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Early stage को ignore करने से ulcer का risk क्यों बढ़ता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

जब पैरों में हल्का दर्द शुरू होता है या पिंडलियों के आसपास नीले रंग की बारीक नसें दिखाई देने लगती हैं, तो हम अक्सर इसे दिन भर की थकान या बढ़ती उम्र का सामान्य असर मानकर टाल देते हैं। हम रात को पैरों के नीचे तकिया लगा लेते हैं या दर्द निवारक क्रीम मलकर सो जाते हैं। शुरुआत में ये तरीके कुछ आराम भी दे देते हैं, जिससे हमें लगता है कि समस्या खत्म हो गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस 'शुरुआती स्टेज' को आप इतनी आसानी से नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, वह असल में आपके पैरों की त्वचा और ऊतकों (Tissues) को अंदर ही अंदर सड़ा रही है? वेरीकोज वेन्स (Varicose Veins) सिर्फ नसों के फूलने की बीमारी नहीं है; अगर इसे इसके शुरुआती चरण में सही तरीके से न रोका जाए, तो यह पैरों में ऐसे भयंकर और गहरे घाव बना सकती है जो महीनों या सालों तक नहीं भरते। इन कभी न भरने वाले घावों को 'वेनस अल्सर' (Venous Ulcers) कहा जाता है। आज जो महज़ एक सूजी हुई नस है, वह कल आपके पैर में एक ऐसा अल्सर बन सकती है जो आपके चलने-फिरने की आज़ादी को पूरी तरह छीन ले।

वेरीकोज वेन्स (Varicose Veins) असल में क्या हैं?

हमारे शरीर में खून को पैरों से वापस ऊपर दिल तक पहुँचाने का काम हमारी नसें (Veins) करती हैं। चूंकि इस खून को गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के विपरीत ऊपर की तरफ जाना होता है, इसलिए इन नसों के अंदर छोटे-छोटे 'वाल्व' (Valves) होते हैं। ये वाल्व एक वन-वे दरवाजे की तरह काम करते हैं, वे खून को ऊपर तो जाने देते हैं, लेकिन नीचे वापस नहीं लौटने देते। जब हमारी खराब जीवनशैली, घंटों खड़े रहने या भारी वज़न के कारण ये वाल्व कमज़ोर होकर काम करना बंद कर देते हैं, तो खून ऊपर जाने के बजाय नीचे पैरों की नसों में ही जमा होने लगता है। खून के इसी लगातार जमाव के कारण नसें फूल जाती हैं, सूज जाती हैं और त्वचा के बाहर नीले या बैंगनी रंग के गुच्छों के रूप में उभर आती हैं। इसे ही वेरीकोज वेन्स कहा जाता है।

खामोश शुरुआत: जब नसों में गंदा खून जमा होने लगता है

वेरीकोज वेन्स की शुरुआत रातों-रात मोटे गुच्छों के रूप में नहीं होती। पहले चरण में, आपको अपनी पिंडलियों या जांघों के पीछे लाल या नीले रंग की बहुत ही बारीक जाले जैसी नसें दिखने लगती हैं (Spider Veins)। इसके साथ ही शाम के समय पैरों में भारीपन और थकावट महसूस होने लगती है। यह इस बात का पहला अलार्म है कि आपकी नसों के वाल्व कमज़ोर होना शुरू हो गए हैं और खून का सर्कुलेशन धीमा पड़ रहा है। ज़्यादातर लोग इस स्टेज को पूरी तरह इग्नोर कर देते हैं, और यहीं से अल्सर की नींव पड़नी शुरू हो जाती है।

