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आप symptom manage कर रहे हैं या circulation problem?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

पैरों में लगातार दर्द, भारीपन और त्वचा के नीचे नीली-बैंगनी रंग की उभरी हुई नसें... अगर आप भी रोज़ाना इस परेशानी का सामना कर रहे हैं, तो रुकिए और खुद से एक बहुत ही ज़रूरी सवाल पूछिए: "क्या मैं अपनी बीमारी को सच में ठीक कर रहा हूँ, या सिर्फ इसके लक्षणों (Symptoms) को दबा रहा हूँ?" आज के समय में वेरीकोज वेन्स (Varicose Veins) एक बहुत ही आम समस्या बन गई है। लोग दर्द और नसों की सूजन से बचने के लिए कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स पहनते हैं, रात को पैरों के नीचे तकिया लगाते हैं, और दर्द निवारक जेल मलते हैं। कुछ घंटों के लिए आराम ज़रूर मिल जाता है, लेकिन अगले दिन वह दर्द और भारीपन फिर से लौट आता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्योंकि आप सिर्फ 'सिम्पटम मैनेज' कर रहे हैं, जबकि असली बीमारी नसों के अंदर खराब हुए 'ब्लड सर्कुलेशन' में छिपी है। जब तक आप इस सर्कुलेशन प्रॉब्लम को जड़ से ठीक नहीं करेंगे, कोई भी क्रीम या मोज़े आपको हमेशा के लिए आज़ाद नहीं कर सकते। 

वेरीकोज वेन्स (Varicose Veins) असल में क्या हैं?

हमारे शरीर में खून को पैरों से वापस ऊपर दिल तक पहुँचाने का काम हमारी नसें (Veins) करती हैं। चूंकि इस खून को गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के विपरीत ऊपर की तरफ जाना होता है, इसलिए इन नसों के अंदर छोटे-छोटे 'वाल्व' (Valves) होते हैं। ये वाल्व खून को ऊपर तो जाने देते हैं, लेकिन नीचे वापस नहीं लौटने देते। जब हमारी खराब जीवनशैली या लगातार खड़े रहने के कारण ये वाल्व कमज़ोर होकर काम करना बंद कर देते हैं, तो खून ऊपर जाने के बजाय नीचे पैरों की नसों में ही जमा होने लगता है। खून के इसी लगातार जमाव के कारण नसें फूल जाती हैं, सूज जाती हैं और त्वचा के बाहर नीले या बैंगनी रंग के गुच्छों के रूप में उभर आती हैं। इसे ही वेरीकोज वेन्स कहा जाता है।

लक्षणों को दबाना (Symptom Management) क्या है?

ज़्यादातर लोग वेरीकोज वेन्स को सिर्फ एक बाहरी या त्वचा से जुड़ी समस्या मान लेते हैं। जब पैरों में भारीपन लगता है, तो वे दर्द की गोलियाँ खा लेते हैं; जब नसें सूजती हैं, तो बाहर से ठंडी क्रीम लगा लेते हैं। यह सब 'सिम्पटम मैनेजमेंट' कहलाता है। आप उस अलार्म को बंद कर रहे हैं जो शरीर आपको दर्द के रूप में दे रहा है। क्रीम या गोली खाने से न तो आपका ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है और न ही आपके खराब हो चुके वाल्व दोबारा ठीक होते हैं। आप सिर्फ अपने दिमाग को यह धोखा दे रहे हैं कि आपकी बीमारी ठीक हो रही है, जबकि अंदर ही अंदर खून का जमाव नसों को और ज़्यादा डैमेज कर रहा होता है।

सर्कुलेशन प्रॉब्लम (Circulation Problem): बीमारी की असली जड़

वेरीकोज वेन्स त्वचा की नहीं, बल्कि 'खराब सर्कुलेशन' की बीमारी है। जब वाल्व खराब होते हैं, तो नसों के अंदर गंदा और बिना ऑक्सीजन वाला खून (Deoxygenated blood) लंबे समय तक रुका रहता है। यह गंदा खून नसों की दीवारों को अंदर से कमज़ोर करता है और उनमें भयंकर सूजन पैदा करता है। जब तक आप इस गंदे खून को वहाँ से हटाकर सर्कुलेशन का रास्ता साफ नहीं करेंगे, तब तक बीमारी बढ़ती ही जाएगी। असली इलाज वह है जो आपकी नसों के अंदरूनी लचीलेपन को वापस लाए और खून के बहाव को प्राकृतिक रूप से ऊपर की तरफ धकेले।

कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स (Compression Stockings) का सच: इलाज या सिर्फ सहारा?

