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क्या घुटनों की चिकनाई खत्म हो रही है? शुरुआती लक्षण जानिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 28 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5037

आजकल घुटनों का दर्द सिर्फ उम्र ढलने की निशानी नहीं रहा। आपने भी एक बात पर गौर किया होगा? 35 या 40 की उम्र वाले लोग भी सीढ़ियाँ चढ़ते समय घुटनों में दर्द और जकड़न से परेशान रहते हैं। कई बार तो उनके घुटनों से कट-कट की आवाज़ भी आती है। हम लोग अक्सर इसे दिन भर की थकान या मौसम का असर मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। पर असल में, यह आपके घुटनों की चिकनाई कम होने का पहला संकेत होता है। इसी चिकनाई को हम कार्टिलेज (Cartilage) और जॉइंट फ्लूइड (Joint Fluid) कहते हैं।

ज़रा सोचिए, जब यह चिकनाई कम होगी तो होगा क्या? सीधी सी बात है, हड्डियाँ आपस में रगड़ खाएंगी। इसी से दर्द और अकड़न धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। अच्छी बात बस इतनी है कि अगर समय रहते इन इशारों को पकड़ लिया जाए, तो सही देखभाल से इस दिक्कत को काफ़ी हद तक थामा जा सकता है।

घुटनों की चिकनाई आखिर होती क्या है?

घुटने के जोड़ों के बीच एक बहुत ही मुलायम परत होती है। इसे ही कार्टिलेज कहते हैं। इसी परत की वजह से हड्डियाँ आपस में घिसने से बची रहती हैं और हम बिना किसी रुकावट के चल-फिर पाते हैं। इसके साथ ही, घुटनों के अंदर 'साइनोवियल फ्लूइड' नाम का एक कुदरती तरल भी होता है। आसान भाषा में समझें तो यह जोड़ों का तेल है। यह उन्हें ज़रूरी चिकनाहट देता है ताकि घुटने आराम से मुड़ सकें।

जब यह तरल सूखने लगता है या कार्टिलेज घिसने लगती है, तो हड्डियाँ सीधे आपस में टकराती हैं। इसी रगड़ की वजह से दर्द, जकड़न और कट-कट की आवाज़ आने शुरू होती है। शुरू में भले ही आपको यह कोई बड़ी बात न लगे, पर ध्यान न देने पर यह रोज़ की परेशानी बन जाती है।

कार्टिलेज और साइनोवियल फ्लूइड का काम क्या है?

हमारे घुटनों को ठीक से काम करने के लिए इन दोनों चीज़ों की बहुत ज़रूरत होती है। जब तक शरीर में इनकी मात्रा ठीक रहती है, आपके घुटने आपका पूरा साथ देते हैं। पर जैसे ही इनमें कमी आती है, घुटने अंदर से रूखे लगने लगते हैं और दर्द दस्तक दे देता है।

  • कार्टिलेज (शरीर का शॉक एब्जॉर्बर): चलते, बैठते या कोई भारी वज़न उठाते समय घुटनों पर जो भी दबाव पड़ता है, उसे कार्टिलेज ही संभालती है। आप इसे हड्डियों के बीच का गद्दा समझ लें। इसकी मज़बूती कम होते ही हड्डियाँ टकराती हैं, और नतीजा होता है तेज़ दर्द और सूजन।
  • साइनोवियल फ्लूइड (जोड़ों की चिकनाहट): यह तरल घुटने के पूरे जोड़ को चिकना बनाए रखता है। इसकी वजह से पैर मोड़ने या फैलाने में कोई अड़चन नहीं आती। जब यह कम होता है, तो घुटनों से आवाज़ें आती हैं, जकड़न बढ़ती है और दो कदम चलना भी भारी लगता है।

शुरुआती लक्षण जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है

घुटनों की चिकनाई कोई एक दिन में खत्म नहीं होती। यह सब बहुत धीरे-धीरे होता है। शुरू में दर्द इतना हल्का रहता है कि कोई भी इसे बस थकान ही मानेगा। पर जब तक असली परेशानी समझ आती है, घुटनों का अच्छा-खासा नुकसान हो चुका होता है।

