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बच्चों में Number तेज़ी से बढ़ रहे - Screen Time और Outdoor Time

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 28 May, 2026
  • category-iconUpdated on 08 Jun, 2026
  • category-iconChild Health
  • blog-view-icon5038

कुछ साल पहले तक चश्मा लगाना एक बड़ी उम्र की बात लगती थी। लेकिन आज स्कूल में देखिए हर तीसरे-चौथे बच्चे की नाक पर चश्मा है। 7 साल का बच्चा, 10 साल का बच्चा सब चश्मा लगाए घूम रहे हैं और जो अभी नहीं लगाते, उनके माँ-बाप भी अंदर से डरे हुए हैं कि पता नहीं कब नंबर आ जाए। यह डर बेवजह नहीं है क्योंकि पिछले कुछ सालों में बच्चों में चश्मे का नंबर जिस रफ़्तार से बढ़ा है, वह सच में चिंता की बात है।

आज की ज़िंदगी में बच्चे सुबह से रात तक किसी न किसी चमकते पर्दे के सामने बैठे रहते हैं। पढ़ाई भी मोबाइल पर, मनोरंजन भी मोबाइल पर, दोस्तों से बात भी मोबाइल पर। बाहर खेलने का वक़्त कहीं गुम हो गया है और इसी बदलाव का सबसे सीधा असर पड़ रहा है बच्चों की आँखों पर। अगर आपका बच्चा भी दूर का साफ़ नहीं देख पाता, आँखें मींचकर टेलीविज़न देखता है या अक्सर सिरदर्द की शिकायत करता है तो यह लेख आपके लिए ही है।

आँखों का नंबर बढ़ना क्या होता है? 

जब बच्चे को दूर की चीजें साफ़ दिखाई नहीं देतीं और उसे बार-बार आँखें सिकोड़कर देखना पड़ता है, तब यह आँखों का नंबर बढ़ने का संकेत हो सकता है। इसे सामान्य भाषा में आँखों का कमजोर होना भी कहा जाता है।

कई बच्चों में यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है। शुरुआत में बच्चा टीवी के बहुत पास बैठने लगता है, स्कूल में बोर्ड साफ़ नहीं देख पाता या पढ़ाई करते समय जल्दी थक जाता है। समय पर ध्यान न देने पर नंबर बढ़ता जा सकता है।

क्या Screen Time सच में आँखों को प्रभावित करता है? 

लगातार मोबाइल, टीवी, टैबलेट या लैपटॉप देखने की आदत बच्चों की आँखों पर असर डाल सकती है। जब बच्चा लंबे समय तक स्क्रीन देखता है, तो उसकी आँखों को लगातार एक ही दूरी पर फोकस करना पड़ता है। इससे आँखों में थकान और दबाव बढ़ने लगता है। धीरे-धीरे यह आदत आँखों की परेशानी को बढ़ा सकती है।

  • आँखों में थकान बढ़ना: लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखें भारी और थकी हुई महसूस हो सकती हैं।
  • कम पलक झपकाना: स्क्रीन देखते समय बच्चे सामान्य से कम पलक झपकाते हैं, जिससे आँखों में सूखापन आ सकता है।
  • धुंधला दिखाई देना: लगातार स्क्रीन देखने के बाद कुछ बच्चों को दूर की चीजें साफ़ देखने में परेशानी हो सकती है।
  • सिर दर्द की समस्या: आँखों पर दबाव बढ़ने से बार-बार सिर दर्द महसूस हो सकता है।
  • आँखों में जलन और पानी आना: ज़्यादा Screen Time से आँखों में जलन, खुजली या पानी आने जैसी परेशानी हो सकती है।

Outdoor Time बच्चों की आँखों के लिए क्यों जरूरी माना जाता है? 

बच्चों का बाहर खेलना केवल शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि आँखों के लिए भी बहुत ज़रूरी माना जाता है। जब बच्चे खुली जगह में समय बिताते हैं, तो उनकी आँखों को लगातार एक ही दूरी पर देखने का दबाव नहीं रहता। इससे आँखों को प्राकृतिक आराम मिल सकता है और उनका सामान्य विकास बेहतर तरीके से हो सकता है।

