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Intermittent Fasting सब को Suit करती है? आयुर्वेद की राय

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आजकल वजन घटाने और फिट रहने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग (Intermittent Fasting) एक बहुत बड़ा लाइफस्टाइल ट्रेंड बन चुका है। सीधी सी बात है, इसमें खाने का कोई नया मेन्यू नहीं होता, बल्कि खाने और उपवास का एक फिक्स पैटर्न फॉलो किया जाता है। बहुत से लोगों को इसे अपनाने के बाद शरीर में हल्कापन और बेहतर हाज़मा महसूस भी होता है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तरीका हर किसी के शरीर के लिए फिट बैठता है? आयुर्वेद का मानना है कि हर इंसान की प्रकृति (बॉडी टाइप), उसकी पाचक अग्नि (मेटाबॉलिज्म) और लाइफस्टाइल बिल्कुल अलग होती है। इसलिए जो डाइट प्लान किसी एक के लिए वरदान साबित हो सकता है, वही दूसरे के लिए कमजोरी, चक्कर या शरीर में भारी असंतुलन की वजह बन सकता है। एक ही लाठी से सबको नहीं हांका जा सकता।

आखिर क्या है ये इंटरमिटेंट फास्टिंग और क्यों है इतनी पॉपुलर?

सरल शब्दों में कहें तो यह खाने की टाइमिंग का एक खेल है। इसमें आप पूरे 24 घंटे को दो हिस्सों में बांट देते हैं: पहला खाने का समय और दूसरा उपवास का समय।

लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से अलग-अलग पैटर्न चुनते हैं:

  • 16:8 का पैटर्न: इसमें 16 घंटे भूखे रहना होता है और दिन के बचे हुए 8 घंटे के बीच ही खाना होता है (यह सबसे ज़्यादा पॉपुलर है)।
  • 14:10 का पैटर्न: इसमें 14 घंटे का उपवास और 10 घंटे की ईटिंग विंडो होती है।
  • अल्टरनेट डे फास्टिंग: कुछ लोग एक दिन छोड़कर एक दिन उपवास भी करते हैं।

वजन काबू में रखने, सुस्त पाचन को पटरी पर लाने और दिनभर एनर्जेटिक रहने के लिए लोग इसे धड़ल्ले से अपना रहे हैं। यह इसलिए भी पॉपुलर हुआ क्योंकि इसे फॉलो करना बहुत सीधा और सिंपल है, लेकिन बिना सोचे-समझे इसे आज़माना सही नहीं है।

क्या भूखे रहना हमारे शरीर के लिए एक नेचुरल प्रोसेस है?

देखा जाए तो इतिहास में इंसानों को हर वक्त खाना नहीं मिलता था। शिकार या खेती के भरोसे रहने के कारण हमारा शरीर कुदरती रूप से ऐसा बना है कि वह बिना खाए भी लंबे समय तक काम चला सके। इसलिए उपवास को एक पूरी तरह से नेचुरल बायोलॉजिकल प्रोसेस माना जाता है।

लेकिन आज का दौर बिल्कुल अलग है। अब हमारे आस-पास सिर्फ खाना ही नहीं बदला, बल्कि हमारा मानसिक तनाव, अधूरी नींद और काम करने का तरीका भी पूरी तरह बदल चुका है। आज हमारा शरीर सिर्फ खाने की कमी से ही नहीं जूझता, बल्कि हमारी बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल का बोझ भी उठाता है। यही वजह है कि आज के समय में फास्टिंग का असर हर इंसान पर एक जैसा नहीं होता।

किन लोगों को इंटरमिटेंट फास्टिंग से असली फायदा मिल सकता है?

यह तरीका हर किसी के लिए तो नहीं, लेकिन कुछ खास तरह की बॉडी और लाइफस्टाइल वाले लोगों के पाचन तंत्र को वापस रीसेट करने में बहुत मदद कर सकता है:

  • बढ़ता वजन और शरीर की एक्स्ट्रा चर्बी: अगर शरीर में फैट लगातार बढ़ रहा है, तो यह तरीका खाने की बेवजह की आदतों पर ब्रेक लगाता है और कैलोरी को बैलेंस करने में मदद करता है।
  • सुस्त पाचन और खाने के बाद भारीपन: अगर खाना खाने के तुरंत बाद आपको भारीपन महसूस होता है, पेट फूलता है या सुस्ती आने लगती है, तो यह पैटर्न आपके डाइजेस्टिव सिस्टम को थोड़ा आराम देकर उसे दोबारा एक्टिव करता है।
  • इंसुलिन का असंतुलन: जब शरीर में शुगर को प्रोसेस करने की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ जाती है, तो खाने के बीच लंबा गैप देने से मेटाबॉलिक बैलेंस को सुधरने का मौका मिलता है।
  • दिनभर बैठे रहने वाली जॉब: अगर आपकी लाइफस्टाइल ऐसी है जिसमें आपको घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करना पड़ता है और फिजिकल एक्टिविटी न के बराबर है, तो यह तरीका बेवजह की कैलोरी जमा होने से रोकता है।
  • हर थोड़ी देर में मंचिंग: जिन लोगों का खाने का कोई फिक्स टाइम नहीं होता और वे दिनभर कुछ न कुछ चबाते रहते हैं, उनके लिए यह तरीका एक बेहतरीन अनुशासन (डिसिप्लिन) लेकर आता है।

किन लोगों के लिए यह हानिकारक हो सकती है?

इंटरमिटेंट फास्टिंग हर शरीर के लिए उपयुक्त नहीं होती। कुछ स्थितियों में यह शरीर को संतुलन देने के बजाय और अधिक अस्थिर कर सकती है, खासकर जब पहले से कमजोरी या असंतुलन मौजूद हो।

  • कमजोर पाचन शक्ति वाले लोग: ऐसे लोगों में लंबे समय तक भूखे रहने से गैस, भारीपन और असहजता बढ़ सकती है और पाचन और भी कमजोर हो सकता है।
  • कम रक्तचाप वाले व्यक्ति: भोजन में लंबा अंतर होने से चक्कर, थकान और कमजोरी बढ़ सकती है क्योंकि शरीर को पर्याप्त ऊर्जा समय पर नहीं मिल पाती।
  • गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं: इस अवस्था में शरीर को लगातार पोषण की जरूरत होती है, इसलिए लंबे उपवास से ऊर्जा और पोषण की कमी हो सकती है।
  • लगातार थकान महसूस करने वाले लोग: पहले से ही ऊर्जा की कमी होने पर उपवास शरीर की कमजोरी को और बढ़ा सकता है और दिनभर थकान महसूस हो सकती है।
  • चिंता और मानसिक तनाव वाले लोग: लंबे समय तक भूखे रहने से मानसिक बेचैनी, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है, जिससे मन और अधिक असंतुलित हो सकता है।

उपवास के दौरान शरीर द्वारा दिए जाने वाले चेतावनी संकेत

अगर उपवास के दौरान शरीर लगातार असहज संकेत देने लगे, तो उन्हें सामान्य मानकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। यह संकेत शरीर में ऊर्जा और संतुलन की कमी की ओर इशारा कर सकता है।

  • अत्यधिक थकान: शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस होना और हल्का काम करने पर भी जल्दी थक जाना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल रहा।
  • चक्कर आना: लंबे समय तक खाली पेट रहने से रक्त शर्करा या ऊर्जा स्तर गिर सकता है, जिससे सिर हल्का लगना या चक्कर आना महसूस हो सकता है।
  • मूड में अचानक बदलाव: बिना कारण चिड़चिड़ापन या उदासी बढ़ना शरीर और मन के असंतुलन का संकेत हो सकता है।
  • नींद में गड़बड़ी: नींद का बार-बार टूटना या ठीक से नींद न आना शरीर की लय प्रभावित होने का संकेत हो सकता है।
  • चिड़चिड़ापन और बेचैनी: भूख या ऊर्जा की कमी से मानसिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है, जिससे चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।

ये संकेत बताते हैं कि शरीर को अधिक संतुलित पोषण और देखभाल की आवश्यकता हो सकती है।

इंटरमिटेंट फास्टिंग या उपवास के संभावित नुकसान

उपवास हर व्यक्ति के लिए समान रूप से लाभकारी नहीं होता। गलत तरीके या असंतुलित शरीर में इसे अपनाने से कुछ दुष्प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं।

  • कमजोरी और ऊर्जा की कमी: लंबे समय तक भोजन न करने से शरीर में थकान, सुस्ती और काम करने की क्षमता में कमी महसूस हो सकती है।
  • पाचन असंतुलन: कुछ लोगों में उपवास के बाद गैस, भारीपन या अम्लता जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
  • मानसिक अस्थिरता: भूखे रहने से चिड़चिड़ापन, चिंता और मूड स्विंग्स बढ़ सकते हैं, खासकर संवेदनशील लोगों में।
  • हार्मोनल असंतुलन: लंबे समय तक गलत तरीके से उपवास करने से शरीर के हार्मोन संतुलन पर असर पड़ सकता है, जिससे नींद और ऊर्जा प्रभावित होती है।
  • अत्यधिक भूख और ओवरईटिंग: उपवास के बाद अधिक खाने की आदत बन सकती है, जिससे वजन और पाचन दोनों पर नकारात्मक असर पड़ता है।

