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46 साल की Meena को numbness महसूस हुई — nerve damage कब शुरू होता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 17 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 17 Apr, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5008

46 साल की Meena, जो एक गृहिणी हैं, एक सुबह उठीं तो उन्हें पैर में अजीब सा सुन्नपन महसूस हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे नसों में अचानक sensation कम हो गई हो या पैर “सुन्न” पड़ गया हो। शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य थकान या गलत सोने की स्थिति समझकर नजरअंदाज कर दिया। लेकिन कुछ ही दिनों में यह सुन्नपन बढ़ने लगा और धीरे-धीरे कमर से लेकर पैर तक फैलने लगा। साथ ही हल्का दर्द और खिंचाव भी महसूस होने लगा, जिससे उनकी चिंता बढ़ने लगी। यही वह स्थिति थी जो धीरे-धीरे Sciatica की ओर इशारा कर रही थी। इसके बाद Meena ने आगे बढ़कर जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया, जहाँ उनकी पूरी स्थिति को विस्तार से समझा गया और नसों के दबाव, वात असंतुलन और लाइफस्टाइल पैटर्न के आधार पर उनका आकलन किया गया।

बीमारी की शुरुआत: छोटे संकेत जिन्हें नजरअंदाज किया गया

शरीर किसी भी समस्या को अचानक गंभीर रूप में नहीं दिखाता, वह पहले से ही छोटे-छोटे संकेत देने लगता है जिन्हें अक्सर हम सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। Meena के केस में भी शुरुआत में हल्का दर्द, झनझनाहट और stiffness जैसे लक्षण महसूस होते रहे, लेकिन उन्होंने इसे सामान्य थकान मान लिया। समय के साथ यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ता गया और हिप से पैर तक फैलने लगा, जिससे उनकी परेशानी और स्पष्ट होने लगी।

Sciatica और numbness का connection क्या है?

Numbness sciatica का एक बहुत आम लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला लक्षण है। जब sciatic nerve पर दबाव बढ़ जाता है, तो नसों के जरिए जाने वाले संकेत ठीक से मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाते। इस कारण पैर, जांघ या कभी-कभी पूरा निचला हिस्सा सुन्न या भारी महसूस होने लगता है। कई बार इसके साथ झनझनाहट, चुभन या कमजोरी भी महसूस होती है। यह संकेत बताता है कि नस पर दबाव लंबे समय से बना हुआ है और समस्या सिर्फ सामान्य दर्द तक सीमित नहीं है।

Sciatica क्या होता है और nerve पर क्या असर पड़ता है?

Sciatica क्या है?

Sciatica कोई अलग बीमारी नहीं है, बल्कि नस में होने वाली irritation या दबाव की स्थिति है। यह sciatic nerve को प्रभावित करता है, जो कमर से शुरू होकर कूल्हे और पैर तक जाती है। जब इस नस पर दबाव पड़ता है, तो दर्द, झनझनाहट और सुन्नपन शुरू हो जाते हैं।

Nerve पर दबाव कैसे बनता है?

Nerve compression धीरे-धीरे विकसित होती है। रीढ़ की हड्डी की disc कमजोर होने लगती है, मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। धीरे-धीरे nerve के रास्ते में दबाव बढ़ता जाता है, और यहीं से असली समस्या शुरू होती है।

सुन्नपन (numbness) एक शुरुआती संकेत कैसे है?

सुन्नपन शरीर का एक बहुत ही शुरुआती और सूक्ष्म संकेत होता है। यह बताता है कि nerve के signals ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। अगर इसे समय पर नजरअंदाज किया जाए, तो यह आगे चलकर तेज दर्द, कमजोरी और चलने-फिरने में दिक्कत में बदल सकता है।

30–40 की उम्र में Sciatica क्यों बढ़ता है?