  • सुबह घुटनों में जकड़न: रात भर सोने के बाद, सुबह उठते ही घुटने एकदम अकड़े हुए लगना।
  • सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने में दर्द: सीढ़ियाँ इस्तेमाल करते समय घुटनों में अजीब सा खिंचाव या दर्द होना, जबकि सीधे रास्ते पर कोई दिक्कत न लगे।
  • कट-कट की आवाज़ आना: उठने-बैठने या चलने पर घुटनों से ऐसी आवाज़ें आना जो पहले कभी नहीं आती थीं।
  • लंबे समय तक बैठने के बाद उठने में परेशानी: कुर्सी या ज़मीन पर देर तक बैठने के बाद जब अचानक खड़े हों, तो घुटनों में तेज़ दर्द महसूस होना।
  • हल्की सूजन: कभी-कभी घुटनों के आस-पास सूजन या गर्माहट लगना, जो थोड़ी देर आराम करने से अपने आप ठीक हो जाए।
  • थोड़ा चलने पर ही थकान: पहले आप बिना रुके लंबा चल लेते थे, लेकिन अब थोड़ी सी दूरी में ही घुटने भारी लगने लगें।

इन इशारों को जितनी जल्दी आप पहचान लें, उतना ही अच्छा है। सही समय पर कदम उठाने से आप अपने घुटनों को ज़्यादा खराब होने से बचा सकते हैं।

सीढ़ियाँ चढ़ते समय दर्द क्यों बढ़ जाता है?

समतल सड़क की तुलना में, सीढ़ियाँ चढ़ते समय हमारे घुटनों पर कई गुना ज़्यादा ज़ोर पड़ता है। जब हमारी कार्टिलेज मज़बूत होती है, तो वह इस दबाव को आसानी से सह लेती है। पर जब यही परत घिस जाए या इसमें कमज़ोरी आ जाए, तो सारा दबाव सीधा हड्डियों पर पड़ता है। इसी से दर्द और सूजन बढ़ती हैं।

यही वजह है कि कई लोग प्लेन सड़क पर तो आसानी से चल लेते हैं, लेकिन सीढ़ियों पर उनके घुटने जवाब दे जाते हैं। यह एकदम साफ इशारा है कि घुटनों की चिकनाई घट रही है और अब उन्हें आपकी देखभाल की सख़्त ज़रूरत है।

घुटनों से कट-कट की आवाज़ आना: क्या यह खतरे का संकेत है?

घुटनों से आवाज़ आना हमेशा किसी बड़ी बीमारी को नहीं बताता। कई बार यह सिर्फ जोड़ों के बीच गैस के बुलबुले फूटने से होता है। इसमें दर्द भी नहीं होता। पर अगर यह आवाज़ लगातार आ रही है और आपको दर्द, जकड़न या सूजन भी महसूस हो रही है, तो समझ जाइए कि घुटने घिस रहे हैं। मेडिकल भाषा में इसे 'क्रैपिटस' (Crepitus) कहते हैं।

आयुर्वेद में इस आवाज़ का सीधा कनेक्शन शरीर में वात दोष बढ़ने से है। जब जोड़ों के बीच सूखापन बढ़ता है और चिकनाई की कमी होती है, तब घुटनों से ये कट-कट की आवाज़ें आनी शुरू हो जाती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि आपके जोड़ों को अंदर से सही पोषण और नमी चाहिए।

घुटनों की चिकनाई कम होने के पीछे क्या कारण हैं?

