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पेट साफ न होना क्यों बड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

अक्सर "आज पेट ठीक से साफ नहीं हुआ" जैसी बात को हम साधारण मानकर टाल देते हैं, लेकिन आयुर्वेद में इसे शरीर का एक गंभीर चेतावनी संकेत माना जाता है। पाचन तंत्र हमारे स्वास्थ्य का आधार है; जब मल त्याग की यह प्राकृतिक लय बिगड़ती है, तो इसका असर केवल पेट तक सीमित नहीं रहता। यह इस बात का प्रमाण है कि शरीर के भीतर 'जठराग्नि' मंद पड़ रही है और 'आम' (विषाक्त तत्व) जमा होने लगे हैं। जिसे हम छोटी परेशानी समझते हैं, वह असल में शरीर द्वारा दिया गया एक 'अलार्म' है, जो संकेत देता है कि आपके आंतरिक तंत्र को तत्काल सुधार और संतुलन की आवश्यकता है।

‘नियमित मल त्याग’ का वास्तविक अर्थ क्या है? 

'पेट साफ होने' का मतलब सिर्फ हर रोज टॉयलेट जाना नहीं है। इसका असली मतलब है, बिना किसी जोर या मेहनत के, पेट का एक बार में पूरी तरह खाली हो जाना।

अगर आपको टॉयलेट में ज्यादा समय बैठना पड़ता है, बार-बार जाना पड़ता है, या बाहर आने के बाद भी ऐसा लगे कि 'पेट अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ है', तो समझ लीजिए कि आपके पाचन का संतुलन बिगड़ रहा है। शरीर में हल्कापन और ताजगी महसूस होना ही सही पेट साफ होने की असली पहचान है।

शरीर की प्राकृतिक पाचन प्रक्रिया कैसे काम करती है?

शरीर की पाचन प्रक्रिया एक क्रमबद्ध प्रणाली है, जो इस प्रकार काम करती है:

  1. मुंह (चबाना और लार मिलना): भोजन को चबाने से वह छोटे टुकड़ों में टूटता है और लार के साथ मिलकर पाचन की शुरुआत होती है।
  2. अमाशय (पेट) में पाचन: यहाँ भोजन अम्ल और पाचक रसों के साथ मिलकर छोटे कणों में टूटता है।
  3. छोटी आंत में सूक्ष्म पाचन: भोजन का गहराई से पाचन होता है और पोषक तत्व अलग किए जाते हैं।
  4. अवशोषण (Absorption): आंतों की दीवारों से पोषक तत्व रक्त में जाकर पूरे शरीर तक पहुँचते हैं।
  5. उपयोग (Assimilation): शरीर इन पोषक तत्वों का उपयोग ऊर्जा, मरम्मत और विकास के लिए करता है।
  6. अपशिष्ट निष्कासन (Elimination): जो अवशेष बचते हैं, वे बड़ी आंत के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं।

शुरुआती संकेत जिन्हें नजरअंदाज किया जाता है

अक्सर हम इन छोटे लक्षणों को सामान्य मानकर छोड़ देते हैं, लेकिन आयुर्वेद में इन्हें 'पूर्व-रूप' कहा जाता है, यानी बड़ी बीमारी के आने से पहले शरीर द्वारा दी गई चेतावनी।

  • पेट का भारीपन: सुबह उठने के बाद भी अगर पेट फूला हुआ और भारी महसूस हो, तो यह संकेत है कि आपकी 'अग्नि' भोजन को सही ढंग से नहीं पचा पा रही है।
  • गैस और अफारा: पेट में लगातार बनने वाली हवा इस बात का प्रमाण है कि आंतों में मल रुककर सड़ रहा है और वायु दोष (Vata) असंतुलित हो गया है।
  • मल का अधूरापन: शौच के बाद भी पेट पूरी तरह खाली न लगना सबसे सूक्ष्म संकेत है कि शरीर में 'आम' (Toxins) जमा हो रहे हैं।
  • अकारण थकान: अगर बिना मेहनत किए भी आप दिन भर सुस्त महसूस करते हैं, तो समझ लें कि पेट की गंदगी आपके रक्त और ऊर्जा प्रवाह को बाधित कर रही है।