डॉक्टर अक्सर वेरीकोज वेन्स के मरीज़ों को तंग मोज़े (Compression Stockings) पहनने की सलाह देते हैं। ये स्टॉकिंग्स बाहर से नसों को दबाकर रखती हैं ताकि खून नीचे जमा न हो और ऊपर की तरफ जाए। यह सूजन कम करने का एक बेहतरीन 'सहारा' ज़रूर है, लेकिन यह कोई 'इलाज' नहीं है। जैसे ही आप स्टॉकिंग्स उतारते हैं, खून फिर से नीचे की तरफ भागने लगता है। इसका मतलब है कि आपकी नसें अब भी अंदर से कमज़ोर हैं। स्टॉकिंग्स पर निर्भर रहने का मतलब है कि आप उम्र भर के लिए अपनी बीमारी के गुलाम बन गए हैं।

दर्द निवारक जेल और दवाइयाँ: एक खतरनाक धोखा

कई लोग पैरों की सूजन और जलन को कम करने के लिए पेनकिलर्स (Painkillers) या बाजार में मिलने वाले महंगे जेल का इस्तेमाल करते हैं। ये जेल त्वचा को कुछ देर के लिए ठंडा कर देते हैं, जिससे जलन महसूस नहीं होती। लेकिन यह सिर्फ एक भ्रम है। नसों के अंदर जो गंदा खून जमा है और जो वाल्व खराब हो चुके हैं, उन पर इन क्रीम्स का कोई असर नहीं होता। लंबे समय तक सिर्फ इन पर निर्भर रहने से बीमारी इतनी बढ़ जाती है कि नसें फटने की नौबत आ जाती है।

लगातार खड़े रहना या बैठे रहना: नसों का सबसे बड़ा दुश्मन

आजकल हमारी दिनचर्या ऐसी हो गई है कि हमें घंटों तक एक ही स्थिति में रहना पड़ता है। जो लोग पेशे से टीचर, पुलिस वाले, गार्ड या शेफ हैं, उन्हें घंटों खड़ा रहना पड़ता है। वहीं, कॉर्पोरेट जॉब्स में लोग घंटों कुर्सी पर बैठे रहते हैं। दोनों ही स्थितियों में हमारे पैरों की मांसपेशीयाँ (Muscles) हरकत नहीं करतीं। पैरों की मांसपेशियाँ एक 'पंप' की तरह काम करती हैं जो खून को ऊपर धकेलती हैं। जब ये मांसपेशियाँ काम नहीं करतीं, तो खून गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे पैरों में ही जमा होने लगता है, जो वेरीकोज वेन्स को जन्म देता है।

कब्ज (Constipation) और भारी वजन: नसों पर पड़ने वाला अदृश्य दबाव

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आपका पेट आपके पैरों की नसों को सीधे प्रभावित करता है। अगर आपका पेट साफ नहीं रहता और आपको कब्ज है, तो मल त्यागते समय आपको ज़ोर लगाना पड़ता है। यह ज़ोर आपके पेट का दबाव बहुत ज़्यादा बढ़ा देता है, जो सीधा पैरों से ऊपर आ रहे खून का रास्ता रोक देता है। इसी तरह, शरीर का अतिरिक्त वजन या मोटापा भी पैरों की नसों पर बहुत भारी दबाव डालता है, जिससे सर्कुलेशन पूरी तरह बिगड़ जाता है और वाल्व टूट जाते हैं।

