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Diabetes और ED - दोनों के एक साथ इलाज का तरीका

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

डायबिटीज एक ऐसी क्रॉनिक स्थिति है जो शरीर को अंदर से धीरे-धीरे खोखला करती है, लेकिन इसका सबसे परेशान करने वाला और मौन प्रभाव पुरुषों के निजी जीवन पर पड़ता है। जब हाई ब्लड शुगर के साथ-साथ इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या उभरती है, तो यह केवल एक शारीरिक कमज़ोरी नहीं बल्कि नसों और रक्त वाहिकाओं के गंभीर रूप से डैमेज होने का सीधा संकेत होता है।

इस विषय पर खुलकर बात करने में अक्सर लोग हिचकिचाते हैं और अलग-अलग कृत्रिम दवाइयों का सहारा लेकर शरीर को और गहरे संकट में डाल देते हैं। लेकिन शरीर की इस दोहरी चुनौती को समझने के लिए शुगर के असंतुलन और नसों की कमज़ोरी को एक साथ साधना ज़रूरी है, ताकि शरीर अपनी खोई हुई ऊर्जा और ताकत को प्राकृतिक रूप से वापस पा सके।

डायबिटीज में नसों और शरीर के साथ क्या होता है?

जब ब्लड शुगर का स्तर लंबे समय तक अनियंत्रित रहता है, तो शरीर के आंतरिक सिस्टम, विशेषकर नर्वस सिस्टम और एंडोक्राइन ग्रंथियों पर भारी दबाव पड़ता है। शरीर के अंदर ये मुख्य प्रक्रियाएँ काम कर रही होती हैं:

  • नसों का डैमेज होना: बढ़ा हुआ ब्लड शुगर सीधे तौर पर शरीर की बारीक नसों को नष्ट करने लगता है, जिससे नसों से जुड़ी बीमारियों का जन्म होता है और संवेदनशीलता खत्म हो जाती है।
  • रक्त प्रवाह में रुकावट: डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को सख्त बना देता है, जिससे जननांगों तक पर्याप्त रक्त का प्रवाह नहीं पहुँच पाता और नसों की कमज़ोरी तेज़ी से हावी होती है।
  • एंडोथेलियल डिसफंक्शन: रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत नाइट्रिक ऑक्साइड बनाना कम कर देती है, जो नसों को चौड़ा करने और इरेक्शन के लिए सबसे महत्वपूर्ण रसायन है।
  • ऊर्जा का भयंकर क्षय: शरीर का शुगर मेटाबॉलिज़्म बिगड़ने के कारण कोशिकाओं को ग्लूकोज नहीं मिल पाता, जिससे व्यक्ति को अत्यधिक थकान और कमज़ोरी लगातार बनी रहती है।

डायबिटीज के कारण होने वाले ईडी के प्रकार

यह समस्या हर पुरुष में एक समान नहीं होती। शुगर के प्रभाव और नसों की स्थिति के आधार पर इसे मुख्य रूप से इन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:

  • न्यूरोजेनिक ईडी: यह तब होता है जब अनियंत्रित शुगर के कारण सीधे तंत्रिका तंत्र डैमेज हो जाता है, और दिमाग से जननांगों तक जाने वाले सिग्नल्स बीच में ही टूट जाते हैं।
  • वैस्कुलर ईडी: जब धमनियों में प्लाक जमा हो जाता है और शुगर के कारण नसें सिकुड़ जाती हैं, तो यह वैस्कुलर डिस्फंक्शन पैदा करता है जहाँ पर्याप्त ब्लड फ्लो नहीं हो पाता।
  • साइकोलॉजिकल ईडी: कई बार ब्लड शुगर और दवाइयों के तनाव से व्यक्ति का एंडोक्राइन सिस्टम पूरी तरह कन्फ्यूज़ हो जाता है, और यह डर की वजह से इरेक्शन नहीं होने देता।

इस स्थिति में शरीर क्या लक्षण महसूस करता है?