सुबह पेट साफ न होने के पीछे छिपे कारण 

सुबह पेट साफ न होने की समस्या अक्सर रातों-रात पैदा नहीं होती, बल्कि यह हमारी छोटी-छोटी दैनिक आदतों का मिला-जुला परिणाम है। 

  • देर से उठना: आयुर्वेद के अनुसार 'ब्रह्म मुहूर्त' (सूर्योदय से पहले) में उठने से शरीर में प्राकृतिक वेग (Pressure) बनता है। देर से उठने पर मल आंतों में सूखने लगता है।
  • पानी की कमी: पाचन के बाद बचे हुए कचरे को बाहर निकालने के लिए नमी की जरूरत होती है। पानी कम पीने से मल सख्त हो जाता है और कब्ज पैदा करता है।
  • फाइबर (रेशे) की कमी: चोकरयुक्त आटा, फल और सब्जियां न खाने से मल को आगे बढ़ने के लिए जरूरी सहारा नहीं मिलता।
  • तनाव और चिंता: हमारा मस्तिष्क और पेट एक-दूसरे से सीधे जुड़े हैं। मानसिक तनाव पाचन तंत्र की गति को धीमा कर देता है, जिससे पेट साफ होने में बाधा आती है।
  • गतिहीन जीवन (No Movement): शारीरिक सक्रियता की कमी आंतों की मांसपेशियों को सुस्त बना देती है, जिससे मल त्याग की प्रक्रिया कठिन हो जाती है।

कब्ज और “पेट साफ न होना” में अंतर 

ज्यादातर लोग कब्ज और 'पेट साफ न होना' को एक ही मानते हैं, लेकिन इन दोनों के बीच एक बहुत ही सूक्ष्म और महत्वपूर्ण अंतर है। इसे समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि दोनों का शरीर पर असर अलग-अलग होता है।

  • कब्ज (Constipation): यह एक स्पष्ट और गंभीर स्थिति है, जहाँ कई दिनों तक मल त्याग होता ही नहीं। इसमें मल आंतों में सूखकर सख्त हो जाता है और उसे बाहर निकालने में काफी परेशानी होती है। आयुर्वेद में इसे 'विबन्ध' कहा जाता है, जो शरीर में अत्यधिक वात दोष बढ़ने का संकेत है।
  • पेट साफ न होना (Incomplete Evacuation): यह कब्ज से पहले की एक सूक्ष्म अवस्था है। इसमें मल तो रोज आता है, लेकिन विसर्जन के बाद मानसिक संतुष्टि और शरीर में हल्कापन महसूस नहीं होता। आपको ऐसा लगता रहता है कि 'कुछ बाकी रह गया है'। इसे 'सामावस्था' का संकेत माना जाता है, जहाँ पाचन अग्नि मंद होने के कारण मल चिपचिपा हो जाता है।

आंतों की गतिशीलता क्यों धीमी पड़ती है?

आंतों की गतिशीलता (Intestinal Motility) का धीमा होना पाचन तंत्र के इंजन के थमने जैसा है। इसके मुख्य कारण बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली हैं:

  • मूवमेंट की कमी: कम शारीरिक सक्रियता आंतों की मांसपेशियों को सुस्त बनाती है, जिससे मल आगे नहीं बढ़ पाता।
  • पानी की कमी: नमी के अभाव में मल सख्त हो जाता है, जो आंतों की प्राकृतिक गति (Peristalsis) में बाधा डालता है।
  • अनियमित दिनचर्या: बेवक्त खाना और सोना शरीर की 'बायोलॉजिकल क्लॉक' को बिगाड़ देता है, जिससे उत्सर्जन की लय टूट जाती है।

आयुर्वेदिक समझ: पेट साफ न होना क्या दर्शाता है? 