यह चिकनाई अचानक से गायब नहीं होती। इसके कम होने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें से ज़्यादातर हमारी रोज़ की ज़िन्दगी और आदतों से जुड़े हैं:

  • उम्र का बढ़ना: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, कार्टिलेज की मोटाई और साइनोवियल फ्लूइड का बनना अपने आप कम होने लगता है।
  • वज़न ज़्यादा होना: शरीर का भारीपन घुटनों पर लगातार दबाव डालता है। इससे कार्टिलेज बहुत तेज़ी से घिसती है।
  • व्यायाम की कमी: शरीर को हरकत में न रखने से घुटनों के आस-पास की मांसपेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं। जब जोड़ों को सपोर्ट नहीं मिलता, तो चिकनाई घटने लगती है।
  • कैल्शियम और विटामिन D की कमी: हड्डियों को अगर अंदर से ज़रूरी पोषण न मिले, तो कार्टिलेज भी कमज़ोर पड़ने लगती है।
  • पुरानी चोट: अगर घुटने पर कभी कोई चोट लगी हो और वो ठीक से न भरी हो, तो वह अंदर ही अंदर कार्टिलेज को नुकसान पहुँचाती है।
  • उठने-बैठने का गलत तरीका: ज़मीन पर घंटों बैठे रहना, पालथी मारना या पैरों को बहुत देर तक एक ही पोज़िशन में मोड़े रखने से घुटनों पर भारी दबाव पड़ता है।
  • गलत खानपान: बहुत ज़्यादा तला-भुना, बासी या भारी खाना खाने से शरीर में वात बढ़ता है। यह जोड़ों की चिकनाई को सुखा देता है और आपका पाचन भी पूरी तरह से खराब कर सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार घुटनों की चिकनाई आखिर कम क्यों होती है?

आयुर्वेद की मानें तो घुटनों की चिकनाई घटने का सीधा नाता हमारे शरीर में 'वात दोष' के बढ़ने से है। वात का तो स्वभाव ही रूखा और सूखा होता है। अब ज़ाहिर है, जब शरीर में वात बढ़ेगा तो जोड़ों का सूखापन भी बढ़ेगा ही। ऐसे में 'साइनोवियल फ्लूइड' सूखने लगता है। बस यहीं से घुटनों में कट-कट की आवाज़, जकड़न और दर्द का सिलसिला शुरू होता है।

आयुर्वेद की दुनिया में इसे 'संधिगत वात' (Sandhigata Vata) का नाम दिया गया है। आज के मॉडर्न साइंस में आप इसे ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) कह सकते हैं। इसमें जोड़ों में सूजन और दर्द इतना बढ़ जाता है कि दो कदम चलना भी भारी लगने लगता है। लोग सोचते हैं कि यह महज़ उम्र का तकाज़ा है। पर ऐसा बिल्कुल नहीं है। आपकी बिगड़ी हुई दिनचर्या, गलत खानपान और लाइफस्टाइल की कमियां भी इसकी बड़ी वजहें होती हैं।

घुटनों के इलाज को लेकर आयुर्वेद का नज़रिया

आयुर्वेद इसे महज़ एक घुटने की बीमारी मानकर नहीं चलता। इसका मानना है कि यह शरीर में बढ़े हुए वात, रूखेपन, चिकनाई की कमी और कमज़ोर हो चुकी मांसपेशियों का मिला-जुला नतीजा है। इलाज का असली मक़सद सिर्फ घुटनों की आवाज़ को शांत करना नहीं होता। बल्कि जोड़ों की असली मज़बूती, उनका लचीलापन और पूरे शरीर का बैलेंस फिर से ठीक करना होता है।

  • जड़ पर प्रहार: सिर्फ घुटने की आवाज़ पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसके पीछे जो असली वजहें हैं जैसे घंटों तक एक ही जगह बैठे रहना, मांसपेशियों की कमज़ोरी, गलत समय पर खाना, उम्र का असर, वात का बढ़ना और शरीर का सूखापन इन सभी को समझकर सुधारा जाता है।
  • वात का बैलेंस बहुत ज़रूरी: आयुर्वेद के हिसाब से वात बढ़ने पर ही जोड़ों में रगड़ और सूखापन आता है। इसलिए शरीर में नमी और स्निग्धता बनाए रखने के तरीकों पर सबसे ज़्यादा फोकस रहता है।
  • जोड़ों की चिकनाहट और लचीलापन: घुटनों के आस-पास की मांसपेशियों को ताक़त देने और जोड़ों की नॉर्मल मूवमेंट को वापस लाने पर खास ध्यान दिया जाता है।
  • मांसपेशियों की मज़बूती: अगर आपकी जांघ और घुटनों की मांसपेशियां कमज़ोर हैं, तो सारा दबाव सीधा जोड़ों पर पड़ेगा। इसलिए शरीर को अंदर से स्थिर और मज़बूत बनाने वाले उपाय अपनाए जाते हैं।
  • ज़िन्दगी और रूटीन में सुधार: देर रात तक जागना, घंटों बैठे रहना, कम एक्टिविटी और गलत टाइम पर खाना खाने जैसी आदतों को सुधारना इलाज का बहुत अहम हिस्सा है।