जब डायबिटीज और ईडी एक साथ हमला करते हैं, तो शरीर केवल एक जगह नहीं, बल्कि कई तरीकों से अलार्म बजाता है जिन्हें समझना ज़रूरी है:

  • कामेच्छा में अचानक कमी: टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन के असंतुलन के कारण अचानक शारीरिक संबंधों से रुचि पूरी तरह खत्म होने लगती है।
  • हाथ-पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन: नसों के डैमेज होने की शुरुआत अक्सर हाथ-पैरों में झुनझुनी और तलवों में जलन के रूप में होती है, जो डायबिटिक न्यूरोपैथी का स्पष्ट लक्षण है।
  • मांसपेशियों में भारीपन और दर्द: शरीर की ताकत कम होने लगती है और थोड़ा सा भी शारीरिक परिश्रम करने पर पिंडलियों और जांघों में भारी दर्द उठता है।
  • लगातार मानसिक बेचैनी और तनाव: शरीर के साथ न दे पाने की निराशा व्यक्ति को गहरे अवसाद और एंग्जायटी की ओर धकेल देती है, जिससे चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।

इस दोहरी परेशानी में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और क्या भयंकर जटिलताएँ होती हैं?

रातों-रात परिणाम पाने की चाहत में लोग अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो उनके शरीर को और भी गहरे संकट में डाल देते हैं:

  • कृत्रिम पिल्स का अंधाधुंध इस्तेमाल: केवल ब्लड फ्लो बढ़ाने वाली नीली गोलियाँ खाना और अपनी हाई ब्लड शुगर को नज़रअंदाज़ करना दिल पर भयंकर दबाव डालता है, जो भविष्य में गंभीर हृदय संबंधी बीमारियों का कारण बनता है।
  • केवल शुगर को दोष देना: कई लोग केवल टाइप 2 डायबिटीज की गोलियाँ खाते रहते हैं और नसों की ताकत बढ़ाने पर कोई ध्यान नहीं देते।
  • डाइट को पूरी तरह छोड़ना: वज़न कम करने के चक्कर में भूखे रहना और वज़न प्रबंधन के नियम भूलकर शरीर को कुपोषण का शिकार बनाना, जिससे शरीर की 'शुक्र धातु' पूरी तरह सूख जाती है।
  • तनाव में डूब जाना: बीमारी को लेकर शर्मिंदगी और मानसिक तनाव लेना कॉर्टिसोल हॉर्मोन को बढ़ाता है, जो शुगर के स्तर को तेज़ी से ऊपर धकेल देता है।

डायबिटीज और ईडी को लेकर आयुर्वेद का क्या गहरा नज़रिया है?

आधुनिक चिकित्सा इसे केवल ब्लड शुगर और नसों की कमज़ोरी मानती है, लेकिन आयुर्वेद इसे 'प्रमेह उपद्रव' और 'ओजस क्षय' के रूप में बहुत गहराई से समझता है:

  • शुक्र धातु का भारी क्षय: आयुर्वेद के अनुसार शरीर की 7वीं धातु 'शुक्र' है। जब कमज़ोर पाचन के कारण 'आम' बनता है, तो आहार का रस शुक्र धातु तक पहुँच ही नहीं पाता, जिससे भयंकर कमज़ोरी आती है।
  • वात दोष का प्रकोप: डायबिटीज (प्रमेह) में धातु क्षय होता है। जब सही वात दोष को कम करने के उपाय नहीं किए जाते, तो बढ़ा हुआ रूखा वात शरीर की बारीक नसों को सुखाकर उन्हें सुन्न कर देता है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस का कफ से संबंध: शरीर का भारीपन और इंसुलिन रेजिस्टेंस आयुर्वेद में दूषित कफ का परिणाम है, जो स्रोतसों को ब्लॉक कर देता है और ऊर्जा का प्रवाह रोक देता है।
  • ओजस का बह जाना: प्रमेह में जब यूरिन के रास्ते शरीर के ज़रूरी तत्व बाहर निकलने लगते हैं, तो इंसान की जीवन शक्ति खत्म हो जाती है।

डायबिटीज और ईडी को एक साथ नियंत्रित करने वाला आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

