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अचानक कमजोरी और सुन्नपन – क्या ब्लड शुगर नर्व्स को प्रभावित कर रहा है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर ऐसा होता है कि बैठे-बैठे अचानक हाथ या पैर सुन्न पड़ जाते हैं। हम सोचते हैं, "चलो, थोड़ी देर में अपने आप ठीक हो जाएगा।" शुरुआत में यह झुनझुनी बस कुछ मिनटों की होती है, जिसे हम थकान या गलत तरीके से बैठने का नतीजा मानकर टाल देते हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, अगर यही सुन्नपन बार-बार होने लगे? रात को सोते वक्त हाथों में झनझनाहट होने लगे या पैर ठीक से काम न करें?

तब यह महज़ थकान नहीं होती। असल में, यह आपकी नसों (nerves) पर पड़ रहे भारी दबाव का एक अलार्म है। अफसोस की बात है कि ज़्यादातर लोग इसे तब तक इग्नोर करते हैं, जब तक कि पानी सिर से ऊपर नहीं चला जाता। अगर आपके साथ भी ऐसा कुछ हो रहा है, तो अब वक्त आ गया है कि आप अपने शरीर के इन इशारों को गहराई से समझें।

क्या ब्लड शुगर नसों को नुकसान पहुंचा सकती है?

बिल्कुल। अगर आपकी ब्लड शुगर लंबे समय से हाई चल रही है, तो यह आपकी नसों को अंदर ही अंदर डैमेज कर सकती है। जब शरीर में शुगर का लेवल लगातार ऊपर-नीचे होता है, तो नसों तक खून और सही पोषण नहीं पहुंच पाते। नतीजा? धीरे-धीरे नसें अपनी संवेदनशीलता (सेंसिटिविटी) खोने लगती हैं।

यही वजह है कि हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन, कमज़ोरी और सुन्नपन महसूस होता है। ज़्यादातर लोगों में यह दिक्कत पहले पैरों से शुरू होती है और फिर धीरे-धीरे हाथों तक आ जाती है। यह कोई एक दिन में होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि शरीर के अंदर बहुत धीरे-धीरे और चुपचाप बढ़ती है।

शरीर में कमज़ोरी और झुनझुनी क्यों महसूस होती है?

जब नसें अपना काम ठीक से नहीं कर पातीं, तो दिमाग से शरीर के बाकी हिस्सों तक जाने वाले सिग्नल्स रास्ते में ही अटकने लगते हैं। इसका सबसे पहला और सीधा असर हमारी मांसपेशियों, हाथों और पैरों पर पड़ता है। यह दिक्कत हर किसी को अलग-अलग तरीके से महसूस हो सकती है:

  • पैरों में भारीपन और कमज़ोरी: सीढ़ियां चढ़ते वक्त या थोड़ा सा चलते ही ऐसा लगना जैसे पैरों में मन-मन भर का वज़न बंधा हो। थकान बहुत जल्दी हावी हो जाती है।
  • चीज़ें पकड़ने में तकलीफ: हाथों की ग्रिप (पकड़) ढीली पड़ने लगती है। पानी का गिलास उठाना, शर्ट के बटन बंद करना या कोई भी छोटी चीज़ पकड़ना बड़ा काम लगने लगता है।
  • तलवों में सुई चुभने जैसा एहसास: पैरों के तलवों में एक अजीब सी चुभन या जलन होती है, जो खासकर रात के वक्त बिस्तर पर लेटते ही भड़क जाती है।
  • हाथ-पैरों में झनझनाहट: बिना कोई भारी काम किए ही हाथ-पैरों में चींटियां रेंगने जैसा एहसास या झनझनाहट होना, जो काफी देर तक शांत न हो।
  • लगातार थकान और सुस्ती: शरीर की बैटरी हमेशा 'लो' महसूस होना। बिना कुछ खास किए भी हर वक्त बदन में सुस्ती छाई रहती है।
  • संतुलन बनाने में परेशानी: नसों के कमज़ोर पड़ने से चलते वक्त शरीर का बैलेंस डगमगाने लगता है और इंसान को खुद में लड़खड़ाहट महसूस होती है।

