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Immunity weak होने पर infection जल्दी क्यों पकड़ता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

मौसम में ज़रा सा बदलाव होते ही कुछ लोग तुरंत बीमार पड़ जाते हैं, जबकि कुछ लोगों पर इसका कोई खास असर नहीं होता। यह बड़ा अंतर हमारे शरीर के भीतर मौजूद एक अदृश्य सुरक्षा कवच का है, जो हमें हर पल बाहरी खतरों से बचाता है। जब यह सुरक्षा चक्र टूटता या कमजोर पड़ता है, तो शरीर बीमारियों और बाहरी कीटाणुओं का बहुत आसान शिकार बन जाता है।

इस स्थिति को समझना और शरीर की आंतरिक ताकत को वापस जगाना स्वस्थ व सक्रिय जीवन के लिए सबसे आवश्यक कदम है। बाहरी दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय यदि हम इस बात पर ध्यान दें कि हमारा शरीर अंदर से क्यों कमजोर पड़ रहा है, तो कई गंभीर बीमारियों को आसानी से रोका जा सकता है।

कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता असल में क्या है?

आयुर्वेद में इस रक्षा प्रणाली को 'ओजस' कहा जाता है, जो हमारे स्वस्थ पाचन और सभी शारीरिक धातुओं का अंतिम व सबसे शुद्ध सार होता है। जब हमारी जठराग्नि कमजोर होती है, तो खाया हुआ भोजन ठीक से पच नहीं पाता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर में 'आम' (विषाक्त पदार्थ) जमा होने लगता है। यह 'आम' शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों को अवरुद्ध कर देता है और ओजस के निर्माण को पूरी तरह रोक देता है, जिससे शरीर बाहरी संक्रमणों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।

कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता किन रूपों में प्रकट होती है?

शरीर की रक्षा प्रणाली जब अंदर से समझौता कर लेती है, तो यह केवल एक ही बीमारी के रूप में नहीं बल्कि कई अलग-अलग तरीकों से सामने आती है। आप इन विभिन्न रूपों के माध्यम से अपनी आंतरिक स्थिति को समझ सकते हैं।

  • श्वसन तंत्र की समस्याएँ: बार-बार सर्दी जुकाम, लगातार खाँसी, गले में खराश या साइनस का संक्रमण होना इसका सबसे आम और शुरुआती रूप है।
  • पाचन तंत्र के विकार: पेट में बार-बार इन्फेक्शन होना, अचानक दस्त लगना या लगातार कब्ज और भयंकर गैस की शिकायत का बने रहना।
  • त्वचा के संक्रमण: त्वचा पर बार-बार फंगल संक्रमण उभरना, चकत्ते पड़ना, लालिमा होना या छोटे घावों का बहुत धीमी गति से भरना।

कमजोर इम्युनिटी कौन से मुख्य संकेत देती है?

कोई भी गंभीर बीमारी शरीर में अचानक नहीं आती, हमारा शरीर पहले से ही बचाव के लिए कई छोटे-छोटे संकेत देने लगता है। इन महत्वपूर्ण संकेतों को समय रहते पहचान लेना उत्तम स्वास्थ्य का सबसे अच्छा तरीका है।

  • बार-बार बीमार पड़ना: मौसम के जरा से बदलाव पर या किसी अस्वस्थ व्यक्ति के संपर्क में आते ही तुरंत खुद भी संक्रमण की चपेट में आ जाना।
  • घाव भरने में देरी: शरीर पर लगी छोटी सी खरोंच, कट या घाव को पूरी तरह से ठीक होने में सामान्य से कई गुना अधिक समय लगना।
  • पाचन का खराब रहना: हमेशा पेट भारी या फूला हुआ महसूस होना और खाया हुआ पौष्टिक भोजन भी शरीर में सही से न लगना।

आयुर्वेद इस स्थिति को कैसे देखता है और सहायक उपाय

आयुर्वेद रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी को केवल बाहरी कीटाणुओं का हमला नहीं मानता, बल्कि इसे शरीर के आंतरिक वातावरण के असंतुलन का सीधा परिणाम मानता है। इसका मुख्य कारण जठराग्नि की कमजोरी है, जिससे शरीर में वात, पित्त और कफ दोष पूरी तरह असंतुलित हो जाते हैं। जब विषैला 'आम' (टॉक्सिन्स) शरीर के स्रोतों (चैनल्स) को बंद कर देता है, तो सप्त धातुओं को मिलने वाला पोषण रुक जाता है और हमारे शरीर का परम रक्षक 'ओजस' घट जाता है। आयुर्वेद इस ओजस को वापस बढ़ाने के लिए जठराग्नि को मजबूत करने, शरीर से जमे हुए विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और तीनों दोषों को प्राकृतिक रूप से संतुलित करने पर गहराई से काम करता है।

कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों के लिए विशेष आहार तालिका

सही समय पर लिया गया सुपाच्य आहार आपकी अग्नि को मजबूत करके शरीर की रक्षा प्रणाली को सीधा पोषण प्रदान करता है। नीचे दी गई विशेष आहार तालिका आपके स्वास्थ्य को भीतर से सुधारने में बहुत सहायक हो सकती है।

भोजन का समय अनुशंसित आहार वर्जित आहार
सुबह (नाश्ता) दलिया, पपीता, उबले हुए सेब, भीगे हुए बादाम और मुनक्का, हल्का गुनगुना पानी ठंडी दही, बहुत अधिक कड़क चाय या कॉफी, बासी भोजन और मैदे से बनी चीजें
दोपहर (लंच) पुरानी मूंग की दाल, रागी या ज्वार की रोटी, उबली हुई हरी सब्जियाँ, ताजी छाछ बहुत अधिक मसालेदार ग्रेवी, लाल मिर्च, गरिष्ठ भोजन और ठंडे कोल्ड ड्रिंक्स
रात (डिनर) आसानी से पचने वाली सब्जियों की हल्की खिचड़ी, लौकी या तोरई का सूप रात के समय भारी डेयरी उत्पाद (चीज, पनीर), लाल मांस और भारी मिठाइयाँ

इम्युनिटी बढ़ाने में लाभकारी प्रमुख जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें कई ऐसी शक्तिशाली और सुरक्षित औषधियाँ दी हैं, जो शुद्ध ओजस का निर्माण करती हैं और शरीर को बाहरी संक्रमणों से सुरक्षित रखती हैं। यहाँ कुछ विशेष और लाभकारी जड़ी-बूटियों का वर्णन किया गया है।

  • गिलोय: इसे आयुर्वेद में 'अमृता' भी कहा गया है, जो शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालकर प्राकृतिक रक्षक कोशिकाओं को बहुत मजबूती प्रदान करती है।
  • अश्वगंधा: यह एक बेहतरीन रसायन है जो शारीरिक तनाव को कम करता है और थके हुए शरीर को गहरी ताकत व नई ऊर्जा प्रदान करता है।
  • आँवला: विटामिन सी और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स का यह सबसे बड़ा स्रोत तीनों दोषों को संतुलित कर ओजस को सीधे तौर पर बढ़ाता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रबंधित करने वाली लाभकारी आयुर्वेदिक थेरेपी

शरीर की गहरी परतों में जमे हुए विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और ओजस को पुनर्जीवित करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक थेरेपी अत्यधिक प्रभावी होती हैं। इन प्रामाणिक प्रक्रियाओं से शरीर भीतर से शुद्ध और हल्का होता है।

  • अभ्यंग: हल्के गर्म और औषधीय तेलों से पूरे शरीर की मालिश करने से रक्त का संचार बढ़ता है और थका हुआ तंत्रिका तंत्र तुरंत शांत होता है।
  • नस्य: नाक के छिद्रों के माध्यम से हर्बल तेल की कुछ बूँदें डालना सिर और ऊपरी श्वसन मार्ग के संक्रमणों को रोकने में बेहद असरदार प्रक्रिया है।

डॉक्टर से परामर्श कब लें?

घरेलू उपाय, सही आहार और प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ बहुत लाभकारी हैं, लेकिन कुछ गंभीर स्थितियों में तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इन संकेतों को कभी भी नजरअंदाज न करें।

  • लगातार तेज बुखार: यदि शरीर का तापमान कई दिनों तक खतरनाक रूप से बढ़ा रहे और साधारण उपायों से बिल्कुल कम न हो रहा हो।
  • साँस लेने में गंभीर तकलीफ: सीने में लगातार भारीपन, दर्द होना या सामान्य रूप से साँस लेने में भी अत्यधिक कठिनाई महसूस होना।
  • लगातार वजन कम होना: बिना किसी प्रयास या डाइटिंग के शरीर का वजन बहुत तेजी से गिरना और अत्यधिक शारीरिक कमजोरी आ जाना।

निष्कर्ष

कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता एक दिन में नहीं बनती और न ही यह केवल कोई एक गोली खाने से तुरंत मजबूत हो सकती है। यह आपकी जीवनशैली, आपके आहार और शरीर की आंतरिक अग्नि का ही अंतिम परिणाम है। जब आप प्रकृति के सरल नियमों का पालन करते हैं और शरीर को उसकी जरूरत के अनुसार सही पोषण देते हैं, तो आपका शरीर स्वयं को किसी भी बड़े संक्रमण से बचाने में सक्षम हो जाता है। यदि आप भी बार-बार इन्फेक्शन का शिकार हो रहे हैं और अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुरक्षित व प्राकृतिक रूप से बढ़ाना चाहते हैं, तो आज ही विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्राप्त करें। व्यक्तिगत सलाह, आपकी प्रकृति के अनुसार आहार और सही आयुर्वेदिक उपचार के लिए जीवा आयुर्वेद के विशेषज्ञों से +919266714040 पर बेझिझक संपर्क करें।

