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Screen Time से Eyes, Sleep और Neck Pain क्यों बढ़ रहे हैं? - Ayurveda Lifestyle View

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 27 May, 2026
  • category-iconUpdated on 11 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5033

सुबह उठते ही आँखों में भारीपन और सूखापन महसूस होना। रात को बिस्तर पर लेटने के घंटों बाद भी नींद न आना और करवटें बदलते रहना। और दिन भर लैपटॉप के सामने बैठते-बैठते गर्दन और कंधों का पत्थर की तरह सख्त हो जाना। आज के इस डिजिटल युग में, स्क्रीन टाइम ने हमारी ज़िंदगी को जितना आसान बनाया है, उतना ही हमारे शरीर के ऊपरी हिस्से आँखों, मस्तिष्क और गर्दन को एक ऐसे भयानक तनाव Digital Stress में धकेल दिया है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

हम अक्सर आँखों की जलन को नींद की कमी मान लेते हैं, नींद न आने को काम का तनाव समझ लेते हैं और गर्दन के दर्द के लिए गलत तकिये को दोष दे देते हैं। लेकिन यह इतनी साधारण बात नहीं है। यह आपके शरीर की उन नाज़ुक नसों, मांसपेशियों और दोषों की चीख है जो लगातार नीली रोशनी Blue Light और गलत पोश्चर के भारी हमले से कुचली जा रही हैं। अगर स्क्रीन टाइम की वजह से आँखों का भारीपन, नींद की कमी और गर्दन का दर्द रोज़ की आदत बन जाए, तो समझ लीजिए कि आप डिजिटल टॉक्सिक ओवरलोड की चपेट में आ चुके हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना आगे चलकर आपकी दृष्टि, मानसिक शांति और शरीर की गतिशीलता हमेशा के लिए छीन सकता है।

लगातार स्क्रीन टाइम आँखों, नींद और गर्दन में क्या संकेत देता है?

मोबाइल और लैपटॉप का 8-10 घंटे का अत्यधिक इस्तेमाल हमारे शरीर के ऊपरी हिस्से Urdhvajatrugata क्षेत्र पर एक ऐसा भारी दबाव डालता है, जिसके लिए हमारा सिस्टम प्राकृतिक रूप से नहीं बना है।

  • कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम Computer Vision Syndrome: स्क्रीन को लगातार घूरने से हम पलकें झपकाना कम कर देते हैं सामान्यतः 15 बार प्रति मिनट से घटकर 4-5 बार। इससे आँखों का प्राकृतिक पानी सूखने लगता है। इसके कारण आँखों में लालिमा, जलन, सूखापन Dry Eyes और धुंधलापन रहने लगता है।
  • नीली रोशनी और मेलाटोनिन Blue Light & Melatonin Suppression: मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली नीली रोशनी हमारे दिमाग को यह भ्रम देती है कि अभी दिन है। इससे नींद लाने वाला हार्मोन मेलाटोनिन बनना बंद हो जाता है। यही कारण है कि घंटों थकान के बाद भी बिस्तर पर नींद नहीं आती Insomnia और हमारा स्लीप साइकिल पूरी तरह टूट जाता है।
  • टेक्स्ट नेक Text Neck और सर्वाइकल का दबाव: मोबाइल या लैपटॉप देखने के लिए लगातार गर्दन को आगे की तरफ झुकाए रखने से गर्दन की मांसपेशियों और रीढ़ की हड्डी पर कई गुना ज़्यादा वज़न पड़ता है। यह लगातार खिंचाव गर्दन Cervical Spine की नसों को जकड़ लेता है, जिससे दर्द कंधों और सिर के पिछले हिस्से तक पहुँचता है।

आँखों का डैमेज, स्लीप डिसऑर्डर और गर्दन का दर्द किन प्रकारों में सामने आता है?