इसलिए उपवास हमेशा शरीर की प्रकृति और क्षमता को समझकर ही अपनाना चाहिए।

आयुर्वेद के हिसाब से फास्टिंग और आपकी बॉडी का कनेक्शन

आयुर्वेद में उपवास (फास्टिंग) को "लंघन" कहा जाता है। इसका मतलब सिर्फ भूखे रहना या पेट को खाली छोड़ देना बिल्कुल नहीं है। इसका असली काम है शरीर के अंदर सालों से जमा हुई गंदगी (टॉक्सिन्स) को जलाना और बुझ चुकी पेट की आग (पाचन) को दोबारा भड़काना। लेकिन, एक ही तरीका हर किसी पर फिट नहीं बैठ सकता, क्योंकि हम सबकी बॉडी (वात, पित्त या कफ) एक-दूसरे से एकदम अलग होती है।

यही वजह है कि फास्टिंग का असर हर बॉडी टाइप पर अलग-अलग दिखाई देता है:

  • वात प्रकृति: जिन लोगों के शरीर में 'वात' (हवा) ज़्यादा होता है, उनका शरीर पहले से ही थोड़ा सूखा और हल्का होता है। अगर ये लोग बहुत लंबा उपवास रख लें, तो शरीर का रूखापन और बढ़ जाता है। फिर इन्हें बहुत जल्दी कमज़ोरी लगने लगती है, चक्कर आने लगते हैं और बिना बात की घबराहट शुरू हो जाती है।
  • पित्त प्रकृति: ऐसे लोगों के पेट में पहले से ही काफी गर्मी (एसिड) होती है। अगर ये थोड़ी देर भी भूखे रह जाएं, तो पेट और सीने में भयंकर जलन होने लगती है, खट्टी डकारें आती हैं और बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ापन होने लगता है।
  • कफ प्रकृति: इन लोगों का पाचन थोड़ा सुस्त होता है और शरीर में अक्सर भारीपन रहता है। ऐसे लोगों के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग सबसे बढ़िया काम करती है। इससे उनका फालतू फैट बहुत तेज़ी से पिघलता है, सुस्ती भाग जाती है और शरीर में गज़ब की फुर्ती आ जाती है।

फास्टिंग के दौरान आपका खान-पान कैसा होना चाहिए?

सिर्फ भूखे रहने से बात नहीं बनेगी। आप उपवास खोलने के बाद क्या खा रहे हैं, यह शरीर को अंदर से ताक़त देने के लिए बहुत ज़रूरी है।

क्या खाना चाहिए?

  • बिल्कुल ताज़ा और पचने में हल्का खाना।
  • सीज़न वाले ताज़े फल और हरी सब्ज़ियाँ।
  • मूंग की दाल और हल्की-फुल्की खिचड़ी।
  • हल्का गुनगुना पानी और नॉर्मल ड्रिंक्स।
  • सौंफ और अजवाइन जैसी चीज़ें, जो हाज़मा दुरुस्त रखती हैं।

किन चीज़ों से दूर रहें?

  • बहुत ज़्यादा तेल-मसाले वाला या तला-भुना खाना।
  • कोल्ड ड्रिंक्स या सोडे वाली चीज़ें।
  • पैकेट बंद और कई दिनों तक रखा हुआ (प्रोसेस्ड) खाना।
  • ऐसी चीज़ें जिनमें चीनी या मीठा बहुत ज़्यादा हो।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

इंटरमिटेंट फास्टिंग हर किसी की बॉडी को सूट नहीं करती। इसलिए अपने शरीर के इशारों को कभी भी इग्नोर न करें:

  • अगर आपको हर वक्त भयंकर कमज़ोरी या थकावट लग रही हो।
  • चक्कर आ रहे हों या अचानक से एनर्जी बिल्कुल डाउन हो जाए।
  • रातों की नींद खराब होने लगे।
  • बिना बात के गुस्सा आए या मूड बहुत ज़्यादा ऊपर-नीचे होने लगे।
  • फास्टिंग खोलने के बाद आप खुद को रोक न पाएं और हद से ज़्यादा ठूंस-ठूंस कर खा लें।
  • शरीर में अजीब सी उलझन या बेचैनी महसूस होने लगे।
  • अगर आपकी कोई पुरानी बीमारी और ज़्यादा बिगड़ जाए।
  • जब फास्टिंग के चक्कर में आपके रोज़मर्रा के काम और ज़िंदगी डिस्टर्ब होने लगे।