गलत खान-पान: खून का गाढ़ा होना और नसों का कुपोषण

हम जो खाते हैं, वही हमारे खून का निर्माण करता है। ज़्यादा जंक फूड, बहुत ज़्यादा नमक (जो शरीर में पानी रोककर सूजन बढ़ाता है), और रिफाइंड शुगर से भरा आहार हमारे खून को अशुद्ध और गाढ़ा बना देता है। गाढ़े खून को ऊपर की तरफ धकेलना नसों के लिए बहुत मुश्किल होता है। इसके अलावा, विटामिन सी और फाइबर की कमी से हमारी नसों की दीवारें अपना लचीलापन (Elasticity) खो देती हैं, जिससे वे आसानी से फूल जाती हैं और वेरीकोज वेन्स बन जाती हैं।

इसे नजरअंदाज करने की कीमत: अल्सर और गंभीर जटिलताएँ

अगर आप अब भी वेरीकोज वेन्स को सिर्फ खूबसूरती बिगाड़ने वाली बीमारी मानकर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, तो आप बहुत बड़े खतरे की तरफ बढ़ रहे हैं। जब गंदा खून सालों तक एक ही जगह रुका रहता है, तो वह त्वचा को अंदर से गलाने लगता है। इसके कारण पैरों में भयंकर खुजली होती है, त्वचा काली पड़ जाती है, और अंततः वहाँ कभी न भरने वाले घाव बन जाते हैं, जिन्हें 'वेनस अल्सर' (Venous Ulcers) कहते हैं। कई बार जमे हुए खून में थक्के (Blood Clots) बन जाते हैं, जो अगर टूटकर फेफड़ों तक पहुँच जाएँ, तो जानलेवा भी हो सकते हैं।

आयुर्वेद वेरीकोज वेन्स को कैसे समझता है? (सिराग्रंथि)

आधुनिक विज्ञान जिसे सर्कुलेशन की समस्या कहता है, आयुर्वेद ने हज़ारों साल पहले उसे बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से समझा था। आयुर्वेद में वेरीकोज वेन्स को 'सिराग्रंथि' (Siragranthi) कहा जाता है। यह मुख्य रूप से शरीर में 'वात दोष' (Vata Dosha) के भयंकर असंतुलन और खून (रक्त धातु) के अशुद्ध होने के कारण पैदा होने वाली बीमारी है। वात का काम शरीर में हर चीज़ को गति (Movement) देना है। जब वात बिगड़ता है, तो वह नसों (सिराओं) में खून के प्रवाह को रोक देता है, जिससे अशुद्ध खून एक जगह जमा होकर ग्रंथि (गाँठ या गुच्छा) बना लेता है। आयुर्वेद का लक्ष्य सिर्फ इस गाँठ को काटना नहीं, बल्कि वात और रक्त के प्रवाह को सही करना है।

नसों को मजबूत बनाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें नसों के सर्कुलेशन को सुधारने और गंदे खून को साफ करने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं, जो बिना कोई सुस्ती लाए बीमारी को जड़ से काटती हैं।

  • मंजिष्ठा: यह आयुर्वेद की सबसे बेहतरीन ब्लड-प्यूरिफायर (रक्त शोधक) जड़ी-बूटी है। यह नसों में जमे गंदे खून को साफ करती है और त्वचा के कालेपन को दूर करती है।
  • अर्जुन: यह सिर्फ दिल के लिए नहीं, बल्कि पूरे शरीर की रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) की दीवारों को भयंकर मज़बूती देने के लिए जानी जाती है।
  • गुग्गुलु: यह शरीर में कहीं भी आई सूजन को प्राकृतिक रूप से खींच लेता है और नसों के गुच्छों को ढीला करने में बहुत मदद करता है।
  • सारिवा: यह नसों की जलन और खुजली को तुरंत शांत करती है और खून को ठंडा रखती है।

आयुर्वेदिक थेरेपी वेरीकोज वेन्स में कैसे काम करती है?