इलाज में इस्तेमाल होने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों का काम सिर्फ आपका दर्द भगाना नहीं है। ये जोड़ों को पोषण देती हैं, वात को बैलेंस करती हैं और शरीर को ताक़तवर बनाती हैं:

  • अश्वगंधा: यह मांसपेशियों को मज़बूती देने और शरीर की एनर्जी बनाए रखने के लिए जानी जाती है।
  • गुग्गुलु: जोड़ों का बैलेंस ठीक रखने और उनकी जकड़न (stiffness) को दूर करने में यह बहुत असरदार है।
  • दशमूल: वात को बैलेंस करने और शरीर की अकड़न को मिटाने में इसका कोई जवाब नहीं।
  • शल्लकी: घुटनों की नेचुरल मूवमेंट और उनमें आराम बनाए रखने के लिए यह बहुत फायदेमंद मानी जाती है।
  • त्रिफला: यह आपका पाचन दुरुस्त करता है, जिससे शरीर में जमा फालतू टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं।

इलाज में काम आने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

इन सभी थेरेपी का सीधा सा लक्ष्य यही है कि जोड़ों की चिकनाई बनी रहे, वात कंट्रोल में रहे और घुटनों की मूवमेंट पहले की तरह आसान हो जाए:

  • अभ्यंग (औषधीय तेल से मालिश): गर्म और खास आयुर्वेदिक तेल से मालिश करने पर जोड़ों और मांसपेशियों को भरपूर चिकनाहट मिलती है। इससे सूखापन और अकड़न दोनों दूर होते हैं।
  • जानु बस्ती: इस तरीके में घुटनों के ऊपर एक खास औषधीय तेल को कुछ देर तक रोक कर रखा जाता है। यह घुटनों को अंदर तक पोषण और आराम देने का काम करता है।
  • स्वेदन चिकित्सा: हल्की भाप या गर्माहट देने से जकड़न में बहुत जल्दी आराम मिलता है और जोड़ों की मूवमेंट खुल जाती है।
  • पोटली स्वेदन: जड़ी-बूटियों की एक गर्म पोटली बनाकर उससे घुटनों की सिकाई करते हैं। इससे भारीपन और दर्द में काफी राहत मिलती है।
  • शिरोधारा: दिमाग की टेंशन को कम करने और शरीर को रिलैक्स करने वाली यह प्रोसेस वात को बैलेंस करने में बहुत मददगार साबित होती है।

सही खानपान: क्या खाएं और क्या न खाएं

क्या खाएं:

  • गर्म और एकदम ताज़ा बना हुआ खाना।
  • मूंग की दाल और ऐसा खाना जो हल्का हो और आपका पाचन ठीक रखे।
  • देशी घी की बिल्कुल सही और संतुलित मात्रा।
  • तिल, बादाम और अखरोट।
  • हल्दी, सोंठ और जीरा।
  • पीने के लिए हमेशा हल्का गुनगुना पानी।

क्या न खाएं:

