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Mosquito repellent लगाते समय बच्चों में क्या सावधानी रखें?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर हम सोचते हैं कि मेडिकल स्टोर या सुपरमार्केट में मिलने वाला हर 'मॉस्किटो रिपेलेंट' (Mosquito Repellent) एक जैसा और पूरी तरह सुरक्षित होता है। डेंगू और मलेरिया के डर से हम बिना सोचे-समझे बच्चों के नाज़ुक हाथों, पैरों और चेहरे पर भर-भर कर क्रीम या स्प्रे लगा देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि जिस क्रीम ने मच्छर को आपके बच्चे से दूर रखा, वही क्रीम अगर ज़रूरत से ज़्यादा या गलत तरीके से लगा दी जाए, तो बच्चे की त्वचा पर लाल चकत्ते, आंखों में जलन या सांस में तकलीफ क्यों शुरू हो जाती है? दरअसल, 'मच्छर से बचाव' और 'केमिकल के ज़हर से बचाव' दोनों दिखने में भले ही एक ही सिक्के के दो पहलू लगें, लेकिन दोनों का शरीर पर असर बिल्कुल अलग होता है। सिर्फ विज्ञापनों के कहने पर कुछ भी लगा लेने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि बढ़ सकती है। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि यह कोई आम कन्फ्यूजन नहीं है, बल्कि आपके बच्चे के नाज़ुक शरीर की ज़रूरत के हिसाब से सही चीज़ चुनने का मामला है।

त्वचा के अंदर जाकर ये रिपेलेंट्स असल में करते क्या हैं? 

बड़ों की त्वचा और बच्चों की त्वचा में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। बाज़ार में मिलने वाले ज़्यादातर केमिकल रिपेलेंट्स में 'डीट' (DEET) या 'पिकारिडिन' (Picaridin) नाम के तेज़ रसायन होते हैं। जब आप इन्हें लगाते हैं, तो ये मच्छरों के सूंघने वाले सेंसर (Sensors) को ब्लॉक कर देते हैं और उन्हें भ्रमित कर देते हैं। लेकिन बच्चों की त्वचा बड़ों के मुकाबले बहुत पतली और छिद्रपूर्ण (Porous) होती है। जब आप इन तेज़ केमिकल्स को बच्चे की त्वचा पर रगड़ते हैं, तो ये सिर्फ त्वचा के ऊपर नहीं रहते, बल्कि सोख लिए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, प्राकृतिक (Natural) रिपेलेंट्स जैसे सिट्रोनेला (Citronella) या नीलगिरी का तेल मच्छरों को अपनी तेज़ गंध से दूर रखते हैं और खून में मिलकर ज़हर नहीं बनाते।

क्या 'किड्स सेफ' लिखा होने का मतलब हर प्रोडक्ट सुरक्षित है?

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कई बार माता-पिता बाज़ार से कोई भी रिपेलेंट पैच, रोल-ऑन या क्रीम यह सोचकर ले आते हैं कि उस पर 'बच्चों के लिए' लिखा है। रोल-ऑन को कपड़ों पर लगाना होता है, लेकिन कई लोग उसे सीधे त्वचा पर रगड़ देते हैं। अगर आप छोटे बच्चे को यह सोचकर DEET वाली क्रीम लगा रहे हैं कि इससे वह डेंगू से बचेगा, तो फायदे की जगह उसके नर्वस सिस्टम  पर बुरा असर पड़ सकता है। समस्या रिपेलेंट में नहीं, बल्कि हमारी उसे इस्तेमाल करने की आधी-अधूरी जानकारी में है।

एक्सपर्ट डॉक्टर की विशेष सलाह

बच्चों की त्वचा बहुत नाजुक और पतली होती है, जिससे 'DEET' जैसे तेज रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल उनके मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। यदि रिपेलेंट लगाने के बाद बच्चे में झटके आना (Seizures), अत्यधिक सुस्ती, सांस लेने में भारी तकलीफ, लगातार खांसी, या गलती से केमिकल मुंह में जाने पर गंभीर उल्टी और पेट दर्द जैसे रेड-फ्लैग लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। बच्चे के चेहरे, हाथों और कटी-फटी त्वचा पर सीधे केमिकल लगाने से बचें।

गलत तरीके से रिपेलेंट लगाने से बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ता है?