  • आँखों को प्राकृतिक आराम मिलता है: बाहर खेलने के दौरान आँखें दूर और पास दोनों चीजों को देखती हैं, जिससे उन पर लगातार एक जैसा दबाव नहीं पड़ता।
  • धूप और खुली रोशनी फायदेमंद मानी जाती है: प्राकृतिक रोशनी बच्चों की आँखों के सामान्य विकास में सहायक मानी जाती है।
  • लगातार पास देखने की आदत कम होती है: बाहर खेलते समय बच्चे मोबाइल या किताब की तरह केवल पास की चीजों पर ध्यान नहीं लगाते।
  • आँखों की थकान कम हो सकती है: लंबे समय तक स्क्रीन देखने से होने वाली थकान को कम करने में बाहर खेलना मददगार हो सकता है।
  • शरीर और आँखों का संतुलन बेहतर रहता है: दौड़ना, खेलना और खुली हवा में रहना बच्चों की overall growth के लिए अच्छे माने जाते हैं।

कौन-सी आदतें बच्चों की आँखों पर ज्यादा असर डाल सकती हैं? 

आजकल बच्चों की कुछ रोज़मर्रा की आदतें उनकी आँखों पर लगातार दबाव बढ़ा सकती हैं। अगर समय रहते इन आदतों पर ध्यान न दिया जाए, तो धीरे-धीरे आँखों की परेशानी बढ़ सकती है।

  • लंबे समय तक मोबाइल या टीवी देखना
  • बहुत कम बाहर खेलना
  • अंधेरे में स्क्रीन देखना
  • किताब या मोबाइल बहुत पास से देखना
  • लगातार बिना रुके पढ़ाई या स्क्रीन देखना
  • देर रात तक जागना
  • ग़लत तरीके से बैठकर पढ़ना या मोबाइल चलाना

बच्चों में आँखों का नंबर बढ़ने के शुरुआती संकेत  

जब बच्चों की आँखों का नंबर बढ़ना शुरू होता है, तो शरीर कुछ शुरुआती संकेत देने लगता है। अक्सर बच्चे ख़ुद अपनी परेशानी ठीक से बता नहीं पाते, इसलिए माता-पिता को इन बदलावों पर ध्यान देना ज़रूरी माना जाता है।

  •  टीवी के बहुत पास बैठकर देखना
  •  स्कूल में बोर्ड साफ़ दिखाई न देना
  •  बार-बार आँखें सिकोड़कर देखना
  •  पढ़ते समय किताब बहुत पास लाना
  •  आँखों में जलन या पानी आना
  •  बार-बार सिर दर्द होना
  •  आँखों को लगातार मलना
  •  पढ़ाई में जल्दी थकान महसूस होना

बच्चों की आँखों को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें? 

बच्चों की आँखों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए उनकी रोज़मर्रा की आदतों पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी माना जाता है। छोटी-छोटी अच्छी आदतें आँखों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद कर सकती हैं।

  • स्क्रीन देखने का समय सीमित रखें: बच्चों को लगातार लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या टैबलेट देखने से बचाएँ।
  • बीच-बीच में आँखों को आराम दें: पढ़ाई या स्क्रीन देखने के दौरान थोड़ी देर का विराम देना फायदेमंद माना जाता है।
  • रोज़ बाहर खेलने की आदत डालें: खुली हवा और प्राकृतिक रोशनी आँखों के लिए अच्छी मानी जाती है।
  • सही रोशनी में पढ़ाई कराएँ: बहुत कम रोशनी या अंधेरे में पढ़ाई करने से आँखों पर दबाव बढ़ सकता है।
  • पर्याप्त नींद ज़रूरी है: पूरी नींद आँखों को आराम देने और थकान कम करने में मदद कर सकती है।
  • पौष्टिक भोजन दें: हरी सब्जियाँ, फल और संतुलित आहार आँखों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

बच्चों की आँखों के बढ़ते नंबर को आयुर्वेद कैसे समझता है? 

आयुर्वेद के अनुसार बच्चों की आँखों का स्वास्थ्य केवल आँखों तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे शरीर के संपूर्ण संतुलन से जोड़कर देखा जाता है। लगातार मोबाइल देखना, देर रात तक जागना, बाहर कम खेलना और लंबे समय तक पास की चीजों पर ध्यान लगाए रखना शरीर के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इसका असर धीरे-धीरे आँखों की कमजोरी और बढ़ते नंबर के रूप में दिखाई देने लग सकता है।