  • बहुत ज़्यादा ठंडी चीज़ें।
  • लंबे समय तक पेट को खाली रखना।
  • ज़्यादा सूखा और पैकेट वाला (प्रोसेस्ड) खाना।
  • बहुत ज़्यादा तला-भुना खाना।
  • देर रात को खाना खाने की आदत।
  • बिना किसी टाइम टेबल के कुछ भी खा लेना।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम सुखविंदर कौर है और मेरी उम्र 61 वर्ष है, मैं दिल्ली से हूँ। लगभग 6 महीने पहले मुझे घुटने में चोट लग गई थी, जिसके बाद मैंने एलोपैथिक इलाज करवाया। वहाँ मुझे सर्जरी की सलाह दी गई, जिससे मैं बहुत चिंतित हो गई। चूँकि मेरा पहले से आयुर्वेद पर विश्वास था और मेरे पिता मुझे 2018 में जीवा आयुर्वेद ले गए थे, इसलिए मैंने दोबारा आयुर्वेदिक इलाज की ओर रुख किया। मैंने ऑनलाइन जीवाग्राम के बारे में देखा और वहाँ से संपर्क किया। इसके बाद मैंने डॉक्टरों से बात की और इलाज शुरू कराया। मुझे सही मार्गदर्शन, दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल की सलाह दी गई। धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा। आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करती हूँ और जीवा आयुर्वेद के इलाज से मुझे बहुत राहत मिली है। 

डॉक्टर से सलाह कब लेनी चाहिए?

घुटनों से आवाज़ आना हमेशा किसी बड़ी बीमारी का अलार्म नहीं होता। फिर भी, कुछ संकेतों को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए:

  • अगर आवाज़ के साथ-साथ दर्द भी होने लगे।
  • अगर घुटनों के आस-पास सूजन नज़र आने लगे।
  • अगर चलने या ज़मीन पर बैठने में दिक्कत होने लगे।
  • अगर चलते-चलते आपका घुटना बार-बार अटकने लगे।
  • अगर घुटनों की जकड़न लगातार बढ़ती जा रही हो।
  • अगर सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों में कमज़ोरी महसूस हो।
  • अगर आपको लगने लगे कि घुटनों पर बैलेंस नहीं बन रहा है।
  • अगर आपके रोज़मर्रा के छोटे-मोटे काम भी इस दर्द की वजह से रुकने लगें।

ऐसी हालत में बिना किसी देरी के सही चेकअप और सलाह लेना ही समझदारी है।

निष्कर्ष 

निष्कर्ष के तौर पर बस इतना समझ लीजिए कि घुटनों की चिकनाई कोई रातों-रात खत्म होने वाली चीज़ नहीं है। यह परेशानी शरीर के अंदर धीरे-धीरे पनपती है। अगर सही वक़्त पर इस पर ध्यान न दिया जाए, तो यह रोज़ की ज़िन्दगी को काफी मुश्किल बना देती है।

सबसे ज़रूरी यही है कि शुरुआत में ही इसके इशारों को पहचान लें और सही कदम उठाएं। आयुर्वेद इस समस्या को सिर्फ दर्द नहीं मानता, बल्कि पूरे शरीर के बिगड़े हुए बैलेंस के रूप में देखता है। वात को कंट्रोल करके, जोड़ों को पूरा पोषण देकर और अपनी लाइफस्टाइल को सुधारकर आप अपने घुटनों की चिकनाई को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है कि कमर दर्द केवल उम्र बढ़ने पर ही हो। आजकल लंबे समय तक बैठे रहने, गलत तरीके से काम करने और शारीरिक गतिविधि कम होने के कारण कम उम्र के लोगों में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। कई बार लगातार तनाव और नींद की कमी भी शरीर की जकड़न बढ़ा देती है। यदि समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो हल्का दर्द भी धीरे-धीरे पुरानी समस्या बन सकता है। इसलिए उम्र के साथ-साथ जीवनशैली को समझना भी जरूरी माना जाता है।

बहुत ज्यादा नरम गद्दा रीढ़ को सही सहारा नहीं दे पाता। इससे सोते समय शरीर की स्थिति बिगड़ सकती है और कमर की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। कई लोगों को सुबह उठते समय कमर में ज्यादा जकड़न और भारीपन महसूस होता है। सही सतह पर सोना रीढ़ को संतुलन देने में मदद कर सकता है। इसलिए मध्यम कठोरता वाला गद्दा अधिक आरामदायक माना जाता है।