हर व्यक्ति का शरीर और स्क्रीन इस्तेमाल करने का तरीका अलग होता है। आयुर्वेद के अनुसार, डिजिटल स्ट्रेस से शरीर पर पड़ने वाला यह प्रभाव वात, पित्त और कफ दोषों के आधार पर तीन प्रकारों में देखा जा सकता है:

  • वात-प्रधान लक्षण Vata-dominant: वात बढ़ने से शरीर में रूखापन आता है। आँखों में भयंकर सूखापन जैसे रेत चुभ रही हो, गर्दन में कट-कट की आवाज़ आना, और दिमाग में लगातार विचार चलते रहने के कारण उथली और कच्ची नींद आना। व्यक्ति आधी रात को उठ जाता है और फिर सो नहीं पाता।
  • पित्त-प्रधान लक्षण Pitta-dominant: स्क्रीन की गर्मी और रेडिएशन से आँखों का आलोचक पित्त भड़क जाता है। आँखें लाल हो जाती हैं और उनमें से गर्म पानी आता है। नींद न आने के साथ-साथ चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और गर्दन में जलन वाला दर्द महसूस होता है।
  • कफ-प्रधान लक्षण Kapha-dominant: इसमें आँखों के नीचे भारी सूजन Puffy eyes आ जाती है। सुबह उठने पर गर्दन और कंधों में भारी जकड़न महसूस होती है। व्यक्ति 8-9 घंटे सोने के बाद भी हमेशा क्रोनिक फटीग Chronic fatigue और आलस से घिरा रहता है।

क्या आपमें भी इस डिजिटल डैमेज के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

यह नुकसान रातों-रात नहीं होता। शरीर बहुत पहले से अलार्म बजाता है, जिसे हम अक्सर काम की थकावट मानकर टाल देते हैं। अगर आपको रोज़ाना ये संकेत दिख रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • शाम होते-होते धुंधलापन Blurred Vision: दिन के अंत में स्क्रीन या दूर की चीज़ों को देखने पर फोकस न कर पाना और आँखों को ज़ोर से मलने की ज़रूरत महसूस होना।
  • नींद आने में 30 मिनट से ज़्यादा लगना: बिस्तर पर लेटने के बाद नींद आने में बहुत समय लगना और सुबह उठने पर दिमाग का थका हुआ महसूस होना
  • सिर के पिछले हिस्से से गर्दन तक भारीपन: काम करते समय सिर के पीछे वाले हिस्से Occipital region में भारीपन और गर्दन घुमाने में दर्द या रुकावट का महसूस होना।
  • आँखों में लाइट चुभना Photophobia: तेज़ रोशनी या अचानक धूप में जाने पर आँखों का न खुल पाना और तेज़ सिरदर्द ट्रिगर हो जाना।

इस में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ क्या हैं?

लक्षणों से तुरंत राहत पाने और अपना काम चालू रखने की जल्दबाज़ी में, मरीज़ अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो समस्या को स्थायी रूप से डैमेज कर देते हैं:

  • आई ड्रॉप्स और स्लीपिंग पिल्स का रोज़ाना सेवन: बिना डॉक्टर की सलाह के रोज़ाना लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स डालना और नींद के लिए मेलाटोनिन या स्लीपिंग पिल्स खाना। इससे शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली सुस्त पड़ जाती है और आप इन दवाओं के गुलाम बन जाते हैं।
  • गलत पोश्चर और तकिये को नज़रअंदाज़ करना: दर्द होने के बावजूद अपने बैठने के तरीके Ergonomics को न सुधारना और दर्द से बचने के लिए मोटे-मोटे तकियों का इस्तेमाल करना, जो सर्वाइकल के गैप को और बिगाड़ देता है।
  • पेनकिलर्स पर निर्भरता: गर्दन के दर्द के लिए रोज़ाना दर्द निवारक गोलियाँ खाना, जो आपकी किडनी और पेट की परत को डैमेज कर देता है, लेकिन जिस जगह नस दबी है, वहां कोई आराम नहीं मिलता।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएँ: अगर इसे ठीक न किया जाए, तो यह सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस Cervical spondylosis, क्रोनिक इनसोमनिया लंबे समय तक नींद न आना, और कॉर्नियल डैमेज Corneal damage का भयंकर रूप ले लेती है।

आयुर्वेद स्क्रीन टाइम से होने वाली इन समस्याओं को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम और सर्वाइकल कहता है, आयुर्वेद उसे उर्ध्वजत्रुगत गर्दन से ऊपर के रोगों और दोषों के गंभीर प्रकोप के विज्ञान से समझता है।