जब दवाइयाँ खून के भारी जमाव को नहीं हटा पातीं, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी सीधे उस गंदे खून पर हमला करती है।

  • रक्तमोक्षण: यह वेरीकोज वेन्स का सबसे जादुई इलाज है। इसमें प्रभावित नसों पर विशेष प्रकार की जोंक (Leeches) लगाई जाती हैं, जो सिर्फ गंदे और अशुद्ध खून को चूसकर बाहर निकाल देती हैं। इससे नसों का दबाव तुरंत कम हो जाता है और ताज़ा खून दौड़ने लगता है।
  • अभ्यंग: वेरीकोज वेन्स में बहुत सावधानी से नीचे से ऊपर (दिल की तरफ) की दिशा में औषधीय तेलों से हल्की मालिश की जाती है, जो रुके हुए खून को वापस ऊपर धकेलने में बहुत मदद करती है।

सर्कुलेशन सुधारने के लिए कैसा हो आपका डाइट प्लान?

आप जो खाते हैं, वही आपके खून को या तो बीमारी बनाता है या ताक़त। वेरीकोज वेन्स के सर्कुलेशन को ठीक करने के लिए एक वात-शामक और रक्त-शोधक डाइट लेना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

श्रेणी क्या अपनाएँ (अनुशंसित) किनसे परहेज़ करें (वर्जित)
आहार का सिद्धांत हल्का, सुपाच्य व फाइबर युक्त भोजन (जैसे दलिया, ओट्स) जो गैस व कब्ज न बनाए भारी, तैलीय व कब्ज बढ़ाने वाला भोजन
पोषक तत्व विटामिन C युक्त चीज़ें (आंवला, संतरा): नसों की दीवारों को मज़बूत बनाती हैं फास्ट फूड और अत्यधिक नमक: सूजन को बढ़ाते हैं
पाचन संतुलन त्रिफला का नियमित सेवन: पेट को साफ रखता है बासी और भारी खाना: खून को गाढ़ा बनाता है
दैनिक पेय गुनगुना पानी पर्याप्त मात्रा में: खून को पतला रखकर सर्कुलेशन सुधारता है कम पानी पीना या ठंडे पेय पदार्थ
जीवनशैली सहयोग हर 45 मिनट में चलना-फिरना: पिंडलियों की मांसपेशियों को सक्रिय रखता है लंबे समय तक एक ही स्थिति में खड़े या बैठे रहना

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी कैंची नहीं है जो एक मिनट में सूजी हुई नस को काटकर बाहर निकाल दे। आपके बिगड़े हुए सर्कुलेशन को पूरी तरह रिसेट होने और वाल्व को नई ताक़त मिलने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; पैरों का भारीपन, जलन और भयंकर खिंचाव काफी कम होने लगेंगे।
  • 1 से 3 महीने तक: अशुद्ध खून साफ होने से नसों का नीला और कालापन कम होने लगेगा। खुजली और सूजन में बहुत ज़्यादा आराम मिलेगा।
  • 3 से 6 महीने तक: आपकी नसें अंदर से पूरी तरह साफ और ताक़तवर बन जाएँगी। सूजी हुई नसें धीरे-धीरे सिकुड़कर अपनी सामान्य अवस्था में आने लगेंगी और आप बिना स्टॉकिंग्स के भी आराम से चल सकेंगे।

मरीज़़ों के अनुभव

नमस्कार, मेरा नाम सुरजीत राय है। मेरी उम्र 56 वर्ष है और मैं छत्तीसगढ़ से हूँ। मुझे पिछले 2 वर्षों से घुटने के पीछे तेज दर्द और नसों से जुड़ी समस्या थी। कई दवाइयाँ लेने के बावजूद मुझे कोई राहत नहीं मिली।

फिर मैंने जीवा आयुर्वेद से उपचार शुरू किया। डॉक्टर के मार्गदर्शन में नियमित दवाइयाँ और एक्सरसाइज़ करने से मुझे लगभग 5 महीनों में पूरी तरह राहत मिल गई। अब मैं स्वस्थ हूँ और मेरा परिवार भी बहुत खुश है।