इन दोनों बीमारियों को हराने के लिए आपको ऐसा आयुर्वेदिक डाइट चाहिए जो ब्लड शुगर को न बढ़ाए लेकिन शरीर को भरपूर 'शुक्र' (ताकत) प्रदान करे। इस चार्ट का पालन करें:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - ताकत और शुगर कंट्रोल करने वाले) क्या न खाएं (नुकसानदायक - कफ और कमज़ोरी बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, जौ (Barley), ओट्स, ज्वार, रागी की रोटी। मैदा से बनी चीज़ें, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स।
प्रोटीन और मेवे मूंग दाल, रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, कद्दू के बीज। बिना भिगोए और ज़्यादा नमक वाले सूखे मेवे, भारी राजमा।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, करेला, परवल, सहजन (Moringa - नसों के लिए उत्तम)। बहुत ज़्यादा आलू, शकरकंद, कच्चा सलाद रात के समय।
फल (Fruits) पपीता, सेब, अमरूद, जामुन (सीमित मात्रा में)। बहुत अधिक पके केले, आम, डिब्बाबंद मीठे फलों के जूस।
वसा और पेय शुद्ध देसी गाय का घी (सीमित), दालचीनी का पानी। रिफाइंड ऑयल, ठंडी कोल्ड ड्रिंक्स, शराब (बिल्कुल वर्जित)।

शुगर कंट्रोल करने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे कई रसायन दिए हैं जो बिना किसी साइड इफेक्ट के नसों की सूजन को खत्म करते हैं और इरेक्शन के लिए ज़रूरी ब्लड फ्लो को प्राकृतिक रूप से बढ़ाते हैं:

  • अश्वगंधा: यह नसों के लिए सबसे बेहतरीन टॉनिक है। अश्वगंधा कॉर्टिसोल (तनाव हॉर्मोन) को कम करता है, टेस्टोस्टेरोन बढ़ाता है और मांसपेशियों में ताकत भरता है।
  • गिलोय: किसी भी तरह के इन्फेक्शन को रोकने और शुगर को मेंटेन करने के लिए गिलोय एक जादुई रसायन है, जो इम्युनिटी को फौलादी बनाता है।
  • गोक्षुर: यह जड़ी-बूटी शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड के स्तर को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती है, जिससे जननांगों में रक्त प्रवाह सुधरता है और ईडी की समस्या दूर होती है।
  • मेथी: रात भर भीगे हुए मेथी के बीज चबाने से इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ती है और शुगर स्पाइक नहीं होता, जिससे नसों को नुकसान नहीं पहुँचता।

नसों की कमज़ोरी और शुगर के लिए बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और शुगर की बीमारी बहुत पुरानी हो चुकी हो, तो औषधियों के साथ पंचकर्म की ये बाहरी और आंतरिक थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • अभ्यंग मालिश: औषधीय तेलों (जैसे क्षीरबला तेल) से पूरे शरीर की सौम्य अभ्यंग मालिश करने से शरीर का ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है और बारीक नसों में दोबारा जान आती है।
  • शिरोधारा: माथे पर औषधीय तेल या काढ़े की लगातार धारा गिराने वाली शिरोधारा थेरेपी स्ट्रेस हॉर्मोन्स को पिघला देती है और साइकोलॉजिकल ईडी को जड़ से खत्म करती है।
  • विरेचन थेरेपी: शरीर से पुराने पित्त और 'आम' टॉक्सिन्स को बाहर निकालने के लिए विरेचन थेरेपी की जाती है। यह लिवर को डिटॉक्स कर शुगर के मेटाबॉलिज़्म को तेज़ करती है।
  • बस्ती कर्म: वात दोष को कंट्रोल करने और अपान वायु की दिशा सही करने के लिए औषधीय तेल या काढ़े की बस्ती दी जाती है, जिससे पेल्विक एरिया की नसें ताकतवर बनती हैं।

प्राकृतिक रूप से नसों में ताकत और शुगर कंट्रोल होने में कितना समय लगता है?