  • आलोचक पित्त और तर्पक कफ का सूखना: आँखों की दृष्टि आलोचक पित्त और दिमाग की शांति तर्पक कफ द्वारा नियंत्रित होती है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आलोचक पित्त को भड़काती है और तर्पक कफ को सुखा देती है, जिससे आँखों में जलन और नींद गायब हो जाती है।
  • प्राण वात और व्यान वात का असंतुलन: मोबाइल में लगातार स्क्रॉलिंग और रेडिएशन से दिमाग का प्राण वात उत्तेजित हो जाता है, जिससे नर्वस सिस्टम हाइपर-एक्टिव हो जाता है और नींद नहीं आती।
  • गर्दन में संधिगत वात: घंटों सिर झुकाकर काम करने से गर्दन ग्रीवा के स्थान पर वात रूखापन बढ़ जाता है और नसों व मांसपेशियों के चैनल Srotas ब्लॉक हो जाते हैं, जिससे जकड़न और दर्द आता है।

आँखों, नींद और गर्दन के लिए बेहतरीन आयुर्वेदिक डाइट

आपका खाना ही आपके वात और पित्त को भड़का भी सकता है और उन्हें दोबारा शांत भी कर सकता है। इस डिजिटल स्ट्रेस से बचने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन में अनिवार्य रूप से शामिल करें।

आहार की श्रेणी क्या खाएं फायदेमंद - दोषों को शांत करने वाले क्या न खाएं ट्रिगर फूड्स - रूखापन और गर्मी बढ़ाने वाले
अनाज Grains पुराना चावल, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, रूखे बिस्कुट।
वसा Fats देसी गाय का शुद्ध घी आँखों और मस्तिष्क के लिए अमृत, बादाम रोगन। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, डालडा, बाज़ार का बटर।
सब्ज़ियाँ Veg लौकी, तरोई, गाजर विटामिन A, पालक, सीताफल। अत्यधिक मिर्च-मसालेदार सब्ज़ियाँ, कच्चा सलाद, बैंगन।
फल और मेवे रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, किशमिश, पपीता, मीठे सेब। डिब्बाबंद और खट्टे फल, बाज़ार के रोस्टेड व नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ हल्दी और अश्वगंधा वाला दूध रात में, ताज़ा मट्ठा, जीरा पानी। बहुत ज़्यादा कैफीन कॉफी नींद और आँखों का पानी सुखाती है।

आँखों, नींद और गर्दन को प्राकृतिक ताक़त देने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के दर्द को खींच लेते हैं और डैमेज हो चुके सिस्टम को दोबारा ज़िंदा कर देते हैं:

  • त्रिफला Triphala: आँखों के लिए त्रिफला से बड़ा कोई वरदान नहीं है। यह आलोचक पित्त को शांत करता है। त्रिफला के पानी से आँखें धोने Netra Prakshalana से आँखों की थकावट और सूखापन तुरंत दूर होता है।
  • अश्वगंधा Ashwagandha: नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी दूर करने और डिजिटल स्ट्रेस को गिराने के लिए अश्वगंधा एक अद्भुत रसायन है। यह कॉर्टिसोल स्ट्रेस हार्मोन को कम करके गहरी और शांतिपूर्ण नींद लाता है।
  • ब्राह्मी Brahmi: लगातार स्क्रीन देखने से जब दिमाग की नसें भारी होने लगती हैं, तो ब्राह्मी नर्वस सिस्टम को जादुई शांति और फौलादी ठंडक प्रदान करती है, जिससे नींद की गुणवत्ता Sleep Quality सुधरती है।
  • शल्लकी Shallaki: यह जड़ी-बूटी आयुर्वेद में जोड़ों की समस्याओं और विशेषकर गर्दन Cervical की जकड़न और सूजन को तेज़ी से घटाने के लिए बहुत अचूक मानी जाती है।
  • सर्पगंधा Sarpagandha: गंभीर इनसोमनिया और मानसिक तनाव को कम करने के लिए इसका आयुर्वेद में सटीक उपयोग किया जाता है।

