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Ritucharya का पालन करना क्यों जरूरी माना जाता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

क्या मौसम बदलते ही आपको भी सर्दी-जुकाम, पेट की गड़बड़ी, सुस्ती या जोड़ों में दर्द जैसी दिक्कतें होने लगती हैं? हम अक्सर इसे अपनी कमज़ोर इम्युनिटी समझ लेते हैं, लेकिन आयुर्वेद का नज़रिया इससे बिल्कुल अलग है।

आयुर्वेद मानता है कि हम इंसान इसी प्रकृति का हिस्सा हैं। इसलिए, जब बाहर का मौसम बदलता है, तो हमारे शरीर के अंदर भी बड़े बदलाव होते हैं। अगर हम इन बदलावों के साथ तालमेल नहीं बिठाते, तो शरीर का बैलेंस बिगड़ जाता है और हमें तरह-तरह की दिक्कतें होने लगती हैं। 

जब हम सर्दियों में गर्मियों वाले कपड़े नहीं पहन सकते, तो हमारा खान-पान और लाइफस्टाइल पूरे साल एक जैसा कैसे हो सकता है? मौसम के इसी इशारे को समझना और शरीर की ज़रूरत के हिसाब से खुद को ढालना सबसे ज़रूरी है।

ऋतुचर्या क्या है? 

'ऋतु' यानी मौसम और 'चर्या' यानी आपका रूटीन। सीधे शब्दों में कहें तो, मौसम के हिसाब से अपने खान-पान और आदतों को बदलना ही ऋतुचर्या है।

समझते हैं कि बदलते मौसम के साथ शरीर में क्या होता है और पूरे साल बिना दवाइयों के फिट रहने के लिए हमें अपने रूटीन में क्या-क्या बदलाव करने चाहिए।

मौसम बदलने पर शरीर में क्या-क्या होता है?

हर मौसम हमारे शरीर, हमारी पाचन शक्ति और हमारे दिमाग पर अलग तरह का असर डालता है। आइए देखते हैं कैसे:

सर्दियों का असर (ठंड का मौसम): सर्दियों में हमारी पाचन शक्ति भड़क उठती है। पाचन इतना मज़बूत होता है कि आप भारी से भारी खाना (जैसे मक्के की रोटी, गाजर का हलवा, गोंद के लड्डू या मेवे) भी आसानी से पचा लेते हैं। इस मौसम में शरीर को अंदर से गर्म रखने के लिए ज़्यादा और ताक़तवर खाने की ज़रूरत होती है।

गर्मियों का असर: गर्मियों में बाहर इतनी आग बरसती है कि शरीर अंदर से सुस्त पड़ जाता है। पसीने के ज़रिए शरीर का सारा पानी और ज़रूरी मिनरल्स बाहर निकल जाते हैं। गर्मियों में हमारा पाचन बहुत कमज़ोर हो जाता है। इसीलिए गर्मियों में भारी खाना या तली-भुनी चीज़ें पचती नहीं हैं। शरीर सिर्फ पानी, जूस, छाछ और हल्के खाने की मांग करता है।

बरसात (मानसून) का असर: यह मौसम पाचन के लिए सबसे खराब माना जाता है। हवा में बहुत ज़्यादा नमी (Humidity) होती है। पेट की आग बिल्कुल सुस्त हो जाती है। इसीलिए बरसात में सबसे ज़्यादा पेट खराब होने, गैस बनने, इन्फेक्शन होने और डायरिया जैसी बीमारियां होती हैं।

अगर हम मौसम के हिसाब से न चलें तो क्या होगा?

अगर मौसम बदलने के बाद भी आप अपना खाना, पानी और रूटीन नहीं बदलते हैं, तो शरीर पर बहुत भारी दबाव पड़ता है। इसी का नतीजा होता है:

  • मौसम बदलते ही बार-बार बुखार या जुकाम होना।
  • भयंकर एसिडिटी, सीने में जलन या कब्ज़ रहना।
  • चेहरे पर अचानक पिंपल्स आना या स्किन फटना।
  • जोड़ों में दर्द बढ़ जाना।
  • हमेशा थकान और कमज़ोरी महसूस होना।

गलत मौसम में गलत खाना खाने से शरीर के तीनों दोष (वात, पित्त और कफ) बिगड़ जाते हैं और यही से सारी बीमारियों की शुरुआत होती है।

एक्सपर्ट डॉक्टर की विशेष सलाह

मौसम बदलने पर हल्का सर्दी-जुकाम या पेट में थोड़ी गड़बड़ी होना शरीर का एक सामान्य बदलाव है, जिसे सही खान-पान से ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर आपको लगातार तेज़ बुखार रहे, उल्टी-दस्त की वजह से शरीर में पानी की कमी (Dehydration) हो जाए, या सांस लेने में तकलीफ महसूस हो (खासकर अस्थमा के मरीजों को), तो इसे सिर्फ 'मौसम का असर' समझकर न टालें। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों में ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से जांच कराना बेहद ज़रूरी है। 

हर मौसम में क्या खाएं और कैसे रहें? (आयुर्वेद के आसान नियम)