इस उम्र में Sciatica बढ़ने का सबसे बड़ा कारण बदलती जीवनशैली होती है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर काम करना, शारीरिक गतिविधि की कमी और लगातार तनाव रीढ़ की हड्डी पर दबाव डालते हैं। धीरे-धीरे शरीर की लचीलापन कम होने लगती है और मांसपेशियां कमजोर व सख्त हो जाती हैं। इसके साथ ही नसों की सहनशक्ति भी घटने लगती है, जिससे छोटी सी गड़बड़ी भी दर्द, झनझनाहट या सुन्नपन के रूप में सामने आने लगती है। यही वजह है कि इस उम्र में Sciatica के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं।

सिर्फ दर्द को कंट्रोल करने तक सीमित एलोपैथी अप्रोच

एलोपैथी में Sciatica या nerve pain का इलाज मुख्य रूप से दर्द और सूजन को कम करने पर किया जाता है। दवाइयों और पेनकिलर्स की मदद से दर्द को कुछ समय के लिए कम किया जाता है, जिससे मरीज को तुरंत राहत मिलती है और चलना-फिरना आसान हो जाता है।

लेकिन यह तरीका ज्यादातर सिर्फ “कंट्रोल” तक ही सीमित रहता है। दर्द की असली वजह जैसे गलत posture, मांसपेशियों की कमजोरी, कम physical activity और spine पर लगातार दबाव को ठीक करने पर कम ध्यान दिया जाता है। इसी कारण कई लोगों में दर्द बार-बार वापस आ जाता है और उन्हें लंबे समय तक दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है।

जीवा आयुर्वेद के साथ Kavita का पहला संपर्क

लगातार पैर में झनझनाहट, सुन्नपन और हिप से पैर तक बढ़ते दर्द के कारण Kavita काफी परेशान रहने लगी थीं। एलोपैथी से उन्हें सिर्फ अस्थायी राहत मिल रही थी, लेकिन समस्या बार-बार वापस आ रही थी। इसी वजह से उन्होंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क करने का फैसला किया। शुरुआत में उन्हें भी संदेह था कि क्या आयुर्वेद उनकी nerve-related समस्या में मदद कर पाएगा, लेकिन जब लक्षण रोज़मर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो उन्होंने आगे कदम बढ़ाया।

उन्होंने 0129 4264323 पर कॉल करके घर बैठे वीडियो कंसल्टेशन लिया। जीवा के डॉक्टरों ने उनकी पूरी स्थिति को ध्यान से समझा, उनके symptoms, lifestyle और दर्द के पैटर्न को विस्तार से जाना। इसी आधार पर उनके केस की गहरी समझ बनी और सही इलाज की दिशा तय की गई।

आयुर्वेद Sciatica को कैसे समझता है?

आयुर्वेद में Sciatica को सिर्फ नस का दर्द नहीं माना जाता, बल्कि इसे शरीर के अंदर हुए गहरे असंतुलन का परिणाम समझा जाता है, खासकर वात दोष के बढ़ने से जुड़ा हुआ। जब वात बढ़ता है तो शरीर में सूखापन, जकड़न, कमजोरी और तेज दर्द जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं, जो नसों और मांसपेशियों को प्रभावित करती हैं। इसके साथ ही कमजोर पाचन (अग्नि) से ‘आम’ (टॉक्सिन्स) बनने लगते हैं, जो शरीर के सूक्ष्म मार्गों में रुकावट पैदा करते हैं। इससे नसों का पोषण और रक्त प्रवाह प्रभावित होता है, और धीरे-धीरे हिप से पैर तक दर्द, झनझनाहट और stiffness बढ़ने लगती है।

जिवा आयुर्वेद में Kavita की जांच कैसे की गई?

आयुर्वेद में Sciatica या nerve pain को सिर्फ लक्षण के आधार पर नहीं देखा जाता, बल्कि पूरे शरीर में चल रहे असंतुलन को समझा जाता है। Kavita के केस में जीवा आयुर्वेद में दर्द के पैटर्न के साथ-साथ शरीर की अंदरूनी स्थिति का गहराई से आकलन किया गया।

  • नाड़ी परीक्षण के जरिए वात असंतुलन और नसों पर दबाव की स्थिति को समझा गया
  • हिप से पैर तक दर्द के पैटर्न, उसकी तीव्रता और ट्रिगर फैक्टर्स का विश्लेषण किया गया
  • मांसपेशियों की जकड़न और रीढ़ की सपोर्ट सिस्टम की कमजोरी को जांचा गया
  • बैठने, चलने और रोज़मर्रा की posture habits का विस्तार से मूल्यांकन किया गया
  • शारीरिक गतिविधि की कमी और lifestyle imbalance को समझा गया
  • तनाव और नींद की गुणवत्ता का दर्द पर प्रभाव आंका गया
  • वात दोष के बढ़े हुए स्तर और नसों पर उसके असर की पहचान की गई