इग्नोर करने की पहली गलती: सिर्फ दर्द को दबाना

जब पैरों में भारीपन और हल्का दर्द शुरू होता है, तो ज़्यादातर लोग मोज़े (Compression Stockings) पहन लेते हैं या दर्द की गोलियाँ खा लेते हैं। यह सब सिर्फ लक्षणों को दबाने का काम करता है। आप उस अलार्म को बंद कर रहे हैं जो शरीर आपको दे रहा है। क्रीम या गोली खाने से न तो आपका ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है और न ही आपके खराब हो चुके वाल्व दोबारा ठीक होते हैं। आप सिर्फ अपने दिमाग को यह धोखा दे रहे हैं कि आपकी बीमारी ठीक हो रही है, जबकि अंदर ही अंदर खून का भारी जमाव नसों और आसपास के ऊतकों को डैमेज कर रहा होता है।

टिश्यू डैमेज की शुरुआत: गंदा खून कैसे त्वचा को सड़ाता है

यह समझना बहुत ज़रूरी है कि जो खून वेरीकोज वेन्स में जमा होता है, वह अशुद्ध और बिना ऑक्सीजन वाला खून (Deoxygenated blood) होता है। जब आप शुरुआती स्टेज को इग्नोर करते हैं, तो यह गंदा खून महीनों और सालों तक पैरों की निचली नसों में जमा रहता है। ऑक्सीजन और पोषक तत्वों (Nutrients) की कमी के कारण, नसों के आसपास मौजूद त्वचा और ऊतकों को ताज़ा पोषण मिलना बंद हो जाता है। इसे मेडिकल भाषा में 'हाइपोक्सिया' (Hypoxia) कहते हैं। जब त्वचा को पोषण नहीं मिलता, तो वह अंदर ही अंदर कमज़ोर होने लगती है और मरने (Tissue death) लगती है।

पैरों का काला पड़ना: अल्सर से ठीक पहले की चेतावनी

जब नसों में गंदे खून का दबाव बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है, तो नसों की दीवारों से लाल रक्त कोशिकाएं (Red Blood Cells) रिसकर बाहर त्वचा के ऊतकों में जमा होने लगती हैं। जब ये कोशिकाएं टूटती हैं, तो इनमें से 'हीमोसिडेरिन' (Hemosiderin) नाम का एक पिगमेंट निकलता है, जो त्वचा को जंग लगने जैसा भूरा या काला बना देता है। अगर आपके टखनों (Ankles) के आसपास की त्वचा सख्त, सूखी और काली या भूरी पड़ने लगी है, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अल्सर बस बनने ही वाला है। त्वचा का यह कालापन बताता है कि अंदर के ऊतक अब पूरी तरह से सड़ चुके हैं।

वेनस अल्सर (Venous Ulcer) का जन्म: जब त्वचा हार मान लेती है

जब त्वचा अंदर से पूरी तरह कुपोषित, सूखी और सख्त हो जाती है, तो उसे नुकसान पहुँचाने के लिए किसी बड़ी चोट की ज़रूरत नहीं होती। सिर्फ एक हल्का सा खरोंच लगना, मच्छर का काटना, या किसी फर्नीचर से हल्का सा टकरा जाना ही त्वचा को फाड़ने के लिए काफी होता है। चूंकि उस जगह पर ऑक्सीजन वाला ताज़ा खून पहुँच ही नहीं रहा है, इसलिए वह छोटा सा घाव कभी भरता नहीं है। इसके बजाय, वह घाव धीरे-धीरे बड़ा, गहरा और बहुत ज़्यादा दर्दनाक होता चला जाता है। इसी न भरने वाले खुले घाव को वेनस अल्सर कहते हैं।

खड़े रहने या बैठे रहने का असर: सर्कुलेशन कैसे रुकता है?

आजकल हमारी दिनचर्या ऐसी हो गई है कि हमें घंटों तक एक ही स्थिति में रहना पड़ता है। जो लोग पेशे से टीचर, पुलिस वाले, गार्ड या शेफ हैं, उन्हें घंटों खड़ा रहना पड़ता है। वहीं, कॉर्पोरेट जॉब्स में लोग घंटों कुर्सी पर बैठे रहते हैं। दोनों ही स्थितियों में हमारे पैरों की मांसपेशियाँ (Muscles) हरकत नहीं करतीं। पैरों की पिंडलियों की मांसपेशियाँ एक 'पंप' की तरह काम करती हैं जो खून को ऊपर दिल की तरफ धकेलती हैं। जब ये मांसपेशियाँ काम नहीं करतीं, तो खून नीचे जमा होकर वाल्व्स को तोड़ देता है, जो अल्सर की तरफ पहला कदम होता है।

कब्ज और बढ़ता वजन: अल्सर के खतरे को कैसे बढ़ाते हैं?

