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हाइपरथायरॉइड: हार्मोन बढ़ने के कारण और असर क्या हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

रोज़ाना हार्मोन को दबाने वाली गोली का इस्तेमाल हाइपरथायरायडिज्म (थायरॉइड हार्मोन की अधिकता) और घबराहट जैसी बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ शरीर में हार्मोन की अधिकता को बाहर से कृत्रिम रूप से रोक कर लक्षणों को कुछ समय के लिए दबा देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मरीज़ को दवा छोड़ने के तुरंत बाद फिर से भयंकर घबराहट, दिल की धड़कन तेज़ होना और वज़न घटने की समस्या होने लगती है और बीमारी पहले से भी बड़े रूप में वापस आ जाती है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार बाहरी दवाएँ खाने से ग्रंथि का भ्रमित होना, बीमारी कितनी गंभीर है, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर में मौजूद अशुद्धियाँ और अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और थायरॉइड ग्रंथि की सेहत प्राकृतिक रूप से बनी रहे।

हाइपरथायरायडिज्म क्या है?

थायरॉइड हमारे गले के निचले हिस्से में मौजूद एक तितली के आकार की ग्रंथि है। इसका मुख्य काम शरीर के मेटाबॉलिज़्म और ऊर्जा को नियंत्रित करने वाले हार्मोन (T3 और T4) बनाना है। हाइपरथायरायडिज्म एक ऐसी स्थिति है, जहाँ यह ग्रंथि अति-सक्रिय हो जाती है और शरीर की ज़रूरत से बहुत ज़्यादा मात्रा में हार्मोन बनाने लगती है। आमतौर पर लोग इसका शिकार तनाव, गलत खान-पान, पित्त बढ़ने या ऑटोइम्यून बीमारी के कारण होते हैं। जब शरीर में थायरॉइड हार्मोन बढ़ जाता है, तो शरीर की पूरी मशीनरी बहुत तेज़ चलने लगती है, जिससे वज़न तेज़ी से घटने लगता है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है और पसीना बहुत आता है। हार्मोन को दबाने वाली गोली खाने पर ब्लड रिपोर्ट में टीएसएच (TSH) नॉर्मल आ जाता है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ रिपोर्ट को ठीक करती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस अनुकूल माहौल को ठीक नहीं करतीं जिसमें ग्रंथि अति-सक्रिय हुई है। दवा को बिना सोचे-समझे जीवन भर इस्तेमाल करना ग्रंथि को पूरी तरह भ्रमित कर देता है।

थायरॉइड असंतुलन की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

हार्मोन और एंडोक्राइन सिस्टम से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं

  • हाइपरथायरायडिज्म (Hyperthyroidism) यह मूल स्थिति है जिसमें ग्रंथि बहुत ज़्यादा हार्मोन बनाने लगती है। मेटाबॉलिज़्म तेज़ हो जाता है और टीएसएच का स्तर बहुत गिर जाता है।
  • ग्रेव्स डिज़ीज़ (Graves' Disease) यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है जहाँ शरीर की ही रोग प्रतिरोधक क्षमता थायरॉइड ग्रंथि को ज़्यादा हार्मोन बनाने के लिए उत्तेजित कर देती है।
  • थायरॉइड नोड्यूल्स (Thyroid Nodules) ग्रंथि में छोटी-छोटी गाँठें बन जाती हैं जो खुद अपना अलग हार्मोन बनाने लगती हैं।
  • थायरॉइडाइटिस (Thyroiditis) किसी इन्फेक्शन या इम्यून समस्या के कारण ग्रंथि में सूजन आ जाती है, जिससे जमा हुआ हार्मोन अचानक खून में मिल जाता है।

हाइपरथायरायडिज्म के लक्षण और संकेत

बार-बार शरीर में घबराहट होना या वज़न का बेतहाशा गिरना कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं

  • वज़न का तेज़ी से घटना बहुत ज़्यादा खाने के बावजूद शरीर का सूखना और वज़न का लगातार कम होना।
  • दिल की धड़कन बढ़ना और घबराहट आराम करते हुए भी दिल का तेज़ी से धड़कना (Palpitations) और हाथों का काँपना।
  • गर्मी बर्दाश्त न होना मौसम सामान्य होने पर भी शरीर में हमेशा बहुत ज़्यादा गर्मी और पसीना महसूस होना।
  • नींद न आना और चिड़चिड़ापन रात भर नींद न आना, बेचैनी और छोटी-छोटी बातों पर तेज़ गुस्सा आना।
  • मासिक धर्म में बदलाव महिलाओं में पीरियड्स का बहुत कम आना या अनियमित हो जाना।
  • ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

शरीर में थायरॉइड हार्मोन बढ़ने के मुख्य कारण क्या हैं?

थायरॉइड ग्रंथि के अति-सक्रिय होने और हार्मोन ज़्यादा बनने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं

  • पित्त और वात दोष का असंतुलन आयुर्वेद के अनुसार शरीर में पित्त (गर्मी) और वात (वायु) बढ़ने से अग्नि तेज़ हो जाती है और ग्रंथि अति-सक्रिय हो जाती है।
  • ग्रेव्स डिज़ीज़ यह एक ऑटोइम्यून कारण है जहाँ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही ग्रंथि को ज़्यादा हार्मोन बनाने के लिए उकसाती है।
  • मानसिक तनाव और एंग्जायटी ज़्यादा तनाव से दिमाग और एंडोक्राइन सिस्टम प्रभावित होता है, जो ग्रंथि के सामान्य काम में रुकावट पैदा करता है।
  • गलत खान-पान बहुत ज़्यादा तीखा, गर्म, कैफीन और मसालेदार भोजन खाने से शरीर में पित्त तेज़ी से भड़कता है।
  • आयोडीन की अधिकता खान-पान या दवाओं के ज़रिए शरीर में बहुत ज़्यादा आयोडीन का जाना।

हाइपरथायरायडिज्म के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

इस समस्या को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ बाहरी गोली पर निर्भर रहा जाए, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

  • हृदय रोग का खतरा दिल की धड़कन लगातार तेज़ रहने से हार्ट फेलियर या स्ट्रोक का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
  • हड्डियों का कमज़ोर होना (ऑस्टियोपोरोसिस) बहुत ज़्यादा हार्मोन हड्डियों से कैल्शियम खींच लेता है, जिससे वे भुरभुरी और कमज़ोर हो जाती हैं।
  • आँखों की समस्याएँ ग्रेव्स डिज़ीज़ में आँखें बाहर की तरफ निकल आती हैं, लाल रहती हैं और देखने में तकलीफ होती है।
  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन लगातार हार्मोनल असंतुलन से एंग्जायटी, पैनिक अटैक और गंभीर डिप्रेशन हो सकता है।
  • थायरॉइड स्टॉर्म यह एक जानलेवा स्थिति है जहाँ लक्षण अचानक बहुत भयंकर रूप ले लेते हैं और तेज़ बुखार आ जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से थायरॉइड हार्मोन का बढ़ना सिर्फ गले की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे मुख्य रूप से 'पित्त' और 'वात' दोष के बिगड़ने तथा 'भस्मक रोग' (जहाँ अग्नि सब कुछ जला देती है) से जोड़कर देखा जाता है। डॉक्टर नाड़ी और जीभ देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में बहुत ज़्यादा गर्मी और 'आम' (टॉक्सिन्स) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने गले के 'विशुद्ध चक्र' और नसों को अति-सक्रिय कर दिया है। जब तक यह बढ़ा हुआ पित्त और वात शरीर में रहेगा, ग्रंथि ज़्यादा हार्मोन बनाती रहेगी। आयुर्वेद में बस ब्लड रिपोर्ट को ठीक करना और ग्रंथि को सुन्न करने वाली गोली देना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, शरीर की गर्मी शांत हो और थायरॉइड ग्रंथि अपना काम प्राकृतिक रूप से संतुलित करे।