जब हम बिना सोचे-समझे इनका भारी मात्रा में इस्तेमाल करते हैं, तो बच्चे के शरीर के बाहरी और अंदरूनी हिस्से में अजीबोगरीब बदलाव होते हैं:

  • आंखों और त्वचा में जलन: अगर स्प्रे गलती से बच्चे की आंख या मुंह के पास चला जाए, तो लालिमा, आंसू और त्वचा पर रैशेज़ (Rashes) आ जाते हैं।
  • सांस फूलना और खांसी: बंद कमरे में तेज़ केमिकल वाला स्प्रे छिड़कने से बच्चे की श्वास नली में सूजन आ सकती है और उसे लगातार खांसी हो सकती है।
  • पेट में दर्द और उल्टी (Nausea): बच्चे अक्सर अपने हाथ-मुँह में डालते हैं। अगर आपने उनके हाथों पर क्रीम लगाई है, तो वह केमिकल सीधे पेट में जाकर फूड पॉइज़निंग और उल्टियाँ कर सकता है।
  • सुस्ती और चिड़चिड़ापन: खून में ज़्यादा केमिकल मिल जाने से बच्चा बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ा हो जाता है और उसे अजीब सी सुस्ती घेर लेती है।

क्या इनका गलत इस्तेमाल शरीर में किसी बड़ी परेशानी का संकेत बन सकता है?

अगर आप रोज़ाना गलत तरीके से हैवी केमिकल वाले रिपेलेंट्स का सेवन (इस्तेमाल) कर रहे हैं, तो इसे नज़रअंदाज़ बिल्कुल न करें। यह शरीर में कई दिक्कतें पैदा कर सकता है:

  • न्यूरोटॉक्सिसिटी (Neurotoxicity): 'DEET' जैसे केमिकल्स का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल बच्चों के विकासशील मस्तिष्क पर बुरा असर डाल सकता है, जिससे झटके (Seizures) या न्यूरोलॉजिकल समस्याएँ हो सकती हैं।
  • क्रॉनिक एलर्जी और डर्मेटाइटिस: रोज़ाना क्रीम रगड़ने से बच्चे की त्वचा का सुरक्षा कवच (Skin barrier) टूट सकता है और उसे एक्जिमा (Eczema) हो सकता है।
  • हॉर्मोनल इम्बैलेंस: कुछ सस्ते केमिकल्स शरीर में जाकर हॉर्मोन्स को डिस्टर्ब कर सकते हैं, जिससे बच्चे के विकास में रुकावट आ सकती है।

आयुर्वेद इन केमिकल-युक्त चीज़ों को किस नज़रिए से देखता है?

आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ का ही सारा खेल है। बच्चों का शरीर मुख्य रूप से 'कफ' प्रधान होता है, जो उनके विकास के लिए ज़रूरी है। जब आप तेज़ और तीखे केमिकल (जैसे DEET या मॉस्किटो कॉइल का धुआं) इस्तेमाल करते हैं, तो आयुर्वेद इसे 'विषाक्त' (Toxic) मानता है। ये केमिकल्स बच्चों के शरीर में 'पित्त' (गर्मी और जलन) और 'वात' (रुखापन) को भड़का देते हैं। इससे उनकी नाज़ुक त्वचा (रक्त धातु) दूषित हो जाती है। आयुर्वेद हमेशा 'धूपन' (Fumigation) यानी प्राकृतिक चीज़ों का धुआं करने या नीम जैसे सुरक्षित लेप की सलाह देता है। इसका सीधा मतलब है कि जब तक आप बच्चे की उम्र और प्रकृति को नहीं समझेंगे, फायदा नहीं मिलेगा बल्कि उसका 'ओजस' कमज़ोर होगा।

मच्छरों को दूर रखने और त्वचा को सुरक्षित रखने वाले बेहतरीन साथी

प्रकृति ने हमें इन खतरनाक मच्छरों से बचाने के लिए कुछ बेहतरीन चीज़ें दी हैं जो इनका असर प्राकृतिक रूप से दोगुना कर देती हैं:

  • नीम और नारियल का तेल: शुद्ध नारियल तेल में कुछ बूंदें नीम के तेल की मिलाकर बच्चे के हाथ-पैरों पर लगाने से यह मच्छरों का सबसे बड़ा काल बन जाता है और त्वचा को पोषण भी देता है।
  • सिट्रोनेला और लेमनग्रास: ये एसेंशियल ऑयल्स मच्छरों के सेंसर को प्राकृतिक रूप से ब्लॉक कर देते हैं। इन्हें डिफ्यूज़र में डालकर कमरे में रखना बहुत सुरक्षित है।
  • मच्छरदानी (Mosquito Net): यह दुनिया का सबसे बेहतरीन, सुरक्षित और बिना किसी साइड-इफेक्ट वाला 'रिपेलेंट' है। सोते समय बच्चों के लिए इसका इस्तेमाल एक कवच का काम करता है।

वो आम गलतियाँ जो रिपेलेंट के इस्तेमाल के वक्त भारी नुकसान में बदल देती हैं

हम अक्सर जाने-अनजाने में बच्चों की सुरक्षा करते वक्त कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो परेशानी बढ़ा देता है:

  • चेहरे और हाथों पर लगाना: बच्चों की हथेलियों (Palms), आंखों के आस-पास और कटे-छिले घाव पर रिपेलेंट लगाना खतरनाक है। बच्चे तुरंत हाथ मुंह या आंख में डालते हैं।
  • सनस्क्रीन के साथ गलत इस्तेमाल: अगर बच्चे को धूप में जाना है, तो पहले सनस्क्रीन लगाएँ और 15 मिनट बाद रिपेलेंट लगाएँ। कभी भी दोनों को एक साथ मिलाकर न मलें, यह केमिकल रिएक्शन कर सकता है।
  • सोते समय त्वचा पर लगा छोड़ देना: दिन भर रिपेलेंट लगे रहने के बाद, रात को सोने से पहले बच्चे की त्वचा को साबुन और पानी से न धोना सबसे बड़ी गलती है।
  • बंद कमरे में स्प्रे करना: एरोसोल स्प्रे (Aerosol Sprays) को बंद कमरे में छिड़कना और बच्चे को वहीं बैठे रहने देना उनके फेफड़ों में सीधा ज़हर उतारने जैसा है।

बाज़ार में मिलने वाले लिक्विड वेपोराइज़र और कॉइल का रोज़ाना इस्तेमाल कब बन जाता है खतरा?

आजकल लोग समय बचाने और मच्छरों से तुरंत छुटकारा पाने के लिए बाज़ार से लिक्विड मशीन (Vaporizers) या मॉस्किटो कॉइल ले आते हैं और रात भर बंद कमरे में चलाकर छोड़ देते हैं। ये चीज़ें तुरंत इस्तेमाल में तो आसान लगती हैं, लेकिन रोज़ाना इनका भरोसा करना बच्चों के लिए खतरनाक है। एक मॉस्किटो कॉइल से निकलने वाला धुआं 100 सिगरेट के धुएँ के बराबर PM 2.5 पार्टिकल्स छोड़ता है। अगर बच्चा रोज़ यह ज़हरीला धुआं सूंघेगा, तो उसके शरीर को कमज़ोरी और बीमारियों के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

हमेशा फिट और सुरक्षित रखने के लिए इन्हें बच्चों की रूटीन में कैसे ढालें?

बच्चों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ छोटे-छोटे बदलाव करके आप इनका बहुत बड़ा फायदा देख सकते हैं:

  • उम्र के हिसाब से चुनें: 2 महीने तक सिर्फ मच्छरदानी, 2 महीने से 3 साल तक 'रोल-ऑन' (कपड़ों पर) या बहुत माइल्ड प्राकृतिक क्रीम, और बड़े बच्चों के लिए ज़रूरत पड़ने पर ही केमिकल रिपेलेंट (DEET 10-30% से कम वाला) का इस्तेमाल करें।
  • कपड़ों का सही इस्तेमाल: जब भी संभव हो, रिपेलेंट को सीधे त्वचा पर लगाने की बजाय कपड़ों के किनारों (Sleeves, collars) पर लगाएँ।
  • साफ-सफाई का ध्यान: बच्चा जब भी बाहर से खेलकर घर आए, उसे नहलाएँ या उसके हाथ-पैर अच्छे से साबुन से धोएँ ताकि केमिकल शरीर पर लगा न रहे।

आयुर्वेद शरीर की रिकवरी के लिए प्राकृतिक सुरक्षा पर इतना भरोसा क्यों करता है?

आयुर्वेद सिर्फ बीमारी को नहीं छुपाता, बल्कि उसके जड़ तक जाता है। आयुर्वेद यह मानता है कि बचपन के शुरुआती सालों में शरीर के टिशू (धातुएँ) जैसे 'रस' और 'रक्त' बन रहे होते हैं। अगर इसी उम्र में त्वचा के ज़रिए तेज़ रसायन (Toxins) शरीर में डाल दिए जाएँ, तो बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास रुक सकता है। इसलिए नाड़ी वैद्य सर्दियों और गर्मियों में मौसम के अनुसार सुरक्षित धूपन (Fumigation) और नीम-तुलसी जैसे प्राकृतिक रक्षा-कवचों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। आयुर्वेद में आपका लाइफस्टाइल कुछ इस तरह सेट किया जाता है जो बच्चे के शरीर की सातों धातुओं को बाहरी ज़हर से बचाए और इम्यूनिटी को प्राकृतिक रूप से बढ़ाए।