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि आपका पेट आपके पैरों की नसों को सीधे प्रभावित करता है। अगर आपको क्रोनिक कब्ज है, तो मल त्यागते समय आपको रोज़ाना बहुत ज़ोर लगाना पड़ता है। यह ज़ोर आपके पेट का अंदरूनी दबाव बढ़ा देता है, जो सीधा पैरों से ऊपर आ रहे खून का रास्ता रोक देता है। इसी तरह, शरीर का अतिरिक्त वजन (मोटापा) भी पैरों की नसों पर भारी दबाव डालता है। यह रुकावट नसों में सूजन पैदा करती है और त्वचा को ऑक्सीजन मिलने से रोकती है, जिससे अल्सर का रिस्क कई गुना बढ़ जाता है।

डाइट की गलतियाँ: खून का गाढ़ा होना और अल्सर का रिस्क

हम जो खाते हैं, वही हमारे खून का निर्माण करता है। ज़्यादा जंक फूड, बहुत ज़्यादा नमक, और रिफाइंड शुगर से भरा आहार हमारे खून को अशुद्ध और गाढ़ा बना देता है। गाढ़े खून को ऊपर की तरफ धकेलना नसों के कमज़ोर वाल्व के लिए बहुत मुश्किल होता है। इसके अलावा, हमारी डाइट में विटामिन सी और प्रोटीन की भारी कमी है, जो त्वचा और घावों को हील (Heal) करने के लिए सबसे ज़रूरी तत्व हैं। जब शरीर में सही पोषण ही नहीं होगा, तो एक छोटा सा घाव भी भयंकर अल्सर बन जाता है।

आयुर्वेद वेरीकोज वेन्स और अल्सर को कैसे समझता है? (सिराग्रंथि और दुष्ट व्रण)

आधुनिक विज्ञान जिसे सर्कुलेशन की समस्या कहता है, आयुर्वेद ने उसे हज़ारों साल पहले ही समझ लिया था। आयुर्वेद में वेरीकोज वेन्स को 'सिराग्रंथि' और इससे बनने वाले अल्सर को 'दुष्ट व्रण' (Non-healing ulcer) कहा जाता है। यह शरीर में 'वात दोष' (Vata Dosha) के भयंकर असंतुलन और खून (रक्त धातु) के बहुत ज़्यादा अशुद्ध होने के कारण होता है। वात नसों में खून के प्रवाह को रोक देता है, और अशुद्ध खून (रक्त दृष्टि) त्वचा को अंदर से गलाकर दुष्ट व्रण (अल्सर) बना देता है। आयुर्वेद का लक्ष्य सिर्फ घाव पर मलहम लगाना नहीं, बल्कि वात और रक्त के प्रवाह को दोबारा प्राकृतिक रूप से सुचारू करना है।

नसों और त्वचा को हील करने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें नसों के सर्कुलेशन को सुधारने और अल्सर जैसे घावों को भरने के लिए सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं।

  • नीम और हल्दी (हरिद्रा): अल्सर के घाव को संक्रमण (Infection) से बचाने और उसे प्राकृतिक रूप से सुखाने के लिए इनका उपयोग बहुत कारगर है।
  • अर्जुन: यह पूरे शरीर की रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) की दीवारों को भयंकर मज़बूती देने के लिए जानी जाती है, जिससे नसें दोबारा नहीं फूलतीं।
  • गुग्गुलु: यह शरीर में आई सूजन को प्राकृतिक रूप से खींच लेता है और नसों के गुच्छों को ढीला करता है।

आयुर्वेदिक थेरेपी वेरीकोज अल्सर को रोकने में कैसे काम करती है?

