: आप जैसे ही धूप में कदम रखते हैं, ये पैच और ज़्यादा साफ़ और गहरे लगने लगते हैं। यह साबित करता है कि सूरज की किरणें आपकी परेशानी को बढ़ा रही हैं।
  • प्राकृतिक चमक का खो जाना: स्किन अपना नेचुरल ग्लो खो देती है और काफी बेजान (Dull) सी लगने लगती है। यह दिखाता है कि स्किन अंदर से हेल्दी नहीं है।
  • मेकअप से भी न छिपना: कई बार अच्छा-खासा मेकअप लगाने के बाद भी ये धब्बे अलग से झांकते रहते हैं। यह बताता है कि दिक्कत स्किन की गहराई में है, सिर्फ ऊपरी परत पर नहीं।

इन शुरुआती बातों को वक्त रहते समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि शुरू में सही खानपान और आयुर्वेदिक देखभाल से इन्हें बहुत आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है।

गर्मी में मेलास्मा और पिगमेंटेशन के प्रमुख कारण

गर्मियों के दिनों में यह परेशानी एकदम से क्यों बढ़ जाती है? यह कोई इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे कुछ ठोस कारण हैं जो हमारे शरीर के अंदरूनी बैलेंस को पूरी तरह बिगाड़ देते हैं।

  • तेज़ धूप और UV किरणें: जब आप काफी देर तक चिलचिलाती धूप में रहते हैं, तो UV किरणें स्किन में मेलानिन का प्रोडक्शन बढ़ा देती हैं। इसी से चेहरे पर गहरे पैच बनने लगते हैं।
  • हॉर्मोनल बदलाव: महिलाओं के शरीर में होने वाले हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव इस समस्या की एक बड़ी वजह हैं। ये बदलाव स्किन की रंग बनाने वाली कोशिकाओं को ओवरएक्टिव कर देते हैं।
  • शरीर की अंदरूनी गर्मी: आयुर्वेद के मुताबिक, जब शरीर में गर्मी यानी पित्त बढ़ता है, तो स्किन बहुत ज़्यादा सेंसिटिव हो जाती है। इसी गर्मी की वजह से चेहरे के धब्बे और ज़्यादा डार्क दिखने लगते हैं।
  • तनाव (Stress): बहुत ज़्यादा स्ट्रेस लेना न सिर्फ आपके हॉर्मोन्स का खेल बिगाड़ता है, बल्कि स्किन की चमक भी छीन लेता है। इससे पिगमेंटेशन और ज़्यादा जिद्दी हो जाता है।
  • गलत खानपान: बहुत ज़्यादा तला-भुना, मसालेदार या बाहर का पैकेट वाला खाना शरीर में गर्मी (पित्त) बढ़ाता है। इस असंतुलन का असर सीधे आपके चेहरे पर दिखता है और इससे आपका पाचन भी बुरी तरह खराब होता है।
  • नींद की कमी और खराब रूटीन: अगर आप रोज़ सही से सो नहीं रहे हैं या रूटीन बिल्कुल अस्त-व्यस्त है, तो स्किन को खुद को रिपेयर करने का वक्त ही नहीं मिलता। ऐसे में स्किन बेजान और पैची लगने लगती है।

इन कारणों को समझने के बाद आप अपनी आदतों में छोटे-छोटे सुधार करके इस परेशानी को जड़ से कंट्रोल कर सकते हैं, बजाय इसके कि सिर्फ स्किन के ऊपर तरह-तरह की क्रीम लगाते रहें।

आयुर्वेद की नज़र में त्वचा क्या है?