इन सभी आधारों पर Kavita के लिए एक व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की गई, जिसका उद्देश्य सिर्फ दर्द कम करना नहीं बल्कि जड़ कारण को ठीक करना था।

जीवा आयुर्वेद का Kavita के लिए उपचार दृष्टिकोण (Treatment Approach)

Kavita के केस में nerve pain को केवल दर्द की समस्या नहीं माना गया, बल्कि इसे शरीर के अंदर गहरे असंतुलन का संकेत समझा गया। आयुर्वेद का उद्देश्य यहां लक्षणों को दबाना नहीं, बल्कि असली कारण को ठीक करके शरीर को संतुलन में लाना था।

  • वात संतुलन: Sciatica और nerve pain में वात दोष का बढ़ना मुख्य कारण माना गया। बढ़ा हुआ वात नसों में सूखापन और खिंचाव पैदा करता है, जिससे दर्द बढ़ता है। इसे संतुलित करने पर ध्यान दिया गया ताकि धीरे-धीरे दर्द और झनझनाहट में राहत मिले।
  • नसों और मांसपेशियों का पोषण: कमजोर मांसपेशियाँ और नसों पर लगातार दबाव दर्द को बढ़ाते हैं। शरीर को रिलैक्स कर और पोषण बढ़ाकर nerve pressure को कम करने पर काम किया गया, जिससे दर्द का फैलाव घटने लगा।
  • रक्त संचार और जकड़न में सुधार: लंबे समय तक बैठने और कम गतिविधि से शरीर में जकड़न बढ़ती है। इसे सुधारकर रक्त संचार बेहतर किया गया ताकि नसों पर दबाव कम हो और movement आसान हो सके।
  • लाइफस्टाइल संतुलन: गलत posture, कम शारीरिक गतिविधि और तनाव को दर्द का बड़ा कारण माना गया। हल्की एक्सरसाइज, सही दिनचर्या और संतुलित जीवनशैली पर जोर देकर शरीर की रिकवरी को सपोर्ट किया गया।

क्या आयुर्वेदिक दवाइयां वाकई इतनी सुरक्षित हैं?

Kavita के मन में भी शुरुआत में यही डर था कि कहीं आयुर्वेदिक इलाज से उनका बार-बार लौटने वाला दर्द और न बढ़ जाए, क्योंकि वह लंबे समय से Sciatica जैसे लक्षणों से परेशान थीं और पहले कई दवाइयों से सिर्फ अस्थायी राहत मिली थी। उन्हें लगता था कि कहीं हर्बल दवाओं से कमजोरी या कोई साइड इफेक्ट न हो जाए।

लेकिन जब जीवा आयुर्वेद के डॉक्टरों ने उनकी पूरी स्थिति समझकर विस्तार से बताया कि आयुर्वेदिक दवाइयां प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं, तो उनका भरोसा धीरे-धीरे बढ़ा। उन्हें समझाया गया कि सही तरीके से दिया गया आयुर्वेदिक उपचार शरीर में वात संतुलन सुधारता है, नसों की जकड़न कम करता है और दर्द के मूल कारण पर काम करता है, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।

Kavita के उपचार में दी गई आयुर्वेदिक थेरेपीज़

Kavita के केस में Sciatica और नसों की जकड़न को कम करने के लिए दवाइयों के साथ कुछ खास आयुर्वेदिक थेरेपीज़ दी गईं, जिनका उद्देश्य दर्द को शांत करना, नसों का दबाव कम करना और शरीर को भीतर से रिलैक्स करना था।

  • अभ्यंग (तेल मालिश): कमर, हिप और पैरों पर औषधीय तेल से मालिश की गई, जिससे जकड़न कम हुई, नसों को आराम मिला और दर्द धीरे-धीरे घटने लगा।
  • कटि बस्ती: कमर के निचले हिस्से में गर्म तेल को एक निश्चित स्थान पर रोका गया, जिससे रीढ़ और नसों को गहरी राहत मिली और दर्द की तीव्रता कम हुई।
  • स्वेदन (भाप चिकित्सा): हल्की हर्बल भाप से शरीर की जकड़न और अकड़न कम की गई, जिससे मूवमेंट आसान हुआ और stiffness में राहत मिली।

Kavita की डाइट में छोटे बदलाव, जिन्होंने किया बड़ा असर

Kavita के केस में बार-बार लौटने वाले Sciatica दर्द को कम करने के लिए उनकी रोज़मर्रा की आदतों और खान-पान में कुछ जरूरी बदलाव किए गए, ताकि शरीर में सूजन कम हो और वात संतुलन बेहतर हो सके।