आयुर्वेद के अनुसार, पेट साफ न होना केवल एक शारीरिक समस्या नहीं, बल्कि 'मंदाग्नि' (पाचन अग्नि का कमजोर होना) और 'अपान वायु' के असंतुलन का परिणाम है। जब हमारी जठराग्नि भोजन को पूरी तरह नहीं पचा पाती, तो शरीर में 'आम' (Toxins) का निर्माण होता है, जो आंतों की दीवारों पर चिपककर मल के प्राकृतिक मार्ग में बाधा डालता है। आयुर्वेद इसे रोगों की जननी मानता है, क्योंकि संचित 'आम' न केवल पाचन को बाधित करता है, बल्कि धीरे-धीरे रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैलकर ओज (Vitality) को कम कर देता है। इसलिए, पेट की शुद्धि केवल गंदगी बाहर निकालना नहीं, बल्कि शरीर की आंतरिक ऊर्जा और दोषों को साम्यावस्था में लाने की एक अनिवार्य प्रक्रिया है। 

जीवा आयुर्वेद: पेट की समस्या का जड़ से समाधान 

जीवा आयुर्वेद में पेट साफ न होने या कब्ज की समस्या को केवल एक शारीरिक अवरोध नहीं, बल्कि 'मंदाग्नि' (धीमी पाचन अग्नि) और 'आम' (विषैले तत्व) के संचय के रूप में देखा जाता है। जीवा का दृष्टिकोण लक्षणों को दबाने के बजाय पाचन तंत्र को दोबारा सक्रिय करने पर केंद्रित है:

  • अग्नि दीपन (Igniting Digestive Fire): सबसे पहले उन उपचारों और जड़ी-बूटियों का उपयोग किया जाता है जो जठराग्नि को प्रबल करती हैं, ताकि भोजन का पाचन सही हो और नया 'आम' न बने।
  • आम शोधन (Detoxification): आंतों की दीवारों पर जमा पुरानी गंदगी और चिपचिपे विषाक्त तत्वों को बाहर निकालने के लिए विशेष औषधियों का चयन किया जाता है।
  • वात अनुलोमन (Regulating Vata): पेट साफ न होने का मुख्य कारण 'अपान वायु' का रुकना है। जीवा का उपचार इस वायु की दिशा को सही करता है, जिससे मल त्याग की प्रक्रिया प्राकृतिक और सहज हो जाती है।
  • कस्टमाइज्ड डाइट और लाइफस्टाइल: आपकी प्रकृति (Vata-Pitta-Kapha) के अनुसार एक व्यक्तिगत चार्ट तैयार किया जाता है, क्योंकि जो आहार एक व्यक्ति का पेट साफ करता है, वह दूसरे के लिए भारी हो सकता है।

पाचन को सुचारू बनाने वाली प्रमुख औषधियाँ

ये जड़ी-बूटियाँ न केवल पेट साफ करती हैं, बल्कि पाचन तंत्र को भीतर से मजबूत बनाकर गंदगी को जड़ से खत्म करती हैं।

  • त्रिफला: यह आयुर्वेद का सबसे प्रसिद्ध फॉर्मूला है जो आँतों की सफाई करता है और शरीर को पोषण भी देता है।
  • ईसबगोल: यह प्राकृतिक फाइबर का बेहतरीन स्रोत है, जो मल को नरम बनाकर उसे बाहर निकालने में मदद करता है।
  • हरीतकी: इसे 'जड़ी-बूटियों की माँ' कहा जाता है; यह पुरानी से पुरानी कब्ज को दूर करने और आँतों को सक्रिय करने में कारगर है।
  • गंधर्व हरीतकी: यह अरंडी के तेल (Castor oil) के साथ तैयार की गई हरीतकी है, जो जिद्दी कब्ज और पेट के भारीपन को बहुत सहजता से दूर करती है।

गहरी शुद्धि के लिए प्रभावी आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेदिक थेरेपी शरीर के उन हिस्सों से भी विषैले तत्वों (Toxins) को बाहर निकालती हैं जहाँ दवाइयाँ आसानी से नहीं पहुँच पातीं।