प्रकृति बहुत समझदार है। वो हमें उसी मौसम में वही फल और सब्ज़ियां देती है, जिनकी हमारे शरीर को ज़रूरत होती है।

1. वसंत ऋतु (फरवरी से अप्रैल का समय): सर्दियों में हमारे शरीर में खूब सारा कफ (बलगम) जमा हो जाता है। जैसे ही वसंत की हल्की गर्मी शुरू होती है, वो जमा हुआ कफ पिघलने लगता है। इसीलिए इस मौसम में लोगों को सबसे ज़्यादा खांसी, जुकाम और एलर्जी होती है।

  • क्या करें: इस मौसम में हल्का खाना खाएं। भारी, मीठी और तली हुई चीज़ों से बचें। रोज़ सुबह थोड़ी कसरत (व्यायाम) ज़रूर करें ताकि शरीर एक्टिव रहे।

2. गर्मी का मौसम (मई और जून): इस समय शरीर का सारा पानी सूखने लगता है और पेट में गर्मी (पित्त) बढ़ जाती है।

  • क्या करें: खूब सारा पानी पिएं। तरबूज़, खरबूज़ा, खीरा, ककड़ी जैसे पानी वाले फल खाएं। सत्तू, छाछ और नारियल पानी पिएं। भारी और मसालेदार खाने से बिल्कुल दूर रहें। कसरत भी बहुत हल्की करें, ज़्यादा थकाने वाले काम न करें।

3. बरसात का मौसम (जुलाई से सितंबर): इस मौसम में हवा में गैस (वात) बढ़ जाती है और पाचन कमज़ोर हो जाता है। इन्फेक्शन का खतरा सबसे ज़्यादा होता है।

  • क्या करें: हमेशा ताज़ा और गर्म खाना ही खाएं। बाहर का खुला हुआ, बासी या स्ट्रीट फूड बिल्कुल न खाएं। पानी उबालकर पीना सबसे अच्छा है। खाने में अदरक, लहसुन और हींग का इस्तेमाल बढ़ा दें। यह खाना पचाने में मदद करते हैं।

4. शरद ऋतु (अक्टूबर और नवंबर - हल्की ठंड): बरसात के बाद जब अचानक आसमान साफ होता है और तेज़ धूप निकलती है, तो शरीर में पित्त (गर्मी और एसिडिटी) बहुत तेज़ी से बढ़ता है।

  • क्या करें: हल्का और पेट को ठंडक देने वाला खाना खाएं। बहुत ज़्यादा तीखा और मसालेदार खाना खाने से बचें।

5. सर्दियाँ (दिसंबर और जनवरी): यह मौसम सेहत बनाने के लिए सबसे अच्छा होता है। पाचन एकदम मज़बूत होता है।

  • क्या करें: आप आराम से पौष्टिक और भारी खाना खा सकते हैं। तिल, गुड़, घी, मेवे, बाजरा और मक्का अपनी डाइट में शामिल करें। अच्छे से कसरत करें और शरीर को गर्म कपड़ों से ढककर रखें।

ऋतुचर्या सिर्फ खाने के बारे में नहीं है

हमें लगता है कि ऋतुचर्या का मतलब सिर्फ डाइट बदलना है, लेकिन ऐसा नहीं है। आपके रहने का तरीका भी बहुत मायने रखता है:

  • नींद: सर्दियों की रातें लंबी होती हैं, तो शरीर को ज़्यादा आराम चाहिए। गर्मियों में आप दोपहर में भी थोड़ी देर झपकी ले सकते हैं, लेकिन सर्दियों और बरसात में दिन में सोने से बचना चाहिए।
  • कपड़े: मौसम के हिसाब से सही कपड़े पहनें। बरसात में गीले कपड़े ज़्यादा देर तक न पहनें।
  • कसरत (Exercise): सर्दियों में आप जमकर पसीना बहा सकते हैं और भारी कसरत कर सकते हैं। लेकिन गर्मियों में शरीर को थकाने वाली भारी कसरत से बचना चाहिए, उसकी जगह योग या हल्की सैर करनी चाहिए।

आज की बिज़ी लाइफ में ऋतुचर्या को कैसे अपनाएं?

अब आप कहेंगे कि हम तो सारा दिन AC वाले ऑफिस में बैठे रहते हैं, हमें बाहर के मौसम का क्या पता चलेगा?

हमारा शरीर बाहर की हवा और सूरज की रोशनी के हिसाब से ही अपनी घड़ी सेट करता है। आप भले ही AC में बैठे हों, लेकिन आपका पाचन तो मौसम के हिसाब से ही काम करेगा। इसे अपनी रूटीन में उतारने के लिए बस ये छोटे-छोटे काम करें:

  • सीज़नल सब्ज़ियां खाएं: बाज़ार में जो सब्ज़ी या फल नया आया है और सस्ता है, समझ लीजिए, वही सीज़नल है। कोल्ड स्टोरेज वाले बेमौसम फल (जैसे सर्दियों में तरबूज़) खाने से बचें।
  • पानी पीने का तरीका बदलें: गर्मियों में मटके का पानी पिएं, बरसात और सर्दियों में हल्का गुनगुना पानी पिएं। फ्रिज का ठंडा पानी हमेशा के लिए छोड़ दें।
  • अपनी भूख को समझें: घड़ी देखकर खाना न खाएं। अगर गर्मियों में कम भूख लग रही है, तो हल्का ही खाएं।
  • नींद पूरी करें: रात को सही समय पर सोएं और मोबाइल को बिस्तर से दूर रखें।

किन लोगों को इसका सबसे ज़्यादा ध्यान रखना चाहिए?

