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अगर परिवार में Diabetes है, तो आपको किन बातों से सबसे ज्यादा बचना चाहिए?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

शुगर कम करने वाली गोलियों और इंसुलिन का इस्तेमाल डायबिटीज़ जैसी बीमारियों में काफी आम है। जब परिवार में माता-पिता या दादा-दादी को डायबिटीज़ हो, तो लोगों को लगता है कि उन्हें भी यह बीमारी होना तय है और वे डर के मारे पहले ही कृत्रिम दवाइयाँ या सप्लीमेंट्स लेना शुरू कर देते हैं। ये दवाएँ कुछ समय के लिए ब्लड शुगर को फौरी तौर पर कम कर देती हैं, जिससे इंसान को लगता है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि गलत खानपान की वजह से और दवा छोड़ने के तुरंत बाद कमज़ोरी महसूस होने लगती है और ब्लड शुगर पहले से भी ज़्यादा बढ़कर वापस आ जाता है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार दवाओं पर शरीर की निर्भरता, इंसुलिन रेजिस्टेंस, बीमारी का जेनेटिक प्रभाव, या सबसे महत्वपूर्ण—पाचन तंत्र की खराबी और शरीर के अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और पैंक्रियाज़ की सेहत बनी रहे।

जेनेटिक या हेरिडेटरी डायबिटीज़ क्या है?

जेनेटिक डायबिटीज़ एक ऐसी स्थिति है, जहाँ परिवार के सदस्यों से शुगर की बीमारी अगली पीढ़ी में ट्रांसफर होने का जोखिम होता है। लेकिन सिर्फ जीन होने से बीमारी नहीं होती, आमतौर पर लोग इसका शिकार गलत खानपान, जंक फूड, बहुत ज़्यादा मीठा खाने, या शारीरिक मेहनत न करने के कारण कम उम्र में ही हो जाते हैं। जब पैंक्रियाज़ कमज़ोर पड़ता है, तो वह खून में मौजूद शुगर को ऊर्जा में नहीं बदल पाता, जिससे शुगर लेवल तेज़ी से बढ़ने लगता है। अंग्रेजी दवाएँ खाने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ लक्षणों को दबाती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस खराब माहौल को ठीक नहीं करतीं जिसमें यह मेटाबॉलिक बीमारी पनपती है। दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना किडनी और हृदय पर बुरा असर डालता है।

डायबिटीज़ की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

मेटाबॉलिज़्म की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • टाइप 1 डायबिटीज़: यह अक्सर जेनेटिक होती है, जहाँ शरीर की इम्युनिटी ही पैंक्रियाज़ की कोशिकाओं को नष्ट कर देती है और इंसुलिन बनना बंद हो जाता है।
  • टाइप 2 डायबिटीज़: यह जीवनशैली और मोटापे से जुड़ी बीमारी है जहाँ शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उसका सही इस्तेमाल नहीं कर पाता। परिवार में इतिहास होने पर इसका खतरा सबसे ज़्यादा होता है।
  • प्री-डायबिटीज़: यह वह स्थिति है जब ब्लड शुगर सामान्य से ज़्यादा होता है, लेकिन इतना नहीं कि उसे डायबिटीज़ कहा जाए।
  • जेस्टेशनल डायबिटीज़: यह गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में होने वाली शुगर की बीमारी है, जिसका जेनेटिक कनेक्शन भी होता है।

जेनेटिक डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षण और संकेत

परिवार में इतिहास होने पर बार-बार शुगर का बढ़ना या लगातार थकान कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • लगातार थकान और कमज़ोरी: विशेषकर खाना खाने के बाद या रात के समय असहनीय सुस्ती आना।
  • वज़न का तेज़ी से बढ़ना या घटना: पेट के आसपास चर्बी जमा होना या बिना कोशिश के वज़न कम होना।
  • बार-बार पेशाब आना और प्यास लगना: खून में शुगर बढ़ने से गुर्दों पर दबाव पड़ना।
  • त्वचा का रंग बदलना: गर्दन या अंडरआर्म्स के आसपास की त्वचा का काला या मोटा पड़ जाना।
  • घाव भरने में देरी: छोटी सी खरोंच या चोट का लंबे समय तक ठीक न होना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

परिवार में डायबिटीज़ होने पर किन बातों से सबसे ज़्यादा बचना चाहिए? (मुख्य कारण)

लिवर खराब होने और शुगर बढ़ने के पीछे सिर्फ जेनेटिक्स नहीं, बल्कि आपकी अपनी आदतें सबसे बड़ी कारण होती हैं। मुख्य रूप से इन बातों से बचना चाहिए:

  • मीठा और जंक फूड: गलत खान-पान जैसे मैदा, कोल्ड ड्रिंक, या भारी भोजन से शरीर में टॉक्सिन्स (आम) बनते हैं। यह गंदगी पाचन को दूषित कर देती है। इनसे पूरी तरह बचना चाहिए।
  • बैठे रहने वाली जीवनशैली: दिन भर कंप्यूटर के आगे बैठे रहना और शारीरिक मेहनत न करना इंसुलिन रेजिस्टेंस को जन्म देता है।
  • मोटापा और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल: खून में ज़्यादा कोलेस्ट्रॉल और फैट पैंक्रियाज़ के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है। वज़न बढ़ने से रोकें।
  • देर रात तक जागना और तनाव: स्ट्रेस हार्मोन शुगर लेवल को बढ़ाते हैं। पूरी नींद न लेना बीमारी को तेज़ी से ट्रिगर करता है।
  • गोलियों पर अंधाधुंध निर्भरता: परिवार में शुगर देखकर तुरंत भारी दवाएँ खाने से शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो जाती है।

इसके जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

डायबिटीज़ को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर बचाव न किया जाए, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • हृदय रोग का खतरा: यह नसों में ब्लॉकेज पैदा कर सकता है, जिससे हार्ट अटैक का जोखिम तेज़ी से बढ़ता है।
  • किडनी फेलियर (नेफ्रोपैथी): लगातार बढ़ा हुआ ब्लड शुगर किडनी के फिल्टर करने की क्षमता को नष्ट कर देता है।
  • आँखों की रौशनी कम होना (रेटिनोपैथी): शुगर के कारण आँखों की नसें कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे अंधापन आ सकता है।
  • मानसिक तनाव और चिंता: जीवन भर की बीमारी के डर से डिप्रेशन और नींद की समस्या हो सकती है।
  • नसों का डैमेज (न्यूरोपैथी): पैरों और हाथों में सुन्नपन या झुनझुनी होना, जो आगे चलकर गंभीर घाव में बदल सकता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से हेरिडेटरी डायबिटीज़ (प्रमेह) सिर्फ ब्लड शुगर की दिक्कत नहीं है। यहाँ यह माना जाता है कि जब शरीर में कफ दोष बिगड़ जाता है तथा जठराग्नि (पाचन अग्नि) कमज़ोर हो जाती है, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी, जीभ और पेट की स्थिति देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में टॉक्सिन्स (आम) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने मेद धातु (फैट टिश्यू) को पूरी तरह दूषित कर दिया है। जब तक यह दूषित वसा शरीर में जमा रहेगी, इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या हमेशा बनी रहेगी। आयुर्वेद में बस लक्षण मिटाना और गोलियाँ बढ़ाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, मेटाबॉलिज़्म की शुद्धि हो और पैंक्रियाज़ प्राकृतिक रूप से स्वस्थ बने।

डायबिटीज़ से बचाव के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में पैंक्रियाज़ को स्वस्थ बनाने और ब्लड शुगर को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • गुडमार (Gurmar): इसके नाम का अर्थ ही है 'शुगर को मारने वाला'। यह मीठा खाने की इच्छा को कम करता है और इंसुलिन उत्पादन बढ़ाता है।
  • गिलोय: आयुर्वेद में इसे बहुत शक्तिशाली माना गया है। यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाती है और ब्लड शुगर को प्राकृतिक रूप से कम करती है।
  • विजयसार: प्राचीन काल से विजयसार की लकड़ी का इस्तेमाल शुगर को नियंत्रित करने और पैंक्रियाज़ को ताकत देने के लिए किया जाता है।
  • करेला और जामुन: यह खून से शुगर को कम करने और कमज़ोर कोशिकाओं को ताकत देने का एक बहुत ही लाभकारी उपाय है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित फैट और दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और मेटाबॉलिक शुद्धि: जब पारिवारिक इतिहास के कारण मेटाबॉलिज़्म बहुत धीमा हो, तो जीवा आयुर्वेद में 'विरेचन' और 'उद्वर्तन' (हर्बल पाउडर मसाज) जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 15 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों और पेट की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना: विरेचन प्रक्रिया में मरीज़ को औषधीय घी पिलाकर विशेष जड़ी-बूटियों के माध्यम से मल त्याग कराया जाता है। इससे आंतों में जमा पुरानी गंदगी बाहर निकल जाती है।
  • आंतरिक राहत: अंदरूनी सफाई के साथ शरीर की मालिश और भाप दी जाती है। इससे शरीर का भारीपन दूर होता है और कफ दोष जड़ से खत्म होने लगता है।

जेनेटिक रिस्क वाले व्यक्ति के लिए शुद्ध आहार

क्या खाएँ?