हाइपरथायरायडिज्म के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में थायरॉइड ग्रंथि को शांत करने और दोषों को संतुलित करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं

  • शंखपुष्पी यह नसों को शांत करने और अति-सक्रिय थायरॉइड ग्रंथि को नियंत्रित करने की सबसे बेहतरीन औषधि है।
  • ब्राह्मी आयुर्वेद में इसे दिमाग को आराम देने और तनाव (Stress) कम करने के लिए बहुत शक्तिशाली माना गया है। यह घबराहट को शांत करती है।
  • आमलकी (आँवला) यह शरीर की बढ़ी हुई गर्मी (पित्त) को शांत करता है, इम्युनिटी बढ़ाता है और मेटाबॉलिज़्म सुधारता है।
  • गिलोय यह शरीर में बढ़े हुए पित्त दोष को खत्म करती है, अंदरूनी इन्फेक्शन से बचाती है और ऑटोइम्यून स्थिति (ग्रेव्स डिज़ीज़) में बहुत फायदा करती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म शरीर की अंदरूनी सफाई

  • प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य और शांत ग्रंथि पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया
  • गहरी सफाई और शरीर शोधन जब थायरॉइड की समस्या पुरानी हो और दवा के डोज़ लगातार बदल रहे हों, तो जीवा आयुर्वेद में शरीर के दोषों को संतुलित करने के लिए विशेष पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय यह 7 से 15 दिनों तक चलने वाली शरीर की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • शिरोधारा और विरेचन तनाव और एंग्जायटी को शांत करने के लिए औषधीय तेल या मट्ठे से 'शिरोधारा' की जाती है, और शरीर की भयंकर गर्मी (पित्त) को मल के ज़रिए बाहर निकालने के लिए विरेचन कराया जाता है।
  • स्थायी राहत के लिए औषधियाँ अंदरूनी सफाई के साथ ग्रंथि को शांत करने वाली जड़ी-बूटियों का सेवन कराया जाता है। इससे सालों पुरानी भयंकर घबराहट और कमज़ोरी में राहत मिलती है।

थायरॉइड के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, थायरॉइड हार्मोन को प्राकृतिक रूप से संतुलित करने के लिए ठंडा (शीतल), हल्का और पित्त को शांत करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है

क्या खाएँ?

  • ठंडी तासीर वाली चीज़ें नारियल पानी, जौ का पानी और ताज़े फल खाएँ, यह शरीर के पित्त और गर्मी को शांत रखते हैं।
  • क्रूसिफेरस सब्ज़ियाँ फूलगोभी, पत्तागोभी और ब्रोकली खाएँ (पकाकर), यह प्राकृतिक रूप से थायरॉइड हार्मोन के निर्माण को धीमा करती हैं।
  • साबुत धनिया का पानी रात भर भिगोए हुए साबुत धनिये का पानी सुबह पिएँ, यह ग्रंथि को शांत करने के लिए बहुत अच्छी प्राकृतिक दवा है।

क्या न खाएँ?

  • ज़्यादा आयोडीन युक्त आहार समुद्री नमक और सी-फूड कम खाएँ क्योंकि आयोडीन थायरॉइड हार्मोन को तेज़ी से बढ़ाता है।
  • मिर्च-मसाले और गर्म चीज़ें ज़्यादा तीखा, लहसुन, प्याज़ और अचार बिल्कुल बंद कर दें, ये शरीर में पित्त भड़काते हैं।
  • चाय, कॉफी और कैफीन कैफीन दिल की धड़कन और एंग्जायटी को तेज़ी से बढ़ाता है, इसका सेवन बिल्कुल न करें।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा वजन पहले लगभग 85 किलो रहता था, लेकिन अचानक वह बढ़ना शुरू हुआ और 115 किलो तक पहुँच गया। जब मैंने डॉक्टर को दिखाया और टेस्ट करवाए, तो मुझे थायराइड डिटेक्ट हुआ। डॉक्टर ने मुझे 75mg की टैबलेट शुरू की, लेकिन उससे मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि सीने में दर्द की शिकायत होने लगी।

