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Postpartum Depression — माँ बनने के बाद उदासी कब Normal नहीं?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 15 May, 2026
  • category-iconUpdated on 15 May, 2026
  • category-iconMental Health
  • blog-view-icon5005

माँ बनना दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास है, लेकिन कई महिलाओं के लिए यह सफर भयंकर उदासी और डर (Postpartum Depression) लेकर आता है। बच्चे के जन्म के बाद कुछ दिन चिड़चिड़ापन होना 'बेबी ब्लूज़' (Baby Blues) है जो नॉर्मल है, लेकिन अगर यह उदासी हफ्तों तक रहे और बच्चे से दूर जाने का मन करे, तो यह नॉर्मल नहीं है। एलोपैथी में इसके लिए एंटी-डिप्रेसेंट्स (Anti-depressants) दिए जाते हैं जो शरीर को सुन्न कर देते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह 'वात' दोष के भड़कने और 'ओजस' कम होने का परिणाम है। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से इसे जड़ से ठीक करता है।

Postpartum Depression (PPD) असल में क्या है और यह 'बेबी ब्लूज़' से कैसे अलग है?

डिलीवरी के बाद पहले दो हफ्तों तक रोने का मन करना, चिड़चिड़ापन या उदासी 'बेबी ब्लूज़' कहलाती है, जो हार्मोन्स के अचानक गिरने के कारण होती है और अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन जब यह उदासी दो हफ्ते से ज़्यादा खिंच जाए, बहुत ज़्यादा गहरी हो जाए और नई माँ को अपना जीवन या बच्चे की ज़िम्मेदारी एक भयंकर बोझ लगने लगे, तो इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression) कहते हैं। यह कोई मन का वहम या कमज़ोरी नहीं है, बल्कि एक भयंकर मेडिकल और मानसिक स्थिति है। एंटी-डिप्रेसेंट गोलियों का इस्तेमाल सिर्फ दिमाग को कुछ समय के लिए सुन्न करने का बाहरी इलाज है, जबकि असली गड़बड़ी शरीर के अंदर डिलीवरी के बाद कमज़ोर हुए 'ओजस' (Immunity & Vitality) और भड़के हुए वात दोष में चल रही होती है।

Postpartum Depression के भयंकर प्रकार जो एक नई माँ को अंदर से तोड़ देते हैं

डिलीवरी के बाद मानसिक स्थिति के बिगड़ने के मुख्य रूप से तीन भयंकर प्रकार होते हैं:

  • बेबी ब्लूज़ (Baby Blues): यह लगभग 70-80% महिलाओं को होता है। इसमें डिलीवरी के 2-3 दिन बाद अचानक मूड स्विंग्स होते हैं, बिना बात के रोना आता है, लेकिन यह 10 से 14 दिनों में खुद ठीक हो जाता है।
  • पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression): यह बेबी ब्लूज़ से बहुत ज़्यादा भयंकर होता है। यह डिलीवरी के 1 महीने से लेकर 1 साल तक कभी भी भड़क सकता है। इसमें माँ को बच्चे से कोई लगाव महसूस नहीं होता और वह भयंकर अवसाद में डूब जाती है।
  • पोस्टपार्टम साइकोसिस (Postpartum Psychosis): यह सबसे दुर्लभ लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति है। इसमें नई माँ को मतिभ्रम (Hallucinations) होने लगते हैं, आवाज़ें सुनाई देती हैं, और वह खुद को या अपने बच्चे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर सकती है। यह एक भयंकर मेडिकल इमरजेंसी है।

नई माँ में दिखने वाले Postpartum Depression के भयंकर और डरावने संकेत

जब डिप्रेशन दिमाग पर हावी होने लगता है, तो माँ के शरीर और व्यवहार द्वारा दिए जाने वाले भयंकर लक्षण इस प्रकार हैं:

  • लगातार रोना और भयंकर उदासी: बिना किसी कारण के घंटों तक रोना और मन में हमेशा एक भारीपन महसूस करना।
  • बच्चे से जुड़ाव न होना (Detachment): अपने ही नवजात शिशु को देखकर कोई प्यार न आना, उसे गोद में उठाने से कतराना या उसके रोने पर चिड़चिड़ा जाना।
  • भयंकर अपराधबोध (Intense Guilt): खुद को एक 'बुरी माँ' समझना और यह सोचना कि "मैं अपने बच्चे की सही देखभाल नहीं कर पा रही हूँ।"
  • नींद और भूख का गायब होना: बच्चा जब सो रहा हो, तब भी भयंकर बेचैनी के कारण नींद न आना और खाना-पीना बिल्कुल छोड़ देना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत अपनी जाँच कराएँ और चिकित्सक से परामर्श लें।

माँ बनने के बाद भयंकर उदासी और डिप्रेशन घेरने के असली अंदरूनी कारण

डिलीवरी के बाद दिमाग में इस भयंकर उथल-पुथल के पीछे गहरे अंदरूनी कारण होते हैं:

  • हार्मोन्स का अचानक और तेज़ी से गिरना: गर्भावस्था के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन (Hormones) बहुत ज़्यादा होते हैं। डिलीवरी के तुरंत बाद ये 24 घंटे के अंदर भयंकर रूप से गिर जाते हैं, जिससे दिमाग का केमिकल बैलेंस पूरी तरह बिगड़ जाता है।
  • वात दोष का भयंकर असंतुलन: डिलीवरी के बाद गर्भाशय खाली हो जाता है और शरीर में 'वात' (हवा) तेज़ी से बढ़ जाती है। यही भड़का हुआ वात दिमाग में बेचैनी, डर और भयंकर उदासी पैदा करता है।
  • नींद की कमी और भयंकर थकावट: रात-रात भर जागकर बच्चे को दूध पिलाना और टूटी हुई नींद शरीर और दिमाग को भयंकर रूप से थका देती है, जिससे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाता है।
  • धातु क्षय (पोषण की कमी): बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया में माँ के शरीर से बहुत ज़्यादा रक्त और पोषण निकलता है, जिससे शरीर का 'ओजस' सूख जाता है।

Postpartum Depression को 'आम थकावट' मानकर अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

इस भयंकर स्थिति को अगर सिर्फ 'डिलीवरी के बाद की आम कमज़ोरी' मानकर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • क्रोनिक डिप्रेशन (Chronic Depression): अगर इसे जड़ से ठीक न किया जाए, तो यह उदासी हमेशा के लिए माँ के स्वभाव का हिस्सा बन जाती है और ताउम्र गोलियाँ खानी पड़ती हैं।
  • बच्चे के विकास पर भयंकर असर: जब माँ बच्चे से जुड़ नहीं पाती, तो बच्चे का मानसिक और भावनात्मक विकास (Emotional growth) भयंकर रूप से धीमा पड़ जाता है।
  • रिश्तों का टूटना: चिड़चिड़ेपन और उदासी के कारण पति-पत्नी के बीच भयंकर दूरियाँ आ जाती हैं, जो कई बार तलाक का कारण भी बन जाती हैं।

नई माँ की इस भयंकर मानसिक स्थिति पर आयुर्वेद का क्या चमत्कारी नज़रिया है?

आयुर्वेद में इस मानसिक समस्या को 'सूतिका रोग' (Postpartum diseases) और 'मनोवह स्रोतस' (दिमाग की नसों) के दूषित होने से जोड़कर देखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, डिलीवरी के बाद जठराग्नि सुस्त होती है और वात दोष अपनी चरम सीमा पर भड़का हुआ होता है। जब यह वात दिमाग की नसों में प्रवेश करता है, तो यह रजस और तमस गुणों को बढ़ा देता है, जिससे मन में भयंकर डर, शंका और उदासी छा जाती है। जीवा आयुर्वेद के डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं कि उदासी किस दोष की वजह से भड़की है। आयुर्वेद में बस नींद की गोलियाँ देकर माँ को सुलाना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, 'ओजस' दोबारा बने और माँ अपने बच्चे के साथ प्राकृतिक रूप से जुड़ सके।