डायबिटीज और नसों के संबंध को समझना

डायबिटीज को सिर्फ 'ब्लड में शुगर बढ़ने' की समस्या समझना बहुत बड़ी भूल है। यह आपके पूरे शरीर के सिस्टम को हिलाकर रख देती है, और नसें भी इससे बच नहीं पातीं। जब खून में शुगर लंबे समय तक कंट्रोल से बाहर रहती है, तो नसों की ऊपरी परत डैमेज होने लगती है। इससे शरीर की महसूस करने की ताकत कम हो जाती है। कई बार तो ऐसा होता है कि ज़मीन पर पैर रखने पर भी इंसान को अपना ही पैर ठीक से महसूस नहीं होता। इसी कारण कई शुगर के मरीज़ों को चलते वक्त लड़खड़ाहट और अस्थिरता होती है।

किन लोगों में यह समस्या ज़्यादा देखी जाती है?

नसों के सुन्न पड़ने की यह दिक्कत वैसे तो किसी को भी अपना शिकार बना सकती है, लेकिन कुछ खास लोगों को इसका रिस्क बहुत ज़्यादा होता है। अगर इनमें से कोई भी बात आपसे मेल खाती है, तो आपको ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है:

  • लंबे समय से बढ़ी हुई शर्करा: जिनकी शुगर महीनों या सालों से काबू में नहीं आ रही है, उनकी नसों के डैमेज होने के चांस सबसे ज़्यादा होते हैं।
  • एक जगह बैठे रहने की आदत: दिन-दिन भर कुर्सी पर बैठकर काम करना और फिजिकल एक्टिविटी के नाम पर ज़ीरो होना। इससे नसों में खून का बहाव धीमा पड़ जाता है।
  • ज़्यादा तनाव और नींद की कमी: जो लोग हर वक्त टेंशन में रहते हैं और जिनकी नींद पूरी नहीं होती, उनकी नसें समय से पहले कमज़ोर पड़ने लगती हैं।
  • बढ़ती उम्र: जैसे-जैसे उम्र ढलती है, नसों की ताकत और उनका रिस्पॉन्स टाइम अपने आप कमज़ोर होने लगता है।
  • कमज़ोर पाचन: पेट ठीक न रहने से शरीर में गंदगी (टॉक्सिन्स) इकट्ठी होने लगती है, जो धीरे-धीरे नसों को नुकसान पहुंचाती है।
  • मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता: शरीर का बढ़ा हुआ वज़न नसों पर एक्स्ट्रा प्रेशर डालता है और शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बुरी तरह बिगाड़ देता है।

शुरुआती संकेत जिन्हें लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं

शुरुआत में नसों की यह तकलीफ इतनी मामूली लगती है कि ज़्यादातर लोग इसे थकान या 'मौसम का असर' कहकर टाल देते हैं। लेकिन याद रखिए, शरीर कभी बिना वजह अलार्म नहीं बजाता:

  • पैरों में हल्की झुनझुनी: कुर्सी पर बैठे-बैठे या चलते वक्त पैरों में चींटियां चलना। थोड़ी देर में ठीक हो जाना, लेकिन फिर से यही होना।
  • उंगलियों में सुन्नपन: हाथ या पैर की उंगलियों का अचानक से सुन्न हो जाना और ऐसा लगना जैसे उनमें जान ही नहीं है।
  • रात में जलन बढ़ना: दिन में तो सब ठीक लगे, लेकिन रात को बिस्तर पर जाते ही हाथ-पैरों में तेज़ जलन और बेचैनी शुरू हो जाना।
  • थोड़ी दूरी चलने पर थकान: पहले आप जितना आराम से चल लेते थे, अब उतनी ही दूर चलने पर पैरों का जवाब दे जाना।
  • हाथों की पकड़ कमज़ोर लगना: चीज़ों को पकड़ने में पहले जैसी ताकत न महसूस होना और अक्सर हाथों से सामान छिटक कर गिर जाना।
  • तलवों में चुभन महसूस होना: पैरों के तलवों में ऐसा एहसास होना जैसे आप नंगे पैर कंकड़ या रेत पर चल रहे हों।

इन छोटे-छोटे इशारों को आप जितनी जल्दी पकड़ लेंगे और सही वक्त पर अपना इलाज शुरू कर देंगे, भविष्य की बड़ी और तकलीफदेह बीमारियों से उतना ही बचे रहेंगे।

आयुर्वेद नसों की कमज़ोरी को कैसे देखता है?