आयुर्वेद में माना जाता है कि ग़लत दिनचर्या, मानसिक थकान और आँखों पर लगातार दबाव बढ़ने से आँखें जल्दी थक सकती हैं। इसलिए केवल चश्मा लगाने पर ही ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि बच्चों की नींद, खानपान, पढ़ाई की आदतें और रोज़मर्रा की जीवनशैली को भी सुधारने पर ज़ोर दिया जाता है। आयुर्वेद का उद्देश्य शरीर और आँखों के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना माना जाता है।

उपचार में उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियां

आयुर्वेद का सीधा नियम है कि यहाँ दवाएं सिर्फ दर्द दबाने के लिए नहीं, बल्कि समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए दी जाती हैं।  

  • अश्वगंधा: यह कमज़ोरी और थकान मिटाकर थकी हुई नसों में नई जान फूंकता है।
  • गिलोय: यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर शरीर को बार-बार होने वाले इन्फेक्शन से बचाता है।
  • त्रिफला: यह शरीर के कोने-कोने से ज़हरीले तत्वों को साफ़ करके पाचन को दुरुस्त करता है।
  • ब्राह्मी: यह मानसिक तनाव और बेचैनी को शांत करके गहरी नींद लाने में मदद करती है।
  • दशमूल: यह शरीर के हर तरह के दर्द, जकड़न और सूजन को भीतर से ठीक करता है।

बीमारी को जड़ से मिटाने वाली आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जैसे हम अपनी गाड़ी की टाइम-टू-टाइम सर्विसिंग कराते हैं, वैसे ही हमारे शरीर को भी अंदर से रीबूट होने की ज़रूरत होती है। आयुर्वेद में थेरेपीज़ का मतलब सिर्फ थोड़ी देर का आराम नहीं है। ये पंचकर्म जैसी प्रक्रियाएं शरीर के दोषों को बैलेंस करके अंदरूनी हीलिंग को सुपरफास्ट बना देती हैं। 

  • अभ्यंग: गुनगुने औषधीय तेल की इस मालिश से नसों को पोषण मिलता है, ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है और शरीर की पुरानी से पुरानी जकड़न गायब हो जाती है।
  • स्वेदन: जड़ी-बूटियों की इस खास भाप से शरीर के बंद रोमछिद्र खुलते हैं, जिससे सारा जमा हुआ कचरा पसीने के रास्ते बाहर निकल जाता है और मांसपेशियां ढीली होती हैं।
  • शिरोधारा: माथे पर गिरने वाली तेल की यह निरंतर धार सीधे नर्वस सिस्टम को शांत करती है, जिससे तनाव, अनिद्रा और मानसिक थकान पल भर में गायब हो जाती है।
  • बस्ती थेरेपी: इसे आयुर्वेद का आधा इलाज माना जाता है क्योंकि यह सीधे वात दोष को कंट्रोल करके शरीर के भीतर जमा जिद्दी टॉक्सिंस को बाहर निकाल फेंकती है।
  • योग और प्राणायाम: हल्के आसन और सांसों के सही तालमेल से शरीर में ऑक्सीजन का फ्लो बढ़ता है, जिससे अंगों की अकड़न दूर होती है और मानसिक शांति मिलती है।

ये सभी थेरेपीज़ शरीर को अपनी पुरानी लय में वापस लाती हैं, लेकिन इन्हें कब और कैसे करना है, इसका सही फैसला हमेशा एक अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में ही होना चाहिए।

सही खान-पान: क्या खाएं और क्या न खाएं

एक पौष्टिक और संतुलित थाली न सिर्फ हमारे पूरे शरीर को तंदुरुस्त रखती है, बल्कि हमारी आँखों की रोशनी को भी बुढ़ापे तक सलामत बनाए रखती है।

क्या खाएँ?

  • हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी, बथुआ... इन्हें अपनी डाइट का हिस्सा बना लीजिए। ये आँखों के लेंस को मजबूत रखने के लिए किसी सीक्रेट टॉनिक से कम नहीं हैं।
  • गाजर का आजमाया हुआ नुस्खा: गाजर को सदियों से आँखों का पक्का यार माना गया है। इसे खाने से धुंधलेपन की शिकायत पास भी नहीं आती।
  • रसीले मौसमी फल: आंवला, संतरा, पपीता जो भी सीजनल फल मिलें, उन्हें अपनी थाली में जगह दें। ये आँखों को अंदर से सींचते हैं।
  • भीगे बादाम और अखरोट: सुबह-सुबह खाली पेट कुछ भीगे हुए मेवे चबाना नसों को फौलाद जैसी मजबूती देता है और दिनभर एनर्जी लो नहीं होने देता।

किन चीजों से दूरी भली?