दोबारा जांच और अल्ट्रासाउंड कराने पर पता चला कि मुझे थर्ड ग्रेड फैटी लिवर (Fatty Liver Grade 3) है और किडनी में पथरी की भी समस्या है। मैं इतना परेशान हो गया कि मुझे रात को नींद आना भी बंद हो गई थी। फिर मुझे जीवा आयुर्वेद और डॉक्टर प्रताप चौहान के बारे में पता चला। जब मैंने कॉल किया, तो उन्होंने सबसे पहले मेरा वेट, हाइट और लाइफस्टाइल के बारे में विस्तार से पूछा और फिर दवाइयां शुरू कीं। जीवा का ट्रीटमेंट लेने के बाद मेरा थर्ड ग्रेड फैटी लिवर घटकर पहले ग्रेड 1 पर आया और अब वह पूरी तरह ठीक हो गया है।" मुझे लगता है कि अगर थायराइड का पता चलते ही मैं जीवा आयुर्वेद चला जाता, तो शायद मुझे फैटी लिवर, यूरिक एसिड और किडनी स्टोन जैसी समस्याओं का सामना ही न करना पड़ता। मेरी आप सबसे विनती है कि किसी भी समस्या के लिए जीवा आयुर्वेद जरूर जाएं ताकि आपको मेरी तरह परेशान न होना पड़े।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है

  • बीमारी और शरीर की स्थिति ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे आप कितने सालों से दवा खा रहे हैं, और मरीज़ का पित्त दोष कितना बढ़ा हुआ है।
  • हल्की समस्या में सुधार अगर समस्या अभी शुरू हुई है, तो आमतौर पर 1 से 3 महीने में ही घबराहट शांत होने लगती है और रिपोर्ट सुधर जाती है।
  • पुरानी बीमारी का समय अगर आप कई सालों से हाई डोज़ की दवाएँ ले रहे हैं, तो शरीर को पूरी तरह शांत होने और ग्रंथि को खुद संतुलित होने में 6 महीने से 1 साल तक का समय भी लग सकता है।
  • उपचार का तरीका इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से ग्रंथि को शांत करने वाली जड़ी-बूटियाँ, सही खानपान और व्यायाम शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो दोष संतुलित हो जाते हैं और भविष्य में दवाओं पर निर्भरता धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

थायरॉइड की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण हार्मोन को नियंत्रित करने पर केंद्रित बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका दवाओं से ग्रंथि को हार्मोन बनाने से रोकना शरीर को संतुलित कर ग्रंथि के कार्य को सामान्य करना
मूल कारण पर प्रभाव बीमारी के मूल कारण को पूरी तरह खत्म नहीं करता पित्त-वात असंतुलन और टॉक्सिन्स को संतुलित करता है
गंभीर स्थिति में उपाय रेडियोएक्टिव आयोडीन या सर्जरी से ग्रंथि को नष्ट करना ग्रंथि को सुरक्षित रखते हुए संतुलन बनाना
उपचार विधियाँ दवाइयाँ, रेडियोआयोडीन, सर्जरी जड़ी-बूटियाँ और संतुलित आहार
दुष्प्रभाव जीवनभर हार्मोन पर निर्भरता सामान्यतः सुरक्षित, प्राकृतिक सुधार
परिणाम अस्थायी नियंत्रण या ग्रंथि का नाश शरीर की प्राकृतिक हार्मोन संतुलन क्षमता में सुधार
समय जल्दी असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए

हाइपरथायरायडिज्म होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  • दिल की धड़कन बहुत ज़्यादा तेज़ हो जाए या छाती में दर्द महसूस हो।
  • वज़न इतनी तेज़ी से घटे कि शरीर भयंकर कमज़ोर हो जाए और चक्कर आएँ।
  • आँखों में भारी सूजन आ जाए और देखने में तकलीफ होने लगे।
  • महिलाओं में मासिक धर्म पूरी तरह से रुक जाए।
  • हमेशा तेज़ घबराहट, पैनिक अटैक और हाथों में बहुत ज़्यादा कंपन हो।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और जीवन भर की जटिलताओं से बचा जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से हाइपरथायरायडिज्म और शरीर में हार्मोन का बढ़ना मुख्य रूप से पित्त व वात दोष के बिगड़ने तथा शरीर में भयंकर गर्मी (अग्नि) के बढ़ने से जुड़ा होता है। तनाव, गलत खान-पान, कैफीन और ऑटोइम्यून स्थिति से गले के विशुद्ध चक्र में रुकावट आती है। सिर्फ रोज़ाना एंटी-थायरॉइड दवा खाने से ब्लड रिपोर्ट कुछ समय के लिए ठीक हो जाती है लेकिन ग्रंथि की अपनी क्षमता भ्रमित हो जाती है। इलाज में शरीर की अंदरूनी शुद्धि और पित्त को शांत करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसमें दोषों को संतुलित करना, साबुत धनिया का पानी पीना, शंखपुष्पी-ब्राह्मी जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना और तनाव मुक्त दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे ग्रंथि प्राकृतिक रूप से शांत हो और बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, अगर बीमारी की शुरुआत में ही सही आयुर्वेदिक इलाज और डाइट का पालन किया जाए, तो ग्रंथि को प्राकृतिक रूप से शांत करके संतुलित किया जा सकता है।

नहीं, यह दवा सिर्फ हार्मोन को बनने से रोकती है। अंदरूनी तौर पर पित्त को शांत किए बिना दवा छोड़ने पर यह बीमारी बार-बार लौटती है।

हाँ, आयुर्वेद में धनिये के पानी को पित्त शांत करने और थायरॉइड ग्रंथि की कार्यक्षमता को संतुलित करने के लिए बहुत अच्छा माना गया है।

हाँ, क्रूसिफेरस सब्ज़ियाँ प्राकृतिक रूप से थायरॉइड के अति-स्राव को धीमा करती हैं, इसलिए हाइपरथायरायडिज्म के रोगियों के लिए यह अच्छी मानी जाती हैं।

हाँ, ज़्यादा तनाव और चिंता सीधे तौर पर आपके नर्वस और एंडोक्राइन सिस्टम को उत्तेजित करते हैं, जिससे ग्रंथि अति-सक्रिय होती है और हार्मोन ज़्यादा बनता है।

हाँ, कैफीन शरीर में पित्त और गर्मी बढ़ाता है, जो सीधा दिल की धड़कन और एंग्जायटी को तेज़ करता है, इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

हाँ, ब्राह्मी सबसे अच्छी आयुर्वेदिक औषधि है जो नसों को शांत करती है, दिमाग को आराम देती है और हाथों का काँपना कम करती है।

ज़्यादातर मामलों में मेटाबॉलिज़्म बहुत तेज़ होने के कारण शरीर की कैलोरी तेज़ी से जलती है और वज़न लगातार कम होने लगता है।

हाँ, शरीर की पूरी मशीनरी तेज़ चलने से आँतों की गति भी तेज़ हो जाती है, जिससे खाना पचने से पहले ही मल के रूप में बाहर आने लगता है।

हाँ, गिलोय शरीर की इम्युनिटी को सही दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करती है और बढ़े हुए पित्त को प्राकृतिक रूप से शांत करती है।

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