आयुर्वेद में नसों की कमज़ोरी को सिर्फ किसी एक अंग की बीमारी नहीं माना जाता। असल में, यह पूरे शरीर का बैलेंस बिगड़ने का नतीजा है। इसमें सबसे बड़ा रोल 'वात दोष' का होता है। वात ही हमारे शरीर की हर मूवमेंट (गति) और ब्लड सर्कुलेशन को चलाता है। जब यह वात बेकाबू हो जाता है, तो नसों का नैचुरल लचीलापन खत्म होने लगता है और वो सूखने लगती हैं। इसी वजह से हाथ-पैरों में झुनझुनी, सुन्नपन, कंपन और दर्द जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। आपका खराब रूटीन और हर वक्त का स्ट्रेस इस 'वात' को और ज़्यादा भड़का देते हैं।

इसके अलावा, आपका कमज़ोर पाचन भी इसके लिए उतना ही ज़िम्मेदार है। आयुर्वेद मानता है कि पेट की गड़बड़ी ही सारी बीमारियों की जड़ है। जब आपका खाना ठीक से नहीं पचता, तो शरीर में 'आम' (गंदगी या टॉक्सिन्स) इकट्ठा होने लगता है। यही गंदगी धीरे-धीरे नसों को ब्लॉक कर देती है, जिससे शरीर हर वक्त भारी, सुस्त और थका-थका सा महसूस करता है।

आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

आयुर्वेद में, ब्लड शुगर हाई होने और नसों के कमज़ोर पड़ने को हम महज़ एक 'बीमारी' नहीं कहते। सच तो यह है कि जब शरीर में वात और कफ दोष अपनी हदें पार कर जाते हैं, आपकी जठराग्नि (पाचन) सुस्त पड़ जाती है, और नसों को उनका खाना नहीं मिलता तब जाकर यह समस्या पैदा होती है।

  • वात दोष को काबू करना: नसों में जो चींटियां दौड़ती हैं, सुन्नपन आता है या सूखापन लगता है... वो सब वात भड़कने की निशानी है। इसलिए सबसे पहला काम नसों को अंदर से गर्माहट और सही पोषण देना है, ताकि वे अपना काम दोबारा शुरू कर सकें।
  • डाइजेशन सेट करना: अगर पेट में गंदगी (आम या टॉक्सिन्स) जमा है, तो वो सीधा नसों पर अटैक करेगी। इसलिए सबसे पहले जठराग्नि (पाचन की आग) को तेज़ किया जाता है। जब खाना सही से पचेगा, तभी शरीर को असली ताकत मिलेगी।
  • नसों को उनकी डाइट देना: जब नसों तक सही पोषण नहीं पहुंचता, तभी ये झुनझुनी और जलन शुरू होती है। आयुर्वेदिक तरीके से नसों और मांसपेशियों में अंदर से नई जान फूंकी जाती है।
  • लाइफस्टाइल की मरम्मत: आप कितनी भी अच्छी दवा खा लें, अगर रात-रात भर जागना, दिनभर एक जगह बैठे रहना और फालतू की टेंशन लेना नहीं छोड़ेंगे, तो कोई खास फायदा नहीं होगा। रूटीन बदलना इस इलाज की सबसे अहम कड़ी है।

इलाज में काम आने वाली असरदार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद का काम करने का स्टाइल एकदम अलग है। यहाँ जड़ी-बूटियां सिर्फ शुगर घटाने की मशीन नहीं हैं। ये आपके पूरे शरीर की सर्विसिंग करती हैं और मुरझाई हुई नसों को फिर से हरा-भरा कर देती हैं:

  • गिलोय (गुडूची): बिना वजह इसे 'अमृत' नहीं कहा जाता। यह आपकी इम्यूनिटी को इतना ज़बरदस्त तरीके से बूस्ट करती है कि शरीर की अंदरूनी गड़बड़ी अपने आप सेट होने लगती है।
  • अश्वगंधा: टेंशन से भरा दिमाग और कमज़ोर नसें इन दोनों का ये अचूक इलाज है। इसे खाने से बदन की बरसों पुरानी थकान मिट जाती है और आप फिर से एनर्जेटिक फील करते हैं।
  • मेथी: शुगर वालों के लिए मेथी दाना किसी जादू से कम नहीं है। यह बिना किसी साइड इफेक्ट के ब्लड शुगर को नेचुरली कंट्रोल करता है और शरीर के इंसुलिन सिस्टम का काम आसान बना देता है।
  • करेला: करेले का कड़वापन ही उसकी असली ताकत है। यह आपके मेटाबॉलिज़्म (खाना पचाने की स्पीड) को एकदम फास्ट कर देता है, जिससे शुगर लेवल कभी आउट ऑफ कंट्रोल नहीं होता।
  • ब्राह्मी: दिमाग शांत रहेगा, तभी तो नसें अपना काम ठीक से कर पाएंगी! ब्राह्मी आपके दिमाग की सारी उलझनों और स्ट्रेस को धो डालती है और नसों के डैमेज हो चुके नेटवर्क की अंदर से रिपेयरिंग करती है।