  • जंक फूड का चस्का: तीसरे दिन पिज्जा, बर्गर या समोसे-कचौड़ी उड़ाना बंद कीजिए। यह तली-भुनी चीजें शरीर का पूरा सिस्टम बिगाड़ कर रख देती हैं।
  • हद से ज्यादा मीठा: पेस्ट्री, चॉकलेट और एक्स्ट्रा शक्कर वाली चीजें खाने में तो लाजवाब लगती हैं, पर ये अंदर ही अंदर शरीर को खोखला कर देती हैं।
  • पैकेट वाला कचरा: चिप्स और कुरकुरे सिर्फ जुबान को स्वाद देते हैं, शरीर को इनसे रत्ती भर भी पोषण नहीं मिलता।
  • बर्फ जैसा ठंडा पानी: फ्रिज की बोतल से सीधे ठंडा पानी गटकना या हर वक्त आइसक्रीम खाना आपके डाइजेशन की आग को बुझा देता है।
  • देर रात का भारी डिनर: रात को सोने से ठीक पहले जब आप प्लेट भरकर भारी खाना खाते हैं, तो पेट उसे पचा नहीं पाता। नतीजा? सुबह उठते ही सिर और आँखें भारी महसूस होती हैं।।

निष्कर्ष

आजकल के बच्चों का बचपन मैदान की मिट्टी से गायब होकर मोबाइल, टीवी और टैबलेट की स्क्रीन में सिमट गया है। छोटे-छोटे बच्चे घंटों स्क्रीन से चिपके रहते हैं, जिससे उनकी नाजुक आँखों पर ऐसा प्रेशर पड़ता है जिसे वे संभाल नहीं पातीं। इसके उलट, बाहर खुली धूप और ताजी हवा में दौड़-भाग करना सिर्फ खेल नहीं, बल्कि उनकी आँखों की नसों को आराम देने और उनके सही विकास के लिए बेहद जरूरी है।

अगर हम वाकई चाहते हैं कि बच्चों की आँखों का नूर सलामत रहे, तो हमें उनके रूटीन को बदलना होगा। स्क्रीन टाइम फिक्स करिए, उन्हें टाइम पर सुलाइए, प्लेट में फल-सब्जियां दीजिए और शाम को जबरदस्ती उन्हें बाहर खेलने भेजिए। इसके बाद भी अगर बच्चा बार-बार आँखें मलता है, टीवी के बहुत पास जाकर बैठता है या सिरदर्द का रोना रोता है, तो उसे लापरवाही में मत टालिए। तुरंत किसी अच्छे आई डॉक्टर के पास ले जाना ही समझदारी है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

लगातार लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या टैबलेट देखने से आँखों पर दबाव बढ़ सकता है, जो बच्चों की आँखों को प्रभावित कर सकता है।

स्क्रीन का समय बच्चे की उम्र के अनुसार सीमित रखना बेहतर माना जाता है। बीच-बीच में आँखों को आराम देना भी जरूरी होता है।

हाँ, खुली हवा और प्राकृतिक रोशनी में समय बिताना बच्चों की आँखों को आराम देने और उनके सामान्य विकास में मददगार माना जाता है।

टीवी के पास बैठना, आँखें सिकोड़कर देखना, सिर दर्द और बोर्ड साफ न दिखना शुरुआती संकेत माने जा सकते हैं।

चश्मा देखने में मदद करता है, लेकिन साथ में सही दिनचर्या, पर्याप्त नींद और स्क्रीन समय कम करना भी जरूरी माना जाता है।

हाँ, पर्याप्त नींद न मिलने से आँखों की थकान और तनाव बढ़ सकता है।

हरी सब्जियाँ, गाजर, आंवला, ताजे फल और पौष्टिक भोजन आँखों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

लंबे समय तक लगातार स्क्रीन पर पढ़ाई करने से आँखों में थकान और जलन महसूस हो सकती है।

अगर बच्चे को धुंधला दिखे, सिर दर्द हो या वह बार-बार आँखें मले, तो आँखों की जांच करवाना जरूरी माना जाता है।

आयुर्वेद में बच्चों की दिनचर्या, खानपान और जीवनशैली को संतुलित रखने पर जोर दिया जाता है, जो आँखों के स्वास्थ्य के लिए सहायक माना जाता है।

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