आँखों की रोशनी, नींद और गर्दन का दर्द मिटाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और जकड़न बहुत गहराई तक सर्वाइकल में जम चुकी हो या आँखें पूरी तरह रूखी हो चुकी हों, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • नेत्र तर्पण Netra Tarpana: आँखों के चारों ओर उड़द की दाल का घेरा बनाकर उसमें हल्का गर्म औषधीय घी भरा जाता है। यह सूखी आँखों Dry Eyes को गहरा पोषण देता है, दृष्टि तेज़ करता है और नीली रोशनी के डैमेज को खत्म करता है।
  • शिरोधारा Shirodhara: माथे के बीच आज्ञा चक्र पर औषधीय तेल या काढ़े की लगातार धार गिराई जाती है। यह प्राण वात को तुरंत शांत करती है, स्ट्रेस को शून्य कर देती है और रातों की गायब हुई नींद को वापस ले आती है।
  • ग्रीवा बस्ती Greeva Basti: गर्दन के पीछे गर्म औषधीय तेल रोककर की जाने वाली यह थेरेपी सूखी हुई सर्वाइकल नसों को भारी चिकनाई देती है, जिससे गर्दन की जकड़न और दर्द तुरंत रुक जाता है।
  • नस्य Nasya: नाक के ज़रिए औषधीय तेल जैसे अणु तेल डालने की यह थेरेपी सीधे दिमाग, आँखों और गर्दन की ब्लॉक हुई नसों को खोलती है। "नासा हि शिरसो द्वारम" नाक सिर का द्वार है, इसलिए यह इन सभी समस्याओं में अचूक है।

आँखों, नींद और गर्दन के पूरी तरह रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

बरसों से स्क्रीन और गलत पोश्चर के कारण बिगड़े हुए सिस्टम को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और डाइट से आपका पाचन सुधरेगा। आँखों की जलन और गर्दन की भारी जकड़न में कमी आएगी। नींद आने में लगने वाला समय Sleep latency कम होने लगेगा।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से नसों और आँखों का रूखापन खत्म होने लगेगा। गर्दन की मूवमेंट पूरी तरह वापस आ जाएगी और आप बिना स्लीपिंग पिल्स के अच्छी नींद ले सकेंगे।
  • 5-6 महीने: आलोचक पित्त और तर्पक कफ का संतुलन पूरी तरह स्थापित हो जाएगा। आप बिना किसी दर्द या आँखों की थकान के एक सामान्य, ऊर्जावान और दर्द-मुक्त जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

इस समस्या के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा Symptomatic care आयुर्वेद Holistic care
इलाज का मुख्य लक्ष्य लक्षणों को दबाने के लिए पेनकिलर्स, स्लीपिंग पिल्स और लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स देना। वात-पित्त को शांत करना, तनाव दूर करना और आँखों व दिमाग को प्राकृतिक पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया आँखों, गर्दन और नींद को तीन अलग-अलग बीमारियाँ मानकर अलग-अलग इलाज करना। इन सभी को कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और अत्यधिक मानसिक तनाव का एक ही सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल एर्गोनॉमिक्स की सलाह दी जाती है, लेकिन जठराग्नि या मन की शांति पर कोई खास ज़ोर नहीं दिया जाता। वात-शामक डाइट, स्क्रीन डिटॉक्स, त्राटक ध्यान और औषधीय तेलों की मालिश को इलाज का आधार माना जाता है।
लंबा असर दवाइयाँ छोड़ने पर लक्षण तुरंत वापस आ जाते हैं और शरीर दवाओं का आदी हो जाता है। शरीर अंदर से मज़बूत होता है और सिस्टम खुद को हील कर लेता है, जिससे इंसान स्थायी रूप से स्वस्थ रहता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस डिजिटल डैमेज को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • अचानक दृष्टि में भारी कमी आना: अगर आपकी आँखों की रोशनी अचानक कम हो जाए या आपको चीज़ें दो-दो दिखाई देने Double vision लगें।
  • गर्दन से हाथों तक असहनीय तेज़ दर्द: अगर गर्दन का दर्द बिजली के झटके की तरह हाथों और उँगलियों तक जाए और उँगलियाँ सुन्न पड़ने लगें।
  • लगातार कई रातों तक नींद का बिल्कुल न आना: अगर आप बिना झपकी लिए 3-4 दिन गुज़ार दें और मानसिक संतुलन बिगड़ने लगे या बहुत ज़्यादा चक्कर Vertigo आने लगें।