बरसों की हाई ब्लड शुगर से सूख चुकी नसों को दोबारा पोषण देने और ताकतवर बनाने में एक अनुशासित और सुरक्षित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: सही जठराग्नि और प्राकृतिक औषधियों के सेवन से ब्लड शुगर के स्पाइक्स कम होंगे। शरीर की लगातार रहने वाली थकान और पैरों की झुनझुनी काफी हद तक कम हो जाएगी।
  • 3-4 महीने: अश्वगंधा और गोक्षुर जैसे रसायनों के प्रभाव से नर्वस सिस्टम का डैमेज रिपेयर होना शुरू होगा। इरेक्शन में सुधार नज़र आएगा और मानसिक तनाव से आज़ादी मिलेगी।
  • 5-6 महीने और आगे: आपकी 'शुक्र धातु' पूरी तरह पोषित हो जाएगी। आप बिना किसी बाहरी कृत्रिम पिल्स की बाधा के एक प्राकृतिक, ऊर्जावान और स्वस्थ जीवन का अनुभव करेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

डायबिटीज और ईडी के एक साथ इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य शुगर के लिए मेटफॉर्मिन और ईडी के लिए ब्लड फ्लो बढ़ाने वाली कृत्रिम गोलियाँ (Sildenafil/Viagra) देना। बढ़ा हुआ वात शांत करना, जठराग्नि को प्रबल करना और शरीर की 'शुक्र धातु' व नसों को प्राकृतिक रूप से पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक ब्लड शुगर की खराबी और पेल्विक एरिया (Pelvic area) में कम ब्लड फ्लो की स्थानीय समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और 'ओजस क्षय' (जीवन शक्ति की कमी) का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल अक्सर केवल मीठा छोड़ने और सप्लीमेंट्स खाने पर निर्भर रहने की आम सलाह दी जाती है। खाने में 'स्नेहन' (घी), वात-शामक आहार, और मानसिक शांति (तनाव-मुक्ति) पर बहुत गहरा ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर कृत्रिम गोलियों का हृदय पर भयंकर दबाव पड़ता है और शरीर अपना प्राकृतिक काम करना भूल जाता है। शरीर की जठराग्नि और नसें अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से हॉर्मोन्स और रक्त प्रवाह को संतुलित करना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस वात और नसों की कमज़ोरी को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • सीने में भारी दबाव और दर्द: अगर ईडी की कोई कृत्रिम गोली खाने के बाद आपको अचानक सीने में भारीपन, पसीना या सांस फूलने की समस्या हो (यह हार्ट अटैक का संकेत है)।
  • हाथ-पैरों का पूरी तरह सुन्न हो जाना: अगर डायबिटीज के कारण आपके पैरों के तलवों में कोई भी संवेदना महसूस होनी बंद हो जाए और वहां घाव बनने लगें।
  • अचानक आंखों की रौशनी कम होना: हाई ब्लड शुगर का असर जब आंखों की बारीक नसों पर पड़ता है, तो दृष्टि अचानक धुंधली हो सकती है।
  • प्राइवेट पार्ट्स में कोई घाव या इन्फेक्शन: अगर ब्लड शुगर के कारण जननांगों के आसपास कोई इन्फेक्शन हो जाए जो लंबे समय तक सूख न रहा हो।

निष्कर्ष

अपनी डायबिटीज और शारीरिक कमज़ोरी को एक ऐसी उम्र की सज़ा न मानें जिसके साथ आपको समझौता करना पड़े। जब आप अपने कमज़ोर पाचन और खराब लाइफस्टाइल को नज़रअंदाज़ करके केवल शॉर्टकट वाली नीली गोलियाँ निगलते हैं, तो आप अपनी नसों को नहीं, बल्कि अपने हृदय और पूरे एंडोक्राइन सिस्टम को भारी खतरे में डाल रहे होते हैं। बिना सही 'अग्नि' और बिना प्राकृतिक पोषण के, कोई भी कृत्रिम उत्तेजक गोली शरीर के लिए महज़ एक ज़हर है।