निष्कर्ष

इंटरमिटेंट फास्टिंग को सिर्फ वज़न घटाने का कोई नया 'ट्रेंड' मत समझिए। यह सीधे तौर पर आपके शरीर और जीने के तरीके से जुड़ी एक बहुत गहरी प्रोसेस है। आज के समय में लोग इसे सिर्फ वज़न घटाने की मशीन मानते हैं, लेकिन आयुर्वेद इसे आपके हाज़मे, वात के बैलेंस और आपकी बॉडी टाइप के हिसाब से तौलता है।

अगर आप बिना सोचे-समझे किसी की देखा-देखी इसे शुरू कर देंगे, तो यह फायदे की जगह आपके शरीर का पूरा सिस्टम बिगाड़ कर रख देगी। इसलिए, अपनी बॉडी के इशारों को समझिए, अपने डेली रूटीन और बॉडी टाइप को ध्यान में रखकर ही इसे अपनाइए, तभी यह आपको लंबे समय तक फिट रख पाएगी।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करने से पहले शरीर की तैयारी इसलिए जरूरी होती है क्योंकि हर व्यक्ति की पाचन शक्ति और ऊर्जा स्तर अलग होता है। यदि शरीर पहले से कमजोर या असंतुलित हो, तो अचानक बदलाव से थकान या चक्कर जैसे लक्षण बढ़ सकते हैं। धीरे-धीरे दिनचर्या बदलने से शरीर बेहतर तरीके से अनुकूल हो पाता है। यह प्रक्रिया को सुरक्षित और अधिक प्रभावी बनाता है।

हाँ, इस दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पानी शरीर को हाइड्रेट रखता है और ऊर्जा संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। कम पानी पीने से सिरदर्द, कमजोरी और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए उपवास के दौरान तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

कुछ लोगों में शुरुआती समय में नींद पर असर देखा जा सकता है क्योंकि शरीर नई दिनचर्या के साथ तालमेल बिठा रहा होता है। भूख या ऊर्जा में बदलाव नींद को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन समय के साथ संतुलन बनने पर नींद बेहतर भी हो सकती है। यह पूरी तरह व्यक्ति की जीवनशैली पर निर्भर करता है।

कुछ लोगों में शुरुआत में मानसिक अस्थिरता या ध्यान में कमी महसूस हो सकती है। यह शरीर में ऊर्जा के बदलाव के कारण होता है। जैसे-जैसे शरीर अनुकूल होता है, एकाग्रता में सुधार भी देखा जा सकता है। यह प्रभाव हर व्यक्ति में अलग होता है।

नहीं, हर आयु वर्ग के लिए इसका प्रभाव अलग हो सकता है। युवाओं में यह अधिक आसानी से सहन हो सकता है, जबकि बुजुर्गों में सावधानी की आवश्यकता होती है। बच्चों या बहुत कमजोर शरीर वाले लोगों के लिए यह उपयुक्त नहीं माना जाता। शरीर की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण कारक होती है।

 हल्का व्यायाम कई लोगों के लिए लाभकारी हो सकता है क्योंकि यह शरीर को सक्रिय रखता है। लेकिन अत्यधिक व्यायाम उपवास के दौरान कमजोरी बढ़ा सकता है। संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है ताकि शरीर पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

कुछ लोग इसे लंबे समय तक अपनाते हैं, लेकिन यह पूरी तरह शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। यदि शरीर संतुलित महसूस करता है तो इसे जारी रखा जा सकता है। लेकिन किसी भी प्रकार की असहजता होने पर इसे संशोधित करना बेहतर होता है।

 शुरुआती दिनों में कुछ लोगों को सिरदर्द महसूस हो सकता है। इसका कारण पानी की कमी या ऊर्जा स्तर में बदलाव हो सकता है। यदि यह लगातार बना रहे तो दिनचर्या पर पुनर्विचार करना जरूरी होता है।

 हाँ, यह पाचन प्रणाली को प्रभावित कर सकता है क्योंकि भोजन का समय बदल जाता है। कुछ लोगों में सुधार होता है जबकि कुछ में असहजता बढ़ सकती है। यह पूरी तरह शरीर की प्रकृति पर निर्भर करता है।

 हल्के बदलाव कुछ लोग खुद भी शुरू कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक या कठोर पैटर्न अपनाने से पहले सलाह लेना बेहतर होता है। इससे शरीर की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति को समझकर सही दिशा मिलती है। यह जोखिम को कम करता है और परिणाम को बेहतर बनाता है।

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