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हाथ-पैर ठंडे रहना Body Circulation Issue हो सकता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

सर्दियों में हाथ-पैर ठंडे होना आम बात है, लेकिन क्या गर्मियों में या रजाई में रहने के बाद भी आपके पैर बर्फ की तरह ठंडे रहते हैं? हम अक्सर इसे 'कमज़ोरी' या 'मौसम का असर' मानकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हाथ और पैर हमारे हृदय (Heart) से सबसे दूर होते हैं? जब शरीर के अंदरूनी सिस्टम में ब्लड सर्कुलेशन (Blood Circulation) खराब होता है, तो हृदय सबसे पहले दूर के हिस्सों में खून भेजना कम कर देता है। यह ठंडापन असल में शरीर की खामोश चीख-पुकार है जो बता रही है कि नसों में ऑक्सीजन और खून का दौरा ब्लॉक हो रहा है। इस खतरे को समय रहते पहचानना ही गंभीर बीमारियों से बचने की चाबी है। इस ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि हाथ-पैर ठंडे रहना भविष्य की किन भयंकर बीमारियों की वॉर्निंग (Warning) है, और कैसे आयुर्वेद की मदद से आप खुद को स्वस्थ रख सकते हैं।

हाथ-पैर ठंडे रहना: सिर्फ मौसम का असर नहीं, तो क्या है?

अगर मोज़े पहनने या रजाई में लेटने के बाद भी आपके पैरों में गर्माहट नहीं आती, तो यह सिर्फ बाहरी ठंड का असर नहीं है। यह शरीर के अंदरूनी सर्कुलेशन के फेल होने का संकेत है।

  • खराब ब्लड सर्कुलेशन (Poor Circulation): जब कोलेस्ट्रॉल या खराब डाइट के कारण नसें सिकुड़ जाती हैं या ब्लॉक हो जाती हैं, तो खून हाथ-पैरों की उंगलियों तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वे हमेशा ठंडे रहते हैं।
  • खून की भारी कमी (Anemia): खून में मौजूद लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) ऑक्सीजन और गर्माहट को पूरे शरीर में लेकर जाती हैं। जब हीमोग्लोबिन कम होता है, तो अंगों को ऑक्सीजन नहीं मिलती और शरीर अंदर से ठंडा पड़ने लगता है।
  • सुस्त थायरॉयड (Hypothyroidism): थायरॉयड ग्रंथि शरीर के तापमान और मेटाबॉलिज़्म को कंट्रोल करती है। इसके सुस्त पड़ने से शरीर में ऊर्जा (गर्मी) बननी बंद हो जाती है और हाथ-पैर बर्फ जैसे हो जाते हैं।
  • नसों का डैमेज (Neuropathy): डायबिटीज़ या विटामिन B12 की भारी कमी के कारण जब नसें डैमेज हो जाती हैं, तो दिमाग को तापमान का सही सिग्नल नहीं मिलता और हाथ-पैरों में ठंडापन व सुन्नपन रहने लगता है।

आयुर्वेद इस खामोशी को कैसे समझता है? (वात दोष और रक्त धातु)

आधुनिक विज्ञान जिसे सर्कुलेशन की कमी या न्यूरोपैथी कहता है, आयुर्वेद ने उसे हज़ारों साल पहले ही शरीर के 'वात दोष' और 'रक्त धातु' के बिगड़ने के रूप में बहुत गहराई से समझाया था।

  • वात दोष का भयंकर प्रकोप: वात (वायु) की प्राकृतिक तासीर ठंडी और रूखी होती है। जब खराब लाइफस्टाइल से शरीर में वात भड़कता है, तो यह खून की नलियों (नसों) को सिकोड़ देता है, जिससे खून का दौरा रुक जाता है और हाथ-पैर ठंडे हो जाते हैं।
  • रक्त धातु की कमज़ोरी: आयुर्वेद मानता है कि जब पाचन (अग्नि) कमज़ोर होता है, तो खाने से सही 'रक्त' (खून) नहीं बन पाता। खून की कमी से शरीर को प्राकृतिक गर्माहट नहीं मिलती।
  • आम (Toxins) से स्रोतस में रुकावट: बिना पचा हुआ खाना जब शरीर में 'आम' (ज़हर) बनाता है, तो वह खून की नलियों (स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है। इस ब्लॉकेज के कारण हृदय का पंप किया हुआ खून पैरों तक पहुँच ही नहीं पाता।

जीवा आयुर्वेद का समग्र प्रबंधन क्या है?