इस सिंथेटिक दवाइयों के जाल से बाहर निकलें। अपने आहार में प्राकृतिक ताकत के भंडार जैसे जौ, सहजन और शुद्ध गाय के घी को शामिल करें। अश्वगंधा, गोक्षुर और शिलाजीत जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों पर भरोसा करें जो आपके शरीर की डैमेज नसों को रिपेयर करती हैं और शुगर को जड़ से कंट्रोल करती हैं। इन खतरनाक गोलियों की आजीवन निर्भरता को अपनी आदत न बनने दें, और अपने शरीर को प्राकृतिक रूप से फौलादी बनाने व इससे राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जी हाँ। सामान्य पुरुषों की तुलना में डायबिटिक पुरुषों में ईडी होने की संभावना 3 गुना ज़्यादा होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर सीधे तौर पर जननांगों को सप्लाई करने वाली बारीक नसों और रक्त वाहिकाओं को डैमेज (Neuropathy & Vasculopathy) कर देता है।

बिना डॉक्टर की सलाह के डायबिटीज में ऐसी गोलियाँ लेना बहुत खतरनाक है। ये दवाइयाँ हृदय (Heart) पर अचानक बहुत भारी दबाव डालती हैं। चूंकि डायबिटिक मरीज़ों की नसें पहले से कमज़ोर होती हैं, इसलिए यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक का बड़ा कारण बन सकता है।

बिल्कुल। पेट के आसपास जमा एक्स्ट्रा फैट (Visceral fat) इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाता है और टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन को कम करता है। 5-10% वज़न घटाने से ही शुगर लेवल तेज़ी से नॉर्मल होता है और पेल्विक एरिया में ब्लड फ्लो सुधर जाता है।

अश्वगंधा केवल नसों और मांसपेशियों को ताकत देने वाला (वाजीकरण) रसायन ही नहीं है, बल्कि यह शरीर के स्ट्रेस हॉर्मोन (Cortisol) को घटाकर इंसुलिन की संवेदनशीलता को बढ़ाता है, जिससे शुगर लेवल को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

इसे मेटाबोलिक मेमोरी और नसों का पुराना डैमेज कहते हैं। भले ही आज आपकी शुगर नॉर्मल है, लेकिन बीते सालों में जो हाई शुगर रही थी, उसने नसों पर घाव कर दिए हैं (Neuropathy)। इसके अलावा मानसिक तनाव (Performance anxiety) भी इसका एक बड़ा कारण हो सकता है।

गोक्षुर आयुर्वेद में शुक्र धातु को पोषण देने वाली एक बेहतरीन औषधि है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि यह शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) बढ़ाता है, जो नसों को चौड़ा कर ब्लड फ्लो को तेज़ करता है और ईडी को प्राकृतिक रूप से ठीक करता है।

ज़्यादा मात्रा में कैफीन (Caffeine) नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करता है और वात दोष को भड़काता है। यह खून की नसों को सिकोड़ (Vasoconstriction) सकता है, जिससे जननांगों तक रक्त का प्रवाह और भी कम हो जाता है।

लहसुन ब्लड थिनर (खून पतला करने वाला) होता है और ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है। हालांकि, आयुर्वेद के अनुसार यह पित्त (गर्मी) को बढ़ाता है। अगर आपका पेट खराब रहता है या एसिडिटी है, तो इसे सीधे कच्चा खाने के बजाय घी में हल्का भूनकर खाना बेहतर है।

अगर आप बहुत लंबे समय तक सख्त सीट वाली साइकिल चलाते हैं, तो यह पेल्विक एरिया (Perineum) की नसों (Pudendal nerve) पर भारी दबाव डालता है, जिससे सुन्नपन और ईडी बढ़ सकता है। इसके बजाय सैर करना (Walking) या योग करना ज़्यादा सुरक्षित है।

शत-प्रतिशत। निकोटीन (Nicotine) रक्त वाहिकाओं को बुरी तरह सिकोड़ देता है। डायबिटीज पहले ही नसों को ब्लॉक कर रही है और ऊपर से स्मोकिंग करना इस ब्लॉकेज को दोगुना कर देता है। स्मोकिंग छोड़ते ही शरीर में ब्लड सर्कुलेशन 30% तक सुधर जाता है और दवाइयाँ बेहतर काम करती हैं।

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