जब दवाइयाँ खून के भारी जमाव को नहीं हटा पातीं और अल्सर का खतरा मंडराने लगता है, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी सीधे उस गंदे खून पर हमला करती है।

  • रक्तमोक्षण: यह वेरीकोज वेन्स और अल्सर का सबसे जादुई और त्वरित इलाज है। इसमें प्रभावित नसों और घाव के आसपास विशेष प्रकार की जोंक (Leeches) लगाई जाती हैं, जो सिर्फ गंदे और अशुद्ध खून को चूसकर बाहर निकाल देती हैं। इससे नसों का भारी दबाव तुरंत कम हो जाता है, ऑक्सीजन वाला ताज़ा खून वहाँ पहुँचता है, और न भरने वाला अल्सर भी तेज़ी से भरने लगता है।
  • अभ्यंग: वेरीकोज वेन्स (अल्सर के अलावा अन्य हिस्सों पर) में बहुत सावधानी से नीचे से ऊपर (दिल की तरफ) की दिशा में औषधीय तेलों से हल्की मालिश की जाती है, जो रुके हुए खून को वापस ऊपर धकेलने में मदद करती है।

सर्कुलेशन सुधारने और अल्सर से बचने के लिए वात-शामक डाइट प्लान क्या हो?

आप जो खाते हैं, वही आपके खून को या तो बीमारी बनाता है या ताकत। वेरीकोज वेन्स को अल्सर में बदलने से रोकने के लिए सही डाइट लेना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

श्रेणी क्या अपनाएँ (अनुशंसित) किनसे परहेज़ करें (वर्जित)
आहार का सिद्धांत हल्का, सुपाच्य भोजन जो गैस व कब्ज न बनाए सूखा और बासी भोजन जो वात को बढ़ाए
पोषक तत्व विटामिन C युक्त चीज़ें (आंवला, संतरा): त्वचा व नसों को मज़बूत कर घाव भरने में सहायक फास्ट फूड और अत्यधिक नमक: सूजन को बढ़ाते हैं
पाचन संतुलन त्रिफला का नियमित सेवन: पेट साफ रखकर नसों का दबाव कम करता है पाचन को बिगाड़ने वाली आदतें और अनियमित भोजन
दैनिक पेय गुनगुना पानी पर्याप्त मात्रा में: खून को पतला रखकर सर्कुलेशन सुधारता है ठंडे पेय और कम पानी पीना
जीवनशैली सहयोग हर 45 मिनट में चलना-फिरना: पिंडलियों की मांसपेशियों को सक्रिय रखता है लंबे समय तक एक ही स्थिति में खड़े या बैठे रहना

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी कैंची नहीं है जो एक मिनट में सूजी हुई नस को काटकर बाहर निकाल दे या अल्सर को जादू से भर दे। आपके बिगड़े हुए सर्कुलेशन को पूरी तरह रिसेट होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; पैरों का भारीपन, जलन और भयंकर खिंचाव काफी कम होने लगेंगे।
  • 1 से 3 महीने तक: अशुद्ध खून साफ होने से त्वचा का कालापन कम होने लगेगा। अगर कोई छोटा घाव या अल्सर है, तो उसका संक्रमण रुक जाएगा और वह धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से भरने लगेगा।
  • 3 से 6 महीने तक: आपकी नसें अंदर से पूरी तरह साफ और ताकतवर बन जाएँगी। सूजी हुई नसें धीरे-धीरे सिकुड़कर अपनी सामान्य अवस्था में आने लगेंगी और अल्सर पूरी तरह भर जाएगा, जिससे आपको दर्द से हमेशा के लिए आज़ादी मिल जाएगी।

मरीज़ों के अनुभव

नमस्कार, मेरा नाम सुरजीत राय है। मेरी उम्र 56 वर्ष है और मैं छत्तीसगढ़ से हूँ। मुझे पिछले 2 वर्षों से घुटने के पीछे तेज दर्द और नसों से जुड़ी समस्या थी। कई दवाइयाँ लेने के बावजूद मुझे कोई राहत नहीं मिली।