वैसे तो ऋतुचर्या हर इंसान के लिए है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है:

  • घर के छोटे बच्चे और बुजुर्ग (क्योंकि इनकी इम्युनिटी कम होती है)।
  • गर्भवती महिलाएं।
  • वो लोग जिन्हें हर बदलते मौसम में जुकाम हो जाता है या जो बार-बार बीमार पड़ते हैं।
  • जिन्हें शुगर, बीपी, अस्थमा या जोड़ों के दर्द की पुरानी बीमारी है।

निष्कर्ष

ऋतुचर्या कोई बहुत मुश्किल साइंस नहीं है। यह बस अपने शरीर की आवाज़ सुनने का नाम है। प्रकृति जैसे-जैसे अपने रंग बदलती है, हमें बस उसी रंग में ढलना है।

अगर हम मौसम के हिसाब से अपना खाना, सोना और काम करना सेट कर लें, तो शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्युनिटी) अपने आप इतनी मज़बूत हो जाती है कि कोई भी वायरल या इन्फेक्शन हमें आसानी से नहीं हरा सकता। इसलिए अगली बार जब मौसम बदले, तो सिर्फ अपनी अलमारी के कपड़े न बदलें, बल्कि अपनी रसोई का खाना और अपना रूटीन भी बदलें!

References

Changing seasons | National Oceanic and Atmospheric Administration

Climate change

Why Do We Have Seasons?

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। ऋतुचर्या का मुख्य उद्देश्य मौसम के अनुसार खानपान, दिनचर्या और जीवनशैली में बदलाव करना है। केवल इन्हीं बदलावों से भी शरीर को मौसम के अनुरूप ढलने में मदद मिल सकती है। दवाओं की ज़रूरत केवल किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या होने पर और चिकित्सक की सलाह से ही होती है।

हाँ। चाहे आप शहर में रहते हों या गांव में, मौसम का प्रभाव शरीर पर पड़ता ही है। एयर कंडीशनर या हीटर का उपयोग करने के बावजूद शरीर का जैविक चक्र (Biological Clock) मौसम के अनुसार काम करता है।

यदि मौसम के अनुसार सही भोजन और दिनचर्या अपनाई जाए, तो शरीर को बदलते वातावरण के साथ तालमेल बनाने में मदद मिल सकती है। इससे कुछ लोगों में मौसमी एलर्जी या बार-बार होने वाली छोटी-मोटी परेशानियों का जोखिम कम हो सकता है। हालांकि गंभीर एलर्जी होने पर डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है।

हाँ। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अभी विकसित हो रही होती है। ऐसे में मौसम के अनुसार भोजन, पर्याप्त पानी, सही कपड़े और अच्छी नींद जैसी आदतें उनके संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।

बिल्कुल। बढ़ती उम्र के साथ शरीर की अनुकूलन क्षमता कम हो सकती है। इसलिए बुजुर्गों को मौसम बदलने पर खानपान, पानी की मात्रा, कपड़ों और नियमित स्वास्थ्य जांच पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

आयुर्वेद के अनुसार, मौसम के अनुरूप भोजन करने से पाचन शक्ति पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता। इससे भोजन को पचाने में आसानी हो सकती है और गैस, अपच या भारीपन जैसी समस्याओं का खतरा कम हो सकता है।

मौसम हर साल थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि तापमान, नमी और मौसम के वास्तविक बदलाव को देखकर अपनी दिनचर्या और भोजन में परिवर्तन करना अधिक उचित माना जाता है।

हाँ। यदि आप किसी ऐसे स्थान पर जा रहे हैं जहाँ मौसम आपके शहर से अलग है, तो वहाँ के तापमान और जलवायु के अनुसार भोजन, कपड़े और पानी पीने की आदतों में बदलाव करना शरीर के लिए लाभदायक हो सकता है।

मौसम के अनुसार संतुलित भोजन और नियमित दिनचर्या अपनाने से अनावश्यक ओवरईटिंग की संभावना कम हो सकती है। यह स्वस्थ वजन बनाए रखने में सहायक हो सकता है, हालांकि वजन कई अन्य कारणों पर भी निर्भर करता है।

यदि आपको मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अस्थमा, किडनी, लिवर या किसी अन्य पुरानी बीमारी की समस्या है, तो मौसम के अनुसार बड़े बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेना बेहतर रहता है। इससे आपकी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार सुरक्षित और उपयुक्त दिनचर्या तय की जा सकती है।

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