इलाज में काम आने वाली खास पंचकर्म थेरेपी

इन कमाल की थेरेपीज़ का मकसद एकदम साफ है आपके जाम हो चुके बदन को ढीला करना, नसों को रिलैक्स करना और रुके हुए खून के बहाव को वापस पटरी पर लाना:

  • अभ्यंग (हर्बल मालिश): जब खास जड़ी-बूटियों में पके हुए हल्के गर्म तेल से मालिश होती है, तो शरीर का सारा भारीपन कुछ ही मिनटों में उड़ जाता है। इससे नसों को अंदर तक खुराक मिलती है और ब्लड सर्कुलेशन एकदम तेज़ हो जाता है।
  • स्वेदन (भाप चिकित्सा): मालिश के बाद जब हर्बल भाप (स्टीम) दी जाती है, तो बरसों पुरानी जकड़न भी बर्फ की तरह पिघल जाती है। इसे लेने के बाद आप खुद को रुई जैसा हल्का महसूस करेंगे।
  • शिरोधारा: माथे के बिल्कुल बीचों-बीच गुनगुने औषधीय तेल की धार गिराई जाती है। यह दिमाग की सारी टेंशन और बेचैनी खींच लेती है। नसों को इससे इतना गहरा सुकून मिलता है, जिसका आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

अपनी डाइट में क्या बदलें?

अगर शुगर हाई है और नसें कमज़ोर पड़ रही हैं, तो आपकी थाली ही आपकी सबसे बड़ी दवा है। सही खान-पान ही शरीर में दोबारा जान डाल सकता है:

  • गरमा-गरम और ताज़ा खाना: बासी या ठंडा खाना वात को भड़काता है। हमेशा ताज़ा और आसानी से पचने वाला खाना ही खाएं।
  • हरी सब्जियां और फाइबर: अपनी प्लेट में ताज़ी सब्जियां और फाइबर बढ़ा दें। ये पेट को साफ रखते हैं और शरीर को सॉलिड ताकत देते हैं।
  • हल्का खाना (जैसे मूंग दाल): मूंग दाल जैसी हल्की चीज़ें खाएं ताकि आपके डाइजेशन पर एक्स्ट्रा लोड न पड़े।
  • मीठे और पैकेटबंद खाने से तौबा: चीनी और डिब्बाबंद (प्रोसेस्ड) खाना शरीर का पूरा सिस्टम बिगाड़ कर रख देते हैं। इनसे एकदम दूर रहें।
  • गुनगुना पानी: पूरे दिन थोड़ा-थोड़ा करके गुनगुना पानी पीते रहें। इससे पेट भी सेट रहता है और बदन में हल्कापन बना रहता है।
  • लेट नाइट खाने की आदत छोड़ें: रात को देर से खाने पर वो पचता नहीं है और सुबह उठने पर भारीपन लगता है।
  • पेट को खाली न छोड़ें: बहुत लंबे गैप तक भूखे रहने से शुगर का लेवल बिगड़ सकता है। इसलिए समय पर खाना खा लें।
  • तले-भुने से दूरी: बहुत ज़्यादा ऑयली और तला-भुना खाना नसों को ब्लॉक करता है और शरीर में सुस्ती भर देता है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम अभिषेक मल है, मैं उत्तर प्रदेश का 48 वर्षीय रिसर्च साइंटिस्ट हूँ। 2014 में मुझे डायबिटीज का पता चला, जब बार-बार पेशाब आना और नजर कमजोर होने जैसे लक्षण दिखने लगे। एक रिसर्चर होने के नाते मैं एलोपैथिक दवाइयों की सीमाओं और उनके लंबे उपयोग को लेकर चिंतित था, इसलिए मैंने एक समग्र समाधान की तलाश में जीवा आयुर्वेद का रुख किया। इंदिरापुरम क्लिनिक में डॉ. संदीप श्रीवास्तव से परामर्श के बाद मैंने डायबिटीज मैनेजमेंट प्रोग्राम शुरू किया। नियमित मॉनिटरिंग, पर्सनलाइज्ड डाइट और लाइफस्टाइल बदलाव से मेरी सेहत में तेजी से सुधार हुआ मेरा HbA1c 8.5 से घटकर 5.5 हो गया। आज मैं खुद को पहले से ज्यादा स्वस्थ और संतुलित महसूस करता हूँ।