  • बस्ती (Basti): इसे 'अर्ध-चिकित्सा' कहा जाता है। यह औषधीय एनीमा के जरिए शरीर से बढ़े हुए 'वात' को निकालता है और आँतों की पूरी तरह सफाई करता है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): औषधीय तेलों से की जाने वाली यह मालिश नसों को शांत करती है और पेट की मांसपेशियों को सक्रिय कर पाचन में सुधार करती है।
  • स्वेदन (Swedan): हर्बल स्टीम बाथ के जरिए रोम छिद्रों को खोला जाता है, जिससे शरीर में जमा गंदगी पसीने के रास्ते बाहर निकलती है और शरीर हल्का महसूस करता है।

डाइट चार्ट (क्या खाएं और क्या न खाएं) 

क्या खाएं (Eat) क्या न खाएं (Avoid)
मूंग दाल व खिचड़ी तला-भुना भोजन
छाछ (भुना जीरा के साथ) मैदा व जंक फूड
लौकी, तोरई, कद्दू बहुत मसालेदार भोजन
अनार, केला, सेब खट्टे अचार व पिकल्स
नारियल पानी चाय-कॉफी अधिक मात्रा में
सीमित घी कोल्ड ड्रिंक्स/सोडा
उबली सब्जियाँ देर रात भारी भोजन

जीवा आयुर्वेद में पाचन असंतुलन की जांच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में केवल लक्षणों को नहीं, बल्कि पाचन, दोष और जीवनशैली के पूरे संतुलन को गहराई से समझा जाता है।

  • अग्नि विश्लेषण: पाचन शक्ति (मंद/तीव्र/विषम) की पहचान
  • ‘आम’ जांच: जीभ व मल से टॉक्सिन्स का आकलन
  • नाड़ी परीक्षा: वात-पित्त असंतुलन की जांच
  • लक्षण अध्ययन: जलन, गैस, खट्टी डकार का पैटर्न
  • मानसिक मूल्यांकन: तनाव और नींद का प्रभाव
  • लाइफस्टाइल ऑडिट: खाली पेट चाय व अनियमित दिनचर्या का विश्लेषण

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

सुधार होने में कितना समय लगता है?

  • शुरुआती स्टेज: 7–15 दिनों में जलन, खट्टी डकार और हल्के लक्षणों में साफ़ सुधार दिखने लगता है।
  • पुरानी (Chronic) समस्या: 4–8 हफ्तों में पाचन अग्नि और पित्त धीरे-धीरे संतुलित होते हैं, जिससे स्थायी राहत मिलती है।
  • अन्य कारक: सुधार की गति आपकी डाइट, नींद, तनाव स्तर और दिनचर्या के अनुशासन पर निर्भर करती है।

इलाज से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं?

सही और कस्टमाइज़्ड आयुर्वेदिक उपचार से आपको धीरे-धीरे ये सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं:

  • भोजन के बाद होने वाली जलन और भारीपन में धीरे-धीरे कमी
  • खट्टी डकार और गैस की समस्या में स्थिर सुधार
  • पेट की गर्मी और बेचैनी का शांत होना
  • पाचन सुधरने से भूख और digestion rhythm बेहतर होना
  • शरीर में हल्कापन, थकान और चिड़चिड़ापन कम होना

पेशेंट टेस्टिमोनियल 

मेरा नाम दक्ष मलिक है, मैं 23 वर्ष का हूँ और नोएडा का रहने वाला हूँ। कुछ समय पहले मुझे पेट से जुड़ी समस्या शुरू हुई, इंडाइजेशन, पेट में जलन और लंबे समय तक ठीक से मल न आना जैसी परेशानी होने लगी। मेरे कुछ टेस्ट भी हुए, जिनमें पता चला कि मेरे पेट में कुछ घाव (ulcers) हैं। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद मैंने टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान का कार्यक्रम देखा और उनसे प्रेरित होकर जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। मैंने डॉक्टर से फोन पर भी बात की और फिर वहाँ से दवाइयाँ व उपचार शुरू किया। धीरे-धीरे मेरी हालत में सुधार आने लगा और अब मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च और पारदर्शिता 