हम आपको सिर्फ हीटिंग पैड इस्तेमाल करने या मल्टीविटामिन देकर इन चेतावनियों को दबाने का काम नहीं करते। हमारा लक्ष्य आपके शरीर की असली पुकार को सुनकर ब्लड सर्कुलेशन की जड़ को हमेशा के लिए ठीक करना है।

  • नाड़ी से बीमारी की पहचान: हम लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि नाड़ी परीक्षा से शरीर के अंदर चल रहे वात, पित्त और कफ के असली असंतुलन को पकड़ते हैं कि नसों में ब्लॉकेज है या खून की कमी।
  • अग्नि दीपन और डिटॉक्स: सबसे पहले आपकी मेटाबॉलिक अग्नि को मज़बूत किया जाता है और नसों में फैले हुए 'आम' (गंदगी) को जड़ी-बूटियों के ज़रिए बाहर निकाला जाता है।
  • धातु पोषण (Rejuvenation): जब नसें साफ हो जाती हैं, तब रक्त धातु को बढ़ाने और नर्वस सिस्टम को ताकत देने के लिए विशेष रसायन औषधियाँ दी जाती हैं।

ब्लड सर्कुलेशन सुधारने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें बंद नसों को खोलने और शरीर में प्राकृतिक गर्माहट लाने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं।

  • मंजिष्ठा (Manjistha): यह खून को साफ करने और नसों में जमे हुए 'आम' (टॉक्सिन्स) को पिघलाकर बाहर निकालने की सबसे बेहतरीन औषधि है, जो सर्कुलेशन को तेज़ी से सुधारती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): तनाव कम करने के साथ-साथ यह वात दोष को शांत करता है। यह नसों को ताकत देता है और शरीर के अंदरूनी मेटाबॉलिज़्म को गर्म रखकर ऊर्जा भरता है।
  • अर्जुन (Arjuna): हृदय की पंपिंग क्षमता को बढ़ाने और बंद धमनियों (Arteries) को खोलने के लिए अर्जुन की छाल एक जादुई रक्षक है, जिससे खून हाथ-पैरों तक आसानी से पहुँचता है।
  • सोंठ और दालचीनी (Dry Ginger & Cinnamon): ये शरीर की 'पाचन अग्नि' को तेज़ करते हैं और नसों को खोलकर खून के दौरे (Blood Flow) को तुरंत बढ़ा देते हैं।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी शरीर को कैसे नया बनाती है?

जब शरीर में वात और ब्लॉकेज बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है और हाथ-पैर हमेशा सुन्न व ठंडे रहने लगते हैं, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी शरीर की डीप क्लीनिंग करती है।

  • अभ्यंग (Abhyanga): औषधीय गर्म तेलों से पूरे शरीर की मालिश करने से ब्लड सर्कुलेशन तुरंत तेज़ होता है। यह सिकुड़ी हुई नसों को खोलता है और शरीर में गहरी गर्माहट लाता है।
  • स्वेदन (Swedana): मालिश के बाद हर्बल भाप (Steam) देने से नसों में जमा वात और गंदगी पसीने के रास्ते बाहर निकल जाती है, जिससे अंगों में खून का दौरा बिना किसी रुकावट के होने लगता है।
  • बस्ती (Basti): आयुर्वेद में वात रोगों का आधा इलाज 'बस्ती' को माना गया है। औषधीय तेलों का एनीमा देकर आँतों से सारा फँसा हुआ वात बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे नसों का रूखापन खत्म हो जाता है।

सर्कुलेशन सुधारने के लिए वात-शामक डाइट प्लान

आप जो खाते हैं, वह सीधे आपके खून के गाढ़ेपन और वात दोष को तय करता है। हाथ-पैरों की इस खामोश बीमारी को रोकने के लिए सही डाइट का पालन करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

आहार का सिद्धांत:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): सात्विक, गर्म, ताज़ा और थोड़ा स्निग्ध (चिकनाई युक्त) भोजन लें जो वात को शांत करे और खून का दौरा बढ़ाए।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): बासी, फ्रिज में रखा ठंडा खाना, बहुत ज़्यादा रूखा-सूखा भोजन और कच्चा सलाद जो वात को भड़काता है।

प्राकृतिक पोषण:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): गाय का शुद्ध घी, लहसुन, अदरक, मूंग की दाल, भीगे हुए बादाम और खजूर शामिल करें।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): ज़्यादा मैदा, रिफाइंड तेल, जंक फूड और भारी नॉन-वेज जो नसों में कोलेस्ट्रॉल (आम) बढ़ाते हैं।

विरुद्ध आहार से बचें:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): संतुलित और संगत (Compatible) खाद्य संयोजन अपनाएँ।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): दूध के साथ खट्टे फल, नमक या मछली का सेवन जो सीधे खून को गंदा करता है।