आयुर्वेद स्किन को महज़ एक बाहरी कवर नहीं मानता। यह असल में आपकी अंदरूनी सेहत का असली आईना है। चेहरे की चमक और रंगत देखकर अंदाज़ा लग जाता है कि आपके शरीर के अंदर दोष, धातु या अग्नि किस हालत में हैं। मतलब साफ है, स्किन की कोई भी दिक्कत सिर्फ बाहर की नहीं होती, बल्कि यह अंदर चल रही किसी गड़बड़ी का सीधा सिग्नल होती है।

त्वचा के रंग और पित्त दोष का कनेक्शन

  • पित्त का नेचर: पित्त की तासीर हमेशा तेज़ और गर्म होती है। इसी से शरीर की गर्मी और मेटाबॉलिज़्म कंट्रोल में रहता है। यही चीज़ आपके चेहरे के रंग और ग्लो को भी तय करती है।
  • पित्त बढ़ने पर क्या होता है: जब भी शरीर का पित्त बिगड़ता है, तो स्किन में जलन और काफी गर्मी महसूस होने लगती है। ऐसे में शरीर मेलानिन ज़्यादा बनाने लगता है और चेहरे पर काले धब्बे (हाइपरपिगमेंटेशन) आ जाते हैं।

खून की सफाई (रक्त धातु) और त्वचा

  • खून का काम: स्किन को अच्छा रखने और सही पोषण देने में साफ खून का सबसे बड़ा रोल है। खून जितना साफ रहेगा, आपके चेहरे पर उतनी ही बढ़िया चमक दिखेगी।
  • खून में गंदगी का असर: अगर खून में ज़रा सी भी गंदगी या खराबी आ जाए, तो चेहरे पर दाग-धब्बे और अनईवन टोन (Uneven Tone) साफ़ दिखने लगते हैं। इसी से पिगमेंटेशन जैसी परेशानियाँ और ज़्यादा बढ़ जाती हैं।

इलाज को लेकर आयुर्वेद का नज़रिया

आयुर्वेद मेलास्मा को सिर्फ ऊपर से ठीक करने में यकीन नहीं रखता। यह इसे शरीर की गर्मी, बिगड़े हुए पित्त, गंदे खून और स्ट्रेस से जोड़कर देखता है।

  • जड़ से इलाज: सारा फोकस सिर्फ दाग मिटाने पर नहीं होता। असली वजहों जैसे हॉर्मोन्स का बिगड़ना, खराब लाइफस्टाइल या स्ट्रेस को ठीक किया जाता है।
  • पित्त बैलेंस करना: शरीर की बढ़ी हुई गर्मी ही स्किन का रंग बिगाड़ती है। इसलिए सबसे पहले इस गर्मी यानी पित्त को शांत किया जाता है।
  • खून की सफाई: चेहरे की खूबसूरती साफ खून पर टिकी है। इसलिए खून साफ करने वाले तरीके अपनाए जाते हैं ताकि स्किन अंदर से ग्लो करे।
  • नेचुरल चमक की वापसी: टारगेट सिर्फ धब्बे हटाना नहीं होता, बल्कि स्किन की जो असली रंगत है उसे वापस लाना होता है।
  • लाइफस्टाइल और स्ट्रेस: दिमागी टेंशन और उल्टा-सीधा रूटीन स्किन का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसलिए दिमाग को शांत रखने पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है।
  • लंबे समय वाला रिज़ल्ट: इलाज ऐसा दिया जाता है कि ये काले धब्बे बार-बार वापस न आएं।

इलाज में काम आने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ चेहरे पर कोई क्रीम या लेप लगाने से ये जिद्दी धब्बे चले जाएंगे, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। शरीर को अंदर से ठंडा रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसके लिए आप इन चीज़ों की मदद ले सकते हैं:

  • आंवला: यह तो हम सब जानते हैं कि आंवला शरीर को अंदर से कितनी ठंडक देता है। यह खून को बिल्कुल साफ कर देता है, जिससे चेहरे का रंग अपने आप निखरने लगता है।
  • गिलोय: गिलोय शरीर की गर्मी को कम करता है और आपकी इम्युनिटी को एकदम दुरुस्त रखता है। अगर आपकी स्किन पर जलन महसूस होती है, तो यह उसे भी शांत करता है।
  • त्रिफला: पेट की सारी गंदगी को बाहर निकालने में इसका कोई जवाब नहीं। जब यह आपका पाचन बिल्कुल सही कर देगा, तो स्किन की गंदगी खुद ही साफ़ हो जाएगी।
  • मंजिष्ठा: जब भी खून साफ करने की बात आती है, तो मंजिष्ठा का नाम सबसे पहले आता है। चेहरे के पुराने और जिद्दी दाग-धब्बों को हल्का करने में यह बहुत असर दिखाती है।
  • हल्दी: हल्दी हमारी स्किन की अंदरूनी सूजन को खत्म करती है। इसे लगाने या खाने से चेहरे पर एक नेचुरल चमक आती है जो आसानी से किसी और चीज़ से नहीं मिलती।