जीवा आयुर्वेद Postpartum Depression को जड़ से खत्म करने के लिए कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर माँ का शरीर और स्वास्थ्य (प्रकृति) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: माँ को आ रहे बुरे ख्यालों, नींद की कमी और भूख न लगने की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: गर्भावस्था के दौरान की गई देखभाल और ली गई दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: कुपित वात दोष को पकड़ने के बाद ही दिमाग को ताकत देने और हार्मोन्स को प्राकृतिक रूप से बैलेंस करने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

नई माँ के दिमाग को शांत कर 'ओजस' बढ़ाने वाली आयुर्वेद की अचूक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में नसों को ताकत देने, भयंकर तनाव को काटने और हार्मोन्स को संतुलित करने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं (ये दूध पिलाने वाली माताओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं):

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह आयुर्वेद का सबसे चमत्कारी रसायन है। यह भयंकर मानसिक थकान को दूर करता है, 'कॉर्टिसोल' (तनाव हार्मोन) को कम करता है और शरीर में 'ओजस' भरता है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): यह दिमाग की नसों को शीतलता (ठंडक) देती है। यह भड़के हुए वात को शांत कर नई माँ के दिमाग की भयंकर बेचैनी और बुरे ख्यालों को जड़ से खत्म करती है।
  • शतावरी (Shatavari): यह महिलाओं के लिए एक वरदान है। यह न सिर्फ हार्मोन्स को दोबारा रीसेट (Reset) करती है, बल्कि बच्चे के लिए प्राकृतिक रूप से दूध (Breastmilk) की मात्रा भी बढ़ाती है।
  • जटामांसी (Jatamansi): यह एक प्राकृतिक नर्व-रिलैक्सेंट (Nerve relaxant) है, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के रात को बहुत गहरी और चैन की नींद लाती है।

मानसिक तनाव और 'वात' को जड़ से खत्म करने वाली चमत्कारी पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दिमाग को 'रीसेट' (Reset) करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • शिरोधारा (Shirodhara): डिप्रेशन और मानसिक रोगों के लिए यह सबसे अचूक चिकित्सा है। माथे पर एक निश्चित धार से औषधीय तेल गिराया जाता है, जो सीधे पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) को शांत करता है और भयंकर डिप्रेशन को तुरंत धो डालता है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): औषधीय तेलों (जैसे बला तैल) से पूरे शरीर की मालिश की जाती है। यह डिलीवरी के बाद भड़के हुए वात को शांत करता है और शरीर की भयंकर जकड़न व दर्द को मिटाता है।

Postpartum Depression के ट्रिगर्स को खत्म करने वाला सात्विक और शुद्ध आहार

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस नाज़ुक स्थिति में आहार ही आपकी सबसे बड़ी दवा है:

क्या खाएँ?

  • गर्म, सुपाच्य और स्निग्ध भोजन: मूंग दाल की खिचड़ी, दलिया और लौकी का सूप खाएँ। यह आसानी से पच जाता है और शरीर को ऊर्जा देता है।
  • शुद्ध गाय का घी: रोज़ाना खाने में और गर्म दूध में डालकर गाय का शुद्ध घी पिएँ। यह वात को शांत करने और दिमाग की नसों को चिकनाहट देने का सबसे अचूक तरीका है।
  • बादाम और अखरोट: रात को भिगोए हुए मेवे और अजवायन का पानी नई माँ के गर्भाशय को साफ करते हैं और दिमाग को ताकत देते हैं।

क्या न खाएँ?