References:

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC5291468/

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC3377046/

https://www.sciencedirect.com/topics/medicine-and-dentistry/recurrent-infection

https://www.cdc.gov/chronic-symptoms-following-infections/about/index.html

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

रात की गहरी नींद के दौरान हमारा शरीर साइटोकिन्स नामक विशेष प्रोटीन बनाता है, जो संक्रमण से लड़ने में बहुत मदद करते हैं। नींद की कमी होने पर इन प्रोटीन्स का उत्पादन काफी घट जाता है। इससे हमारी श्वेत रक्त कोशिकाएँ सुस्त पड़ जाती हैं और शरीर बाहरी वायरस का मुकाबला ठीक से नहीं कर पाता है।

लंबे समय तक मानसिक तनाव में रहने से शरीर में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बहुत बढ़ जाता है। यह हार्मोन हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की सामान्य कार्यक्षमता को दबा देता है। तनाव के कारण शरीर की ऊर्जा बँट जाती है, जिससे साधारण मौसमी बीमारियाँ भी हमें जल्दी घेर लेती हैं।

सफेद चीनी या बहुत अधिक मीठी चीजें खाने से हमारी रोग रक्षक कोशिकाओं की बैक्टीरिया को नष्ट करने की प्राकृतिक क्षमता तुरंत कम हो जाती है। यह नकारात्मक प्रभाव मीठा खाने के कई घंटों बाद तक बना रहता है। इस दौरान कोई भी नया संक्रमण शरीर में बहुत आसानी से अपनी जगह बना सकता है।

पानी शरीर से विषैले तत्वों (टॉक्सिन्स) को पसीने और मूत्र के रास्ते बाहर निकालने का सबसे मुख्य माध्यम है। जब हम पर्याप्त पानी नहीं पीते, तो रक्त गाढ़ा हो जाता है और कोशिकाएँ ठीक से काम नहीं कर पातीं। विषाक्त पदार्थों के जमा होने से ओजस घटता है और शरीर जल्दी बीमार पड़ने लगता है।

आयुर्वेद के अनुसार, बहुत अधिक ठंडी चीजें या फ्रिज का पानी पीने से हमारे पेट की पाचन अग्नि (जठराग्नि) तुरंत मंद पड़ जाती है। पाचन के कमजोर होने से भोजन पेट में ही सड़ने लगता है और विषैला आम बनता है। यह आम हमारी इम्युनिटी को भीतर से पूरी तरह खोखला कर देता है।

शारीरिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय रहने पर शरीर का रक्त संचार धीमा पड़ जाता है। इससे हमारी रोग रक्षक कोशिकाओं को शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचने में बहुत अधिक समय लगता है। हल्का और नियमित व्यायाम करने से पसीने के रास्ते टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं और शरीर की गर्मी कीटाणुओं को नष्ट करती है।

उम्र बढ़ने के साथ शरीर के सभी अंगों की कार्यक्षमता स्वाभाविक रूप से थोड़ी धीमी होने लगती है, जिसमें हमारा रक्षा तंत्र भी शामिल है। आयुर्वेद के अनुसार वृद्धावस्था में शरीर में वात दोष बढ़ जाता है। सही आहार और रसायन औषधियों के सेवन से इस प्राकृतिक कमजोरी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

एंटीबायोटिक्स का बार-बार इस्तेमाल करने से हमारी आंतों में मौजूद गुड बैक्टीरिया (मित्र जीवाणु) भी बुरे कीटाणुओं के साथ नष्ट हो जाते हैं। हमारे आंत का स्वास्थ्य ही हमारी इम्युनिटी का सबसे बड़ा आधार है। मित्र जीवाणुओं के मरने से शरीर की समग्र रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक कमजोर पड़ जाती है।

आयुर्वेद में सही तरीके से उपवास (लंघन) करने को एक बेहतरीन चिकित्सा माना गया है। जब शरीर को खाना पचाने का भारी काम नहीं करना पड़ता, तो वह अपनी सारी ऊर्जा जमे हुए विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में लगा देता है। यह प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया शरीर को संक्रमण मुक्त और ऊर्जावान बनाती है।

ताजे फलों और सब्जियों में विटामिन, मिनरल्स और भारी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। ये तत्व शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की तेजी से मरम्मत करते हैं और फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं। मौसमी फल खाने से जठराग्नि को प्राकृतिक रूप से बल मिलता है और शरीर का ओजस निरंतर बढ़ता है।

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