इलाज में इस्तेमाल होने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

इन काले धब्बों को जड़ से मिटाने के लिए आयुर्वेद में कुछ खास तरीके बताए गए हैं:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): जब चेहरे और शरीर की हल्के गुनगुने तेल से मालिश होती है, तो खून का दौरा तेज़ हो जाता है। इसी से आपकी स्किन को अंदर तक सही पोषण मिल पाता है।
  • शिरोधारा: क्या आप जानते हैं कि ज़्यादा टेंशन लेने से भी चेहरे पर धब्बे पड़ते हैं? यह तरीका आपके दिमाग की सारी उलझन खत्म करके उसे एकदम शांत कर देता है, जिससे चेहरे पर अपने आप रौनक लौट आती है।
  • लेप चिकित्सा: इसमें चेहरे के ऊपर कुछ ठंडी और नेचुरल जड़ी-बूटियों का लेप लगाया जाता है। इससे स्किन की सारी गर्मी बाहर खिंच जाती है और धब्बे धीरे-धीरे हल्के पड़ जाते हैं।
  • पंचकर्म: हमारे शरीर में बहुत गहराई तक जो गंदगी फंसी रहती है, उसे बाहर निकालने के लिए पंचकर्म से बढ़िया और कोई चीज़ नहीं है। यह शरीर का अंदरूनी बैलेंस एकदम सही कर देता है।

खाने-पीने में क्या बदलाव करें? (क्या खाएं और क्या न खाएं)

धब्बों से पीछा छुड़ाना है तो सही स्किनकेयर के साथ-साथ अपनी डाइट भी सुधारनी होगी।

क्या खाएं:

  • हल्का और ताज़ा खाना: हमेशा ऐसा खाना खाएं जो पचने में आसान हो। पाचन अच्छा चलेगा तो चेहरे पर भी असर दिखेगा।
  • फल और सब्ज़ियां: ताज़ी हरी सब्ज़ियां और फल विटामिन्स से भरे होते हैं, जो डैमेज स्किन को रिपेयर करते हैं।
  • पानी की कमी न होने दें: खूब पानी या ताज़ा जूस पिएं। इससे शरीर की सारी गंदगी यूरिन के ज़रिए बाहर आ जाती है।
  • मूंग दाल और घी: मूंग दाल आसानी से पच जाती है। इसके साथ थोड़ा सा देसी घी स्किन को अच्छा पोषण देता है।

क्या न खाएं:

  • ज़्यादा तला-भुना: बहुत ज़्यादा तेल और मसाले शरीर में गर्मी पैदा करते हैं, जो धब्बों को डार्क करते हैं।
  • मीठा और पैकेट वाला खाना: ज़्यादा चीनी और पैकेट का खाना खून को गंदा करता है और स्किन को बेजान बनाता है।
  • चाय-कॉफी: दिन भर चाय या कॉफी पीने से शरीर में गर्मी बढ़ती है। यह स्किन के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है।
  • बेवक्त खाना: गलत टाइम पर खाने से पाचन खराब होता है और फिर सीधा असर आपके चेहरे की रंगत पर पड़ता है।

डॉक्टर के पास कब जाएं?

अगर चेहरे पर धब्बे लगातार बढ़ रहे हैं, तो इन्हें बिल्कुल नज़रअंदाज़ न करें। तुरंत चेकअप करवाएं अगर:

  • धब्बे बहुत तेज़ी से फैल रहे हैं।
  • स्किन का रंग अचानक बहुत ज़्यादा डार्क हो जाए।
  • चेहरे पर हमेशा जलन या चुभन सी लगे।
  • हॉर्मोन्स के उतार-चढ़ाव के साथ स्किन भी खराब होने लगे।
  • धूप में निकलते ही परेशानी एकदम से बढ़ जाए।
  • कोई भी क्रीम या घरेलू नुस्खा काम न कर रहा हो।