दैनिक पेय:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): दिन भर में पर्याप्त गुनगुना पानी, दालचीनी या अदरक की चाय पिएं।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): बर्फ का ठंडा पानी, कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स और बहुत ज़्यादा कैफीन जो नसों को सिकोड़ देते हैं।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

जब आप इन छोटे-छोटे संकेतों को इग्नोर करके किसी बड़ी बीमारी (जैसे न्यूरोपैथी या हार्ट ब्लॉकेज) का शिकार हो जाते हैं, तब हम आपकी परेशानी की जड़ तक पहुँचने के लिए गहराई से जाँच करते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले पल्स चेक करके यह गहराई से समझना कि आपके अंदर 'वात', 'पित्त', और 'कफ' का स्तर कितना बिगड़ चुका है और ब्लड सर्कुलेशन कहाँ रुक रहा है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: डॉक्टर आपके नाखूनों का रंग, त्वचा का रूखापन, और सुन्नपन को बहुत बारीकी से चेक करते हैं ताकि एनीमिया और नसों के डैमेज का सही पता चल सके।
  • पाचन का विश्लेषण: यह देखना कि आपका पेट साफ रहता है या नहीं, क्योंकि कब्ज़ और मंदाग्नि ही नसों में टॉक्सिन्स (आम) पैदा करते हैं।
  • लाइफस्टाइल चेक: आपके काम करने के तरीके (ज़्यादा देर बैठे रहना), तनाव और खाने की आदतों को बहुत गहराई से समझा जाता है, क्योंकि बीमारी का ट्रिगर यहीं है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी जादुई दर्द निवारक गोली या ब्लड थिनर नहीं है जो एक रात में खून को पतला कर दे। शरीर की अंदरूनी मशीनरी और नसों को दोबारा रिपेयर होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; वात शांत होने से शरीर में प्राकृतिक गर्माहट आने लगेगी। गैस कम होगी और सुस्ती दूर होने लगेगी।
  • 1 से 3 महीने तक: ब्लड सर्कुलेशन सुधरने से हाथ-पैरों का ठंडा रहना काफी हद तक कम हो जाएगा। नसों का सुन्नपन खत्म होने लगेगा और शरीर में नई ऊर्जा (Energy) आएगी।
  • 3 से 6 महीने और उससे अधिक: आपका पूरा शरीर अंदर से डिटॉक्स हो जाएगा। रक्त धातु पूरी तरह पुष्ट हो जाएगी और आप खराब सर्कुलेशन के डर से मुक्त होकर एक स्वस्थ जीवन जी सकेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

खराब सर्कुलेशन के इलाज के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना बहुत ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को लेकर दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य नसों को चौड़ा करने और ब्लड थिनर्स से लक्षणों को मैनेज करना ‘वात’ को शांत कर और ‘आम’ को हटाकर प्राकृतिक रूप से ब्लॉकेज कम करना
शरीर को देखने का नजरिया कोलेस्ट्रॉल, थायरॉयड और रक्त समस्याओं को अलग-अलग बीमारियाँ मानना ‘अग्नि’, ‘वात दोष’ और ‘रक्त धातु’ को साथ में संतुलित करना
डाइट और जीवनशैली दवाइयों पर निर्भरता, सामान्य डाइट सलाह (कम नमक/फैट) वात-शामक सात्विक आहार, अभ्यंग (तेल मालिश) और जड़ी-बूटियाँ
इलाज का तरीका ब्लड थिनर्स और अन्य दवाओं से नियंत्रण आहार, दिनचर्या और औषधियों से समग्र संतुलन
लंबा असर दवाइयाँ बंद करने पर समस्या लौटना, साइड इफेक्ट्स का खतरा नसों को मज़बूती देकर दीर्घकालिक संतुलन और बेहतर स्वास्थ्य

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

हाथ-पैरों के ठंडेपन को सिर्फ मौसम का बहाना मानकर इग्नोर न करें। अगर आपको शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

  • उंगलियों या नाखूनों का नीला पड़ना: अगर ठंडे होने के साथ आपकी उंगलियों के पोर या नाखून नीले या सफेद पड़ने लगें, तो यह ऑक्सीजन के पूरी तरह रुक जाने का गंभीर संकेत है।
  • अचानक भयंकर सुन्नपन आना: अगर हाथ या पैर पूरी तरह सुन्न पड़ जाएं और उनमें कोई भी सेंसेशन (महसूस होना) खत्म हो जाए, तो यह नर्व डैमेज या स्ट्रोक का अलार्म है।
  • पैरों में बहुत ज़्यादा दर्द और सूजन: अगर थोड़ा सा चलने पर ही पिंडलियों में ऐसा दर्द हो जो बर्दाश्त न हो और पैरों में सूजन आ जाए, तो यह डीप वेन थ्रोम्बोसिस (नसों में खून का थक्का जमना) हो सकता है।
  • सीने में भारीपन और साँस फूलना: हाथ-पैर ठंडे रहने के साथ अगर सीने में जकड़न महसूस हो और साँस उखड़े, तो यह हृदय (Heart) के कमज़ोर होने का सीधा संकेत है।