कई लोग सोचते हैं कि ऐसा कस्टमाइज्ड आयुर्वेद बहुत महंगा होगा। लेकिन आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है । जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें ।

  • जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है । (यह एक अनुमानित आधार है और अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।)
  • अधिक व्यापक दृष्टिकोण के लिए विशेष पैकेज प्रोटोकॉल भी हैं, जिन्हें शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
  • इन पैकेज में दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना और थेरेपी शामिल हैं । इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है ।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

निष्कर्ष

“पेट साफ न होना” केवल एक साधारण समस्या नहीं, बल्कि शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन का शुरुआती संकेत है। यह दर्शाता है कि पाचन अग्नि कमजोर हो रही है और ‘आम’ का जमाव बढ़ रहा है, जो आगे चलकर कई बीमारियों का कारण बन सकता है।

समय पर सही डाइट, लाइफस्टाइल सुधार और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण अपनाकर इस समस्या को जड़ से ठीक किया जा सकता है। क्योंकि स्वस्थ पाचन ही अच्छे स्वास्थ्य, ऊर्जा और संतुलित जीवन की नींव है।

FAQs

नहीं। आयुर्वेद के अनुसार, केवल रोज जाना काफी नहीं है। यदि मल त्याग के बाद आपको पेट में भारीपन महसूस होता है या ऐसा लगता है कि पेट पूरी तरह खाली नहीं हुआ है, तो इसे 'अपूर्ण निष्कासन' माना जाता है, जो पाचन की कमजोरी का संकेत है।

इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण 'मंदाग्नि' (धीमी पाचन शक्ति) और शरीर में पानी की कमी है। इसके अलावा, देर रात भारी भोजन करना भी सुबह की प्राकृतिक लय को बिगाड़ देता है।

नहीं। कब्ज (Constipation) में मल कई दिनों तक नहीं आता और बहुत सख्त हो जाता है। जबकि 'पेट साफ न होना' एक सूक्ष्म स्थिति है जहाँ मल तो रोज आता है, लेकिन चिपचिपा होने या वायु के अवरोध के कारण पूरी तरह बाहर नहीं निकलता।

त्रिफला एक बेहतरीन शोधक है, लेकिन यह कोई जादू की छड़ी नहीं है। स्थायी समाधान के लिए आपको अपनी डाइट, पानी पीने की मात्रा और सोने-जागने के समय में सुधार करना होगा।

आयुर्वेद में जीभ पाचन तंत्र का आईना है। जीभ पर सफेद परत का मतलब है कि आपके शरीर में 'आम' (Toxins) जमा हैं और आपका पेट अंदर से पूरी तरह साफ नहीं है।

जी हाँ। हमारा दिमाग और आंतें (Gut-Brain Axis) आपस में जुड़े हैं। तनाव के कारण आंतों की मांसपेशियों की गति (Peristalsis) धीमी पड़ जाती है, जिससे मल त्याग में कठिनाई होती है।

यह एक गलत धारणा है। चाय या कॉफी में मौजूद कैफीन आंतों को कृत्रिम रूप से उत्तेजित (Stimulate) करता है, जिससे कुछ समय के लिए प्रेशर महसूस हो सकता है, लेकिन लंबे समय में यह आंतों को सुखा देता है और कब्ज को और गंभीर बनाता है।

बस्ती एक आयुर्वेदिक एनीमा प्रक्रिया है जो बड़ी आंत में जमा पुराने और सूखे मल को बाहर निकालती है। यह बढ़े हुए 'वात' दोष को शांत करती है, जो कब्ज का मुख्य कारण है।

फाइबर जरूरी है, लेकिन एकमात्र कारण नहीं। आयुर्वेद के अनुसार, यदि आपकी पाचन अग्नि कमजोर है, तो बहुत अधिक कच्चा सलाद या फाइबर भी पेट में गैस और भारीपन पैदा कर सकता है। भोजन का सुपाच्य और गर्म होना भी उतना ही जरूरी है।

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