  • कड़वी और हल्की सब्ज़ियाँ: करेला, परवल, लौकी और हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ खाएँ, कड़वा रस खून को साफ करता है और शुगर को बढ़ने नहीं देता।
  • पुराना अनाज और मूंग दाल: जौ, रागी और छिलके वाली हरी मूंग की दाल का सूप पिएँ, यह पेट को हल्का रखता है।
  • मेथी और दालचीनी का प्रयोग: सुबह खाली पेट मेथी का पानी पिएँ या खाने में दालचीनी का इस्तेमाल करें, यह शुगर कंट्रोल में बेहतरीन है।

क्या न खाएँ?

  • मीठा और प्रोसेस्ड फूड: चीनी, मिठाइयाँ, पैकेटबंद जूस और मैदे से बनी चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, ये सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाते हैं।
  • विरुद्ध आहार: दूध के साथ नमकीन चीज़ें या बेमेल भोजन कभी न खाएँ, यह पाचन को सबसे ज़्यादा दूषित करता है।
  • सफेद चावल और भारी भोजन: पॉलिश किया हुआ चावल, पूरी, पराठे, जंक फूड और ज़्यादा तेल वाली चीज़ें पैंक्रियाज़ पर बोझ डालती हैं और चर्बी बढ़ाती हैं।

बचाव और ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में मेटाबॉलिक रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे शुगर कितनी पुरानी है, पारिवारिक इतिहास कितना मज़बूत है, और मरीज़ का शरीर कितना कमज़ोर है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर समस्या नई है और शुगर अभी बॉर्डरलाइन (प्री-डायबिटीज़) पर है, तो आमतौर पर 1 से 2 महीनों में ही आपका शरीर हल्का होने लगता है और रिपोर्ट्स सुधर जाती हैं।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर डायबिटीज़ हो चुकी है और दवाइयों की डोज़ काफी ज़्यादा है, तो पैंक्रियाज़ को ताकत मिलने और दवाइयाँ कम होने में 3 से 6 महीने या उससे ज़्यादा भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से पाचन सुधारने वाली जड़ी-बूटियाँ, सही खानपान और योग शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट और लाइफस्टाइल का कड़ाई से पालन करता है, तो पाचन दुरुस्त हो जाता है और भविष्य में बीमारी के गंभीर होने की संभावना खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम रेनू लूम्बा है, मेरी उम्र 60 साल है और मैं पेशे से टीचर रही हूँ। मुझे पिछले 25 सालों से सेहत से जुड़ी कुछ समस्याएं रहती थीं और मैं बॉर्डरलाइन डायबिटीज पर थी। लेकिन इसी साल जनवरी में जब मैंने टेस्ट करवाया, तो मेरी डायबिटीज अचानक बहुत ज़्यादा निकली। हम बहुत घबरा गए थे। एलोपैथिक डॉक्टर ने दवाइयाँ बताईं, लेकिन हम एलोपैथी शुरू नहीं करना चाहते थे क्योंकि हमें पता था कि वो दवाइयां उम्र भर खानी पड़ेंगी। मेरे हस्बैंड हमेशा टीवी पर डॉक्टर प्रताप चौहान जी को फॉलो करते थे, तो उन्होंने सुझाव दिया कि हमें जीवा चलना चाहिए। हम जीवा के कालकाजी क्लिनिक गए, जहाँ हमें डायबिटीज मैनेजमेंट प्रोग्राम के बारे में पता चला। उस प्रोग्राम के तहत मेरे हाथ पर 15 दिन के लिए एक सेंसर लगाया गया, जो यह मॉनिटर करता था कि किस चीज को खाने से मेरा शुगर लेवल अप-डाउन हो रहा है। 

मॉनिटरिंग के बाद मेरी दवाइयां शुरू की गईं और उसके बहुत अच्छे परिणाम आए। मेरा HbA1c जो पहले 8.2 था, अब घटकर 6.4 आ गया है। मैं जीवा की मेडिसिंस और उनके द्वारा दिए गए डाइट चार्ट से बहुत खुश हूँ। 4 महीने के पैकेज के बाद मैं खुद को बहुत हेल्दी, एक्टिव और एनर्जेटिक महसूस कर रही हूँ। मैं डॉक्टर प्रताप चौहान और जीवा की पूरी टीम की बहुत शुक्रगुजार हूँ क्योंकि यहाँ पर्सनल अटेंशन दी जाती है। मैं आप सबसे भी यही कहूँगी कि अगर आपको डायबिटीज की प्रॉब्लम है, तो प्लीज जीवा जॉइन कीजिए।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