निष्कर्ष 

मेलास्मा और पिगमेंटेशन सिर्फ चेहरे की ऊपरी बीमारी नहीं है। यह आपकी अंदरूनी गर्मी, खून की गंदगी, बिगड़े हुए पित्त और खराब लाइफस्टाइल का रिज़ल्ट है।

आज की मॉडर्न साइंस इसे सिर्फ UV किरणों और मेलानिन से जोड़कर देखती है। लेकिन आयुर्वेद इसे शरीर के अंदर के सिस्टम से जोड़ता है। तेज़ धूप, स्ट्रेस और गलत खानपान इसे और ज़्यादा बिगाड़ देते हैं। इसलिए सिर्फ क्रीम के भरोसे न बैठें। अपना पाचन, रूटीन और डाइट सुधारें। यही स्किन को लंबे समय तक ग्लोइंग और बेदाग रखने का असली तरीका है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

पिगमेंटेशन और मेलास्मा हर व्यक्ति में स्थायी नहीं होते। कई मामलों में यह स्थिति समय के साथ कम हो सकती है यदि शरीर के अंदरूनी कारणों पर ध्यान दिया जाए। धूप से बचाव और जीवनशैली में सुधार से त्वचा की स्थिति में बदलाव देखा जा सकता है। हालांकि कुछ मामलों में यह लंबे समय तक बना रह सकता है।

क्रीम और बाहरी उपचार से त्वचा की ऊपरी परत पर असर दिख सकता है। लेकिन मेलास्मा अक्सर अंदरूनी कारणों से जुड़ा होता है, इसलिए केवल बाहरी उपचार पर्याप्त नहीं माना जाता। यदि कारण बने रहते हैं तो समस्या दोबारा लौट सकती है। इसलिए अंदरूनी संतुलन भी महत्वपूर्ण होता है।

उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की प्राकृतिक मरम्मत क्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है। इससे पिगमेंटेशन अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है। लेकिन यह हर व्यक्ति में समान रूप से नहीं होता। जीवनशैली और देखभाल का भी इसमें बड़ा प्रभाव होता है।

धूप से बचाव महत्वपूर्ण है क्योंकि UV किरणें मेलानिन को सक्रिय कर सकती हैं। लेकिन केवल धूप से बचना ही पर्याप्त नहीं होता। शरीर की आंतरिक गर्मी और संतुलन पर भी ध्यान देना जरूरी होता है। दोनों मिलकर बेहतर परिणाम देते हैं।

तनाव शरीर के हार्मोन और आंतरिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इसका असर त्वचा की रंगत और चमक पर भी दिख सकता है। लंबे समय तक तनाव रहने से समस्या बढ़ सकती है। इसलिए मानसिक संतुलन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मेलास्मा महिलाओं में अधिक सामान्य रूप से देखा जाता है लेकिन यह केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। पुरुषों में भी यह स्थिति हो सकती है। हार्मोनल बदलाव और सूर्य का संपर्क दोनों में भूमिका निभा सकते हैं।

आहार शरीर की गर्मी और रक्त की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। अत्यधिक मसालेदार या असंतुलित भोजन त्वचा की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। संतुलित और हल्का आहार त्वचा के लिए बेहतर माना जाता है। इसलिए आहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कुछ मामलों में पिगमेंटेशन काफी हद तक कम हो सकता है। लेकिन परिणाम व्यक्ति की स्थिति और कारणों पर निर्भर करता है। यदि अंदरूनी कारण बने रहते हैं तो यह पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता। नियमित देखभाल से सुधार संभव है।

हार्मोनल बदलाव मेलास्मा का एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। गर्भावस्था या अन्य हार्मोनल स्थितियों में यह अधिक स्पष्ट हो सकता है। जैसे ही हार्मोन संतुलित होते हैं, स्थिति में बदलाव आ सकता है। इसलिए हार्मोनल संतुलन महत्वपूर्ण है।

सनस्क्रीन त्वचा को UV किरणों से बचाने में मदद करता है। यह पिगमेंटेशन और मेलास्मा को बढ़ने से रोकने में सहायक हो सकता है। नियमित उपयोग से त्वचा पर बाहरी प्रभाव कम हो सकता है। इसलिए इसे दैनिक दिनचर्या में शामिल करना उपयोगी माना जाता है।

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