  • वात बढ़ाने वाली ठंडी चीज़ें: फ्रिज का ठंडा पानी, आइसक्रीम और बासी खाना शरीर में भयंकर वात बढ़ाते हैं, इनका सेवन बिल्कुल बंद कर दें।
  • ज्यादा कैफीन (Coffee/Tea): बहुत ज़्यादा चाय या कॉफी पीने से दिमाग का वात भड़कता है और नींद पूरी तरह टूट जाती है, जो डिप्रेशन को कई गुना बढ़ा देती है।
  • सूखा और जंक फूड: बिस्कुट, पिज़्ज़ा, और रूखा खाना आंतों में भयंकर कब्ज़ करता है, जिसका सीधा असर दिमाग की शांति पर पड़ता है।

जीवा आयुर्वेद में इस मानसिक समस्या की गहराई से जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ डिप्रेशन का टेस्ट देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ और प्यार के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले नई माँ की परेशानी, उसके डर और रोने की वजहों को बिना जज (Judge) किए आराम से सुना जाता है।
  • परिवार और पति के सपोर्ट की स्थिति के बारे में पूछा जाता है।
  • माँ के आहार, बच्चे को दूध पिलाने में आ रही दिक्कत और नींद की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जानकर कमज़ोर 'ओजस' और दूषित वात के स्तर का पता लगाया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

इस भयंकर उदासी से पूरी तरह बाहर आने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर उदासी और डर अभी कुछ हफ्तों से ही शुरू हुआ है, तो जड़ी-बूटियों और सात्विक आहार से 4 से 6 हफ्तों में ही दिमाग शांत होने लगता है और माँ बच्चे से जुड़ने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर डिप्रेशन भयंकर है और माँ को अपने ही बच्चे से चिड़चिड़ाहट होती है, तो वात को पूरी तरह 'रीसेट' होने में 3 से 6 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: माँ अगर जड़ी-बूटियों (ब्राह्मी, अश्वगंधा) और घी का कड़ाई से पालन करती है, तो भविष्य में यह उदासी कभी वापस नहीं आती और वह हमेशा के लिए मानसिक गोलियों से मुक्त हो जाती है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक चिकित्सा (Allopathy) और आयुर्वेदिक उपचार में क्या बड़ा अंतर है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य Anti-depressants से मूड और दिमागी केमिकल्स को नियंत्रित करना ब्राह्मी, शतावरी जैसी जड़ी-बूटियों से मानसिक और शारीरिक संतुलन को सपोर्ट देना
नज़रिया समस्या को मुख्य रूप से सेरोटोनिन असंतुलन से जोड़ना इसे वात प्रकोप, ओजस की कमी और प्रसव के बाद शरीर की कमजोरी से जोड़कर देखना
उपचार तरीका दवाओं और काउंसलिंग से लक्षणों को नियंत्रित करना शिरोधारा, जड़ी-बूटियों, आराम और दिनचर्या सुधार पर ध्यान देना
डाइट और लाइफस्टाइल दवा और मानसिक स्वास्थ्य मॉनिटरिंग पर ज़ोर घी, सूप, पौष्टिक आहार और पर्याप्त आराम को रिकवरी का आधार मानना
लंबा असर कुछ दवाओं के लंबे उपयोग से दुष्प्रभाव हो सकते हैं समग्र स्वास्थ्य, मानसिक शांति और ऊर्जा संतुलन को बेहतर बनाने का प्रयास

डॉक्टर की सलाह कब लें?

अगर उदासी के साथ ये भयंकर और डरावने संकेत दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए:

  • मन में लगातार ऐसे भयंकर ख्याल आएँ कि आप खुद को या अपने मासूम बच्चे को कोई नुकसान पहुँचा दें।
  • ऐसी चीज़ें दिखाई या सुनाई देने लगें जो असल में हैं ही नहीं (Hallucinations - यह Postpartum Psychosis का संकेत है)।
  • भयंकर घबराहट के कारण कई दिनों तक बिल्कुल भी नींद न आए और खाना-पीना पूरी तरह छूट जाए।
  • बिस्तर से उठने, नहाने या अपने बच्चे को दूध पिलाने तक की हिम्मत पूरी तरह खत्म हो जाए।