निष्कर्ष 

हमेशा याद रखें कि प्रकृति ने हमें जो कुछ भी दिया है, उसके पीछे एक गहरा विज्ञान छिपा है। आप अपने बच्चे की त्वचा पर जो भी लगाते हैं, उसका सीधा असर उसके शरीर के ब्लड सर्कुलेशन और नर्वस सिस्टम पर पड़ता है। इसलिए 'डेंगू से बचाव' और 'रिपेलेंट के केमिकल' को एक ही चीज़ मानकर इनका अंधाधुंध इस्तेमाल करने की गलती न करें। अपनी इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अपने बच्चे के शरीर की नाज़ुकता को समझें। उम्र और मौसम के हिसाब से बचाव के तरीके बदलें, सही जानकारी जुटाएँ और विज्ञापनों में दिखने वाले जादुई दावों पर आँख बंद करके भरोसा न करें। जब आपका बच्चा बाहरी रसायनों और मच्छरों दोनों से सुरक्षित रहेगा, तो यकीनन वह हर मौसम में पूरी तरह से तंदुरुस्त, एक्टिव और खुश रहेगा।

References:

Usage and Perceived Side Effects of Personal Protective Measures against Mosquitoes among Current Users in Delhi - PMC

The insect repellents: A silent environmental chemical toxicant to the health - ScienceDirect

Human health risks to the use of chemical mosquito repellents: A review

Health hazards of mosquito repellents and safe alternatives

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

बच्चे की उम्र के अनुसार Repellent चुनना चाहिए और हमेशा product label पर दिए निर्देशों का पालन करना चाहिए। DEET, Picaridin या अन्य active ingredients की concentration और उपयोग की उम्र-सीमा अलग-अलग हो सकती है। बहुत छोटे बच्चों के लिए physical protection, जैसे mosquito nets और full-sleeved clothing, विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं।

Repellent को सीधे बच्चे के चेहरे, आंखों, मुंह, हथेलियों या कटे-छिले हुए त्वचा वाले हिस्सों पर नहीं लगाना चाहिए। चेहरे की सुरक्षा के लिए पहले अपने हाथों पर थोड़ी मात्रा लेकर, आंखों और मुंह से दूर रखते हुए सावधानी से लगाया जा सकता है, यदि product label इसकी अनुमति देता हो।

हां, Mosquito Net मच्छरों से बचाव का एक प्रभावी physical barrier है और इसमें त्वचा पर किसी chemical product को लगाने की जरूरत नहीं होती। छोटे बच्चों के सोने के स्थान को मच्छर-मुक्त रखने के लिए इसका उपयोग विशेष रूप से मददगार हो सकता है।

नहीं। Natural या herbal होने का मतलब यह नहीं है कि कोई product हर बच्चे के लिए सुरक्षित होगा। Essential oils और अन्य प्राकृतिक ingredients त्वचा में irritation या allergic reaction पैदा कर सकते हैं। इन्हें इस्तेमाल करने से पहले product की age recommendations और safety instructions जरूर देखें।

अगर Repellent लगाने के बाद लालिमा, खुजली, जलन या rash दिखाई दे, तो product का इस्तेमाल रोक दें और प्रभावित त्वचा को साफ पानी से धो लें। अगर प्रतिक्रिया गंभीर हो, फैल रही हो या बच्चे को सांस लेने में परेशानी हो, तो तुरंत medical help लें।

हां, दोनों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन उन्हें एक साथ मिलाकर नहीं लगाना चाहिए। आमतौर पर Sunscreen पहले और Repellent बाद में लगाया जाता है। दोनों products के label instructions का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण है।

जरूरी नहीं। जब Repellent की जरूरत न रह जाए, तो label instructions के अनुसार त्वचा को धो लेना बेहतर होता है। खासकर यदि बच्चा लंबे समय तक घर के अंदर है और मच्छरों के संपर्क में नहीं है, तो अनावश्यक रूप से product लगाए रखने से बचें।

 इन products का उपयोग करते समय ventilation और product instructions का ध्यान रखना जरूरी है। धुआं या chemical vapour कुछ बच्चों में आंखों, त्वचा या श्वसन तंत्र में irritation पैदा कर सकता है। बच्चे को सीधे धुएं या vapour के संपर्क में रखने से बचें और indoor mosquito control के लिए safer options पर भी विचार करें।

बच्चे को जबरदस्ती उल्टी कराने की कोशिश न करें। Product की packaging अपने पास रखें और तुरंत medical professional या local poison-control service से सलाह लें। अगर बच्चे को सांस लेने में कठिनाई, अत्यधिक सुस्ती, उल्टी या झटके जैसे लक्षण हों, तो emergency medical care लें।

बच्चों को ढीले, शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनाना, घर के आसपास जमा पानी हटाना, खिड़कियों पर screens लगाना और सोते समय Mosquito Net का उपयोग करना मददगार हो सकता है। जरूरत पड़ने पर उम्र के अनुसार उपयुक्त Repellent का इस्तेमाल करें और हमेशा label पर दिए निर्देशों का पालन करें।

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