मैं जीवा आयुर्वेद और डॉक्टरों का दिल से धन्यवाद करती हूँ और सभी को आयुर्वेद अपनाने की सलाह देती हूँ।

सुरजीत राय

छत्तीसगढ़

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

वेरीकोज वेन्स के इस दर्दनाक रूप से बचने के लिए हम अक्सर जल्दबाज़ी में कदम उठाते हैं और तुरंत राहत ढूँढते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आप अपने शरीर के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, क्योंकि सिम्पटम मैनेज करने और आयुर्वेद की गहराई को अपनाने में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य स्टॉकिंग्स, क्रीम या लेज़र सर्जरी द्वारा सूजी हुई नस को हटाने पर केंद्रित खराब सर्कुलेशन और ‘रक्त दृष्टि’ को सुधारकर उसी नस को स्वस्थ बनाने पर फोकस
शरीर को देखने का नज़रिया नस को खराब पाइप मानकर बंद या निकाल देना शरीर को स्वयं-उपचार प्रणाली मानकर रक्तमोक्षण से प्राकृतिक हीलिंग को बढ़ावा
डाइट और जीवनशैली की भूमिका कब्ज़ और खान-पान पर सीमित ध्यान वात-शामक डाइट, फाइबर और संतुलित दिनचर्या को उपचार का केंद्रीय हिस्सा
लंबा असर सर्जरी के बाद भी समस्या दूसरी नसों में लौट सकती है जड़ी-बूटियों से खून साफ कर और वाल्व्स को मजबूत बनाकर स्थायी समाधान की दिशा में कार्य

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags of Varicose Veins)

वेरीकोज वेन्स को महज़ त्वचा की बदसूरती मानकर घर पर क्रीम लगाकर ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कई बार यह शरीर का एक बहुत ही गंभीर संकेत होता है। अगर आपको पैरों में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बहुत ज़रूरी है:

  • अगर सूजी हुई नीली नस अचानक बहुत ज़्यादा लाल और गर्म हो जाए (यह नसों में संक्रमण या Phlebitis का संकेत हो सकता है)।
  • अगर किसी उभरी हुई नस से अचानक खून बहने लगे (Bleeding) जो आसानी से रुक न रहा हो।
  • अगर पैरों के निचले हिस्से या टखनों (Ankles) के पास त्वचा काली पड़ जाए और वहाँ कोई घाव (Ulcer) बन जाए जो भर नहीं रहा हो।
  • अगर पैरों में अचानक से बहुत ज़्यादा दर्दनाक और भयंकर सूजन आ जाए (यह डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी DVT नामक जानलेवा क्लॉट का संकेत हो सकता है)।
  • अगर पैर लगातार सुन्न रहने लगें और चलने पर पिंडलियों में असहनीय ऐंठन (Cramps) होने लगे।

निष्कर्ष

वेरीकोज वेन्स (Varicose Veins) सिर्फ त्वचा पर दिखने वाली कुछ नीली नसें नहीं हैं, यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आपके शरीर का ब्लड सर्कुलेशन एक गंभीर खतरे में है। लक्षणों को दबाने के लिए सिर्फ दर्द निवारक दवाइयाँ खाना या मोज़े (Stockings) पहन लेना समस्या का कोई पक्का समाधान नहीं है। जब तक खून को पैरों से वापस ऊपर धकेलने वाले वाल्व कमज़ोर रहेंगे और गंदा खून नसों में जमा रहेगा, तब तक यह बीमारी अंदर ही अंदर आपकी नसों को गलाती रहेगी। आयुर्वेद आपको इस सर्कुलेशन प्रॉब्लम को जड़ से मिटाने का एक स्थायी और प्राकृतिक समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, जड़ी-बूटियों, पंचकर्म की रक्तमोक्षण थेरेपी और सही जीवनशैली को अपनाकर आप इस बीमारी को न केवल मात दे सकते हैं, बल्कि भविष्य में होने वाली सर्जरी और घावों (Ulcers) से भी खुद को बचा सकते हैं। अपने शरीर के संकेतों को सुनें, सिम्पटम मैनेज करने का भ्रम छोड़ें, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपनी ज़िंदगी को स्वस्थ और हल्का बनाएँ।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