  • भारी और तली चीज़ों से परहेज: मैदा, तला हुआ खाना और जंक फूड कम करने की सलाह दी गई, क्योंकि ये पाचन को धीमा करके शरीर में जकड़न और दर्द को बढ़ा सकते हैं।
  • हल्का और गर्म भोजन: उन्हें ऐसा खाना लेने को कहा गया जो आसानी से पच जाए और शरीर को ठंडक न दे, जिससे नसों की जकड़न कम हो और आराम मिले।
  • पाचन को मजबूत रखना: पेट और पाचन को ठीक रखना सबसे जरूरी बताया गया, ताकि शरीर में टॉक्सिन न बनें और नसों पर दबाव न बढ़े।

Kavita को उपचार से क्या लाभ मिला?

Sciatica और नसों के दर्द को आयुर्वेद में सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि शरीर के असंतुलन का संकेत माना जाता है। Kavita के केस में भी लक्ष्य जड़ कारण को ठीक करना था, जिससे धीरे-धीरे स्थायी सुधार देखने को मिला।

  • दर्द में कमी: हिप से पैर तक जाने वाला दर्द धीरे-धीरे कम हुआ और रोज़मर्रा की गतिविधियाँ आसान होने लगीं।
  • जकड़न में राहत: शरीर की stiffness कम हुई और चलने-फिरने में आराम मिलने लगा।
  • मूवमेंट में सुधार: लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने में होने वाली परेशानी कम हुई।
  • ऊर्जा में बढ़ोतरी: शरीर में हल्कापन महसूस होने लगा और थकान पहले से कम हुई।
  • नींद और आराम में सुधार: दर्द घटने से नींद बेहतर हुई और शरीर को पूरा आराम मिलने लगा।

रिकवरी का सफर: कैसे जीवा ने धीरे-धीरे Kavita को राहत दी?

आयुर्वेद कोई ऐसा तुरंत असर करने वाला तरीका नहीं है जो एक दिन में दर्द खत्म कर दे। इसमें शरीर के अंदर के असंतुलन को धीरे-धीरे ठीक किया जाता है, ताकि नसों और मांसपेशियों को सही तरह से रिकवर होने का समय मिल सके। Kavita के केस में भी सुधार धीरे-धीरे शुरू हुआ लेकिन असर लंबे समय तक बना रहा।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: Kavita के दर्द की तीव्रता कम होने लगी। हिप से पैर तक फैलने वाली झनझनाहट और जकड़न में हल्की राहत महसूस हुई और चलना थोड़ा आसान हुआ।
  • 1 से 3 महीने तक: लंबे समय तक बैठने या चलने पर होने वाला दर्द काफी हद तक कम हुआ। शरीर में हल्कापन आया और मूवमेंट पहले से बेहतर होने लगा।
  • 3 से 6 महीने तक: नसों पर दबाव काफी कम हुआ और दर्द बार-बार लौटने की समस्या घट गई। रोज़मर्रा के काम पहले से ज्यादा आराम से होने लगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च और पारदर्शिता 

कई लोग सोचते हैं कि ऐसा कस्टमाइज्ड आयुर्वेद बहुत महंगा होगा। लेकिन आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है । जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें ।

  • जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है । (यह एक अनुमानित आधार है और अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।)
  • अधिक व्यापक दृष्टिकोण के लिए विशेष पैकेज प्रोटोकॉल भी हैं, जिन्हें शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
  • इन पैकेज में दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना और थेरेपी शामिल हैं । इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है ।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

समय पर जांच क्यों जरूरी है?

समय पर जांच कराना बेहद जरूरी है, क्योंकि यही किसी भी समस्या को शुरुआती स्टेज में पहचानने का सबसे आसान तरीका है। शरीर अक्सर पहले से ही छोटे संकेत देने लगता है, जैसे हल्का दर्द, झनझनाहट या stiffness, लेकिन हम उन्हें सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। Sciatica जैसे मामलों में देरी करने से नसों पर दबाव बढ़ता जाता है और दर्द धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए समय पर जांच और सही पहचान ही आगे बढ़ने वाली परेशानी को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।