मानसिक तनाव केवल मन तक सीमित नहीं रहता, उसका असर शरीर पर भी दिखाई दे सकता है। लगातार चिंता और तनाव की स्थिति में मांसपेशियां खिंची हुई रहने लगती हैं। इससे कमर के आसपास जकड़न और दर्द बढ़ सकता है। कई लोगों में तनाव के समय दर्द अधिक महसूस होने लगता है। शरीर और मन दोनों को संतुलित रखना इसलिए जरूरी माना जाता है।

कुछ लोगों को सुबह उठते समय कमर में अकड़न और दर्द ज्यादा महसूस हो सकता है। रातभर एक ही स्थिति में रहने के कारण मांसपेशियों और जोड़ों में जकड़न बढ़ जाती है। धीरे-धीरे चलने और हल्की गतिविधि करने पर यह परेशानी कम हो सकती है। लेकिन यदि दर्द लगातार बना रहे या समय के साथ बढ़ने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह शरीर के अंदर बढ़ते असंतुलन का संकेत हो सकता है।

बहुत लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना कई बार शरीर को और कमजोर बना सकता है। हल्की और नियंत्रित गतिविधि शरीर में लचीलापन बनाए रखने में मदद कर सकती है। लगातार निष्क्रिय रहने से मांसपेशियों की ताकत कम होने लगती है। हालांकि अत्यधिक दर्द की स्थिति में शरीर को सीमित आराम देना जरूरी हो सकता है। सही संतुलन बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

शरीर में पानी की कमी का असर रीढ़ और जोड़ों पर भी पड़ सकता है। पर्याप्त जल न मिलने पर शरीर में जकड़न और भारीपन बढ़ सकता है। रीढ़ की डिस्क को भी सही नमी की आवश्यकता होती है। यदि लंबे समय तक शरीर में सूखापन बना रहे, तो असहजता बढ़ सकती है। इसलिए नियमित मात्रा में पानी पीना शरीर के संतुलन के लिए आवश्यक माना जाता है।

गलत तरीके से झुकना या अचानक भारी वजन उठाना कमर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इससे रीढ़ और आसपास की मांसपेशियों में खिंचाव बढ़ सकता है। कई लोग घरेलू काम या कार्यालय के दौरान गलत मुद्रा में लंबे समय तक काम करते रहते हैं। धीरे-धीरे यह आदत दर्द और जकड़न का कारण बन सकती है। सही मुद्रा अपनाना कमर की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

शरीर का बढ़ा हुआ वजन रीढ़ और कमर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। खासकर पेट के आसपास जमा वजन शरीर का संतुलन बिगाड़ सकता है। इससे चलते समय और बैठते समय कमर पर भार अधिक महसूस हो सकता है। लंबे समय तक यह स्थिति दर्द और थकान को बढ़ा सकती है। संतुलित वजन बनाए रखना कमर के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठकर वाहन चलाने से कमर पर दबाव बढ़ सकता है। सड़क के झटके और शरीर की गलत स्थिति मांसपेशियों को थका सकती है। कई लोगों को यात्रा के बाद कमर में भारीपन और अकड़न महसूस होने लगती है। बीच बीच में रुककर शरीर को हल्का चलाना फायदेमंद माना जाता है। बैठने की सही स्थिति भी बहुत महत्वपूर्ण होती है।

कई लोगों को ठंड या नमी वाले मौसम में कमर दर्द ज्यादा महसूस होता है। ऐसे मौसम में शरीर की जकड़न बढ़ सकती है और मांसपेशियां अधिक सख्त महसूस हो सकती हैं। खासकर सुबह और रात के समय असहजता बढ़ सकती है। गर्माहट बनाए रखना और शरीर को सक्रिय रखना राहत देने में सहायक माना जाता है। मौसम के अनुसार दिनचर्या में बदलाव करना भी उपयोगी हो सकता है।

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