फिर मैंने जीवा आयुर्वेद से उपचार शुरू किया। डॉक्टर के मार्गदर्शन में नियमित दवाइयाँ और एक्सरसाइज़ करने से मुझे लगभग 5 महीनों में पूरी तरह राहत मिल गई। अब मैं स्वस्थ हूँ और मेरा परिवार भी बहुत खुश है।

मैं जीवा आयुर्वेद और डॉक्टरों का दिल से धन्यवाद करती हूँ और सभी को आयुर्वेद अपनाने की सलाह देती हूँ।

सुरजीत राय

छत्तीसगढ़

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

वेरीकोज वेन्स और इसके भयंकर अल्सर से बचने के लिए हम अक्सर जल्दबाज़ी में कदम उठाते हैं और तुरंत राहत ढूँढते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आप अपने शरीर के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, क्योंकि लक्षणों को दबाने और आयुर्वेद की गहराई को अपनाने में ज़मीन-आसमान का अंतर है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य स्टॉकिंग्स, क्रीम या लेज़र सर्जरी द्वारा सूजी हुई नस को हटाने पर केंद्रित खराब सर्कुलेशन और अशुद्ध खून को सुधारकर नस/ऊतक को पुनः स्वस्थ बनाने पर फोकस
शरीर को देखने का नज़रिया अल्सर को बाहर से साफ कर एंटीबायोटिक देना अल्सर को रक्त अशुद्धि मानकर रक्तमोक्षण से प्राकृतिक हीलिंग को बढ़ावा
डाइट और जीवनशैली की भूमिका कब्ज़ और खान-पान पर सीमित ध्यान वात-शामक डाइट, फाइबर और संतुलित दिनचर्या को उपचार का मुख्य आधार
लंबा असर सर्जरी के बाद भी समस्या दूसरी जगह लौट सकती है जड़ी-बूटियों से खून साफ कर जड़ से समाधान की दिशा में कार्य

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags of Varicose Veins)

वेरीकोज वेन्स को महज़ त्वचा की बदसूरती मानकर इग्नोर नहीं करना चाहिए। अगर आपको पैरों में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बहुत ज़रूरी है:

  • अगर पैरों के निचले हिस्से या टखनों (Ankles) के पास त्वचा भूरी या काली पड़ जाए (यह अल्सर बनने की पहली चेतावनी है)।
  • अगर वहाँ कोई ऐसा घाव बन जाए जो हफ्तों तक भर नहीं रहा हो और उसमें से पानी या पस निकल रहा हो।
  • अगर सूजी हुई नीली नस अचानक बहुत ज़्यादा लाल, गर्म और दर्दनाक हो जाए (Phlebitis का संकेत)।
  • अगर किसी उभरी हुई नस से अचानक खून बहने लगे (Bleeding) जो आसानी से रुक न रहा हो।
  • अगर पैरों में अचानक से बहुत ज़्यादा दर्दनाक और भयंकर सूजन आ जाए (यह जानलेवा ब्लड क्लॉट या DVT का संकेत हो सकता है)।

निष्कर्ष

वेरीकोज वेन्स की शुरुआती स्टेज में दिखने वाली पतली नसें और हल्का दर्द असल में एक टिक-टिक करते टाइम बम की तरह हैं। जब आप दर्द निवारक क्रीम लगाकर या स्टॉकिंग्स पहनकर इस दर्द को इग्नोर करते हैं, तो अंदर ही अंदर रुका हुआ गंदा खून आपकी त्वचा को ऑक्सीजन से वंचित कर रहा होता है। त्वचा का कुपोषण अंततः वेनस अल्सर (Venous Ulcer) के रूप में फट पड़ता है, एक ऐसा घाव जो जल्दी भरता नहीं और आपके जीवन को बहुत कठिन बना देता है। बीमारी को अल्सर की इस भयंकर स्थिति तक पहुँचने ही क्यों देना, जब आयुर्वेद के पास इसका प्राकृतिक समाधान मौजूद है? सही आयुर्वेदिक उपचार, जड़ी-बूटियों, पंचकर्म की रक्तमोक्षण थेरेपी और वात-शामक जीवनशैली को अपनाकर आप खराब सर्कुलेशन को जड़ से ठीक कर सकते हैं। अपने शरीर के शुरुआती संकेतों को गंभीरता से लें, सिर्फ सिम्पटम मैनेज करने की गलती न करें, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपनी नसों और त्वचा को हमेशा के लिए स्वस्थ बनाएँ।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