निष्कर्ष

लैपटॉप पर काम करना और मोबाइल पर दुनिया खोजना आज हमारी ज़रूरत बन चुका है, लेकिन रोज़ सुबह आँखों में चुभन, अधूरी नींद और पत्थर जैसी सख्त गर्दन आपकी सामान्य दिनचर्या का हिस्सा नहीं हैं। यह आपके शरीर का वह चीखता हुआ अलार्म है जो बता रहा है कि आपके वात और पित्त दोष भड़क चुके हैं, और आपका सिस्टम भारी दबाव में दम तोड़ रहा है। जब आप इस अलार्म को रोज़ाना पेनकिलर्स, आई ड्रॉप्स और नींद की कृत्रिम गोलियों से दबाते हैं, तो आप शरीर को हील करने के बजाय उसे स्थायी रूप से अपाहिज कर रहे होते हैं।

इस डिजिटल टॉक्सिक ओवरलोड के चक्र से बाहर निकलें। अपने पोश्चर को सुधारें, सोने से एक घंटे पहले स्क्रीन से ब्रेक लें और अपनी डाइट में शुद्ध गाय का घी शामिल करें। अश्वगंधा, ब्राह्मी और त्रिफला जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और नेत्र तर्पण व शिरोधारा से अपनी सूखी हुई आँखों और दिमाग को प्राकृतिक शांति देकर नया जीवन दें। स्क्रीन के कारण अपने शरीर को कमज़ोर न पड़ने दें, और जड़ से इलाज के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

स्क्रीन को घूरते समय हम पलकें झपकाना (Blinking) बहुत कम कर देते हैं। इससे आँखों को नमी देने वाला आँसू (Tear film) तेज़ी से भाप बनकर उड़ जाता है और वात दोष बढ़ने से आँखों में गंभीर सूखापन आ जाता है।

नीली रोशनी (Blue Light) हमारे मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि को भ्रमित कर देती है कि अभी दिन है, जिससे नींद का हार्मोन मेलाटोनिन नहीं बन पाता। आयुर्वेद के अनुसार यह सीधे प्राण वात को भड़काता है, जिससे नींद टूट जाती है।

बिल्कुल। स्क्रीन को देखने के लिए सिर को आगे झुकाने (Text Neck Posture) से रीढ़ की हड्डी पर सिर का वज़न कई गुना बढ़ जाता है। इससे गर्दन की मांसपेशियों में वात (जकड़न) जम जाता है और सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस शुरू हो जाता है।

हाँ, त्रिफला जल से आँखें धोना (नेत्र प्रक्षालन) आलोचक पित्त को शांत करने का सबसे बेहतरीन और सुरक्षित आयुर्वेदिक उपाय है। यह आँखों की गंदगी और गर्मी निकालकर दृष्टि को तेज़ करता है।

हाँ, सोने से पहले सोशल मीडिया या न्यूज़ देखने से दिमाग में कॉर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है। इससे नर्वस सिस्टम उत्तेजित रहता है और आप शारीरिक रूप से थके होने के बावजूद मानसिक रूप से सो नहीं पाते।

शिरोधारा में माथे पर लगातार औषधीय तेल की धार गिराई जाती है। यह दिमाग की उत्तेजित नसों को जादुई शांति देती है, प्राण वात को संतुलित करती है और मन को उस गहरी ध्यान की अवस्था में ले जाती है, जहाँ से प्राकृतिक नींद की शुरुआत होती है।

आँखों की गर्मी (पित्त) दूर करने के लिए ठंडे पानी के छींटे मारना फायदेमंद है, लेकिन बहुत ज़्यादा बर्फ जैसा ठंडा पानी इस्तेमाल न करें। सामान्य या हल्के ठंडे पानी का इस्तेमाल ही आयुर्वेद में सुरक्षित माना गया है।

हाँ, इसे सर्विकोजेनिक हेडेक (Cervicogenic Headache) कहते हैं। जब गर्दन की मांसपेशियाँ स्क्रीन टाइम के कारण जकड़ जाती हैं, तो यह तनाव पीछे की नसों के ज़रिए सीधे सिर तक पहुँचता है और तेज़ सिरदर्द ट्रिगर करता है।

गर्दन की जकड़न (वात) को खोलने के लिए हमेशा वात-शामक तेल (जैसे महानारायण तेल, बला तेल या शुद्ध तिल का तेल) का ही उपयोग करना चाहिए। ये तेल नसों में अंदर तक जाकर रूखापन और दर्द खत्म करते हैं।

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