डॉक्टर को कब दिखाएं?

शुगर और नसों की कमज़ोरी के लक्षण हर इंसान में अलग हो सकते हैं। लेकिन अगर आपको नीचे बताई गई कोई भी दिक्कत हो रही है, तो इसे इग्नोर करने की भूल बिल्कुल न करें:

  • हाथों या पैरों में लगातार चींटियां चलने जैसा (झुनझुनी) महसूस हो।
  • बार-बार शरीर के अंग सुन्न पड़ जाएं या उनमें तेज़ जलन होने लगे।
  • बिना कोई भारी काम किए ही शरीर टूटता रहे और भयंकर थकान लगे।
  • चलते वक्त ऐसा लगे कि पैर साथ नहीं दे रहे हैं या बैलेंस डगमगा रहा है।
  • पैरों में सुन्नपन इतना बढ़ जाए कि ज़मीन पर पैर रखने का पता ही न चले।
  • कोई मामूली सी खरोंच या घाव भरने में भी हफ्तों का समय लग जाए।
  • दवाइयों से शुगर नॉर्मल आने के बाद भी नसों की झुनझुनी और दर्द कम न हो।

ऐसे में बिना देरी किए किसी अच्छे विशेषज्ञ को दिखाना बहुत ज़रूरी है ताकि नसों को आगे डैमेज होने से बचाया जा सके।

निष्कर्ष

हाई ब्लड शुगर का मतलब सिर्फ मशीन में बढ़ा हुआ नंबर नहीं है। यह असल में अंदर ही अंदर आपकी नसों, डाइजेशन और पूरे शरीर के बैलेंस को दीमक की तरह चाट रही होती है। इसी वजह से हाथ-पैरों का सुन्न होना और झुनझुनी धीरे-धीरे इतनी बड़ी परेशानी बन जाती है कि रोज़मर्रा के छोटे-छोटे काम करना भी भारी पड़ने लगता है।

जहां मॉडर्न मेडिकल साइंस इसे सिर्फ हाई ब्लड शुगर का साइड इफेक्ट मानती है, वहीं आयुर्वेद सीधे इसकी जड़ पर चोट करता है यानी आपका बिगड़ा हुआ 'वात' और कमज़ोर हाज़मा। अगर आप वक्त रहते अपना खान-पान सुधार लें, थोड़ी एक्सरसाइज़ शुरू कर दें, स्ट्रेस लेना कम कर दें और शरीर को सही आराम दें, तो आप नसों के इस डैमेज को काफी हद तक रिवर्स कर सकते हैं और फिर से एक हेल्दी और एक्टिव ज़िंदगी जी सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, लंबे समय तक ब्लड शुगर असंतुलित रहने पर नसों पर असर पड़ सकता है। इससे हाथों और पैरों में जलन, चुभन या झनझनाहट महसूस होने लगती है। कई लोग इसे सामान्य थकान समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। धीरे धीरे यह परेशानी रात के समय ज्यादा बढ़ सकती है। समय रहते ध्यान देना ज़रूरी माना जाता है ताकि नसों पर दबाव कम किया जा सके।

हर बार ऐसा ज़रूरी नहीं होता, लेकिन बार बार कमज़ोरी, पैरों में भारीपन और सुन्नपन महसूस होना शरीर के अंदर गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। यदि इसके साथ प्यास ज्यादा लगना, जल्दी थकान या धुंधला दिखना भी हो, तो जांच कराना बेहतर माना जाता है। कई बार नसों तक सही पोषण न पहुंचने से भी ऐसी स्थिति बन सकती है। लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह लेना ज़रूरी होता है।