बिल्कुल नहीं। भले ही यह बाहर से त्वचा पर नीली और उभरी हुई नसों के रूप में दिखती है, लेकिन अंदर से यह ब्लड सर्कुलेशन रुकने और नसों के कमज़ोर होने की एक गंभीर मेडिकल समस्या है जिसे समय पर ठीक करना ज़रूरी है।

नहीं, स्टॉकिंग्स सिर्फ 'सिम्पटम मैनेजमेंट' का हिस्सा हैं। ये बाहर से दबाव डालकर खून को नीचे जमा होने से रोकते हैं जिससे दर्द और सूजन में आराम मिलता है, लेकिन ये कमज़ोर वाल्व्स या अशुद्ध खून की असली बीमारी को जड़ से ठीक नहीं करते।

जब नसों के वाल्व खराब हो जाते हैं, तो खून गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस नीचे पैरों में ही जमा होने लगता है। अशुद्ध खून का यह भारी जमाव (Pooling of blood) ही आपके पैरों को इतना थका हुआ और भारी महसूस कराता है।

जी हाँ, बहुत गहरा संबंध है। कब्ज के कारण जब आप मल त्यागते समय ज़ोर लगाते हैं, तो पेट (Abdomen) का दबाव बहुत बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ दबाव पैरों से ऊपर आ रहे खून का रास्ता रोक देता है, जिससे पैरों की नसों पर भार पड़ता है और वे फूल जाती हैं।

बिल्कुल! आयुर्वेद में इसे 'सिराग्रंथि' कहा गया है। जड़ी-बूटियों (जैसे मंजिष्ठा, अर्जुन) और रक्तमोक्षण (Leech Therapy) जैसी पंचकर्म प्रक्रियाओं के ज़रिए आयुर्वेद खराब खून को बाहर निकालकर और सर्कुलेशन को सुधारकर इसे प्राकृतिक रूप से ठीक करता है।

हल्की सैर (Walking), साइकिल चलाना (Cycling) और तैराकी (Swimming) सबसे बेहतरीन व्यायाम हैं। ये आपके पैरों की पिंडलियों (Calf muscles) को पंप करते हैं, जिससे खून आसानी से ऊपर की तरफ धकेला जाता है। भारी वज़न उठाने वाले व्यायाम से बचना चाहिए।

मालिश फायदेमंद हो सकती है, लेकिन इसे बहुत ही हल्के हाथों से और हमेशा 'नीचे से ऊपर' (पंजों से दिल की तरफ) की दिशा में करना चाहिए। ज़ोर से रगड़ने या गलत दिशा में मालिश करने से कमज़ोर नसें फट सकती हैं।

आधुनिक विज्ञान अक्सर लेज़र या सर्जरी की सलाह देता है, लेकिन यह अंतिम विकल्प होना चाहिए। ज़्यादातर मामलों में, अगर सही समय पर आयुर्वेद, सही डाइट और जीवनशैली को अपना लिया जाए, तो बिना सर्जरी के ही सर्कुलेशन को दोबारा स्वस्थ किया जा सकता है।

सोते समय पैरों को दिल के स्तर से थोड़ा ऊपर रखने (Elevate करने) से गुरुत्वाकर्षण की मदद मिलती है। इससे दिन भर पैरों में जमा हुआ गंदा खून आसानी से वापस दिल की तरफ लौट पाता है, जिससे सुबह पैरों की सूजन और दर्द में भारी आराम मिलता है।

अगर इसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया जाए, तो नसों में रुका हुआ खून त्वचा को गलाने लगता है, जिससे वहाँ कभी न भरने वाले गहरे घाव (Venous Ulcers) बन सकते हैं। साथ ही, नसों में जानलेवा ब्लड क्लॉट्स बनने का खतरा भी बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है।

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