निष्कर्ष

हमारा शरीर एक बेहतरीन मशीन है जो हर रुकावट का संकेत देता है। हाथ-पैरों का हमेशा ठंडा रहना महज़ मौसम का असर नहीं, बल्कि यह नसों में हो रही ब्लॉकेज, खराब सर्कुलेशन और वात दोष के बेकाबू होने का स्पष्ट अलार्म है। जब हम इन संकेतों को इग्नोर करते हैं, तो हम असल में अपनी बीमारी को अंदर ही अंदर हार्ट की कमज़ोरी या नसों के डैमेज (Neuropathy) तक पहुँचने का मौका दे रहे होते हैं। आयुर्वेद आपको शरीर की भाषा समझने का बेहद सुरक्षित रास्ता दिखाता है। मंजिष्ठा और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों, अभ्यंग मालिश और सही सात्विक दिनचर्या को अपनाकर आप अपने ब्लड सर्कुलेशन को दोबारा तेज़ कर सकते हैं। अपनी नसों की पुकार को सुनें, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपने शरीर को हमेशा के लिए ऊर्जावान और स्वस्थ बनाएं।

FAQs

गर्मियों में हाथ-पैर ठंडे रहना खराब ब्लड सर्कुलेशन, खून की कमी (Anemia) या थायरॉयड ग्रंथि के सुस्त होने का बहुत बड़ा संकेत है। इसका मौसम से नहीं, बल्कि आपके शरीर की अंदरूनी कमज़ोरी से संबंध है।

हाथ-पैरों का ठंडा रहना, बार-बार झनझनाहट या सुन्नपन महसूस होना, पैरों की नसों का नीला पड़ना (Varicose veins), लगातार थकान रहना और बालों का झड़ना खराब सर्कुलेशन के मुख्य लक्षण हैं।

बिल्कुल! आयुर्वेद के अनुसार, जब पेट की 'अग्नि' कमज़ोर होती है, तो खाने से खून (रक्त धातु) ठीक से नहीं बन पाता। साथ ही, पेट में बनने वाला ज़हरीला 'आम' नसों को ब्लॉक कर देता है, जिससे सर्कुलेशन रुक जाता है।

वात की तासीर ठंडी और रूखी होती है। लाइफस्टाइल खराब होने पर जब वात बढ़ता है, तो यह शरीर की नसों को सिकोड़ देता है और खून के प्रवाह (Flow) को रोक देता है, जिससे शरीर ठंडा पड़ने लगता है।

लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रहने से पैरों की नसें और खून की नलियाँ डैमेज होने लगती हैं (Diabetic Neuropathy)। इससे पैरों तक सही मात्रा में खून नहीं पहुँचता और वे ठंडे व सुन्न रहने लगते हैं।

अभ्यंग मालिश ब्लड सर्कुलेशन के लिए सबसे बेहतरीन है। गुनगुने तिल के तेल या महानारायण तेल से रोज़ाना पैरों और हाथों की मालिश करने से रुकी हुई नसें खुलती हैं और वात दोष शांत होता है।

खड़े होकर और बहुत तेज़ी से ठंडा पानी पीने से पेट की अग्नि तुरंत बुझ जाती है और शरीर में वात भड़क जाता है। यह वात जोड़ों और नसों में जाकर रूखापन व ब्लॉकेज पैदा करता है।

लहसुन और अदरक शरीर की 'अग्नि' को तेज़ करते हैं। इनकी तासीर गर्म होती है, जो नसों में जमे खराब कोलेस्ट्रॉल (आम) को पिघलाती है और खून के दौरे को तुरंत बढ़ाकर गर्माहट लाती है।

जी हाँ! 'स्वेदन' (हर्बल भाप) और 'विरेचन' जैसी पंचकर्म थेरेपी शरीर से सारे ज़हरीले तत्वों को बाहर निकाल देती हैं। यह नसों की जकड़न को दूर कर ब्लड सर्कुलेशन को पूरी तरह नया बना देती हैं।

सही आयुर्वेदिक डाइट (गर्म और सुपाच्य भोजन), तेल मालिश और जड़ी-बूटियों (जैसे अश्वगंधा, अर्जुन) के इस्तेमाल से 3 से 4 हफ्तों में ही शरीर में गर्माहट आने लगती है। सर्कुलेशन को पूरी तरह सुधरने में 3 से 6 महीने लग सकते हैं।

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