हाँ, मानसिक तनाव शरीर की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। तनाव बढ़ने पर शरीर में ऐसे परिवर्तन होने लगते हैं जो शर्करा संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। लगातार चिंता और नींद की कमी नसों की कमज़ोरी को भी बढ़ा सकती है। इसलिए मानसिक शांति और पर्याप्त आराम को भी ज़रूरी माना जाता है। केवल भोजन ही नहीं, मन की स्थिति भी शरीर पर असर डालती है।

हाँ, लगातार बैठे रहने से रक्त संचार धीमा हो सकता है। इससे पैरों में झनझनाहट, भारीपन और सुन्नपन महसूस होने लगता है। यदि ब्लड शुगर पहले से असंतुलित हो, तो यह परेशानी और अधिक बढ़ सकती है। बीच बीच में हल्की गतिविधि और शरीर को चलाते रहना लाभकारी माना जाता है। लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठना टालना चाहिए।

हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है, इसलिए बिना सलाह के अचानक सब कुछ बंद करना सही नहीं माना जाता। ज़रूरत से ज्यादा मीठा और पैकेट वाले खाद्य पदार्थ कम करना बेहतर माना जाता है। संतुलित भोजन और सही समय पर खाना अधिक महत्वपूर्ण होता है। शरीर को पोषण भी चाहिए होता है, इसलिए भोजन का चुनाव समझदारी से करना ज़रूरी माना जाता है।

यदि नसों की कमज़ोरी लंबे समय तक बनी रहे, तो चलने में अस्थिरता महसूस हो सकती है। कई लोगों को सीढ़ियां चढ़ते समय डर लगने लगता है या संतुलन बिगड़ने लगता है। पैरों में संवेदना कम होने से चोट का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए शुरुआती संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। सही देखभाल से स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है।

हाँ, कम नींद शरीर के संतुलन को प्रभावित कर सकती है। देर रात तक जागना और पर्याप्त आराम न मिलना शरीर की ऊर्जा प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। इससे थकान, चिड़चिड़ापन और शर्करा असंतुलन की समस्या बढ़ सकती है। नियमित और गहरी नींद शरीर को संतुलित रखने में सहायक मानी जाती है। इसलिए सोने और जागने का समय नियमित रखना ज़रूरी माना जाता है।

हाँ, कम नींद शरीर के संतुलन को प्रभावित कर सकती है। देर रात तक जागना और पर्याप्त आराम न मिलना शरीर की ऊर्जा प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। इससे थकान, चिड़चिड़ापन और शर्करा असंतुलन की समस्या बढ़ सकती है। नियमित और गहरी नींद शरीर को संतुलित रखने में सहायक मानी जाती है। इसलिए सोने और जागने का समय नियमित रखना ज़रूरी माना जाता है।

कई लोगों में ठंड या नमी बढ़ने पर नसों और मांसपेशियों की परेशानी ज्यादा महसूस हो सकती है। हाथ पैरों में अकड़न, भारीपन और झनझनाहट बढ़ सकती है। शरीर का रक्त संचार धीमा होने से भी यह समस्या बढ़ सकती है। ऐसे समय में शरीर को गर्म रखना और नियमित हल्की गतिविधि करना लाभकारी माना जाता है।

हाँ, कुछ लोगों में बार बार भूख लगना और जल्दी थकान महसूस होना भी शरीर के अंदर गड़बड़ी का संकेत माना जाता है। भोजन के बाद भी कमज़ोरी महसूस होना इस ओर इशारा कर सकता है कि शरीर ऊर्जा का सही उपयोग नहीं कर पा रहा। ऐसी स्थिति में केवल ज्यादा खाना समाधान नहीं होता। संतुलित आहार और सही दिनचर्या अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हाँ, नियमित हल्की गतिविधि शरीर में रक्त प्रवाह बेहतर बनाने में सहायक मानी जाती है। धीरे धीरे चलना, खिंचाव वाले अभ्यास और हल्के योगासन शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकते हैं। इससे पैरों की जकड़न और भारीपन कम महसूस हो सकता है। हालांकि बहुत ज्यादा मेहनत वाले व्यायाम बिना सलाह के नहीं करने चाहिए। शरीर की क्षमता के अनुसार गतिविधि चुनना बेहतर माना जाता है।

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