पैरों में बारीक जाले जैसी नसें दिखना (Spider veins), शाम के समय पैरों में भारीपन महसूस होना, और हल्की सूजन आना शुरुआती लक्षण हैं। इन्हें नज़रअंदाज़ करने से ही आगे चलकर भयंकर सूजन और अल्सर बनता है।

यह पैरों के निचले हिस्से (अक्सर टखनों के पास) होने वाला एक ऐसा घाव है जो आसानी से भरता नहीं है। यह तब होता है जब वेरीकोज वेन्स के कारण नसों में गंदा खून जमा हो जाता है और त्वचा को ऑक्सीजन व पोषण नहीं मिल पाता।

यह इस बात की बहुत बड़ी चेतावनी है कि नसों से अशुद्ध खून रिसकर त्वचा के ऊतकों में जमा हो रहा है। त्वचा का यह कालापन बताता है कि उस जगह के ऊतक डैमेज हो रहे हैं और जल्द ही वहाँ अल्सर बन सकता है।

स्टॉकिंग्स खून को नीचे जमा होने से रोककर अल्सर के खतरे को कुछ हद तक धीमा ज़रूर करते हैं, लेकिन यह कोई पक्का इलाज नहीं है। अगर खून गाढ़ा है और वाल्व खराब हैं, तो अंदरूनी बीमारी बढ़ती रहती है।

जी हाँ। कब्ज के कारण मल त्यागते समय लगाया गया ज़ोर पेट का दबाव बढ़ाता है, जिससे पैरों से ऊपर आ रहे खून का रास्ता रुक जाता है। यह रुकावट नसों पर भार डालकर अल्सर के खतरे को बढ़ा देती है।

बिल्कुल! आयुर्वेद में 'रक्तमोक्षण' (Leech Therapy) और रक्त-शोधक जड़ी-बूटियों (जैसे मंजिष्ठा, नीम) के ज़रिए गंदे खून को निकालकर और सर्कुलेशन को सुधारकर सालों पुराने अल्सर को भी प्राकृतिक रूप से ठीक किया जा सकता है।

डाइट में विटामिन सी (आंवला, खट्टे फल) और फाइबर बढ़ाना चाहिए ताकि नसों को ताकत मिले और पेट साफ रहे। बहुत ज़्यादा नमक, जंक फूड और रिफाइंड चीनी से बिल्कुल बचना चाहिए क्योंकि ये सूजन और अशुद्ध खून बढ़ाते हैं।

हल्की सैर (Walking), साइकिल चलाना और तैराकी बेहतरीन व्यायाम हैं। ये आपके पैरों की पिंडलियों (Calf muscles) को पंप करते हैं, जिससे खून ऊपर की तरफ धकेला जाता है और अल्सर का रिस्क कम होता है।

अगर अल्सर (खुला घाव) बन चुका है, तो उस जगह पर कभी मालिश नहीं करनी चाहिए। अगर सिर्फ नसें सूजी हैं, तो बहुत हल्के हाथों से 'नीचे से ऊपर' की दिशा में मालिश की जा सकती है, लेकिन ज़ोर लगाने से नस फट सकती है।

सोते समय पैरों को दिल के स्तर से थोड़ा ऊपर रखने से गुरुत्वाकर्षण की मदद मिलती है। इससे दिन भर पैरों में जमा हुआ गंदा खून वापस लौट पाता है, जिससे सूजन कम होती है और त्वचा को आराम मिलता है।

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