निष्कर्ष

निष्कर्ष: आयुर्वेद के हिसाब से पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression) सिर्फ दिमाग की कमज़ोरी नहीं, बल्कि डिलीवरी के बाद भड़के हुए 'वात' दोष, कमज़ोर 'ओजस' और हार्मोन्स के अचानक गिरने का भयंकर परिणाम है। एंटी-डिप्रेसेंट गोलियाँ खाकर दिमाग को सुन्न करने से यह उदासी कभी खत्म नहीं होती, बल्कि माँ और बच्चे का रिश्ता कमज़ोर होता है। आयुर्वेदिक इलाज में शरीर और दिमाग की अंदरूनी ताकत बढ़ाना, ब्राह्मी-अश्वगंधा जैसी अचूक जड़ी-बूटियाँ, शिरोधारा और शुद्ध सात्विक आहार सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जिससे नई माँ बिना किसी केमिकल के जीवन भर मानसिक रूप से मज़बूत और खुशहाल रहे।

FAQs

बेबी ब्लूज़ डिलीवरी के बाद कुछ दिनों तक रहता है और अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन अगर उदासी, बच्चे से दूरी और रोने का मन 2 हफ्ते से ज़्यादा बना रहे, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन का भयंकर संकेत है।

हाँ, बिल्कुल 100% सुरक्षित है। आयुर्वेद में शतावरी, ब्राह्मी और अश्वगंधा जैसी प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ दी जाती हैं, जो माँ के दिमाग को शांत करती हैं और दूध की मात्रा को भी बढ़ाती हैं, इसका बच्चे पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता।

हाँ। डिप्रेशन में भड़का हुआ वात दिमाग में नकारात्मक ख्याल लाता है। माँ को लगता है कि वह अपने बच्चे से प्यार क्यों नहीं कर पा रही है, जिससे वह खुद को एक 'बुरी माँ' समझने लगती है, जो सिर्फ इस बीमारी का एक लक्षण है।

बिल्कुल। अश्वगंधा एक शक्तिशाली 'एडेप्टोजेन' (Adaptogen) है जो तनाव हार्मोन (कॉर्टिसोल) के स्तर को भयंकर तेज़ी से घटाता है। यह दिमाग की नसों को ताकत देकर भयंकर थकावट और उदासी को दूर करता है।

हाँ, यह पंचकर्म की सबसे चमत्कारी थेरेपी है। माथे पर गिरता हुआ गुनगुना औषधीय तेल सीधे नर्वस सिस्टम (Nervous system) को शांत कर देता है और नई माँ को ऐसी गहरी शांति देता है जो गोलियों से भी मुमकिन नहीं है।

बिल्कुल। डिलीवरी के बाद बच्चे के लिए बार-बार जागना शरीर के 'वात' दोष को भयंकर रूप से बढ़ा देता है। दिमाग को आराम न मिलने से चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन तेज़ी से हावी हो जाते हैं।

सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। यह कोई मन का वहम नहीं है। पति और परिवार को माँ को भावनात्मक सपोर्ट देना चाहिए, बच्चे की देखभाल में मदद करनी चाहिए और उसे ताने मारने के बजाय उसके इलाज में साथ देना चाहिए।

हाँ। अगर आपको पहले बच्चे के समय पोस्टपार्टम डिप्रेशन हुआ था, तो दूसरे बच्चे के समय इसका खतरा और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। इसलिए पहले से ही आयुर्वेदिक 'ओजस' बढ़ाने वाली डाइट शुरू कर देनी चाहिए।

बिल्कुल नहीं। कॉफी में कैफीन होता है जो शरीर को कुछ देर के लिए झूठी ऊर्जा देता है, लेकिन बाद में यह 'वात' दोष को भड़काकर बेचैनी, दिल की धड़कन और नींद न आने की समस्या को भयंकर रूप से बढ़ा देता है।

नहीं! आप बिल्कुल भी बुरी माँ नहीं हैं। यह एक शुद्ध रूप से शारीरिक और हार्मोनल असंतुलन (वात प्रकोप) है। जिस तरह बुखार आने पर इंसान कमज़ोर होता है, वैसे ही यह भी एक बीमारी है जिसका जड़ से इलाज संभव है।

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