निष्कर्ष

बार-बार लौटने वाला Sciatica दर्द सिर्फ एक सामान्य दर्द नहीं होता, बल्कि यह शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन और नसों पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है। ऐसे संकेतों को नजरअंदाज करना समस्या को और गहरा बना सकता है। अगर समय रहते कारण को समझकर सही दिशा में कदम उठाए जाएं और जीवनशैली में जरूरी बदलाव किए जाएं, तो दर्द को दोबारा बढ़ने से रोका जा सकता है और शरीर को धीरे-धीरे संतुलन की ओर लाया जा सकता है। यही वास्तविक सुधार की शुरुआत होती है।

FAQs

अगर सुन्नपन शरीर के एक ही हिस्से (जैसे केवल दाएं या बाएं पैर) में हो, धीरे-धीरे फैल रहा हो, या इसके साथ कमजोरी महसूस होने लगे कि आप चप्पल ठीक से नहीं पहन पा रहे हैं, तो यह गंभीर नर्व कंप्रेशन का संकेत है। इसे तुरंत विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए।

नर्व डैमेज की स्थिति इस पर निर्भर करती है कि दबाव कितना पुराना है। यदि शुरुआती सुन्नपन और झनझनाहट के स्तर पर ही आयुर्वेदिक उपचार और वात संतुलन शुरू कर दिया जाए, तो नसों को दोबारा पुनर्जीवित (Regenerate) किया जा सकता है। बहुत लंबे समय तक अनदेखी करने पर रिकवरी कठिन हो सकती है।

बिना डॉक्टरी सलाह के तेज मालिश करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि अगर डिस्क खिसकी हुई है (Slipped Disc), तो दबाव बढ़ सकता है। आयुर्वेद में 'अभ्यंग' एक प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा औषधीय तेलों के साथ किया जाता है, जो केवल मांसपेशियों को नहीं, बल्कि नसों को पोषण देने के लिए होता है।

हाँ, विशेष रूप से विटामिन B12 की कमी नसों के सुरक्षा कवच (Myelin sheath) को कमजोर कर देती है, जिससे सुन्नपन और झनझनाहट बढ़ती है। आयुर्वेद में इसे 'धातु क्षय' या पोषण की कमी माना जाता है, जिसे सही आहार और औषधियों से सुधारा जाता है।

जी हाँ, आयुर्वेद के अनुसार कब्ज और गैस शरीर में 'अपान वात' को बिगाड़ते हैं। जब पेट साफ नहीं होता, तो शरीर में वात दोष बढ़ता है जो नसों पर दबाव और जकड़न को और अधिक तीव्र कर देता है। इसीलिए जीवा में उपचार के दौरान पाचन सुधारने पर जोर दिया जाता है।

 साइटिका और नसों के दबाव में आमतौर पर 'गर्म सिकाई' या आयुर्वेदिक 'स्वेदन' बेहतर होता है क्योंकि यह रक्त संचार बढ़ाता है और वात को शांत करता है। ठंडी सिकाई से नसें और ज्यादा सिकुड़ सकती हैं, जिससे सुन्नपन बढ़ सकता है।

हाँ, रात के समय शरीर की गतिविधियाँ कम हो जाती हैं और तापमान गिरने से वात दोष बढ़ सकता है। साथ ही, सोते समय गलत पोस्चर नसों पर दबाव बढ़ा देता है, जिससे रात में सुन्नपन या "चींटियाँ चलने" जैसा अहसास ज्यादा होता है।

मर्कटासन' और 'भुजंगासन' नसों के दबाव को कम करने में सहायक होते हैं, लेकिन सुन्नपन की स्थिति में इन्हें केवल विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गलत तरीके से आगे झुकने वाले आसन (Forward Bending) समस्या को बढ़ा सकते हैं।

 बिल्कुल। शरीर का अतिरिक्त वजन सीधे तौर पर रीढ़ की हड्डियों (L4-L5, S1) पर दबाव डालता है, जहाँ से साइटिक नर्व निकलती है। वजन कम करने से नसों को फैलने की जगह मिलती है और संवेदी संकेत (Sensory signals) बेहतर होते हैं।

वात बढ़ाने वाले भोजन जैसे ठंडी चीजें, बासी खाना, अरहर की दाल, भिंडी और बहुत ज्यादा सूखे मेवे (बिना भिगोए) खाने से बचना चाहिए। इसके बजाय घी, अदरक और गर्म ताजे भोजन का सेवन नसों के लचीलेपन के लिए जरूरी है।

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