इस बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है:

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण लक्षणों (ब्लड शुगर) को नियंत्रित करना बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका दवाओं से ब्लड शुगर को तुरंत कम करना शरीर को अंदर से संतुलित कर मेटाबॉलिज़्म सुधारना
मूल कारण पर प्रभाव मेटाबॉलिज़्म की खराबी को ठीक नहीं करता कफ दोष और दूषित पाचन को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ शुगर कंट्रोल दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ और संतुलित आहार
दुष्प्रभाव दवा छोड़ते ही शुगर बढ़ना, किडनी/लिवर पर असर सामान्यतः सुरक्षित, प्राकृतिक सुधार
परिणाम अस्थायी नियंत्रण इंसुलिन रेजिस्टेंस में सुधार, स्थायी लाभ
समय जल्दी असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

परिवार में इतिहास होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • शरीर का वज़न तेज़ी से बढ़ने लगे और कंट्रोल न हो।
  • ब्लड शुगर का स्तर अचानक बहुत ज़्यादा बढ़ या घट जाए।
  • हमेशा प्यास लगे और बार-बार टॉयलेट जाना पड़े।
  • गर्दन और अंडरआर्म्स की त्वचा बहुत ज़्यादा काली और मोटी होने लगे।
  • घरेलू उपचार या परहेज़ करने के बाद भी थकान और कमज़ोरी बनी रहे।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और अंगों को स्थायी रूप से खराब होने से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से जेनेटिक डायबिटीज़ का कनेक्शन मुख्य रूप से कफ दोष के बिगड़ने तथा जठराग्नि के कमज़ोर होने से जुड़ा होता है। परिवार में इतिहास होने के बावजूद, गलत खान-पान, बैठे रहने वाली जीवनशैली और कमज़ोर पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स (आम) बनते हैं जो पैंक्रियाज़ के काम को कमज़ोर कर देते हैं। यही रुकावट इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं होने देती, जिससे शुगर बढ़ती है। सिर्फ बाहरी गोलियाँ खाने से शुगर कम हो जाती है लेकिन बीमारी मरती नहीं है। बचाव में पाचन की शुद्धि और पैंक्रियाज़ को ताकत देना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें कफ को संतुलित करना, हल्का खाना खाना, गुडमार-गिलोय जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना और शारीरिक मेहनत वाली दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को उभरने से पहले ही रोका जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, यह ज़रूरी नहीं है। जेनेटिक्स सिर्फ एक संभावना है। अगर आप सही डाइट और आयुर्वेदिक दिनचर्या का पालन करें, तो आप इस बीमारी से पूरी तरह बच सकते हैं।

नहीं, गोली सिर्फ खून से शुगर के स्तर को कम करती है। अंदरूनी तौर पर लिवर और पैंक्रियाज़ को ताकत दिए बिना यह बीमारी बनी रहती है।

हाँ, नया और पॉलिश किया हुआ सफेद चावल शरीर में तेज़ी से शुगर और फैट बढ़ाता है। आयुर्वेद में पुराना अनाज खाने की सलाह दी जाती है।

हाँ, गुडमार सबसे अच्छी प्राकृतिक जड़ी-बूटी है जो मीठा खाने की इच्छा को कम करती है और पैंक्रियाज़ को ताकत देती है।

हाँ, मैदे और केमिकल वाले जंक फूड शरीर का प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ देते हैं जिससे शरीर में टॉक्सिन्स और चर्बी तेज़ी से बढ़ती है।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार रात में देर तक जागने से शरीर का वात और पित्त बिगड़ता है, जो शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को रोक देता है और स्ट्रेस बढ़ाता है।

बिल्कुल, शारीरिक मेहनत न करने से शरीर का मेटाबॉलिज़्म धीमा पड़ जाता है जो फैट जमा होने और इंसुलिन रेजिस्टेंस के लिए अनुकूल माहौल देता है।

हाँ, मेथी दाना पाचन तंत्र को ठीक करता है और शरीर में इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाकर शुगर को कम करता है।

हाँ, लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर गुर्दों की नसों पर भारी दबाव डालता है, जिससे किडनी फेलियर का खतरा बढ़ जाता है।

हाँ, पेट साफ न होने और कब्ज़ से शरीर में गंदगी जमा होती है, जो पैंक्रियाज़ के काम को भारी कर देती है और मेटाबॉलिज़्म बिगाड़ देती है।

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